काशीकथा विशेष..

विविधा..

बाबू हरिश्चन्द्र को क्यों लिखना पड़ा-‘देखी तुम्हरी काशी लोगों’

हिन्दी खड़ी बोली के उन्नायक बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र काशी की अक्षुण्ण साहित्यिक परम्परा के वटवृक्ष हैं; वह वटवृक्ष जिसे अपने जीवन में भले ही...

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की भूमि दान की नहीं

आम लोगों में यह भ्रामक धारणा आज भी बनी हुई है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर की भूमि महाराज बनारस ने दान में दी...

इसलिए कहते हैं- काशी को प्राचीनतम नगरी

वाराणसी भारतीय इतिहास एंव संस्कृति का एक प्रतिनिधि शहर है। यह काशी महाजनपद की राजधानी के रूप में ख्यात् था। काशी का उल्लेख विविध...

इतिहास के झरोखे में काशी की विरासत

ग्रन्थों में जो सन्दर्भ मिलते हैं उसमें बनारस के बारे में माइथालॉजिकल आधार होता है। हिन्दू माइथालॉजी का मानना है कि बनारस शिव के...

ये हैं- काशी की ‘साढ़े तीन हवेलियां’

आज के इस दौर में गगनचुम्बी ईमारतें, बंग्लो और बड़े मकानों का जाल सा बिछा हुआ है। इतनी खासियत सुख सुविधाओं के बाद भी...

कहानी क्वींस कालेज की

-डॉ०भानुशंकर मेहता वाराणसी को "सर्वविद्या की राजधानी" कहा गया है। अनादिकाल से देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ विद्या अर्जन करने आते रहे हैं। राजा दिवोदास का...

भोजपुरी सिनेमा और काशी

वर्ष 2013 में भारतीय सिनेमा ने अपने सौ वर्ष पूरे किये साथ ही भोजपुरी सिनेमा ने अपना अर्द्धशतक लगाया। 1963 में प्रदर्शित विश्वनाथ शाहाजादी...

साक्षात्कार

लोगों ने पसंद किया तो बस लिखता गया – मनु शर्मा

ऐतिहासिक व पौराणिक आख्यानों से नायकों के चरित्रा को लोक के निकट उपस्थित कर अद्भुत, आकर्षक व अनुकरणीय चित्रा बनाने वाले चितेरे को लोग...

पारंपरिक शान का शहर है बनारस – तरूण कांति बसु

बनारस एक आम शहर नहीं है। यह अपने आप में एक धरोहर है। गंगा किनारे बसे इस शहर की गलियां, घाट, मंदिर, मस्जिद, भवन...

बचाना होगा काशी के जलतीर्थों को – सुरेन्द्र नारायण गौड़

उम्र पाना एक पहलू है, उम्र जीना दूसरा पहलू। उम्र बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है पर उम्र जीना हमारी समझ, अपनी दृष्टि, अपने बोध...

बदलाव में कहीं खो न जाये बनारस – नीलकण्ठ पुरुषोत्तम जोशी

काशी भले ही धनवान न रही हो लेकिन विद्वता और विद्वानों के मामले में तो यह नगर सदियों से समृद्ध रहा है। इस प्राचीन...

चलाना होगा मूल्य शिक्षा का अभियान – कमलाकर मिश्र

आज समाज में चारो तरफ विसंगतियों के चित्रा ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। ध्यान से देखें तो सबकी जड़ों में मूल्यों का अभाव जान पड़ता...

हस्तक्षेप

अभी अभी..