बाबू हरिश्चन्द्र को क्यों लिखना पड़ा-‘देखी तुम्हरी काशी लोगों’

हिन्दी खड़ी बोली के उन्नायक बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र काशी की अक्षुण्ण साहित्यिक परम्परा के वटवृक्ष हैं; वह वटवृक्ष जिसे अपने जीवन में भले ही कम साँसें मिली हों लेकिन हिन्दी साहित्य और भारतीय समाज को अपनी रचनाधर्मिता से चिरसंजीवनी देने वाले काशी के सपूत ने साहित्य सेवा के लिए अपना सर्वस्व लुटा दिया। बाबू हरिश्चन्द्र अक्सर कहा करते थे- ‘इस सम्पत्ति ने हमारे पूर्वजों को खाया है अब इसे हम समाप्त करेंगे।’ बनारस और बनारसीपन बाबू हरिश्चन्द्र के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा था। वैसे भी कबीरदास में जो अक्खड़पन और बेबाकी देखने को मिलती है वो असल में न केवल कबीर की बेबाकी है बल्कि बनारस शहर की अपनी तासीर है। यह बेबाकी उसी के अन्दर प्रविष्ट हो सकती है जो पूरी तरह से बनारस को जीने लगता है। साफ है जब कोई शख्सियत एक शहर को जीने लगे तो फिर उसकी अभिव्यक्ति निजी न होकर सर्वथा सार्वजनिक उद्गार बन जाती है। यथार्थ की अच्छाई और बुराई को उससे अच्छा भला और कौन आवाज दे सकता है?

भारतेन्दु जी ने जहां एक ओर काशी की साहित्य-सरिता को अपने सृजनधर्मिता से नयी गति दिया वहीं काशी के तत्कालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों व मूल्यों की क्षरित होती परिपाटी पर बेचैन होकर बेबाकी के साथ प्रहार किया और यह प्रहार शब्द चित्रों के माध्यम से इतना करारा हो गया कि कालांतर में यह कहीं मुहावरे के रूप में तो कहीं नारे के रूप में प्रयोग होने लगा। खुद पढ़िये, बाबू हरिश्चन्द्र की बेबाक व निर्भीक कविता- ‘देखी तुम्हरी काशी लोगों’।

देखी तुमरी कासी

         देखी तुमरी कासी, लोगों, देखी तुमरी कासी।

         जहाँ विराजैं विश्वनाथ विश्वेश्वरजी अविनासी।।

         आधी कासी भाट भंडेरिया बाम्हन औ संन्यासी।

         आधी कासी रंडी मुंडी राँड खानगी खासी।।

         लोग निकम्मे भंगी गंजड़ लुच्चे बे-बिसवासी।

         महा आलसी झूठे शुहदे बे-फिकरे बदमासी।।

         आप काम कुछ कभी करैं नहिं कोरे रहैं उपासी।

         और करे तो हँसैं बनावैं उसको सत्यानासी।।

         अमीर सब झूठे और निंदक करें घात विश्वासी।

         सिपारसी डरपुकने सिट्टू बोलैं बात अकासी।।

         मैली गली भारी कतवारन सड़ी चमारिन पासी।

         नीचे नल से बदबू उबलै मनो नरक चौरासी।।

         कुत्ते भूँकत काटन दौड़ें सड़क साँड़ सों नासी।

         दौड़ें बंदर बने मुछंदर कूदैं चढ़े अगासी।।

         घाट जाओ ते गंगापुत्तर नोचैं दै गल फाँसी।

         करैं घाटिया बस्तर-मोचन दे देके सब झाँसी।।

         राह चलत भिखमंगे नोचैं बात करैं दाता सी।

         मंदिर बीच भँडेरिया नोचैं करैं धरम की गाँसी।।

         सौदा लेत दलालो नोचैं देकर लासालासी

         माल लिये पर दुकानदार नोचैं कपड़ा दे रासी।।

         चोरी भए पर पुलिस नोचें हाथ गले बिच ढाँसी।

         गए कचहरी अमला नोचैं मेचि बनावैं घासी।।

         फिरैं उचक्का दे दे धक्का लूटैं माल मवासी।

         कैद भए की लाज तनिक नहिं बे-सरमी नंगा सी।।

         देखी तुमरी कासी भैया देखी तुमरी कासी।।

– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र