काशी में अखाडा

19 posts

काशी में एक जमाने में ‘धूर’ को लोग अपना आभूषण मानते थे। दो घंटे ‘धूर’ में ‘लोटाई’ न की तो चैन कहाँ। गमछा उठाया, लँगोट पहना और चले अखाड़े की ‘धूर’  में लोटने। ‘लँगोट की मजबूती’  का मुहावरा आज भी यहाँ प्रसिद्ध है लेकिन समय बदला, युग बदला, परिवेश बदला। इसी के साथ ‘धूर’ का महत्व भी कम होता गया। उस समय बनारस के युवकों में अखाड़े जाने की होड़ थी। हर वर्ग के युवक ‘धूर’ पोतने जाते। पहलवानी करना प्रतिष्ठापरक माना जाता। किसी परिवार में अगर कोई नामी पहलवान निकला तो उसकी प्रतिष्ठा दोगुनी हो जाती। लेकिन खेद है अब पहलवानी का शौक बनारस के अहीर जाति के लोगों तक ही सिमटता जा रहा है। बहुत कम दूसरे वर्गों के लोग पहलवानी में लगे मिलेंगे। नयी सभ्यता, नया युग इस कला पर भी हावी हो रहा है। आज बनारस में मल्ल कला का जो भविष्य है उसे यह डर लगता है कि कहीं यह टूटती श्रृंखला की कड़ी तो बन कर नहीं रह जायेगी। ढेर सारे अखाड़ों में कितने पहलवानों ने इधर काशी का नाम रोशन किया? कितने पहलवान अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खरे उतरे? सम्भवतः वर्तमान समय में उन्हें अँगुलियों पर गिना जा सकता है। बनारस में अखाड़ों की संख्या बहुत है। कहा यह जाता था कि यहाँ पहले मुहल्ले-मुहल्ले में अखाड़े थे। लेकिन कुछ अखाड़े समय के साथ हाशिये में मिट गये। फिर भी अभी अखाड़ों की संख्या बहुत है।