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संगीत

काशी की अपनी एक विशेषता है। इस विशेषता में संगीत एक महत्त्वपूर्ण कड़ी रही है। भगवान शिव के ताण्डव नृत्य के अभिव्यक्ति में और उसमें धारण किये हुए डमरू के ध्वनि से संगीत व नृत्य कला का स्रोत माना जा सकता है। संगीत स्थान, समय, भाव व्यक्ति के अंदर तरंगो की उच्च अवस्था से संगीत में अंतर्निहित विभिन्न स्वरूपों की रचना होती है और वो विभिन्न रूपों में भावाभिव्यक्त होती है। काशी में संगीत की परम्परा काफी पुरानी है लेकिन आज का संगीत ध्रुपद, ख्याल, ठुमरी आदि का स्वरूप प्राचीन संगीत का परिष्कृत विकसित स्वरूप है। काशी में प्राचीनकाल से ही संगीत की प्रतिष्ठा ‘गुथिल’ जैसे संगीतज्ञों ने की थी। जातक कथा के अनुसार ये वीणा बजाने में सिद्धहस्थ थे। 14वी सदी में हस्तिमल द्वारा रचित नाटक ‘विक्रांत कौरवम्’ में काशी के संगीत का वर्णन मिलता है। 16वीं सदी में काशी के शासक गोविन्द चन्द्र के समय गणपति अपने कृति ‘माधवानल कामकंदला’ में नाचगाना, कठपुतली का तमाशा और भाँड का विवरण देते हैं। चैतन्य महाप्रभु का भजन-कीर्तन और महाप्रभु वल्भाचार्य का हवेली संगीत आज भी काशी में जीवंत है। इसी काशी में तानसेन के वंशज काशीराज दरबार की शोभा थे।

काशी में संगीत साधकों की साधना बहुत पहले से ही चली आ रही है। इसी के फलस्वरूप काशी संगीत की जन्मभूमि और कई साधकों की कर्मस्थली रही है। काशी में धार्मिक वातावरण तथा सांस्कृतिक परिवेश ने संगीत के कलाकारों को अपनी प्रतिभा मांजने एवं प्रदर्शित करने का श्रेष्ठ अवसर प्रदान किया है।

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