बचाना होगा काशी के जलतीर्थों को – सुरेन्द्र नारायण गौड़

उम्र पाना एक पहलू है, उम्र जीना दूसरा पहलू। उम्र बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है पर उम्र जीना हमारी समझ, अपनी दृष्टि, अपने बोध पर आधारित है। ऐसे ही सिद्धान्तों को आत्मसात कर अपनी उम्र से कहीं ज्यादा जीवन जी रहे हैं सुरेन्द्र नारायण गौड़। जी हाँ! फिर बात चाहे नगर निगम की सम्पत्तियों पर भू-माफिया के कब्जे को लेकर हो या बनारस के लुप्त 75 धार्मिक कुण्ड व तालाबों की हो या फिर सी0बी0एस0ई0 बोर्ड से बिना मान्यता लिए अवैध स्कूलों के विरूद्ध मुहिम की हो ’जनाधिकार एवं स्वापक निषेध अपराध नियंत्राण ब्यूरो‘ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री गौड़ ऐसे सभी जगह पर मजबूती से खड़े दिखेंगे। 1975 के जे0पी0 आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा कर चुके श्री गौड़ के सेवा क्षेत्रा में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए 2011 में ’काशी रत्न‘ अलंकरण से सम्मानित भी किया गया।

अपनी प्रारम्भिक पृष्ठ भूमि और प्रारम्भिक जीवन के बारे में बतायें।

शिक्षक दिवस (5 सितम्बर 1938) को गाजीपुर में मेरा जन्म हुआ। पिता श्री प्रसिद्ध नारायण गौड़ राजकीय सिटी स्कूल गाजीपुर में प्रिंसिपल थे। अध्यापकीय परिवेश के कारण अनुशासन व दायित्व के प्रति गंभीरता बचपन से ही आ गयी। प्रारम्भिक तथा हाईस्कूल तक की शिक्षा मैंने गाजीपुर में ही पूरी की। इण्टरमीडिएट की शिक्षा वाराणसी के कमच्छा स्थित इण्टर कालेज से पूरी की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आई0टी0 से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद हिन्डाल्को रेनूकूट में इंजीनियर के रूप में सेवा शुरू की।

इंजीनियरिंग के साथ सोशल इंजीनियरिंग की तरफ आपका रूझान कैसे हुआ और आपके द्वारा क्या प्रयास किये गये ?

लोग एक ओर जहां इंजीनियरिंग की नौकरी के साथ ही विलासितापूर्ण जीवनशैली की तरफ भागने लगते हैं, वहीं मैंने समाज में व्याप्त अनाचार की तरफ आवाज उठाना शुरू किया। बिड़ला ग्रुप को सरकार की तरफ से मिल रही बिजली में रियायत अनुचित लगी। मैंने तत्कालीन समय में चल रहे एल्युमिनियम कम्पनियों के आंकड़े इकट्ठा कर यह निष्कर्ष निकाला कि बिड़ला ग्रुप को अनैतिक लाभ पहुंचाया जा रहा है, जिसका भार जनता पर पड़ेगा। मैंने इसके खिलाफ विभिन्न अखबारों में सम्पादक के नाम पत्र लिखकर सूचना दिया। विज्ञापन की अंधी दौड़ में शामिल समाचार पत्रों ने उनके इस विरोध पर ध्यान ही नहीं दिया।

आबादी बढ़ने और नगर विस्तार के साथ अतिक्रमण की मानसिकता के कारण एक ओर तो जलाशयों को माफिया तत्वों द्वारा उनके प्राकृतिक स्वरूप से वंचित करने का सुनियोजित, षडयंत्रापूर्ण अभियान चलाया गया तो दूसरी ओर भूमाफियाओं ने उन पर कब्जा कर जल सप्लाई लाईन को हमेशा के लिए बाधित कर दिया।

कहा जाता है कि एक बार जब तीर धनुष से निकल जाती है तो वह वापस नहीं आती इसी तरह मैं भी भ्रष्टाचार की लड़ाई में कूद पड़ा। अपने अभियान को जोर देने के लिए नौकरी के दौरान ही मैंने सोनभद्र से ‘विष-अमृत’ नामक अखबार निकालना शुरू किया। मैट्रिक पास सारनाथ सिंह नामक व्यक्ति को अपने अखबार का सम्पादक बनाया और स्वयं अखबार के लिए लिखना शुरू किया। अपने अखबार को वाराणसी के दारानगर में छपवाता था और आज अखबार के भीतर रखकर सोनभद्र में प्रसारित कराता था। अखबार में खबर की बढ़ती रफ्तार के प्रभाव को देख कम्पनी द्वारा मुझे लगातार निकाले जाने की धमकियाँ मिलीं। यहां तक कि 15 लाख रूपये की मानहानि का भी नोटिस मिला। कुल चार साल तक चले इस अखबार से मैंने तत्कालीन परिस्थितियों में व्याप्त-भ्रष्टाचार के मुद्दे को पूरी तन्मयता से उठाया परन्तु सहयोगियों के द्वारा कम्पनियों से अवैध वसूली व पीत पत्रकारिता का ग्रहण लगने पर अखबार को छोड़ना पड़ा।

आपने किसी स्वयंसेवी संस्था का गठन भी किया है?

मानव-अधिकारों की रक्षा एवं स्वापक निषेध के लिए भी मैंने एक संस्था का गठन किया। वर्तमान के 33 वकीलों के पैनल वाले इस संस्था के पदेन नियंत्रक आई0जी0 हैं। संस्था के गठन का उद्देश्य है कि एक स्वतंत्र जांच ब्यूरो हो जो सरकार की भी मदद करे। प्रारम्भ में इस संस्था का नाम मानवाधिकार एवं स्वापक निषेध अपराध नियंत्रण जांच ब्यूरो था, परन्तु 1995 में सरकार द्वारा किसी भी संस्था में मानवाधिकार शब्द के प्रयोग पर रोक लगने के बाद इस संस्था का नाम बदल कर जनाधिकार एवं स्वापक निषेध अपराध नियंत्रण जांच ब्यूरो रख दिया गया। इस संस्था द्वारा मैंने ड्रग माफियाओं पर नकेल कसने का काम किया।

कुण्डों व तालाबों को बचाने के लिये आपके द्वारा काफी काम किया जा रहा है । बनारस के लिये आगर आप को कुण्डों और तालाबों का भगीरथ कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है ?

काशी में जैसे मुहल्ले-मुहल्ले में मन्दिर स्थित है वैसे ही थोड़ी-थोड़ी दूर पर एक से बढ़कर एक जलतीर्थ और कुण्ड विद्यमान हैं। इनका धार्मिक महत्व तो है ही, साथ ही शहर के प्राकृतिक स्वरूप को ये कुण्ड और सरोवर संतुलित रखते थे। वाराणसी के पूरे क्षेत्र का तीन चौथाई इलाका वनाच्छादित जलाशयों का था। इसका प्रमाण प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स प्रिंसेप द्वारा 1822 में प्रस्तुत मानचित्र में भी मिलता है। मैंने काशी की इन विरासतों को बचाने के लिए स्वयं के खर्चें पर कुण्डों एवं तालाबों के दस्तावेज निकलवाये तथा न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। एक महत्वपूर्ण मुहिम के अंतर्गत वर्ष 1999 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के री-स्टोरेशन एक्ट 1952 के तहत अभियान शुरू किया है जिसमें 1952 के बाद पाटे गये सभी तालाबों को पुनः खुदवा कर उन्हें री-स्टोर किये जाने का आदेश था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के निर्णय 207 (103) आर0डी0 473 के अनुसार जलाशयों के संरक्षण हेतु 2007 में हाई पावर कमेटी का गठन किया गया जिसके पदेन अध्यक्ष जिलाधिकारी और सचिव नगर आयुक्त होते हैं व आई0जी0 (पुलिस) पदेन संरक्षक हैं। इस पंजीकृत संस्था के अन्तर्गत सूचीबद्ध 63 कुण्ड व तालाब हैं जिन्हे अतिक्रमण मुक्त कर रीस्टोर किया जाना है। वर्ष 2009-10 में तत्कालीन जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय ने तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए एक्शन टेकेन रिपोर्ट तैयार कराया; जिसमें कुल 72 तालाबों की स्टेटस रिपोर्ट मजिस्टेट की अध्यक्षता में वाराणसी नगर निगम क्षेत्र के अन्तर्गत चार टीमों का गठन किया, जिसमें वाराणसी विकास प्राधिकारण, नगर निगम व सदर तहसील के अधिकारियों को लिया गया तथा निर्देश दिया गया कि क्षेत्र के पटे तालाबों का सत्यापन कर राजस्व अभिलेखों व नगर निगम अभिलेखों में सरकारी सम्पत्ति के रूप में दर्ज करने, उनके स्वामित्व सम्बन्धी विसंगतियों को दूर कर उनकी पैमाइश/सीमांकन कर अतिक्रमण हटाने, अतिक्रमणकारियों के विरूद्ध कठोर, दण्डात्मक कार्यवाही कर उन्हें जुलाई 1952 की स्थिति में बहाल किया जाय। वर्तमान में इस हाईपावर कमेटी की समीक्षा बैठक बंद हो गयी है, जिसके कारण भूमाफियाओं के गठजोड़ से नगर के सार्वजनिक तालाबों को पाटा जा रहा है और प्लाटिंग कर उच्च दामों में बेचा जा रहा है। इसमें तुलसीपुर तालाब आराजी नं0 221 पाटकर भवन निर्माण हो रहा है। सुकुलपुरा स्थित शुष्केश्वर तालाब आराजी नं0 124 व 652 प्लाटिंग कर बेचा जा रहा है। मौजा लोहता के तालाब आराजी नं0 7/1 व 7/1 क का रकबा 8 एकड़ राजस्व रिकार्ड में सार्वजनिक तालाब दर्ज है, दबंगों द्वारा पाटा जा रहा है। सगरा तालाब आराजी नं0 89 शिवपुरवाँ रकबा 5.88 एकड़ मौके पर 4.85 एकड़ पर तालाब में पानी है, तथा शेष 1.03 एकड़ को पाटकर अवैध कब्जा कर लिया गया। हरतीरथ तालाब (हंस तीर्थकुण्ड) आराजी नं0 1868 पक्का तालाब वाराणसी विकास प्राधिकारण द्वारा पाटकर बी0एस0एन0एल0 को बेच दिया गया। ओंकालेश्वर महादेव का सुन्दर पक्का तालाब (आराजी सं0 233 रकबा एक बीघा एक बीस्वा) जो छित्तनपुरा मुहल्ले में था एकता नगर कालोनी बनाकर बेच दिया गया। च्यवनेश्वर तालाब-लहरतारा, जहाँ वर्तमान में सनबीन स्कूल है, सनबीम वरूणा भी इसी तरह वरूणा नदी को अतिक्रमित कर बनाया गया। पुनः तुलसीपुर तालाब। ऐसे ही एक लम्बी श्रृंखला है, जिन्हें संरक्षित करने एवं सुरक्षित करने में ही बनारस बचेगा।

कुण्डों व तालाबों पर हो रहे अतिक्रमण के बाद काशी में आप इन जल तीर्थों का अस्तित्व किस तरह से देखते हैं?

बढ़ती आबादी तथा कंक्रीट की जंगलों के फैलाव के बावजूद वाराणसी के कुण्डों का स्वरूप अभी कायम है। लेकिन जिस तरह से इनकी उपेक्षा की जा रही है उससे यही आभास होता है कि एक समय स्वच्छ जल से लबालब भरे और नगर के जल आपूर्ति के भण्डार रहे ये कुण्ड जल्दी ही काल के निष्ठुर गाल में समा जायेंगे। शहर के घनी आबादी के बीच दो विशाल कुण्ड, दुर्गाकुण्ड व लक्ष्मी कुण्ड का धार्मिक महत्व होते हुए भी ये उपेक्षित है। अब तक शासन व प्रशासन ने इनके रख-रखाव व संरक्षण के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई। कुण्डों तथा जलाशयों के कारण न तो शहर में वर्षा का पानी लगता था न कभी पेयजल का संकट होता था। क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में जलाशयों की भरमार थी और वहां तक वर्षा के पानी को आबाध पहुंचने का मार्ग भी था। किन्तु आबादी बढ़ने और नगर-विस्तार के साथ अतिक्रमण की मानसिकता के कारण एक ओर तो जलाशयों को माफिया तत्वों द्वारा उनके प्राकृतिक स्वरूप से वंचित करने का सुनियोजित, षडयंत्रपूर्ण अभियान चलाया गया तो दूसरी ओर भूमाफियाओं ने उन पर कब्जा कर जल सप्लाई लाइन को हमेशा के लिए बाधित कर दिया। पानी आपूर्ति ठप हो जाने से तालाब व पोखरे सूख गये साथ ही भू-जल स्तर घटकर 30 से 40 फीट के बजाय 100 फीट से नीचे चला गया है। यदि स्थानीय प्रशासन इन श्रोतों का संरक्षण कर वास्तविक कब्जा के लिए उपाय करे तो इससे अनेक तरह का लाभ होगा और सबसे बड़ा फायदा तो पानी के संकट को एक सीमा तक दूर किया जा सकता है। धार्मिक पौराणिक व लोगों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण जलतीर्थों के अस्तित्व की लड़ाई में जागरुक नागरिकों को भी कारगर पहल करनी होगी, वरना वह दिन दूर नहीं जब इनका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जायेगा।

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