इस ‘क्योटो’ में धरोहरों पर कब्जे बहुत हैं

विडंबना देखिए कि जिस शहर बनारस की ताकत हस्तक्षेप से जानी जाती थी वहां अतिक्रमण सामर्थ्य का नया पैमाना बन चुका है। बेरोक-टोक ऐतिहासिक धरोहरों, सार्वजनिक स्थानों एवं सरकारी भू-भागों पर लगातार अतिक्रमण जारी है। कहीं नये मन्दिर बनाकर तो कहीं पुराने मन्दिरों को सजाकर, कहीं सेवा के बहाने तो कहीं सहयोग की दुहाई देकर। कुण्डों और तालाबों को पाटकर किसी ने प्लाट तैयार कर लिये हैं तो कोई स्कूल समूह का महाप्रबंधक।

बनारस को प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त हुआ या फिर नरेन्द्र मोदी को काशी से सांसद बनने का; इन दोनों बातों में मत विभिन्नता हो सकती है, लेकिन काशी को समय के साथ विकास और संचार की आवश्यकता है और इसे स्वच्छ-सुन्दर काशी बनाया जाना चाहिए, इस बात में कोई मतभेद नहीं है। हाँ! यह जरूर है कि कुछ लोग काशी को क्योटो की तरह बनाने की तरफदारी कर रहे हैं, तो कुछ लोग इससे भी आगे बढ़कर जुमले उछाल रहे हैं कि “क्यों न काशी को ऐसा बनाया जाय कि क्योटो काशी का अनुकरण करने लगे”। इसे मात्र शब्दों का फेर कह सकते हैं; इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। लब्बो-लुआब यह कि काशी का समग्र विकास और उसके सांस्कृतिक स्वरूप का संरक्षण ही अभीष्ट है। दुर्भाग्य है कि अभी तक यह विमर्श जुबानी से ज्यादा कुछ नहीं है। हां! यह जरूर है कि कुछ हजार करोड़ की अलग-अलग परियोजनाएं बनारस के खाते में जरूर आ चुकी हैं, लेकिन सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि “अनुवर्तन का रास्ता और सपनों की काशी का स्वरूप किस रास्ते और कितने समय में सफलता की सीढ़ियां चढ़ पायेगा?” यह सवाल जरुर मजेदार होगा कि काशी-क्योटो का यह वादा पाँच साल का था या पाँच बार का? लेकिन अगर पाँच साल का है तो चार वर्ष लगभग पूरा होने को है, तब की स्थिति में क्योटो समर्थकों के लिए उसकी बानगी खतरनाक भी है और सोचने को विवश करने वाली भी।

विडंबना देखिए कि जिस शहर बनारस की ताकत हस्तक्षेप से जानी जाती थी वहां अतिक्रमण सामर्थ्य का नया पैमाना बन चुका है। बेरोक-टोक ऐतिहासिक धरोहरों, सार्वजनिक स्थानों एवं सरकारी भू-भागों पर लगातार अतिक्रमण जारी है। कहीं नये मन्दिर बनाकर तो कहीं पुराने मन्दिरों को सजाकर, कहीं सेवा के बहाने तो कहीं सहयोग की दुहाई देकर। कुण्डों और तालाबों को पाटकर किसी ने प्लाट तैयार कर लिये हैं तो कोई स्कूल समूह का महाप्रबंधक। महमूरगंज स्थित बिरला बगीचा एवं तुलसीपुर का तालाब अभी तुरंत के अतिक्रमण की दो बड़ी घटनाएं हैं जहां अतिक्रमणकारी खुद प्रदेश सरकार के बड़े अधिकारी एवं ऊँची रसूख वाले हैं। बजरडीहा स्थित देव पोखरी विगत वर्षों में इसी प्रकार अतिक्रमण की नीयत से दर्जनों ट्रैक्टर लगाकर मिट्टी से पाटी जा रही थी। बीच तालाब में एक ट्रैक्टर फंस जाने से मामला प्रकाश में आया और प्रशासन के कान पर थोड़ी बहुत जूं रेगने की प्रक्रिया शुरू हुई। यूँ तो अतिक्रमणकारियों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। ‘स्वनामधन्य’ लोगों की इतनी लम्बी सूची कि सहसा विश्वास ही न हो कि ये तथाकथित ‘बड़े लोग’ भी अतिक्रमण के ‘गोरखधंधे’ में इतनी गहराई तक डूबे हुए हैं। कुण्डों-तालाबों एवं बड़े बगीचों को रातो-रात काटकर बहुमंजिली इमारत का जाल बना देने को आतुर बाजारू आधुनिकता की दौड़ के अंधे पुजारी अहर्निश अपने अतिक्रमण-अभियान में बेधड़क लगे हुए हैं।

कुण्डो, तालाबों और सार्वजनिक स्थानों ही नहीं बल्कि पुस्तकालयों और मन्दिरों के साथ ही ऐतिहासिक सांस्कृतिक महत्व की धरोहरों की विरासत को भी अतिक्रमण के आतंक से अपने आगोश में ले रहे हैं धृष्ट लोग अब तो शहर के सम्मानित लोगों की सूची में शामिल होने को आतुर भी दिखने लगे हैं।  कुण्डो, तालाबों, मन्दिरों एवं सुरम्य बाग-बगीचों की वजह से ही शायद काशी का अतिप्राचीन नाम आनंद-कानन रखा गया होगा। लेकिन अपने स्वार्थ में प्रकृति और पर्यावरण को भूल चुके, इतिहास व संस्कृति से खिलवाड़ करने को आतुर दुर्जन शक्तियों का मनोबल इस कदर बढ़ चुका है कि अब शहर की धरोहरें महफूज नहीं दिखतीं। अतिक्रमण की बढ़ती घटनाएं केवल प्रशासन की उदासीनता और मिलीभगत का परिणाम ही नहीं हैं, बल्कि इसके साथ ही जनमानस की बढ़ती बाजारवादी सोच और कभी स्वार्थवश तो कभी भयवश चुप रहने और हस्तक्षेप न करने की बढ़ती संस्कृति का परिणाम भी हैं। गंगा, वरूणा और अस्सी नदियों के किनारे तो अतिक्रमणकारियों के पसंदीदा स्थान घोषित हो चुके हैं। 200 मीटर परिक्षेत्र में नये निर्माण का आदेश मजाक बनकर रह गया है। बी0एच0यू0, विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द सरीखे बड़े संस्थानो की भी कई संपत्तियां अतिक्रमण की भेंट चढ़ते चली जा रही हैं।

कुल मिलाकर ‘अतिक्रमण की संख्या बहुत है, अतिक्रमणकारी ऊँचे रसूख वाले हैं, प्रशासन मिला है, उदासीन है या फिर समर्पित है?” इसमें जितनी सच्चाई है, उससे बड़ी सच्चाई यह है कि इस अतिप्राचीन जीवंत सांस्कृतिक नगरी को क्योटो बनाने का सपना देखने और दिखाने वाले ‘टोको’ (हस्तक्षेप) की काशिका संस्कृति को भूल चुके हैं।

कुल मिलाकर ‘अतिक्रमण की संख्या बहुत है, अतिक्रमणकारी ऊँचे रसूख वाले हैं, प्रशासन मिला है, उदासीन है या फिर समर्पित है?” इसमें जितनी सच्चाई है, उससे बड़ी सच्चाई यह है कि इस अतिप्राचीन जीवंत सांस्कृतिक नगरी को क्योटो बनाने का सपना देखने और दिखाने वाले ‘टोको’ (हस्तक्षेप) की काशिका संस्कृति को भूल चुके हैं। यह भी सच है कि हस्तक्षेप करने वालो की संख्या मुठ्ठी भर है; या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें अंगुली पर गिना जा सकता है और वही दूसरी तरफ अतिक्रमण करने वालों की संख्या अनगिनत है। लेकिन वह समय जरूर आ चुका है जब “काशी को क्योटो बनाने” का सपना देखने वाले और “काशी काशी ही रहे” इस तरह सोचने वाले दोनों प्रकार के लोगों को यह तय करना पड़ेगा कि वह अनगिनत स्वार्थलोलुपों के समर्थन में खड़े हैं, या फिर हस्तक्षेप के पाले में। हाँ! यह बात जल्दी ही तय करनी होगी, क्योंकि बनारस के बारे में कहा गया है कि यह शहर थोड़े समय के लिए अव्यस्था की स्थिति में जरूर रह सकता है लेकिन अनिर्णय की स्थिति में कभी भी नहीं रहता।

काशीकथा का यह अभियान न केवल धरोहरों के बखान के लिए समर्पित है बल्कि साथ ही साथ धरोहरों के संरक्षण और इस निमित्त आवश्यक मजबूत हस्तक्षेप की शुरूआत व समर्थन के लिए भी चलाया जा रहा है। आइये हम सब इस पुनीत अभियान का हिस्सा बनें।