सरकारी उपेक्षा का शिकार बनारस की काष्ठ कला

बनारस यानी जिसके हर एक रंग में बसता है रस। यह शहर धर्म आध्यात्म का गढ़ होने के साथ ही अपनी समृद्ध कलाओं के रूप में भी जाना जाता है। गली मोहल्ले में ऐसी-ऐसी कलाएं जिसमें भारत के समृद्ध इतिहास परम्परा और संस्कृति की छाप देखने को मिलती रही है। इन कलाओं के कद्रदान बनारस ही नहीं देश विदेश में भी रहे हैं। चाहे वह यहां कि बुनकरी कला हो या फिर भित्ति चित्र अथवा काष्ठ कला। आज के इस मशीनी युग में भी पारम्परिक रूप से हाथों की बेहतरीन कारीगरी इन कलाओं को जीवित रखे हुए है। काशी की समृद्ध कलाओं में से एक है काष्ठ कला। विशेष प्रकार की सामान्य सी लकड़ी पर कारीगर अपनी कला कौशल से ऐसा रूप देता है कि देखने वाला दंग रह जाये। काष्ठ कला में काशी के हजारों लोग लगे हुए हैं। कई परिवारों की रोजी रोटी काष्ठ कला पर ही निर्भर है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला एक दूसरे को हस्तांतरित होती आ रही है। लेकिन शायद भविष्य में यह कला इतिहास के पन्नों में ही दबकर रह जाये। कारण काष्ठकला के निर्माण में लगे परिवार घोर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। उन्हें इस कार्य में अपने बच्चों का भविष्य नजर नहीं आ रहा है। हालत यह है कि कई परिवार तो अब दूसरे व्यवसाय में लग गये हैं। आइये पहले जानते हैं इस गौरवशाली कला के इतिहास और काष्ठ के खिलौना निर्माण की प्रक्रिया-

बनारस के काष्ठ क्राफ्ट्समेन में सर्वश्रेष्ठ कलाकार श्री राम खेलावन सिंह हैं जो इस विद्या के बहुत ही प्रयोगवादी कलाकार हुए। उन्होंने सन् 1988 में सुपारी का एक कलात्मक लैम्प बनाया जिसके लिए इन्हें सन् 1989 में राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया। इन्हीं के कारण काष्ठ कला में नया परिवर्तन आ गया और लोग इससे पहले से ज्यादा आकर्षित होने लगे। इनके पहले इनके पूर्वज भी काष्ठ कला में निपुण थे।

काष्ठ कला में प्रयोग होने वाली लकड़ी एवं बनाने की प्रक्रियाः-

काष्ठ कला में प्रयोग की जाने वाली लकड़ी एक खास प्रकार के पेड़ से प्राप्त की जाती थी जो काशी में उपलब्ध नहीं थी। उस लकड़ी को बिहार और मीरजापुर जैसे क्षेत्रों से मंगवाया जाता था, इस लकड़ी को कोरैया लकड़ी कहा जाता था। इस लकड़ी की एक खास बात यह थी कि इससे छोटे-छोटे खिलौने और पात्रों को बनाने में आकर्षण आता था।

बाद में इस लकड़ी की खपत बढ़ने लगी और बनारस में इसका आना कम हो गया। अब यह काष्ठ कलाकारों के चिन्ता का विषय बनने लगा फिर इन लोगों ने बनारस की कुछ लकड़ियों पर प्रयोग किए लेकिन असफल रहे फिर भी उन्हें ऐसी एक्यूलीपट्स नाम की एक लकड़ी मिली जिससे उन्होंने आगे का कार्य जारी रखा और आज भी यह कार्य सफलतापूर्वक चलता जा रहा है, इस लकड़ी के अतिरिक्त भी कुछ अन्य लकड़ियों का भी प्रयोग काष्ठ कला में किया जाने लगा।

काष्ठ कला में खिलौने और पात्र बनाने की जो प्रक्रिया है इसमें सर्वप्रथम लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े किये जाते हैं। इसके बाद उन्हें कुछ यंत्रों द्वारा खुरद कर, चिपका कर आदि तरीकों से खिलौने एवं पात्रों का निर्माण किया जाता है।

आजकल के इस खिलौने एवं पात्रों को बनाने के लिए सांचों और बड़ी-बड़ी मशीनों का प्रयोग भी किया जाने लगा है, जिससे एक साथ कई खिलौने एवं पात्र आसानी से तैयार हो जाते हैं।

काष्ठ कला में रंगों का प्रयोगः-

काशी की काष्ठ कला में प्रयुक्त होने वाले चटक रंग जैसे- हरे, लाल, पीले, गुलाबी आदि हैं। पहले कलाकार किसी भी पात्र, खिलौने को केवल एक ही तरीके से रंग देते थे लेकिन आज इसमें भी परिवर्तन देखने को मिलता है। आज खिलौनों को रंगने के लिए पहले किसी भी एक रंग द्वारा खिलौने को पूरा रंगा जाता है, फिर दूसरे रंगों के द्वारा उस पर चित्रकारी या अलंकरण किया जाता है।

काष्ठ कला का वर्तमान और समस्याएं-

काष्ठ कला के निर्माण में सबसे पहली जो समस्या है वह लकड़ी की है। काष्ठ कला में जिस लकड़ी का प्रयोग किया जाता है वह कोरैया लकड़ी होती है। लेकिन विभिन्न कारणों से यह स्थानीय कलाकारों को सरलता से सुलभ नहीं हो पा रही है। कारण इस लकड़ी का डिपो चित्रकूट में बनाया गया है। डिपो इतनी दूर बनने से जितने की लकड़ी नहीं मिलती उससे ज्यादा उसे लाने का खर्चा दिया जाता है। ऐसे में बहुत से कारीगर स्थानीय यूकोलिप्टस की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं। कारीगर बताते हैं कि यूकोलिप्टस की लकड़ी में वह चमक नहीं होती जो कोरैया में होती है। लेकिन मजबूरी में उसी से काम चलाना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि उससे बने खिलौनों को खरीदार कम ही मिलते हैं। काष्ठ कला के निर्माण में सिर्फ यही एक बाधा नहीं है कारीगरों को आर्थिक रूप से भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

 सरकारें इन कारीगरों को तो सपने बहुत दिखाती हैं लेकिन सरकारी सुविधाओं के नाम पर इन्हें जूझना पड़ रहा है। मोदी सरकार ने इन्हें आर्थिक रूप से मदद करने की घोषणा की थी लेकिन तमाम बैंकों के चक्कर काटने के बाद भी इन्हें कर्ज नहीं मिल रहा है। जिसका नतीजा यह हो रहा है कि काष्ठ कला दम तोड़ती नजर आ रही है। यही नहीं कारीगरों द्वारा बिजली उपयोग पर भी उन्हें किसी प्रकार की छूट नहीं मिल रही है। इन तमाम समस्याओं को झेलने के बाद भी कारीगर लकड़ी पर अपनी कला प्रदर्शित करता है लेकिन उसे वह बाजार नहीं मिल पाता कि जहां उसको सही मूल्य मिल जाये। खोजवां निवासी और काष्ठकला के कारीगर जोगिन्दर सिंह कहते हैं कि सरकारी उपेक्षा का दंश कारीगरों को झेलना पड़ रहा है। घोषणाएं तो तमाम होती हैं लेकिन उनका लाभ स्थानीय स्तर पर हम कारीगरों को नहीं मिल पाता। आर्थिक रूप से कारीगर बदहाली की जिंदगी जीने पर मजबूर हैं। बताया कि सुविधाओं के लिए मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को पत्र लिखा लेकिन अभी तक कोई आश्वासन नहीं मिला। कहते हैं कि हमारी तो किसी तरह बीत जा रही है आने वाली पीढ़ी इस व्यवासय की बजाय अन्य क्षेत्रों में जाना पसंद कर रही है।

यानी एक तरह से देखा जाये तो काष्ठ कला की जो वर्तमान दशा है उससे इस कला का भविष्य खतरे दिखायी देता नजर आ रहा है। काष्ठ कला के इस घाव को भरने के लिए जब तक सरकारी संजीवनी नहीं आयेगी तब तक यह रोग और बिगड़ता जायेगा। शायद सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ने के लिए एक और कला कतार में खड़ी है।

-धीरज कुमार गुप्ता

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