पारंपरिक शान का शहर है बनारस – तरूण कांति बसु

बनारस एक आम शहर नहीं है। यह अपने आप में एक धरोहर है। गंगा किनारे बसे इस शहर की गलियां, घाट, मंदिर, मस्जिद, भवन सहित तमाम चीजें अपने आप में ऐतिहासिकता समेटे हुए हैं। यही कारण है कि लोग बनारस को जानने समझने को बेताब रहते हैं। वैसे तो इस शहर के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। हर साल काफी संख्या में देशी-विदेशी टूरिस्ट यहां आते हैं, घूमते हैं। उन्हें बनारस में घुमाने और इस शहर से परिचित कराने का काम तमाम गाइड करते हैं। लेकिन बनारस के इन गाइड लोगों में शीर्षस्थ पुरूष तरूणकांति बसु रहे। बसु दा बनारस को अपने जीवन में जीने वाले व्यक्तित्व थे। वो अपने आप में खुद चलती-फिरती इनसाइक्लोपीडिया थे। पर्यटकों के बीच बनारस का ऐसा चित्राण करते जैसे उनके सामने बनारस की कोई फिल्म चल रही हो। उन्हें इस शहर का एक-एक कोना पता था। पक्का महाल हो या फिर मठ मंदिर सबके बारे में इतनी रोचकता से बताते कि सामने वाले के मन में इस शहर को लेकर जिज्ञासा और बढ़ जाती। उनका अंदाज-ए-बयां इस कदर लोगों को आकर्षित करता कि यहां से जाने की इच्छा नहीं होती। बड़ी राजनीतिक हस्तियों से लेकर कई बड़े विदेशियों को भी बनारस से परिचित कराने का श्रेय तरूणकांति बसु को जाता है। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

बनारस के बारे में आपका अनुभव कैसा रहा है?

बनारस की नगरीय व्यवस्था बंगाल जैसी है। यूं कहें कि इस शहर के विकास में बंगाल का अहम योगदान रहा है। बनारस 380 साल बंगाल के अधीन था। बंगाल के पाल वंश का बनारस छावनी था। पाल वंश के ही मदनपाल ने अपने नाम से मदनपुरा बगीचा लगवाया था। बनारस के घाटों में सबसे प्राचीन चौसट्टी घाट है। मुगल बादशाह अकबर ने एक लड़ाई जीतने के बाद प्रतापादित्य को बनारस का मुख्य अधिकारी नियुक्त किया। उसी ने चौसट्टी घाट और मंदिर सहित किले का निर्माण कराया।

(सिर पर टोपी कंधे पर अंगवस्त्रम रखे हुए बसु दा ने हमारे सवाल से पहले ही कई रोचक किस्से सुनाये। वो भी बनारस से इतर। करीब 15 से बीस 20 मिनट बोलने के बाद उन्होंने कहा कि किसी भी गंभीर चर्चा से पहले माहौल को सहज बना लेना चाहिए। उनके इस अंदाज से हमें पता चल गया कि एक सफल और आकर्षित कर लेने वाले गाइड में क्या गुण होने चाहिए। इसके बाद उन्होंने बनारस के बारे में बताना शुरू किया।) दरअसल मेरी पहचान इसी शहर से है। मैं खुद बनारस को लेकर जिज्ञासु हूँ कि अभी भी पक्का महाल की गलियों में घुमता रहता हूँ। गलियों, पुरानी इमारतों को देखता हूँ। इन्हें देखकर मुझे बहुत आनंद मिलता है। फिर शहर के बारे में लोगों को बताता हूँ।

इस शहर की विशिष्टताओं के बारे में आपका क्या ख़याल है?

देखिये वैसे तो यह शहर बहुत प्राचीन है। पुराणों-ग्रन्थों में भी इस शहर का उल्लेख रहा है। यहां गंगा भी थीं, जमीन भी थी। यानी जीवन के लिए जरूरी हर चीज मौजूद थी। इसके बाद धीरे-धीरे गंगा किनारे बसाहट होने लगी। राजघाट और सारनाथ बनारस के ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल रहे हैं। सारनाथ में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। फिर गुप्त वंश और अशोक का जुड़ाव इस स्थान को वैश्विक स्वरूप प्रदान करता है। चूंकि यहाँ गंगा थीं इसलिए बड़े विद्वान इस पावन नदी के किनारे अध्ययन-अध्यापन करते थे। यह शहर ज्ञान और धर्म का केन्द्र रहा है। बाद में यह शहर व्यापार का भी बहुत बड़ा स्थान बन गया। लोग यहां आकर ज्ञानार्जन करते थे। धीरे-धीरे पूरे भारत से लोगों का यहां आना-जाना होने लगा। लोग आते गये और बसते गये। जिससे विभिन्न संस्कृतियों, भाषा-बोली का सम्मिलन इस शहर में हो गया। बनारस की पहचान लघु भारत के रूप में बन गयी।

बनारस के बारे में जितना विभिन्न ग्रंथों में लिखा गया है, उतना ही महत्वपूर्ण है यहां की मौखिक किंवदंतियां; यानी नाना नानी की कहानियां। यह शहर संगीत कला आयुर्वेद संस्कृत का केंद्र रहा है। यहां सुश्रुत, चरक धनवंतरि जैसे विद्वान हुए। जिनके सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।

बनारस और बंगाल के जुड़ाव के बारे में कुछ बतायें।

बनारस पर बंगाल का बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। यहां की नगरीय व्यवस्था बंगाल जैसी है। यूं कहें कि इस शहर के विकास में बंगाल का अहम योगदान रहा है। बनारस 380 साल बंगाल के अधीन था। बंगाल के पाल वंश का बनारस छावनी था। पाल वंश के ही मदनपाल ने अपने नाम से मदनपुरा बगीचा लगवाया था। बनारस के घाटों में सबसे प्राचीन चौसट्टी घाट है। मुगल बादशाह अकबर ने एक लड़ाई जीतने के बाद प्रतापादित्य को बनारस का मुख्य अधिकारी नियुक्त किया। उसी ने चौसट्टी घाट और मंदिर सहित किले का निर्माण कराया। यहीं पर बंगालियों की बस्ती बसी। वहीं चौखंभा स्थित बंगाली ड्योढ़ी का भी खास महत्व रहा है। यह मेरा घर था। करीब तीन सौ से चार सौ साल पुराने इस भवन की ऐतिहासिकता अपने आप में महत्वपूर्ण है। बहुत कम लोगों को पता है कि स्वामी विवेकानंद पांच बार बनारस आये जिसमें से चार बार मेरे घर पर रूके। आज भी आप देख लीजिए यहां दूसरे प्रदेशों में सबसे ज्यादा संख्या बंगालियों की है। बंगाल से बनारस का एक बड़ा कारण ये भी था कि बंगाल के रास्ते यहां तक आराम से लोग पहुंच जाते थे।

प्राचीन जीवंत नगरों में से एक बनारस को देखने- जानने के लिए आज भी देश-विदेश से लोग आते हैं। वह कौन सी बात इस शहर में आज भी है जिसके लिए लोग इतने उत्सुक रहते हैं?

देखिये, यह शहर अपने आप में अद्भुत है। आज विश्व के बड़े-बड़े शहरों का नाम है, सुविधाओं और संसाधानों में बनारस कहीं नहीं टिकता है; लेकिन जितने भी बड़े शहर हैं उनका इतिहास बहुत ज्यादा है तो केवल सौ दो सौ वर्षों का है। जबकि बनारस का धार्मिक और पौराणिक इतिहास आदिकाल से रहा है। वहीं इस शहर के ज्ञात इतिहास की बात करें तो ढाई से तीन हजार साल पहले भी बनारस रहा है। गंगा किनारे लोग बसे, जीवन की मूल भूत सुविधाएं सब इस शहर में रहीं। जल, जमीन, जंगल सब था यहां। धीरे-धीरे सभ्याताएं, विभिन्न संस्कृतियों और जातियों ने अपना स्थान इस शहर में बना लिया। चूंकि धार्मिक दृष्टि से यह शहर हिन्दुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है, ऐसे में तमाम राजपरिवारों ने यहां भवनों, घाटों और मंदिरों का निर्माण कराया। पुराना बनारस जिसे हम पक्का महाल कहते हैं वह भी आज किसी धरोहर से कम नहीं है। अंग्रेज, मुगल और उसके पहले के शासकों का आतंक पूरे भारत में था। बनारस भी उनके अत्याचार से अछूता नहीं रहा। उस दौर में आक्रमण से बचने के लिए पक्का महाल में लोग घरों का निर्माण करते समय सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते थे। घर आपस में जुड़े रहते थे। गलियां बेहद सकरी रहती थीं, जिससे की बाहरी आक्रमण के दौरान बचा जा सके। कई द्वार बनवाये गये थे। यानी घरों का आपस में गुम्फन था। ये सब चीजें आज के लिए किसी धरोहर से कम नहीं हैं। लोग जानना चाहते हैं कि उस समय लोग कैसे रहते थे, व्यवस्था कैसी थी? भवन के बारे में जानना चाहते हैं। साथ ही धार्मिक रूप से भी यह शहर प्रसिद्ध है, तो पूरे भारत से लोग यहां धार्मिक यात्राओं पर आते हैं।

आधुनिकता के साथ पुराने बनारस की पहचान बनी रहे, आपके अनुसार यह कैसे संभव है।

आधुनिकता का प्रभाव तो हर जगह है। अब तो बनारस में भी बदलाव हो रहा है। गौर करिये तो यह शहर बड़ी तेजी से महानगर में तब्दील हो रहा है। उंची-उंची इमारतें तन गयी हैं। बोल चाल पहनावा सब तो बदल गया है। यह संक्रमण काल है। यदि इस समय आधुनिकता और पुरातन संस्कृति सभ्यता के बीच संतुलन बना दिया जाये तो वह चिर हो जाएगा। शहर में बदलाव जरूरी है, लेकिन पुरानी पहचान से बिना छेड़छाड़ किये यह होना चाहिए। क्योंकि यहां डेवलपमेंट के कदम-कदम पर धरोहर से सामना होगा। वह मंदिर हो सकता है, पुराने भवन हो सकते हैं यहां तक कि गलियां भी यहां धरोहर हैं। इसलिए पूरे प्लानिंग के साथ इस शहर में ‘डेवलपमेंट’ की जरूरत है।

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