संत रविदास मंदिर वाराणसी

वाराणसी यानी संत महात्माओं की तपस्थली। इस पावन नगरी में तुलसीदास, कबीरदास से लेकर अनेकों महर्षि हुए; जिन्होंने समाज को नई दिशा दी। लोगों को भक्ति से जोड़ने का कार्य किया। काशी की इन महान विभूतियों में संत रविदास का नाम भी प्रमुख है। इन्होंने आत्मा का परमात्मा से मिलन का सहज उपाय बताया। आजीवन आध्यात्मिकता की राह दिखाने वाले संत रविदास का नाम उच्च कोटि के संत महात्माओं में शामिल है। संत रविदास का जन्म शूद्र जाति में माघ पूर्णिमा 1433 विक्रमी संवत को वाराणसी के सीर गोवर्धन नामक स्थान पर हुआ था। इस पर एक दोहा भी प्रचलित है-

             चौदह सौ तैंतीस की, माघ सुदी पंदरास।

             दुखियों के कल्याण हित, प्रगटे श्री रविदास।।

    इनके पिता का नाम संतोख दास और माता कलसा देवी थी। बचपन से ही संत रविदास का मन संत सन्यासियों संगत में लगता था और धर्म आध्यात्म के प्रति गहरी रूचि हो गयी थी। रविदास जी अपनों से ज्यादा दूसरों के दुःखों के लिए दुःखी रहते थे। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। जिससे प्रभावित होकर उस समय के राजा नगर की रानी झल्लनबाई और मीरनबाई उनसे काफी प्रभावित हुई। लोगों को आध्यात्मिक दृष्टि देने वाले संत रविदास अपने पारंपरिक व्यवसाय चमड़े का जूता सिलने का कार्य करते रहे। जीवन पर्यन्त संत रविदास जी आध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को अभिसिंचित करते रहे। बाद में इनके अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक हो गयी। संत रविदास के विचारों से प्रेरित क्रांतिकारी संत श्री 108 सरवन दास डेरा सच्चा खण्ड बल्लन ने उनके जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण का विचार किया। मंदिर निर्माण के अपने विचार को अमली जामा पहनाने में लग गये। इसके लिए सरवन दास जी ने कुछ लोगों का चयन किया। इस कार्य में संत हरिदास जी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। मंदिर निर्माण के लिये चयनित लोगों का दल सरवन दास जी के नेतृत्व में वाराणसी पहुंचा। इस दल ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पीछे सीर गोवर्धनपुर (संत रविदास जी के जन्म स्थान) में जमीन का निरीक्षण कर मंदिर निर्माण के लिए उसे खरीद लिया। आखिरकार वह दिन आ गया जिसका सपना संत सरवन दास ने देखा थां 14 जून 1965 सोमवार आषाढ़ संक्रांति के दिन मंदिर निर्माण की पहली ईंट संत हरिदास एवं संत सखन दास के नेतृत्व में हजारों अनुयायियों के उपस्थिति में रखी गयी। देश-विदेश में रहने वाले भक्तों के सहयोग से मंदिर निर्माण का पहला चरण 1972 में पूरा हुआ। इस मौके पर संत रविदास साधु सम्प्रदाय सोसायटी पंजाब से संत गरीब दास समेत काफी संख्या में भक्त मंदिर के उद्घाटन समारोह में पहुँचे इसी समय मंदिर में संत रविदास की मूर्ति की स्थापना भी की गयी इसके बाद मंदिर से जुड़ी तमाम गतिविधियों की देख-रेख के लिए ‘श्री गुरू रविदास जन्म स्थान पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट” की स्थापना हुई। जिसकी हेड ऑफिस डेरा संत सरवन दास जी जालंधर पंजाब एवं शाखा जन्म स्थान मंदिर सीर गोवर्धनपुर वाराणसी में बनाई गयी। मंदिर निर्माण को और विस्तार देने के लिए ट्रस्ट की ओर से कार्य चलता रहा।

1993 में निर्माण का दूसरा चरण पूरा हुआ। इस भव्य मंदिर के ऊपर 7 अप्रैल 1994 को स्वर्ण कलश स्थापित किया गया। इस मौके पर गरीब दास के साथ बहुजन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष कांशीराम भी मौजूद रहे। सफेद रंग के इस मंदिर के ऊपर लगे स्वर्ण कलश पर सूर्य की रोशनी जब पड़ती है तो आकर्षण और बढ़ जाता है। संत रविदास के याद में मंदिर ट्रस्ट की ओर से लंका चौराहे पर भव्य रविदास गेट का निर्माण भी कराया गया। जिसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति के0आर0 नारायण ने 16 जुलाई 1998 को किया। ट्रस्ट की ओर से दूर से आये दर्शनार्थियों के ठहरने के लिए मंदिर के पास ही चार मंजिला आश्रम का निर्माण कराया गया है। मंदिर से सटा हुआ ही बड़ा सा लंगर हाल भी है जहाँ दर्शनार्थियों को निःशुल्क भोजन कराया जाता है। वैसे तो मंदिर में दर्शन के लिए हर समय लोग आते रहते हैं। लेकिन संत रविदास जयंती पर तो दर्शनार्थियों का हुजुम देश-विदेश से सीर गोवर्धन में उमड़ पड़ता है। खासकर जालंघर, पंजाब के भक्तों से तो शहर पट जाता है। इस मौके पर रेलवे जालंघर से वाराणसी के लिए अलग से ट्रेन चलाती है। मंदिर में होने वाले इस बड़े आयोजन की तैयारियाँ जयंती के काफी दिनों पहले ही शुरू हो जाती है। माघी पूर्णिमा (फरवरी) के दिन पड़ने वाली संत रविदास जयंती का रविदास भक्तों को बेसब्री से इंतजार रहता है। जयंती वाले दिन मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। रात को मंदिर रंग-बिरंगे झालरों की रोशनी से नहा उठता है। इस दौरान मंदिर में रविदास बानी गूंजती रहती है। रविदास मंदिर में अक्सर बड़े राजनेता मत्था टेकने पहुंचते रहते हैं।

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