बनारस के संस्कृतज्ञ

आचार्य मंगलदेव शास्त्री : आचार्य मंगलदेव शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले में 1890 ई0 में हुआ था। इन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से एम0ए0 परीक्षा उत्तीर्ण की तथा सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त कर वे आक्सफोर्ड में अनुसन्धान कार्य के लिए चले गये। वहीं से ‘ऋक्प्रतिशाख्य’ का अनुशीलन कर डी0फिल0 की उपाधि प्राप्त की। संस्कृत भाषा में श्लोक रचना उनकी विशेषता थी। 1937 ई0 मे वे संस्कृत कॉलेज (सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय) के अध्यक्ष नियुक्त हुए। ये संस्कृत कॉलेज के अन्तर्गत ‘सरस्वती भवन’ पुस्तकालय के अध्यक्ष भी थे। कालान्तर में कॉलेज जब ‘वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय’ में परिणत हुआ तो कुछ समय तक उसके भी कुलपति रहे। वैदिक प्रातिशाख्य, वैदिक संस्कृति एवं भाषा विज्ञान के ऊपर निर्मित इनके अत्यन्त ही उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक है। इनके मुख्य ग्रन्थ हैं-भाषाविज्ञान (1926), भारतीय संस्कृति का विकास वैदिक धारा (1956) संस्कृत-सम्पादित ग्रन्थ है- ऋग्वेद प्रातिशाख्य (तीन भाग 1931), रश्मिमाला (1954) तथा सूक्तिसप्तशती (सस्ता साहित्य मण्डल दिल्ली से प्रकाशित)

पं0 राजारामशास्त्री : पण्डित राजाराम शास्त्री संस्कृत भाषा के नाना शास्त्रों के अप्रतिम विद्वान थे। ये व्यावहारिक योगविद्या के भी मर्मज्ञ थे। इसी कारण इन्हें योगिसम्राट की उपाधि से विभूषित किया गया था। इनका जन्म 1805 ई0 में हुआ था। इनकी अद्वितीय प्रतिभा तथ अतुल्य शारस्वत ज्ञान का सम्मान विनायक रावपेशवा ने चित्रकूट नामक स्थान में किया था। शास्त्री जी ने अपने प्रमेयबहुल शास्त्रार्थ चिन्तन के प्रदर्शन से पेशवा को प्रभावित किया तथा सम्मान व पारतोषिक प्राप्त किया। राजाराम शास्त्री धर्मशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान् थे, जिसके कारण जानम्यूर ने इन्हें आजमगढ़ जिले का न्यायधीश नियुक्त किया। 1856 ई0 में इन्होंने विधवोद्वाह शंकासमाधिः नामक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ में विधवा-विवाह का पुरजोर समर्थन किया गया है जो उस काल की तात्कालिक परिस्थितियों में एक नयी बात थी। इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद काशिराजकीय पाठशाला के तत्कालीन अध्यक्ष जेम्स राबर्ट वैलेन्टाइन ने राजाराम शास्त्री को 1856 ई0 सांख्यदर्शन के अध्यापक के पद का नियुक्त किया। कालान्तर में ये कालेज के धर्मशास्त्र के प्रधान अध्यापक भी नियुक्त हुए। इनका देहावसान 1875 ई0 में हुआ।

महामहोपाध्याय शिवकुमार शास्त्री : पण्डित शिव कुमार शास्त्री का जन्म 1857 ई0 में वाराणसी जिले के उन्दी नामक गाँव में हुआ था। ये काशी के दरभंगा पाठशाला के अध्यक्ष थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा ये महामहोपाध्याय के पदवी से अलंकृत होने के साथ ही शृंगेरी मठ के शंकराचार्य ने इन्हें ‘सर्वतन्त्रस्वतन्त्र पण्डितराज की पदवी भी प्राप्त थी। पुनः बामरा के राजा ने ‘अत्रैव विद्यारसः’ की उपाधि प्रदान की। शास्त्री जी शास्त्री जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विद्वत् परिषद् के सम्माननीय सदस्य भी थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-

    यतीन्द्रजीवनचरितम्, लक्ष्मीश्वर प्रताप, लिंगधारण चन्द्रिकाव्याख्या

पण्डित गंगाधर शास्त्री तैलंग : काशी की विद्वन्मण्डली में श्री गंगाधर शास्त्री तैलंग स्थान अत्यन्त विशिष्ट है। उनका जन्म काशी में 1853 ई0 में हुआ था। वे न्याय, वेदान्त आदि शास्त्रों के मूर्धन्य विद्वान थे। इन्होंने हिन्दी ‘साहित्य-सागर’ तथा संस्कृत में ‘काव्यात्म संशोधन’ एवं स्कन्दपुराण के किसी अंश पर ‘शिवभक्ति विलास’ नामक टीका की रचना की। सन् 1879 ई0 में तत्कालीन संस्कृत कॉलेज के अध्यक्ष डॉ0 जार्ज थिबो ने गंगाधर शास्त्री की नियुक्ति साहित्य एवं दर्शनशास्त्र के अध्यापक पद पर की। डॉ0 थिबो के अनुरोध से इन्होंने ‘पदमंजरी’, ‘रगंगाधर’, ‘वाक्यपदीय’, ‘तन्त्रवार्तिक’ आदि कठिन ग्रन्थों की टिप्पणी तथा परिष्कार करके ‘पण्डितपत्र’ तथा ‘विजयानगरम् संस्कृत सीरीज’ में प्रकाशित कराया। इन्हें मात्र 34 वर्ष की आयु में महामहोपाध्याय की पदवी से विभूषित किया गया था। इनके महत्वपूर्ण ग्रन्थ है-शाश्वतधर्मदीपिका, काव्यात्मसंशोधनम् दशाननचित्रकाव्यम्, शिवभक्तिविलास, साहित्यसागर (हिन्दी में), अलिविलासिसंलाप

केशव शास्त्री मराठे : केशव शास्त्री मराठे का जन्म काशी में सन् 1845 ई0 में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही सम्पन्न हुई थी। जिसमें इन्हें वेद, काव्य आदि का न प्राप्त हुआ था। इन्होंने काशी के गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेज इससे इतर ज्ञान भी प्राप्त किया था। यहाँ इन्होंने व्याकरण वेदान्त न्याय आदि दर्शनशास्त्रों का सम्यक् अध्ययन किया। ये अंग्रेजी साहित्य में भी निष्णात् थे। बर्कले के दार्शनिक सिद्धान्त में इनकी अबाध गति थी। इनकी नियुक्ति सर्वप्रथम संस्कृत कालेज के एंग्लो-संस्कृत विभाग में छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए हुई। इसके बाद वे उसी कालेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। डॉ0 थिबो के अनेक ग्रन्थों के सम्पादन में उनकी महती भूमिका थी। सन् 1912 में इन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि प्रदान की गयी। वेदान्त शास्त्र में इनकी प्रौढ़ तथा निष्ठा के कारण काशी के तत्कालीन पण्डितों ने इन्हें ‘शान्तब्रह्म’ की उपाधि से अलंकृत किया था। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- आत्मसोपान, स्नेहपूतिपरीक्षा, ज्ञानसिद्धान्तचन्द्रिका, शनिमाहात्म्य, योगवार्तिक (सम्पादन) ज्ञानसिद्धान्त चन्द्रिका, शनिमाहात्म्य, योगवार्तिक (सम्पादन) ज्ञानसिद्धान्त चन्द्रिका ग्रथ ह्मूम के A Treatist concernign the principle of Human knowledge नामक ग्रन्थ का अनुवाद है।

महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी : पण्डित सुधाकर द्विवेदी का जन्म सन् 1860 ई0 में वाराणसी के खजुरी नामक मोहल्ले में हुआ था। काशी के गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेज में इनकी शिक्षा-दीक्षा सम्पन्न हुई। इनकी नियुक्ति सर्वप्रथम दरभंगा संस्कृत पाठशाला में ज्योतिषशास्त्र के अध्यापक के रूप में हुई कालान्तर में संस्कृत कालेज के सरस्वती भवन पुस्तकालय के अध्यक्ष हुए पुनः इसी कालेज में अध्यापक नियुक्त हुए। मात्र 27 वर्ष की अवस्था में इन्हें महामहोपाध्याय की पदवी प्राप्त हुई। इनके मौलिक ग्रन्थ हैं-              दीर्घवृत्तलक्षणम्, यंगराजः, प्रतिमाबोधकः,

         पिण्डप्रभाकरः, समीकरणमीमांसा, आतिद।

सम्पादित ग्रन्थ –    पंचसिद्धान्तिका, आदि।

             सिद्धान्ततत्त्वविवेक :, बृहत्संहिता आदि

हिन्दी ग्रन्थ रचना –  इन्होंने जायसीकृत पद्मावत महाकाव्य का सर्वप्रथम उद्धार किया। तुलसी सुधाकर नामक ग्रन्थ भी इन्हीं की रचना है।

पण्डित ताराचरण भट्टाचार्य : पं0 ताराचरण भट्टाचार्य का जन्म काशी में सन् 1885 ई0 में हुआ था। ये न्यायशास्त्र तथा संस्कृत साहित्य के प्रधान विद्वान थे। अंग्रेजी तथा नवीन विषयों में भी इनकी अबाध गति थी जिनका अध्ययन इन्होंने डॉ0 वेनिस तथा डॉन नार्मन से किया था। इस प्रकार ये न्यायशास्त्र, साहित्यशास्त्र तथा अंग्रेजी भाषा के लब्ध विद्वान थे। इन्हेंने सर्वप्रथम बंगाली टोला हाईस्कूल में अध्यापन का कार्य किया। ये कुछ वर्षों तक वहाँ छात्रों को संस्कृत पढ़ाते रहे। कालान्तर में इन्होंने क्रमशः टीकमणि संस्कृत कालेज तथा गोयनका संस्कृत कालेज में भी अध्यापन का कार्य किया ये अध्यापक होने के साथ ही संस्कृत नाटकों के अभिनेता भी थे। इन्होंने संस्कृत नाटकों के अभिनय के लिए ‘भारती समिति’ नामक संस्था की स्थापना की थी। जिसका संचालन ये स्वयं करते थे। बंगभंग के समय सन् 1905 ई0 में इन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में भी भाग लिया था। ‘सेवक समिति’ नाम से एक संस्था की इन्हेंने स्थापना की थी जो विदेशी कपड़ों के स्थान पर स्वदेशी वस्त्र उपलब्ध कराती थी।

इनके प्रमुख ग्रन्थ हैं-

  1. दशकुमारचरित की संस्कृत टीका
  2. भारतगीतिका (इस ग्रन्थ में भारत के राजनैतिक इतिहास को संस्कृत के गीतों में लिखा गया है।)
  3. संस्कृत नाटकों में स्वचरित गीतिका (स्वयं अभिनय करते हुए ये स्वयं गीतों का निर्माण भी करते थे।)

पण्डित लक्ष्मणशास्त्री तैलंग : तैलंग महोदय का जन्म काशी में 1880 ई0 में हुआ था। ये काव्य तत्त्व के मर्मज्ञ विद्वान थे। इन्हेंने व्याकरण, साहित्य, अंग्रेजी, इतिहास, पाश्चात्य दर्शन, पुरातत्त्व, शिलालेख शास्त्र का गम्भीर तथा विधिवत् अध्ययन किया था। डॉ0 वेनिस तथा डॉ0 नार्मन के ये विशेष सहयोगी तथा प्रिय थे। काशी के गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज में इनकी नियुक्ति अंग्रेजी विभाग में संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में हुई थी। ये श्रीहर्ष के नैषधचरित के उद्भट् विद्वान थे। लन्दन की पालि टेक्स्ट्स सोसाइटी के धम्मपद की अट्टकथा का सम्पादन इन्होंने डॉ0 नार्मन के साथ संयुक्त रूप से किया था। इन्हेंने शेक्सपीयर के ‘मर्चेण्ट आफ वेनिस’ नाटक को संस्कृत भाषा में ‘वेतस्वती-सार्थवाहः’ नाम से अनुदित किया था। शेक्सपीयर के दूसरे नाटक ‘हैमलेट’ को ‘हेमन्तकुमार :’ नाम से संस्कृत में अनुदित कर इन्होंने याज्जीवन संस्कृत भाषा की सेवा की।

पण्डित लक्ष्मणशास्त्री द्राविड : द्राविड महोदय एक अलौकिक तथा कर्मठ विद्वान थे। भारतीय धर्म एवं संस्कृति को अपने पूर्ण वैभव के साथ, विशुद्ध रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए, इनका विशेष आग्रह था। इसीलिए इन्हेंने शारदा एक्ट के विरोध में अपनी ‘महामहोपाध्याय’ पदवी का परित्याग कर एक मिसाल कायम की। इन महापुरुष का जन्म काशी में 1874 में हुआ था। ये मूलतः तमिलनाडु के निवासी थे। ये ऋग्वेद, कृष्णयजुर्वेद, वेदान्त, सांख्य, व्याकरण, न्याय आदि के अप्रतिम विद्वान थे। इन्होंने काशी तथा कलकत्ता के संस्कृत कालेज में अपनी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी। इनकी नियुक्ति सर्वप्रथम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रणवीर संस्कृत पाठशाला में संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में हुई। तदन्तर ये कलकत्ता विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त हुए तथा 1926 ई0 में वहीं से आवकाश ग्रहण किया। पुनः काशी आगमन के पश्चात् इन्होंने संस्कृत विद्या के अध्यन-अध्यापन तथा प्रचार-प्रसार कार्य प्रारम्भ किया। इन्होंने काशी के वल्लभराम शालिगराम सांगवेद महाविद्यालय को अपने अध्यक्षता में ‘अत्यन्त समृद्ध किया। सनातन धर्म के संरक्षण का इनका कार्य बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। ब्राह्मण-महासम्मेलन, वर्णाश्रम स्वराज्यसंघ तथा अखिल भारतीय ब्राह्मण महासम्मेलन द्वारा सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

पण्डित राजेश्वर शास्त्री द्राविड : राजेश्वर शास्त्री द्रविड लक्ष्मण शास्त्री द्रविड के पुत्र थे। इन्होंने वेद, व्याकरण, न्याय, नव्यन्याय, वेदान्त, सांख्य, संस्कृत साहित्य में अबाध गति प्राप्त की थी। ये सांगवेद महाविद्यालय के व्यवस्थापक, तथा अध्यक्ष थे। इस विद्यालय में अध्यापक का कार्य करते समय इन्होंने न्यायशास्त्र के अनेक ग्रन्थों की टीका-टिप्पणी लिखी और और उन्हें प्रकाशित कराया। वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इन्होंने प्राचीन राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष के रूप में पद की गरिमा बढ़ायी। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- ‘शान्ति का अग्रदूत’ तथा ‘वेदों का अपौरुषेयत्व’। हिन्दी में दो नवीन ग्रन्थों का प्रणयन कर प्राचीन राजनीति के स्वरूप का स्पष्ट परिचय दिया है। उनका द्वितीय ग्रन्थ प्रथम ग्रन्थका ही दूसरा भाग है। उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति है कौटिलीय अर्थशास्त्र की ‘वैदिक सिद्धान्तरक्षिणी’ नामक टीका।

पण्डित रामयश त्रिपाठी : त्रिपाठी जी का जन्म 1884 ई0 में काशी से 20 किलोमीटर बाबतपुर के निमैचा गाँव में हुआ था। ये त्याग और तपस्या की मूर्ति तथा पाणिनीय व्याकरण यशस्वी विद्वान् थे। काशी की विद्वन्मण्डली इन्हें ‘महाशयजी’ के आदरणीय सम्बोधन से सम्बोधित करती थी। इन्होंने संस्कृत कालेज से सन् 1914 में व्याकरण विषय में आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन्हें ‘व्याकरणरत्नाकर’ उपाधि से विभूषित किया गया था। सन् 1918 ई0 में ये मारवाड़ी संस्कृत कालेज, मीरघाट में प्रधानाचार्य पद पर नियुक्त हुए। पुनः सन् 1926 ई0 में गोयनका संस्कृत महाविद्यालय, ललिताघाट में प्राध्यापक नियुक्त हुए। गोयनका पाठशाला से सेवानिवृत होने के पश्चात् मीरघाट पर स्थित धर्मसंघविद्यालय में निःशुक्ल विद्यादान देने लगे। सन् 1958 ई0 में इन्होंने श्रीकरपात्रीजी महाराज द्वारा संन्यास ग्रहण कर लिया था। त्रिपाठी महाशय जितने अप्रतिम विद्वान थे उनकी शिष्य भी उतनी गरिमापूर्ण थी इनके शिष्यों में प्रमुख हैं- पुरीपीठस्थ शंकराचार्य श्री निरंजनदेवतीर्थ महाराज, श्री दण्डी स्वामी रामानन्दसरस्वती जी। ये तीनों ही त्रिपाठी महाशय के पट्टशिष्य थे।

ढुण्ढिराज शास्त्री टोपले : टोपले जी का जन्म काशी में 1890 ई0 में हुआ था। इन्होंने न्याय, व्याकरण, साहित्य आदि का गहन अध्ययन किया था। सन् 1912 ई0 में काव्यतीर्थ तथा 1915 ई0 में न्यायाचार्य की उपाधि अर्जित की। सन् 1916 ई0 में इनकी नियुक्ति नित्यानन्द वेदमहाविद्यालय, डी0एम0वी0 वाराणसी में प्रधान अध्यापक के पद में हुई। जहाँ इन्होंने 42 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया। इन्होने न्याय तथा वेदान्त के कठिन ग्रन्थों का विमर्शात्मक संस्करण सम्पादित कर कीर्ति अर्जित की। युक्तिवाद, वैशेषिक दर्शन, भामती की टीका, न्यायसिद्धान्तमुक्तावली, आत्मतत्त्वविवेक, शब्दशक्तिप्रकाशिका तथा श्रीभाष्य ग्रन्थों पर विस्तृत टिप्पणी लिखकर छात्रों का कल्याण किया था। पुनः इन्होंने सांख्यकारिका, श्लोकवार्तिक आदि ग्रन्थों का अनुवाद एवं तर्कभाषारहस्य ग्रन्थ की रचना भी की। इसके अतिरिक्त इन्होंने न्यायमंजरी, न्यायलीलावती गादाधारी, क्रोडपत्रसंग्रह आदि 38 ग्रन्थों की विषयानुक्रमणिका एवं भूमिका लिखी तथा सम्पादित की है।

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