पाण्डित्य की राजधानी है काशी- पं0 वागीश शास्त्री

प्रारम्भिक शिक्षा वृंदावन में ग्रहण करते हुए काशी की ओर ज्ञान साधना के संकल्प के साथ आए पं0 वागीश शास्त्री संस्कृत व्याकरण और भाषाशास्त्रा के मूर्धन्य विद्वान हैं। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में शिक्षण के उपरान्त सेवा निवृत्ति के साथ आपकी सृजनशीलता और भी गतिशील व बहुआयामी हुई। काशी विद्वत परिषद की ओर से 1982 में आपकी प्रखर मेधा और संस्कृत साधना के लिए महामहोपाध्याय की उपाधि से अलंकृत किया गया। तीन सौ से अधिक पांडुलिपियों के संपादन तथा पुस्तक लेखन के क्षेत्रा में लगभग अर्द्धशतक का मानदंड स्थापित करने वाले पं0 वागीश शास्त्री को साहित्य में योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। ऐसे ही दर्जनों सम्मान काशी की पांडित्य परम्परा के ध्वजवाहक प्रो0 भागीरथ प्रसाद त्रापाठी उपाख्य पं0 वागीश शास्त्री के नाम से जुड़कर खुद सम्मानित हुए हैं। काशी की पांडित्य परम्परा और संस्कृत संवर्धन जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर हुए वार्तालाप के प्रमुख अंश –

काशी की पाण्डित्य परम्परा के बारे में बताएं।

 पाण्डित्य परम्परा तो मराठी विद्वानों के आने से प्रारम्भ हुई। काशी का कोई निवासी नहीं है। भगवान शिव भी बाहर से आये थे। काशी में सभी प्रवासी ही थे। यहां तो केवल वन था। केवल सन्यासी ही रात में यहां रहते थे। जिससे गंगा जी शुद्ध थीं। गंगा जी से 02 किमी दूरी आश्रम बनते थे मराठी विद्वानों ने यहां विद्वत्ता की परम्परा डाली। उसमें सबसे पहले थे बाल शास्त्री; यहां के पास के गांव के थे। उन्होंने मराठी विद्वानों से अर्जन करके शास्त्र पढ़ा था। बाबू देव शास्त्री पंचांग निकाला। द्रिक्सिद्ध पंचांग प्राचीन पद्धति से निर्मित होने वाला पंचांग है। उसकी सारणियां बनती थीं। जिसके आधार पर पंचांग बनते थे। वासुदेव शास्त्री ने सबसे पहले इसका मूल डाला। अभी जो पंचांग बनते हैं उनमें भेद होता है। द्रिक पंचांग सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय से अभी भी प्रकाशित होता है।

 बाहर से शंकराचार्य आये तो उनकी भी परीक्षा यहां हुई। काशी तो पांडित्य की राजधानी है। काशी का तात्पर्य यह है कि- यहां से सर्वज्ञ प्रकाश फैलता है। दूर-दूर तक यज्ञोपवीत संस्कार के अवसर पर बोलते हैं कि काशी पढ़ने जा रहे हैं। वाराणसी की प्रसिद्धि बाद में हुई है। काशी का जो बहुवचन है वह काशी राज्य में था। काशिराज्य को बहुवचन के लिए प्रयोग होता था और काशीपुरी के लिए एक वचन का प्रयोग होता था। इसलिए रामनगर काशी के अन्तर्गत आता है। मारकण्डेय महादेव तक काशी का विस्तार था। राजघाट भी काशी हीं था। काशी का उपनिषदों में भी वर्णन है, जो वेद के अंतिम भाग हैं। इसके बाद मुसलमान लोग आये। उन्होंने बुनकरी का प्रसार किया तो काशी की साड़ी प्रसिद्ध होने लगी। काशी का संगीत प्रसिद्ध होने लगा। ये तीन प्रमुख बिन्दु हैं।

 संस्कृति के नाम पर संगीत का प्रचार सांस्कृतिक सहभागिता में संगीत का सांस्कृतिक योगदान में संगीत का प्रचार होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पांडित्य का प्रचार नहीं होता, संगीत का प्रदर्शन होता है। पहले संगीतकारों को भांड़ कहा जाता था। उतना आदर नहीं होता था किन्तु आज आदान-प्रदान का युग है। बाहर का संगीतकार यहां आता है, यहां का बाहर जाता है। यह विनियम परस्पर चलता है। पंडित यहां पर नेता के रुप में कार्य करते थे। शाहजहां के दरबार में जगन्नाथ पंडित का वर्चस्व था। उन्होंने शाहजहां की किसी पत्नी की पुत्री से विवाह किया था तो यहां के पंडितों ने उनका वाराणसी से बहिष्कार कर दिया। तब उन्होंने पंचगंगा पर बैठकर गंगा जी की स्तुति की। गंगा जी एक-एक सीढ़ी चढ़कर आई और उनका चरण स्पर्श किया तब उनकी स्वीकृति हुई और वह यहां से मथुरा जाकर बस गये। अपने पांडित्य से यहां के पंडितों ने शाहजहां तक को प्रभावित किया। शाहजहां के पुत्र दाराशिकोह ने यहां के पंडित रामानन्दपति त्रिपाठी से वेदान्त की शिक्षा प्राप्त की। उसने कमलापति त्रिपाठी के पूर्वज रामानन्दपति त्रिपाठी को मकान दिया, जिसका प्रवेश द्वार हाथी के जाने के बराबर है और पंडित राज जगन्नाथ को आगरा बुलाकर दाराशिकोह ने उनको अध्यापक के रुप में नियुक्त किया। दाराशिकोह ने उपनिषदों का पर्सियन में अनुवाद किया। यह विशेषता काशी के पंडितों की थी। वे शास्त्रों को भी प्रभावित करते थे। आचार्य रामानन्द वाराणसी में ही हुए। पंचगंगा घाट पर उनका निवास स्थान था और उन्होंने मुस्लिम के रुप में जो धर्म परिवर्तित हो गये थे उनको पुनः हिन्दू के रूप में आवर्तित किया और उनका नाम “संयोगी” रखा। इनका भविष्य पुराण में वर्णन है और उन्हीं के सम्प्रदाय में तुलसीदास हुए जो गंगा किनारे रहकर अपने ग्रंथों की रचना की, वो संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। वो चाहते तो संस्कृत में रचना कर सकते थे लेकिन सामान्य जनता के अनुबोधार्थ लोक भाषा की रचना की। प्रत्येक अध्याय के प्रारम्भ में मात्र उन्होंने संस्कृत के श्लोक लिखे हैं। तो भी वह पाण्डित्य परम्परा के अन्तर्गत आ सकते थे। इस प्रकार पाण्डित्य परम्परा का भाव भी सुरक्षित है। आज भी नागकुआं पर पंडितों का शास्त्रार्थ होता है। प्रतिवर्ष नाग पंचमी के दिन शास्त्रार्थ परम्परा स्वरूप यहां होती है। संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा यहां है। यद्यपि अन्यत्र भी संस्कृत विश्वविद्यालय खोले गये हैं किन्तु यह सबसे पुराना है। अंग्रेजों ने ही इनकी स्थापना की थी। इसमें एक विशाल सरस्वती पुस्तकालय भी है। जिसमें हजारों पाण्डुलिपियां सुरक्षित हैं। इस प्रकार का पुस्तकालय अन्यत्र नहीं है।

संस्कृत भाषा में सर्वमान्य व अद्वितीय विपुल साहित्य भंडार है। कम्प्यूटर के लिए भी संस्कृत को उपयुक्त माना गया है लेकिन वर्तमान की अगर बात की जाये तो खासकर ऐसे लोग जिन्हे संस्कृत शिक्षा के लिए नई पीढ़ी को भेजना चाहिए, उनमें अरुचि हो रही है। संस्कृत संरक्षण कैसे होगा?

 इसका एकमात्र कारण है कम्प्यूटर। कम्प्यूटर ने प्रभाव डाला है। तकनीकी शिक्षा के प्रति भारतवर्ष आकृष्ट हुआ है क्योंकि इससे तत्काल नौकरी व धन की प्राप्ति होती है। संस्कृत के अध्ययन से रोजगार प्राप्त नहीं होता है। ऐसी गलत धारणा बन गयी है। संस्कृत को बहिष्कृत कर दिया गया है। शायद आप लोगों को पता हो या ना हो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर संस्कृत टिकी हुई है। त्रिभाषा फार्मूला में से संस्कृत को हटाये जाने से नौकरियों में स्थान मिलना सम्भव नहीं हो सका; क्योंकि हाईस्कूल में संस्कृत नहीं होगा, इण्टरमीडिएट संस्कृत में नहीं होगा तो स्नातक में संस्कृत के विद्यार्थी विश्वविद्यालय में कहां से आयेंगे? आई0ए0एस0 परीक्षा में कैसे बैठेंगे? मैं जर्मनी गया था, वहां मैंने देखा कि विश्वविद्यालयों में संस्कृत प्राध्यापन होता था। वह अब क्षीण हो गयी है। तकनीकी शिक्षा व्यवसाय के कारण कारण जर्मनी में पहले विश्वविद्यालयों में संस्कृत मे प्रवेश के लिए अधिक फीस लगती थी। जब मैं 2003 में गया उस समय विद्यार्थियों की संख्या नगण्य रही यह दुःस्थिति संस्कृत की थी और है। आज का युग अर्थ प्रधान है। संस्कृत को लोग  मात्र पूजा-पाठ की भाषा समझते हैं। अब विदित नहीं है कि संस्कृत में सब तकनीकी विधाएं हैं। संस्कृत के बिना अंगेजी अनुवाद सम्भव नहीं है। हिन्दी क्या है? यदि संस्कृत के तत्सम् शब्दों को निकाल दिया जाये तो हिन्दी कुछ नहीं है। हम लोग जो हिन्दी बोल रहे है  उसमें संस्कृत के तत्सम् शब्द हैं। अन्यथा यह ग्रामीण भाषा ही रह जायेगी। तद्भव शब्द रह जायेंगे। इसलिए मैंने एक पुस्तक मे लिखा था कि राष्ट्रपति का अभिभाषण संस्कृत में लिख लेना चाहिए और उसका अनुवाद प्रादेशिक भाषाओं में होना चाहिए।

भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात् आवश्यकता यह थी कि संस्कृत को मूर्धन्यता प्रदान की जाये लेकिन यह नहीं किया गया। भारतीय रूपये के ऊपर भी संस्कृत का नाम सबसे नीचे है। यह दुरभिसंधि है। यद्यपि मैं मानता हूं कि आदान-प्रदान से सांस्कृतिक संवर्धन-परिवर्धन होता है। प्राचीन समय में भी आदान-प्रदान हुए थे। ग्रीक भाषा के शब्द संस्कृत में आये। फलित ज्योतिष के अनेक शब्द संस्कृत भाषा में आये। संस्कृत के शब्द वहां गये। संस्कृत से अरबिक लोगों ने ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन किया और वहां से भी ज्योतिष शास्त्र परिवर्तित होकर भारत में आया। “उकरा” नामक ग्रंथ अरबिक देश से भारत में आया और भी अरबिक देशों से हमारे यहां से ज्योतिष और वैदिक गंथ अरब गये और अरब ने पुनः परिवर्तित कर यहां पर भेजा गया। “अलविजिस्त” एक ग्रंथ है जिसका अनुवाद संस्कृत में हुआ। जयपुर में सवाई मानसिंह ने संस्कृत में अरबिक ग्रन्थ का अनुवाद कराया। इस प्रकार आदान-प्रदान अभी भी हो सकते हैं। संस्कृत की जो धारा टूटी है वह लगभग 12वीं शताब्दी से टूटी है। 12वीं शताब्दी तक सूर्य सिद्धान्त की रचना हुई। उसके पश्चात् भावमिश्र ने आयुर्वेद में रचना की। जिसमें अन्य भाषा के शब्द लिए। आयुर्वेद में अनेक शब्द पर्सियन से आये। संगीत मेभी अनेक शब्द पर्सियन से आये। राग तोड़ी, राग जौनपुरी, यह शब्द संस्कृत के शब्द नहीं है। आदान-प्रदान से ज्ञान का सवंर्धन होता है। इस प्रकार अभी जो ग्रंथ संस्कृत में नहीं है। अंग्रेजी से उनका संस्कृत मे अनुवाद कराया जाये ताकि संस्कृत की धारा 12वीं शताब्दी से आज तक ज्यों की त्यों निरंतर बनी रहे ताकि विश्व में संस्कृत भाषा का अद्वितीय निदर्शन हो। क्योंकि वैदिक काल से 12वीं शताब्दी तक संस्कृत की अनवरत धारा रही है। उसके बाद धारा टूटी। उस टूटी धारा को पुनः जोड़ने के लिए आधुनिक ज्ञान विज्ञान के गंथों को संस्कृत भाषा में अनुवाद कराया जाये। संस्कृत भाषा को लोग समझते हैं कि दुरूह है, क्योंकि उसका व्याकरण कठिन होता है। लोग पढ़ते नहीं हैं। इसके लिए मैंने एक पद्धति का अविष्कार किया। “वागयोग नामोलिक” पद्धति उसका नाम है जो कि 300 घंटे में कोई भी व्यक्ति संस्कृत लिख बोल सकता है। संस्कृत ऊपर- ऊपर तो पढ़ना सरल है, सीखना सरल है, किन्तु उसके अन्दर प्रवेश करना कठिन है। व्युत्पत्ति से अन्दर प्रवेश हो सकता है। व्युत्पत्ति पद्धति का तात्पर्य है शब्द को तोड़ना, उनका अर्थ बताना। अगर संस्कृत भाषा के शब्दों को पश्चिमी देशों की भाषा के शब्दों के साथ तुलना करायें तो इससे संस्कृत सरल हो जाता है। इस विषय के अनेकों हमारे शिष्य देश-विदेश में प्रोफेसर हैं। किन्तु इस पद्धति का प्रचार-प्रसार भारत मे बहुत कम हुआ। नेता लोगों का संस्कृत के प्रति आकर्षण नहीं है। उनका तो अर्थ के प्रति आकर्षण है। इससे ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि तो हो नहीं सकती। अब तो पाश्चात्य संस्कृति सब जगह हावी हो गयी है। जन्मदिन पर मोमबत्ती बुझाया जाता है, जो हमारी सांस्कृतिक परम्परा ही नहीं रही है। स्कूलों में भी कान्वेंन्ट स्कूलों की वृद्धि होती जा रही है। ‘हम आर्य हैं और विदेशों से आये हैं,’ यह मान्यता स्कूलों में पढ़ाई जा रही है क्योंकि नेता लोगों का विशेष ध्यान संस्कृत की ओर नहीं है। भाजपा आई है लेकिन उसका भी ध्यान नहीं है। पहले भाजपा में यह विचारधारा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी जी संस्कृत नहीं जानते थे मैंने उनकी आलोचना की थी जो अंग्रेजी अखबार में छपा था। जिसमें मैनें लिखा कि नेताओं को स्ंास्कृत का प्रशिक्षण चलाया जाय। इस पर किसी का ध्यान नहीं अर्थ के प्रति दृष्टि है। विद्या के प्रति दृष्टि होने पर संस्कृत को सर्वत्र मान्यता मिलेगी।

 संस्कृत इतना बड़ा ज्ञान-विज्ञान का माध्यम है। इतनी चीजें छिपी हैं, लेकिन वह बचेगी कैसे ?

 हमने पहले ही कहा है कि हमारी जो पद्धति है उससे पढ़कर विदेशी लोग विदेशों में प्रोफेसर हो गये।  उस पद्धति के दो भाग प्रकाशित हो चुके हैं। हजारों वर्षों से चली आ रही संस्कृत व्याकरण की परम्परा को हमने ग्रसित कर दिया था। उसे प्रचारित एवं विकसित करना चाहिए। तभी सर्वत्र संस्कृत का प्रसार हो सकता है।

संस्कृत हो या अन्य कोई भी भाषा हो आज एक तरह से भाषा विपन्न समाज खड़ा होता जा रहा है, जिसको व्याकरण की कोई जानकारी नहीं। यह जो समस्या तेजी से फैल रही है इसके पीछे क्या कारण देखते हैं और निराकरण क्या है ?

 यह तो हिन्दी की प्रकृति है। जैसे अंग्रेजी की प्रकृति है- उसमें सभी भाषाएं सम्मिलित हैं जिसे खिचड़ी भाषा कहते हैं। तत्सम शब्द भी है, उर्दू भी, पर्सियन भी है, लैटिन शब्द भी। इसलिए यह मिश्रण हो गया। अंग्रेजी भी सरल है क्योंकि इसमे ळमदकमत का प्रयाग नहीं है। वो लैटिन और ग्रीक से आयी है। प्राचीन भाषा कठिन मानी जा रही है और मिश्रित भाषा सरल मानी जा रही है। खिचड़ी खाकर लोग स्वस्थ्य हो रहे हैं। इसका निराकरण यह है कि विदेशी लोग अपने यहां आ रहे हैं- आयुर्वेद और दर्शन पढ़ेंगे और संगीत सीखने। इन तीन ज्ञान विद्याओं के लिए इन तीनों का प्रचार-प्रसार चाहिए। आयुर्वेद में मिश्रण हो गया लेकिन यह विदेशी चिकित्सा द्वारा पराभूत नहीं हुआ। बहुत से पर्सियन शब्द हैं आयुर्वेद में। इसलिए वह प्रभावी है। संगीत में भी विदेशी भाषा के शब्द हैं लेकिन वह भी प्रभावी है। पाश्चात्य संगीत ने प्रभावित नहीं किया। भारतीय जनता को आध्यात्म के प्रति आकृष्ट करना जो व्यक्ति शोक, ईर्ष्या से विक्षिप्त होते जा रहे हैं उनके लिए आध्यात्म का दर्शन आवश्यक है। जैसे- योग का प्रसार हो रहा है, परन्तु योग केवल शारीरिक है, आध्यात्मिक नहीं। जिसके लिए विदेशी लोग आ रहे हैं। आध्यात्म और नैतिकता के गंथो का प्रकाशन होना चाहिए। नैतिक शिक्षा की परीक्षा होनी चाहिए। ऐसी नैतिक शिक्षा की जिसमें धर्म न हो आध्यात्म हो। जैसे – “शैले-शैले न माण्क्यिम् मौक्तिकयं न गजे- गजे” प्रत्येक पर्वत मे मणि नहीं होती, प्रत्येक हाथी में मोती नहीं होता, सज्जन व्यक्ति सर्वत्र नहीं होते। प्रत्येक वन मे चन्दन नहीं होते। “माता शत्रु पिता बैरी येन वालो पाठितः” या इस प्रकार के वचनों की परीक्षा होनी चाहिए। वचन भी कठिन होते हैं। हाईस्कूल में नीति वचनों की परीक्षा होनी चाहिए। सर्वसाधारण के लिए परीक्षा होनी चाहिए और सभी पाठ्यक्रमों में नीति वचनों की परीक्षा हो। इस प्रकार ही संस्कृत संरक्षण सम्भव है।

संस्कृत पर आरोप लगता रहा है कि यह रोजगार परक नहीं है लेकिन देखने में आ रहा है तेजी से पुरानी पीढ़ी समाप्त हो रही है, कुशल कर्मकाण्ड कराने वाले और ज्योतिषी नही मिल रहे हैं। ‘डिमांड’ है पर ‘क्वालिटी’ नहीं है। इस असंतुलन के दौर को आप कैसे देखते हैं ? ज्योतिष के प्रति सर्वत्र आकर्षण है किन्तु इसका प्रचार-प्रसार कैसे हो, यह कुछ लोगों के हाथ में है। बी0एच0यू0, काशी विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द में प्रशिक्षण चल रहे हैं। इससे जानकारी बढ़ रही है। उससे व्यक्ति लाभान्वित हो सकते हैं। पहले संस्कृत पढना होगा। आयुर्वेद में संस्कृत के बिना नहीं आ सकता, शास्त्र या शिल्प शास्त्र बिना संस्कृत के नहीं आ सकते लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि मूल यानी संस्कृत के बिना ही लोग कार्य कर रहे हैं। संस्कृत भाषा को कठिन मानकर हिन्दी भाषा के गंथों के आधार पर कार्य कर रहे हैं, इसलिए संस्कृत से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए जो आसान पद्धति है उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिए। तभी मूल के आधार पर शाखाओं का प्रसार हो सकता है। मैं 40 वर्ष पहले एक गर्वनर से मिला था। उन्होंने कहा कि आप नर्सरी तैयार करिये, मैं आपके पढ़ाये शिष्यों को विद्यालयों में शिक्षक नियुक्त कर दूंगा। यह होना चाहिए कि हमसे पढ़े व्यक्ति हमारी पद्धति की परीक्षा में पास हों और विश्वविद्यालयों में नियुक्त हों। तभी सर्वत्र संस्कृत का प्रचार-प्रसार हो सकता है।

शास्त्रार्थ क्या था, कैसे होता था और कैसे संरक्षित करता था संस्कृति को ?

 शास्त्रार्थ का मतलब है प्रश्न और उत्तर। पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष। एक वाक्य में अगर कहा जाये तो प्रश्न का उत्तर। हमने एक प्रश्न उठाया उसको आप लोग उत्तरित करने लगे तो विपक्ष ने कहा कि यह अर्थ नहीं हो सकता; उन्होंने प्रमाण प्रस्तुत की तो दूसरे पक्ष ने भी प्रमाण दिये कि उक्त अर्थ हो सकता है। यही शास्त्रार्थ है। निर्णय करने के लिए एक प्रधान संस्कृतज्ञ होता था जो जो निर्णय देता था।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था नई पीढी को मूल्य से दूर कर रही है, जिसकी वजह से भ्रष्टाचार अनैतिकता व्याप्त है; इसे शिक्षा में कैसे समावेशित किया जाये ?

 प्राणी अनुकरणशील होता है। जो विशिष्ट लोग होते हैं उनको सुधारो। आज दीक्षांत में नेताओं से भाषण कराया जाता है तो विद्यार्थी नेता बनना चाहता है। हमने 1977 मे प्रकाशित अपनी पुस्तक मे लिखा था कि “भारत वर्ष में संस्कृत की मान्यता क्यों?” यह चौखम्भा से प्रकाशित थी। इसमें मैने बताया कि दीक्षांत में नेताओं से भाषण नहीं कराना चाहिए। छात्र अनुकरण करता है। यदि विद्वानो से भाषण करायेंगे। तब उसे पता चलेगा कि विद्वानो की मान्यता है तो वह विद्वान बनने का प्रयास करेगा। यदि सुधारना चाहते हैं तो अध्यापकों और नेताओं को सुधारिये।

काशी को लेकर बड़ा आकर्षण है। यहां सांस्कृतिक समग्रता देखने को मिलती है। बनारस में वह कौन सा आकर्षण है?

यहां का पहला आर्कषण तो गंगा है। आप चार बजे यदि जायेंगे, गंगा से किरणें निकलती हैं। इससे गंगा के किनारे रहने वाले दार्शनिक हो जाते हैं। तुलसीदास गंगा के किनारे रहे, दार्शनिक हो गये। रविदास, कबीरदास दार्शनिक हुए। यह गंगा जल की विशेषता है कि इसके किनारे रहने वाले लोग आध्यात्मिक दृष्टि से प्रबल एवं प्रपुष्ट होते हैं। दूसरा यहां का साड़ी का व्यापार आकर्षण है और तीसरा यहां का जनजीवन है; यहां का विशेष गठन है। यहां केन्द्रीय वातावरण में उर्जा का अनुभव होता है। वाह्य व्यक्ति को इसका अनुभव ज्यादा होता है। यहां के आकर्षण में गंगा विश्वनाथ, साड़ी, संगीत, वातावरण जनजीवन का आकर्षण है।

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