पंचकोशी यात्रा वाराणसी

काशी अपनी धार्मिकता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि काशी की धरती पर कदम रखते ही मन निश्चल और पवित्र हो जाता है। यहां लोग आस्था के साथ मंदिरों में अपने आराध्य के समक्ष माथा टेकते हैं। काशी में कई धार्मिक यात्राएं भी होती हैं। जिनका अपना अलग ही महत्त्व है। आस्थावान भक्त इन यात्राओं को पूरे भक्ति भाव से करते हैं।

1- पंचक्रोशी यात्रा- काशी की पंचक्रोशी यात्रा बहुत प्रसिद्ध है। यह सबसे लंबी यात्रा है। यह यात्रा गंगा स्नान करने के बाद विश्वेश्वर दर्शन से शुरू होती है। यात्रा पांच कोश (11 मील) के घेरे में होती है। यात्री नदी तट के सभी तीर्थों का दर्शन कर दुर्गाकुण्ड से कंदवा में देवायतनों का दर्शन कर रात्रि-विश्राम करते हैं। दूसरे दिन भीमचण्डी में दर्शन के बाद आराम, तीसरे दिन वरूणा नदी में स्नान वहां स्थित रामेश्वर के दर्शन के बाद विश्राम। चौथे दिन यात्री शिवपुर में रूकते हैं। पांचवे दिन कपिलधारा होते हुए फिर से साक्षी विनायक पहुंच कर यात्रा पूरी होती है। यात्रा के दौरान यात्री 108 तीर्थस्थलों और मंदिरों में जाकर दर्शन-पूजन करते हैं। जहां 56 शिवलिंग, 11 विनायक, 10 शिवगण, 10 देवियों, 4 विष्णुओं, 2 भैरवों और 15 अन्य तीर्थों में यात्री जाते हैं।

यात्रा

       धर्म, आध्यात्म और आस्था की नगरी काशी अपने में इतना कुछ समेटे हुए है जिसे शब्दों में बांधना समुद्र से एक बूंद जल निकालने के समान है। काशी में धर्म लोगों का अभिन्न अंग रहा है। प्रातःकाल का आगमन यहां घण्टा-घड़ियालों वैदिक मन्त्रों के सुमधुर स्वर एवं हवन सामग्रियों की सुगन्ध, आम बोलचाल में हर-हर महादेव बनारसियों की परम्परा रही है। काशी से जुड़ा एक कर्म यात्रा का भी है। हिन्दूओं के लिए धार्मिक यात्राओं का अपना महत्व रहा है। यात्राओं की बात की जाय तो काशी में इतनी यात्राएँ होती है कि वर्ष भर इनका क्रम चलता रहता है। धार्मिक यात्रा करने के पीछे का आशय कई अर्थों में है किन्तु सामान्य आशय यह रहा है कि यात्रा के दौरान मन एवं शरीर सात्विक हो जाय और भक्ति में रम जाये। धार्मिक यात्रा के दौरान यात्री कई तरीके से नियमबद्ध हो जाते हैं। साथ ही कई अवगुणों को यात्रा के दौरान छोड़ना पड़ता है। खान-पान पूरी तरह सात्विक हो जाता है। जब तक यात्रा चलती रहती है यात्री का मन पूरी तरह से भक्तिमय हो जाता है। इस दौरान लोग कई तरह के संकल्प से भी बंध जाते है। धार्मिक यात्राओं में कुछ नियम भी बनाये गये हैं। यात्रियों से इन नियमों के पालन की अपेक्षा रहती है। आत्म नियंत्रण के लिए बनाये गये इन नियमों में प्रमुख रूप से यात्रा काल में राजसी एवं तामसी आचार-विचार का तिरस्कार कर दिया जाय। काशी की यात्राओं में सबसे प्रमुख यात्रा पंचक्रोशी है जिसे आस्थावान करते रहे है। इसके अतिरिक्त कई और धार्मिक यात्राएं भी होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तो काशी में रहकर हर दिन पतित पावनी गंगा एवं काशी विश्वनाथ की यात्रा करनी चाहिए। अभी भी कुछ धार्मिक प्रवृत्ति के श्रद्धालु इस नियम का पालन करते हैं। गंगा स्नान के बाद काशी विश्वनाथ का दर्शन करने को एकायतन यात्रा कहा जाता है। काशी की अन्य यात्राएं भी महत्वपूर्ण है जैसे-द्विरायतन की यात्रा त्रियातन की यात्रा चतुरायतन यात्रा के अलावा भी कई यात्राएं होती हैं।

पंचक्रोशी यात्रा- काशी की पंचक्रोशी यात्रा जिसे 84 क्रोशी यात्रा भी कहा जाता है प्रमुख है। इस धार्मिक यात्रा को करने वाले यात्रियों की संख्या अन्य यात्राओं से अधिक रहती है। इस यात्रा के दौरान यात्री पूरे यात्रा करता हैं। इस दौरान यात्रा मार्ग में पड़ने वाले देवस्थलों में यात्री शीश नवाता है। पंचक्रोशी यात्रा की चर्चा सर्वप्रथम 7वीं शताब्दी में पद्यपुराण में मिलती है। बावजूद इसके विद्वानों में पंचक्रोशी यात्रा को लेकर एक राय नहीं रही है। कई विचारकों के अनुसार यह यात्रा अधिक प्राचीन नहीं हैं। जबकि कुछ का मत रहा है कि पंचक्रोशी यात्रा 12वीं शताब्दी के पहले भी काशी में होती रही है। यात्रा के उम्र पर न जाकर इसके महत्व की चर्चा महत्वपूर्ण हैं पंचक्रोशी यात्रा काशी के धार्मिक हृदय यानी गंगा किनारे घाट से शुरू होती है और समाप्त भी होती है। पंचक्रोशी की परिधि में ही वाराणसी की पवित्रता मानी जाती है। पंचक्रोशी यात्रा के एक दिन पहले यात्री या तो व्रत रखते हैं अथवा अल्पाहार कर ढुण्डिराज का पूजन-अर्चन करते हैं। ढुण्डिराज का मंदिर ज्ञानवापी गली में म0नं0 सी0के0 36/11 में स्थित है। इस गली में हर समय दर्शनार्थियों की आवाजाही लगी रहती है। इसके बाद पंचक्रोशी यात्रियों का कारवां आगे सावित्री फाटक अन्नपूर्णा गली में म0नं0 सी0के0 35/27 मंदिर में ढुण्डिराज के दर्शन करता हैं। इसके बाद यात्री पंच्चविनायक मंदिर की तरफ बढ़ते हैं। यह मंदिर म0नं0 सी0के0 35/21 में स्थित है। यहां से दर्शन-पूजन करने के बाद यात्री काशी के पालक यानी विश्वनाथ जी का दर्शन-पूजन करने पहुँचते है। हालांकि इस मंदिर का पता बताने की ज्यादा आवश्यकता नहीं है क्योंकि काशी में काशी विश्वनाथ के मंदिर तक पहुँचने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती है फिर भी मंदिर का पता म0नं0 सी0के0 35/11 विश्वनाथ जी है यहाँ पहुँचकर पंचक्रोशी यात्री विश्वेश्वर महादेव के समक्ष श्रद्धा भाव हो प्रार्थना करते हैं। साथ ही यात्रा की सफलता की कामना करते हैं। प्रार्थना करने के पश्चात यात्री विश्वनाथ जी के मंदिर की तीन बार प्रदक्षिणा (चक्कर) करते है। इसके बाद वहीं मुक्ति मण्डप में जाकर ज्ञानवापी तीर्थ को प्रणाम कर ब्राह्मण को दक्षिणा देते हैं। और इसके बाद आगे की यात्रा पर अग्रसर होते हैं। पंचक्रोशी यात्रा के क्रम में यात्रियों का अगला पड़ाव मणिकर्णिका घाट होता है। यहाँ यात्री गंगा स्नान कर मौन संकल्प तोड़ता है। इसके बाद यात्री तिलक रूद्राक्ष की माला और वस्त्र पहनता है। फिर अक्षत, पुष्प, पैसा लेकर आगे की यात्रा पन्चाक्षरी महामंत्र यानी ‘हर-हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ गंगे” को काशी उंचे स्वर में तो कभी मन में जपता हुआ चलता है। मणिकर्णिका घाट से उत्तर की ओर गली में मणिकर्णिका का मंदिर है। यह मंदिर गढ़वासी टोला मंदिर म0नं0 सी0के0 8/12 में स्थित है। यहाँ भी यात्री मत्था टेकते हैं। इसी रास्ते पर
म0नं0 डी0 1/67 में गणेश मंदिर में सिद्धि विनायक है। यात्री मणिकर्णिका घाट के दक्षिण की ओर स्थित छोटे-बड़े मंदिरों का दर्शन-पूजन करते हुए यात्री ललिताघाट के ऊपर नेपाली पशुपतिश्वर मंदिर के नीचे मंदिर म0नं0 डी0 1/66 में गंगा केशव का मंदिर स्थित है। यहाँ पर भी यात्री दर्शन पूजन करते है। इसके बाद यात्री ललिता घाट पर स्थित मंदिर है। म0नं0 डी0 1/67 में ललिता गौरी के दरबार में प्रस्तुत होते है। इस क्रम में त्रिपुरा भैरवी घाट के ऊपर भगवान शिव के मंदिर में जरासंन्धेश्वर हैं। यह मंदिर म0नं0 5/10 में स्थित है। यहां भी यात्री पहंचकर आशीर्वाद लेते हैं। आगे की यात्रा में यात्री म0नं0 डी0 16/34 मान मंदिर घाट के ऊपर सोमनाथ मंदिर में सोमनाथेश्वर का दर्शन-पूजन करते हैं। यहां दर्शन कर यात्री म0नं0 डी0 16/32 मान मंदिर घाट पर स्थित मंदिर में दालमेश्वर के दर्शन-पूजन को पहुंचते है। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान यात्री भजन-कीर्तन एवं दान दक्षिणा देते चलते हैं। सात्विक विचारों से ओत-प्रोत यात्रियों का मन शान्त चित्त रहता है। यात्रा के दौरान यात्रिकों का अगला पड़ाव दशाश्वमेध घाट स्थित शूलटंकेश्वर मंदिर होता है। ऐसी मान्यता है कि शूलटंकेश्वर के दर्शन से पेट से सम्बन्धित रोग ठीक हो जाता है। शूलटंकेश्वर मंदिर के ऊपर के भवन में राम मन्दिर से सटा हुआ म0नं0 डी0 16/111 में आदि वाराहेश्वर का मंदिर है। यहां भी यात्री पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं।

       इस मंदिर के दक्षिण तरफ म0नं0 डी0 17/100 प्रयागराजघाट पर मोहल्ले में प्रयागेश्वर मंदिर में बंदी देवी की मूर्ति है। इनका दर्शन-पूजन भी यात्री करते है। यात्री आगे दशाश्वमेधेश्वर के दर्शन-पूजन के लिए बढ़ते हैं। इनका मंदिर म0नं0 डी0 18/19 प्रयागघाट पर है। ऐसी मान्यता है कि इलाहाबाद के प्रयागराज में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है उससे दस गुना अधिक फल प्रयागराज दशाश्वमेध घाट पर माघ महीने में स्नान करने से मिलता है। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान यहां दर्शन-पूजन कर यात्री पाण्डेय घाट के ऊपर म0न0 डी0 25/7 शिवजी के मंदिर में सोमेश्वर से सटे हुए सर्वेश्वर की प्रतिमा है यहाँ भी पहुँचते है। यहाँ पूजन कर यात्री केदारेश्वर के आशीर्वाद के लिए पहुँचते हैं। इनका मन्दिर म0नं0 बी0 6/102 केदारघाट पर स्थित है। यहाँ लगभग सप्ताह के सातों दिन वेद पाठ, पुराण, रामायण सम्मेलन होते रहते हैं। यहाँ से पंचक्रोशी यात्रा आगे बढ़ती हुई हनुमतेश्वर शिवलिंग की प्रतिमा हैं। इनका मंदिर हरिश्चन्द्र घाट से सटे हनुमान घाट के ऊपर म0नं0 बी0 4/11 में स्थित है। श्रद्धाभाव से यात्री हनुमतेश्वर का दर्शन-पूजन करते हैं।

       आगे की यात्रा के क्रम में यात्री पानी की टंकी से आगे म0नं0 बी0 2/17 लोलार्क कुण्ड के पास गणेश मंदिर में अर्क विनायक की बड़ी मूर्ति स्थापित है। इसके बाद यात्री लोलार्क सूर्य के मंदिर म0नं0 बी0 2/31 ए में पहुंचते हैं। यहाँ दर्शन-पूजन कर यात्री गंगा किनारे दक्षिण की ओर अस्सी घाट पर पहुंचते हैं। यहाँ यात्री कुछ देर विश्राम एवं जलपान ग्रहण कर घाट के ऊपर स्थित अस्सी संगमेश्वर का दर्शन-पूजन करते हैं। इनका मंदिर म0नं0 बी0 1/174 अस्सीघाट पर स्थित है। यहाँ से यात्री दुर्गाकुण्ड पहुँचते है। कुण्ड में आचमन कर दुर्गा जी का दर्शन-पूजन करते हैं। दुर्गा जी का दर्शन-पूजन करते हैं। दुर्गा कुण्ड के पूर्व-दक्षिण कोने पर म0नं0 बी0 27/2 दुर्गाकुण्ड पर दुर्ग विनायक का मंदिर स्थित है। यहां पहुंचकर यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। दुर्ग विनायक के पश्चिम म0नं0 बी0 27/2 दुर्गाकुण्ड मंदिर में दुर्गा देवी की प्रतिमा है। इनका दर्शन-पूजन कर यात्री गरीबों में दान देते है। यात्रा के दौरान यात्री पंचक्रोशी यात्रा में निर्धारित मार्गों पर ही चलते हैं। पंचक्रोशी यात्रा के क्रम में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार पहले दिन दुर्गा जी में ही विश्राम करने का विधान है। विश्राम के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वार के बाहर पश्चिम तरफ शंकर जी के मंदिर में दक्षिणेश्वर हैं इन्हें मोटे महादेव के नाम से भी जाना जाता है। यात्री आगे बढ़ने पर करमहितालपुर गाँव में विश्वकसेनेश्वर का मंदिर है। यहाँ पहुंचकर यात्री दर्शन-पूजन करते है। पश्चिम चितईपुर होते हुए कन्दवा पहुंचती है। यहाँ पहली गली छोड़कर दूसरी उत्तर दिशा की तरफ जाने वाली गली से आगे पक्का तालाब स्थित है। इस तालाब के उत्तरी तट पर विशाल एवं प्राचीनतम कर्दमेश्वर का मंदिर स्थित है। यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष से अधिक प्राचीन है। यात्री यहां पहुंचकर मंदिर से सटे हुए पश्चिम की ओर कुआं है इसे कर्दम कूप के नाम से जाना जाता है। उसका दर्शन करते है। इस कूप से सटा हुआ ही शंकर जी के मंदिर में सोमनाथेश्वर हैं। यात्री इनका दर्शन-पूजन करते हैं। इनके दर्शन का भी बड़ा महात्म्य है। कर्दम कूप से दक्षिण की ओर सटा हुआ विरूपाक्षण है। इनका दर्शन भी यात्री करते है। इसी मंदिर के उत्तर दिशा में नीलकण्ठेश्वर का मंदिर है यात्री इनका आशीर्वाद भी लेते है। इनके दर्शन-पूजन का भी अलग धार्मिक महत्व है। इनके दर्शन के उपरान्त यात्री कर्दमेश्वर महादेव के दरबार में हाजिरी लगाते है। मंदिर के बाहर दालान में कर्दमेश्वर गण हैं। इन गणों को पंचब्रीहि पांच प्रकार के धान्य अन्न काला तिल चढ़ता है। यात्री कर्दमेश्वर महादेव को गंगा जल, धूप-दीप, वस्त्र, द्रव्य तमतु फल, मिष्ठान पकवान चढ़ाते हैं। इसके बाद यात्री सड़क के पास धर्मशाला में रूकते है। वह कुएं के जल, गंगाजल से शुद्ध कर शाम की पूजा के बाद कर्दमेश्वर में 31 श्लोकों का यात्री हवन करते है। आगे की यात्रा करते हुए यात्री अमरा गांव पहुँचते है। गांव के दाहिने तरफ शिवजी के मंदिर में नागनाथेश्वर है। यात्री उनका अभिषेक कर दर्शन-पूजन करते है। इसी गाँव में यात्री चामुण्डा देवी के मंदिर में जाते है। देवी का दर्शन कर यात्री आशीर्वाद लेते है। इस मंदिर से पश्चिम दोहना गाँव पड़ता है। इस गाँव से दाहिने तरफ सड़क के किनारे शिव जी का मंदिर है जिसमें मोक्षेश्वर महादेव विद्यमान है। यात्री इनका दर्शन-पूजन करते हुए यात्रा आगे बढ़ाते है। इस मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर दाहिनी तरफ करूणेश्वर महादेव का मंदिर है। यात्री इनके दरबार में मत्था टेकने के बाद इसी मंदिर के पश्चिम दाहिनी ओर वीरभद्रगण का मंदिर है यात्री यहां मत्था टेकते हुए यात्रा की सफलता की कामना करते हैं। इस मंदिर से पश्चिम दिशा की तरफ थोड़ा सा आगे बढ़ने पर विकटाक्ष दुर्गा का मंदिर स्थित है। यात्री देवी दर्शन कर धन्य होते हैं। यात्रा का अगला पड़ाव देऊरा गांव में स्थित उन्मत्त भैरों का मंदिर रहता है। ऐसी मान्यता है कि इनके दर्शन से दुःखों का नाश होता है और चिन्ता दूर होती है। इसी गाँव में नीलकण्ठ का भी मंदिर है। यहाँ भी यात्री मत्था टेकते है। इसी गाँव में कालकूटभाषा का मंदिर है। यात्रा क्रम में यहाँ भी यात्री सिर नवाते है। आगे बढ़ने पर विमला दुर्गा देवी का मंदिर विद्यमान है। यात्री यहां पहुंचकर दर्शन-पूजन करते है। इस मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर सड़क पर आगे बढ़ने पर महादेवेश्वर का मंदिर स्थित हैं। इस शिवलिंग का अभिषेक धूप-दीप कर यात्री आशीर्वाद लेते देऊरा गाँव में ही नन्दिकेश्वर मन्दिर हैं इनका दर्शन-पूजन कर यात्री आगे बढ़ते है। आगे बढ़ने पर यात्री भृंगीरीटगण का मंदिर पड़ता है। यात्री यहाँ आशीर्वाद लेते हैं। इस मंदिर से आगे बढ़ने पर गौरा गाँव पड़ता है। इस गाँव में गणप्रियेश्वर का मंदिर स्थित है। यहाँ दर्शन-पूजन कर यात्री इसी मंदिर के पश्चिम तरफ स्थित है। पूर्वाभिमुख विरूपाक्षगण का मंदिर यात्री यहां पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। यहां से यात्रा पश्चिम दिशा की तरफ आगे अग्रसर होते है। आगे चकमातलदेई गाँव पड़ता हैं इस गाँव में स्थित है यक्षेश्वराय का मंदिर उनका दर्शन-पूजन भी यात्री करते है। यहां से आगे बढ़ने पर प्रयागपुर गाँव में विमलेश्वर का मंदिर स्थित है। यात्री इनका भी आशीर्वाद लेते है। पंचक्रोशी यात्रा का ऐसा माहत्म्य है कि शहरी एवं ग्रामीण दोनों इलाकों से गुजरते हुए कई जगह मार्ग काफी उबड़-खाबड़ भी पड़ता है। बावजूद इसके यात्री पूरे श्रद्धा-भाव एवं उत्साह से यात्रा करते है। आगे बढ़ने पर प्रयागपुर गाँव में ही मोक्षेश्वर का मंदिर स्थित है। इनका आशीर्वाद भी यात्री लेते है। यात्रा आगे बढ़ती है तो इसी गाँव में ज्ञानदेश्वर महादेव का मंदिर विद्यमान है। यात्री यहां भी पहुँचकर दर्शन-पूजन करते हैं। पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ने पर असवारी गाँव की सीमा में अमृतेश्वर का मंदिर है। यहाँ भी यात्री जलाभिषेक करने के साथ ही धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाते हैं। इस मंदिर से आगे बढ़ने पर सड़क किनारे कई धर्मशालाएँ स्थित हैं। जिनके दाहिनी ओर विशाल पक्का कुण्ड हे जहां यात्री स्नान करते हैं इसे गन्धर्वतीर्थ कहा जाता है। भीमचण्डी गाँव में स्थित इस तीर्थ का धार्मिक महात्म्य महत्वपूर्ण है। इस कुण्ड के पूर्व-दक्षिणी कोने पर नरकार्णावतार शिव गण का मंदिर स्थित है। जिनका दर्शन-पूजन यात्री करते हैं। आगे बढ़ने पर भीमचण्डी गाँव में ही गन्धर्वेश्वर का मंदिर है। यहाँ पहुँचकर यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। इस मंदिर के दक्षिण तरफ कुआं भीमचण्डी शक्ति तीर्थ है। इस कुंए के जल का यात्री भोजन बनाने एवं पीने का उपयोग करते हैं। इस कुएं से कुछ ही दूरी पर भीमचण्डी विनायक का मंदिर है। पंचक्रोशी यात्री भीमचण्डी विनायक के मंदिर में जाकर दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से सभी कार्य सिद्ध हो जाते है और कष्ट दूर हो जाते है। इसी मन्दिर से सटा हुआ गन्धर्व का मंदिर है। यहां भी यात्री पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। इसके आगे बढ़ने पर भीमचण्डेश्वर का मंदिर है। यात्रा क्रम में यात्री इनका दर्शन-पूजन भी करते है। इस मंदिर के दक्षिण तरफ भीमचण्डी देवी का मंदिर है। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान इनके दर्शन-पूजन का भी विधान है। यात्री देवी के दरबार में पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं। यहां कई धर्मशालाएं हैं जहां यात्री रात्रि विश्राम करते हैं। इसके बाद यात्रा पुनः शुरू करते हुए राजातालाब चौराहे से उत्तर दिशा की ओर रामेश्वर जाने वाले मार्ग पर कचनार गांव स्थित एकपाद शिवगण का मंदिर है। यात्री अपने अनुष्ठानिक सामग्री के साथ इस मंदिर में पहुंचते है और दर्शन-पूजन करते हैं। इसके बाद यात्री आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ने पर हरपुर गांव में सड़क के दाहिनी ओर महाभीम का शिवलिंग स्थित है। पंचक्रोशी यात्री इनका दर्शन-पूजन कर आगे बढ़ते हैं आगे की यात्रा में हरशोत गांव में भैरवेश्वर का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भैरव एवं भैरवी की मूर्तियाँ हैं। इनके दर्शन-पूजन से समस्त कष्ट एवं रोग तत्काल दूर हो जाते हैं। यात्री इनका आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ते हैं। आगे दीनदासपुर गांव में भूतनाथेश्वर का मंदिर है। इनका दर्शन कर यात्री आगे बढ़ते है। इस मंदिर के उत्तर में एक पक्का तालाब है जिसे सिन्धु सरोवर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां भी यात्री जाते हैं। इसी के बगल में ही सोमनाथेश्वर शिवलिंग है। इनके दर्शन-पूजन का माहात्म्य है। यहां मठ भी है जहां साधु सन्यासी निवास करते हैं। आगे की यात्रा में यात्री जनसा गांव में सड़क के दाहिनी तरफ स्थित कालनाथेश्वर के मंदिर में पहुंचकर दर्शन-पूजन करते है। इस मंदिर पास ही कपदीश्विर का मंदिर है यहां भी पंचक्रोशी यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। इसके आगे बढ़ने पर चौखण्डी गाँव के पास कामेश्वर का मन्दिर है। यहाँ भी दर्शन-पूजन का नियम है। इसी के बगल में गणेश्वर का भी मंदिर है। यहां भी पंचक्रोशी यात्री दर्शन-पूजन करते हैं, इसके आगे बढ़ने पर चौखण्डी गांव के पास कामेश्वर का मंदिर है यहां भी दर्शन-पूजन का नियम है। इसी के बगल में गणेश्वर का भी मंदिर है। यहां दर्शन-पूजन करते हुए यात्री पास में ही स्थित वीरभद्र शिवगण के मन्दिर में जाकर आशीर्वाद लेते है। इस मंदिर के पास में ही चारूमुख शिव की प्रतिमा है। ऐसी मान्यता है कि इनके दर्शन-पूजन से व्यक्ति बुद्धिमान एवं चालाक बनता है। इससे आगे बढ़ने पर भटौली गांव में सड़क किनारे स्थित है। गणनाथेश्वर का मंदिर यहां भी यात्री अपनी हाजिरी लगते हैं। इस मंदिर के आगे उत्तर की ओर पक्का कुण्ड स्थित है जिसे देहली विनायक तीर्थ कहते हैं। इस कुण्ड के पूर्वी घाट के पास स्थित है। देहली विनायक का मंदिर यात्री इनका आशीर्वाद लेते हैं। माना जाता है कि इनके दर्शन से रोग पाप कष्ट से मुक्ति मिल जाता है। इस मंदिर से करीब 2 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा की ओर भुलई गांव में उत्कलेश्वर और उद्दण्ड विनायक का मंदिर है। यात्री इन दोनों मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं। माना जाता है कि उद्दण्डविनायक के दर्शन से शत्रु भी मित्र बन जाता है। यहां दर्शन-पूजन कर आगे बढ़ने पर हरीमपुरा गांव में रूद्राणी देवी का मंदिर स्थित है। यात्री देवी का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ते हैं आगे बढ़ने पर रामेश्वर गाँव है जहाँ रामेश्वर में विश्राम कर वरूणा नदी में स्नान करने के बाद वहीं पर स्थित सोमेश्वर शिवलिंग का दर्शन-पूजन करते हैं। इस मंदिर से सटा हुआ भरतेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। यात्री यहां पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। इस मंदिर से सटा हुआ मंदिर है लक्ष्मणेश्वर का यहां भी यात्री पहुंचकर दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। इसके बगल में शत्रुध्नेश्वर का मंदिर विद्यमान है। यात्री इनका दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। इसी क्रम में ध्या भूमीश्वर का मंदिर भी स्थित है। यहां भी यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन-पूजन से धन सम्पदा में बढ़ोत्तरी होती है। इस मंदिर से सटा हुआ नहुषेश्वर का मंदिर है। यात्री यहां पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं। इसके उपरान्त यात्री वहीं पर स्थित रामेश्वर मंदिर में भी दर्शन-पूजन करते है। मान्यता है कि इनके दर्शन से शिव, शक्ति, विष्णु और इष्टदेव की भक्ति का फल प्राप्त होता है। यात्री रामेश्वर के धर्मशालाओं में रात्रि विश्राम करते हैं। इस दौरान कुछ यात्री रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन कर भगवान का नाम जपते हैं। पंचक्रोशी यात्रा रामेश्वर से आगे असंख्यात, शिवलिंगेश्वर का मंदिर यात्री यहां पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। माना जाता है कि असंख्यात शिवलिंगेश्वर के दर्शन-पूजन का फल प्राप्त होता है। रामेश्वर गाँव से आगे चलने पर करौमा गांव में देवसन्ध्येश्वर शक्ति तीर्थ कुंआ है। वही पास में देवसन्ध्येश्वर का मंदिर है। यात्री शिव के इस स्वरूप का दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। यात्रा आगे बढ़ने पर जी0टी0 रोड़ के पार करने पर शिवपुर गांव में बड़ा सा कुण्ड है। इस कुण्ड को मानसरोवर तीर्थ कहा जाता है। इसी के पास ही द्रौपदी कुण्ड है। यात्री शिवपुर में रात को विश्राम भी करते हैं। इस दौरान यात्री इस कुण्ड के जल से स्नान के बाद मंदिर में जाकर दर्शन-पूजन करते हैं। श्रद्धालुओं में विश्वास है कि इनके दर्शन-पूजन से दुख संताप का निषेध होता है एवं सुख की प्राप्ति होती है। इस मंदिर के बगल में ही द्रौपदीश्वर का मंदिर है। दर्शन-पूजन की इस श्रृंखला में यात्री इनके दरबार में भी पहुँचते है। इसी मंदिर में युधिष्ठेश्वर शिवलिंग भी है। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से प्रतिकूल परिस्थिति में मन शांत रहता है एवं धर्म के पालन की शक्ति आती है। इसी मंदिर के बगल में उत्तर दिशा की ओर भीमेश्वर का मंदिर है जहाँ यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। ऐसा माना गया है कि इनके दर्शन से व्यक्ति बलवान होता है। इस मंदिर से सटा हुआ ही आहुनेश्वर का मंदिर है। यात्री इनका भी आशीर्वाद लेते हैं। इसी मंदिर के बगल में नकुलेश्वर का भी मंदिर स्थित है इनके दर्शन के बाद इसी मंदिर से सटा सहदेवेश्वर का मंदिर है जहां पहुँचकर यात्री दर्शन-पूजन करते है। इस मंदिर के पूर्व दिशा में शिव जी के मंदिर में कृष्णेश्वर स्थित है। यात्री कृष्णेश्वर के दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से समस्त कार्य बिना किसी अड़चन के सम्पन्न होते हैं और कृष्ण और शिव की भक्ति प्राप्त होती है। इस मंदिर के पड़ोस में ही परीक्षितेश्वर का मंदिर है। इस मंदिर में भी यात्री जाकर आशीर्वाद लेते हैं। इसी मंदिर के बगल में कुन्तीश्वर का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में यात्री पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। यात्रा के क्रम में शिवपुर में विश्राम करने के दौरान यात्री पंचपाण्डेश्वर और कुन्तीश्वर का दर्शन-पूजन करते हैं। इसके आगे बढ़ने पर टी0वी0 टावर के पश्चिम दिशा की ओर पाशपाणि कुंआ तीर्थ के रूप में स्थित है। इस क्षेत्र को कैन्टूमेन्ट सदर बाजार कहा जाता है। यहीं पर स्थित है पाशपाणि विनायक का मंदिर। यात्री इनका दर्शन-पूजन करते हैं। माना जाता है कि इनके दर्शन-पूजन से समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और किसी भी कार्य में रूकावट नहीं आती है। इससे आगे पाण्डेयपुर की ओर बढ़ने पर खजुरी पास पृथ्वीश्वर का मंदिर स्थित है। मान्यता है कि पृथ्वीश्वर के दर्शन-पूजन से सभी प्रकार के संकट और रोग दूर हो जाते हैं पृश्वीश्वर को राजा पृथु ने स्थापित किया था। इस स्थान पर अक्सर यज्ञ, वेद-वेदान्त, गीता, भागवत, रामायण आदि के कथा होते रहते हैं। इससे आगे बढ़ने पर पाण्डेयपुर से पूर्व की ओर सारंगतालाब है यहीं सारंगतालाब स्वर्ग भूमि देवी तीर्थ है। यहां भी यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। सारंग तालाब से पूर्व की ओर दीनदयालपुर गांव के दाहिनी ओर यूप सरोवर तीर्थ है। यह सोना तालाब के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस तालाब के उत्तरी घाट पर यूपसरोवरेश्वरा का मंदिर स्थित है यात्री यहां दर्शन-पूजन कर पंचक्रोशी यात्रा क्रम को आगे बढ़ाते है।

       यूपसरोवरेश्वर से आगे बढ़ने पर यात्री कपिलधारा पहुँचते हैं। यहां यात्रियों के ठहरने के लिए कई धर्मशालाएँ भी हैं जहाँ यात्री विश्राम करते हैं। वहीं सड़क के दाहिनी ओर कुंआ है जिसे पार्वती शक्ति तीर्थ कहा जाता है। इसी के बगल में पार्वती जी का मंदिर भी है। यात्री यहाँ दर्शन-पूजन करने के बाद विश्राम करते है। इसी मंदिर के पास ही ऐतिहासिक पक्का कुण्ड है। इसी कुण्ड को बृषभध्वजेश्वर कपिल तीर्थ कहा जाता है। काशी के इस तीर्थ को गया के समान स्थान प्राप्त हैं। यात्री यहाँ स्नान कर पितृ तर्पण श्राद्ध करते हैं। कपिलधारा कुण्ड के पश्चिमी घाट पर छांगवक्रेश्वरी देवी का मंदिर स्थित है। यात्री इनका दर्शन-पूजन कर आगे बढ़ते है तो वहीं कपिल तीर्थश्वर का मंदिर है। दर्शन-पूजन के क्रम में यात्री यहां भी आते हैं। इससे आगे बढ़ने पर पास में ही विशाल मंदिर में बृषभध्वजेश्वर की प्रतिमा है। यात्री यहां पहुंचकर इनका दुग्धाभिषेक एवं जलाभिषेक कर दर्शन-पूजन करते हैं। इस दौरान यात्री-साधु सन्तों, गरीबों को भोजन कराते हैं साथ ही दान भी देते हैं। कपिलधारा में ही करीब 9 धर्मशालाएं है। जहां यात्री विश्राम करते हैं। यहां से यात्री आगे बढ़ते हुए कोटवां गांव के पास विष्णु मंदिर में ज्वाला नृसिंह विष्णु की अद्भुत प्रतिमा है। यात्री इनका दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन से भक्ति, विद्या एवं धन की प्राप्ति होती है। आगे यात्री वरूणा, गंगा संगमतीर्थ पर पहुंचते हैं। यहीं पर स्थित है आदिकेशव का विशाल मंदिर मंदिर। मंदिर में स्थित शिव जी को ही केशवेश्वर कहा जाता है। इसी के पास संगमेश्वर के ऊपर आदि केशव विष्णु जी की प्रतिमा है। यात्री इनका दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन से समस्त प्रकार के दुःख, दरिद्रता, रोग दूर हो जाते हैं और सुख समृद्धि का उदय होता है। इनका मंदिर म0नं0 37/51 आदि केशव में है। यात्री आगे बसंता कालेज के पास के ज्ञान केशव के मंदिर सहित अन्य मंदिरों में भी दर्शन-पूजन करते हैं। इस मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है जो खर्व विनायक का मंदिर म0 नं0 52/52 आदिकेशव पर विद्यमान इस मंदिर में भी यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। इस दौरान यात्री खर्व विनायक को लड्डू, दूब, जब, वस्त्र चढ़ाते हैं। घाटों से शुरू पंचक्रोशी यात्रा गाँव-गिरांव होते हुए एक बार फिर से घाट पर पहुँच जाती है। ऐसे में जिन यात्रियों को चलने में कठिनाई होती है वे आदि केशव से ही नाव से मणिकर्णिका घाट पहुँचते है। वहीं स्वस्थ यात्री बसंता कालेज से होते हुए राजघाट जी0टी0 रोड पार कर नीचे गंगा जी के किनारे पहुंचते हैं। यहाँ ऊपर प्रह्लादघाट पर म0नं0 ए0 10/80 पर प्रह्लादेश्वर का मंदिर है। यात्री इनका दर्शन-पूजन करते है। इनके दर्शन-पूजन से शिव एवं विष्णु की भक्ति सुलभ होती है। आगे बढ़ने पर यात्री त्रिलोचन घाट पहुंचते हैं। यहां घाट के ऊपर त्रिलोचनेश्वर का मंदिर है। म0नं0 ए 2/80 पर स्थित त्रिलोचनेश्वर के मंदिर में यात्री दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से दुःख कट जाते है और सुख समृद्धि होती है। एक घाट से दूसरे घाट पर चलते हुए यात्री पंचगंगा-बिन्दुमाधव घाट पर पहुंचते हैं। यहां घाट के ऊपर म0नं0 के0 23/33 में बिन्दु माधव का सुन्दर मंदिर है। बिन्दु माधव की पूर्वामुखी मूर्ति का दर्शन कर यात्री धन्य हो जाते है। यहीं बालाजी मंदिर के पास मंगलागौरी से सटा हुआ म0नं0 24/33 में गभस्तीश्वर का मंदिर है। यात्रा क्रम में यात्री सात्विक विचारों से प्रवाहमान गभस्तीश्वर का दर्शन-पूजन करते हैं। इनके दर्शन से स्वास्थ्य सम्बन्धी विकार दूर होते हैं साथ ही आंखों की रोशनी भी बढ़ती है। इनके दर्शन के उपरान्त यात्री म0नं0 24/34 में मंगलागौरी का दर्शन-पूजन करते हैं। इनके आाशीर्वाद से ऐसी मान्यता है कि धन, ऐश्वर्य, सुख, समृद्धि की प्राप्ति होती है साथ ही समस्त कार्य पूरे होते है। यात्री आगे बढ़ते हैं मंगलागौरी से सटे हुए सिन्धिया घाट के उत्तर वशिष्ठेश्वर का घाट है। घाट के ऊपर ही बायीं ओर वशिष्ठेश्वर का मंदिर है। म0नं0 सी0के0 7/181 में स्थित इस मंदिर में पहुंचकर दर्शन करते हैं। इस मंदिर से सटा हुआ ही दरवाजा है इसी के भीतर म0नं0 सी0के0 7/161 वशिष्ठा घाट में वामदेवेश्वर का मंदिर है। यात्री पंचक्रोशी यात्रा के क्रम में यहाँ भी पहुँचते हैं। यात्री यहां से आगे गंगा जी के किनारे होते हुए सिन्धिया घाट पर पहुंचते है। घाट के ऊपर म0नं0 सी0के0 7/15 में पर्वतेश्वर का मंदिर है। यात्री इनका दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते है। यहां से यात्री मणिकर्णिका घाट की ओर बढ़ते हैं। यहां मणिकर्णिका पुष्करणी ब्रह्म कुण्ड के नीचे गुफा में महेश्वर जी हैं। यात्री इनका भी दर्शन करते हैं। मान्यता के अनुसार इनके आशीर्वाद से सभी सुखों की प्राप्ति होती है और कष्ट दूर होते हैं। मणिकर्णिका घाट के ऊपर ही बायी ओर म0नं0 सी0के0 33/26 में सिद्धि विनायक का मंदिर है। यात्री इनका आशीर्वाद लेते हैं। माना जाता है कि सिद्धि विनायक का दर्शन-पूजन करने से किसी भी कार्य में बाधा नहीं आती है एवं इनकी कृपा से सुख-समृद्धि बढ़ती है। आगे यात्री ब्रह्मनाल चौमुहानी से आगे बढ़ने पर पुलस्तीश्वर के बगल में सप्तावर्ण गणेश जी का मंदिर है। यात्री यात्रा के अंतिम चरण में सप्तावर्ण विनायक मंदिर में पहुंचते हैं। यह मंदिर म0नं0 सी0के0 33/36 में स्थित है। यात्री इन्हें फल, लड्डू दूब आदि का भोग लगाते हैं। इसके बाद यात्री पुनः मणिकर्णिका घाट पर पहुंचकर स्नान करते हैं। यहां से यात्री ढुंढिराज गली में ढुंढिराज के दर्शन करने पहुंचते हैं। ढुंढिराज के दर्शनोंपरान्त यात्री अन्नपूर्णा जी, साक्षी विनायक के बाद अन्नपूर्णा गली में ही द्रौपदी आदित्य पन्चविनायक का दर्शन करते हैं। अन्त में यात्री म0नं0 सी0के0 35/19 काशी विश्वनाथ के दरबार में यात्री पहुंचते हैं। यात्री यहां बाबा का आशीर्वाद लेते हैं। तदुपरान्त मन्त्रों द्वारा प्रार्थना करते हैं। ज्ञानवापी में ही कुंआ हैं जहां यात्री बैठकर सभी देवताओं का नाम जपकर यात्रा का संकल्प छोड़ते है। संकल्प छोड़ने के बाद यात्री सन्त, महात्माओं एवं ब्राह्मणों को वस्त्र, नकद, फल, अन्न का दान देते है साथ ही भोजन भी कराते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। इसके साथ ही काशी की यह धार्मिक पंचक्रोशी यात्रा सम्पन्न हो जाती है। यात्रा सम्पन्न होने के बाद स्वस्थ यात्री काशी के कोतवाल काल भैरव का दर्शन-पूजन भी करते हैं। वहीं कुछ यात्री अगले दिन रूद्राभिषेक हवन भी कराते हैं। ऐसी मान्यता है कि नियम संयम से यात्रा करने पर समस्त दुःखों का नाश होता है और सुख समृद्धि बढ़ती है।

       पंचक्रोशी यात्रा एक दिन से लेकर सात दिन तक होती है। एक दिन की पंचक्रोशी यात्रा महाािवरात्रि के दिन काफी संख्या में यात्री करते हैं। एक दिनी पंचक्रोशी यात्रा में यात्री रामेश्वरम में विश्राम करते हैं। द्विरात्री पंचक्रोशी यात्रा में भीमचण्डी एवं रामेश्वरम् में लोग ठहरते हैं। इसी तरह त्रिरात्री पंचक्रोशी यात्रा में यात्री भीमचण्डी रामेश्वरम् और कपिलधारा में अपना ठौर बनाते हैं। जबकि चार रात्रि  के पंचक्रोशी यात्रा करने के दौरान यात्री कर्दमेश्वर भीमचण्डी, सोमनाथ लंगोटिया हनुमान, रामेश्वर, शिवपुर व कपिलधारा में रूकते हैं।

       इसी तरह पांच रात वाली पंचक्रोशी यात्रा में यात्री कर्दमेश्वर, भीमचण्डी, रामेश्वर, शिवपुर, कपिलधारा में रूकते हैं। छह रात्रि की यात्रा के दौरान यात्री कर्दमेश्वर, भीमचण्डी, सोमनाथ, लंगोटिया हनुमान, रामेश्वर, शिवपुर, व कपिलधारा में विश्राम-आराम करते हैं। पंचक्रोशी यात्रा में अब यात्री मिले जुले रूप में यात्रा करने लगे हैं। मिला-जुला कहने का अर्थ पैदल पंचक्रोशी यात्रा के साथ ही बहुतायत यात्री बाइक सहित अन्य साधनों से भी यात्रा करने लगे हैं। पहले पंचक्रोशी यात्रा यात्री पैदल ही पूरा करते थे। लेकिन वर्तमान में व्यस्तताओं और आराम तलबी के प्रभाव से यात्रा करने की परिपाटी में परिवर्तन आया है। वहीं व्यावहारिक रूप से भी चलन काफी हद तक ठीक है। क्योंकि पहले शहर के बाहर पंचक्रोशी यात्रा की सड़कें कच्ची हुआ करती थी जिस पर पैदल चलने मे ज्यादा दिक्कत नहीं होती थी जिसकी अपेक्षा पक्के रोड़ पर चलना थोड़ा दुरूह होता है। बावजूद इसके अभी भी बहुत से यात्री पारम्परिक रूप से पैदल ही पंचक्रोशी यात्रा करते हैं। ऐसा माना गया है कि पंचक्रोशी यात्रा करने का सबसे बेहतर समय आश्विन, कार्तिक महीना (सितम्बर-’अक्टूबर) मार्गशीर्ष (अप्रैल-मई) होता है। इस महीनों में यात्रा करने का आध्यात्मिक एवं भौगोलिक दोनों लाभ मिलता है और यात्रा सफल होती है। यात्रा की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसे करने के लिए भारत वर्ष के संत-महात्माओं के अलावा आम लोग आते रहते हैं।

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