रामनगर किला स्थित संग्रहालय

गंगा के पूर्वी तट से सटकर खड़े रामनगर दुर्ग की आधारशिला वर्ष 1742 में राजा मंशाराम के कर कमलों से रखी गयी। तब यह महज कच्ची चहारदीवारी हुआ करती थी। इसका प्रमाण दुर्ग के दक्षिण दिशा की दीवार के रूप में आज भी विद्यमान है।

दुर्ग का वर्तमान स्वरूप इनके पुत्र राजा बलवन्त सिंह ने सन् 1752 में प्रदान किया जिसमें राजा बलवन्त सिंह अपने मुख्यालय को गंगापुर से स्थानान्तरित करके इस दुर्ग में स्थापित किया। इस दुर्ग का निर्माण अलग-अलग चरणों में किया गया है। इसमें दो चरणों में बनी दो हवेली जिसे नई हवेली और पुरानी हवेली के नाम से जाना जाता है और किले में दरबार हाल और बाऊ साहब की कोठी भी है। दुर्ग में 1010 छोटे बड़े कमरे है और सात आंगन हैं। इस दुर्ग की बनावट तथा भवन देशी तथा विदेशी शैलियों का सुन्दर समागम है। यह दुर्ग आवासीय दुर्ग होने के कारण अन्य दुर्गों से भिन्न और विशिष्ट है। इस दुर्ग में निर्माण, सुधार व विस्तार का कार्य 1899 तक चलता रहा। यह दुर्ग सामरिक तथ सुरक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण स्थिति में स्थापित है। दुर्ग में गंगा नदी होने के कारण दुर्ग अभेद्य रूप से आक्रमणों से सुरक्षित है क्योंकि किसी भी बाहरी आक्रमण के दौरान किसी भी सेना के लिये खुले गंगा को पार करके आक्रमण करने की सम्भावना कमजोर है। लेकिन फिर भी कोई शत्रु आक्रमण करे तो किले की पत्थर से बनी ऊँची दिवारों में एक निश्चित व सटीक दिशा, आकार व बनावट के छेद, बने हुये है, जिसमें बनारस स्टेट की बनी बड़ी-बड़ी बन्दुको की सहायता से दुश्मन पर गोलियाँ बरसाई जा सके। इस दुर्ग की पश्चिमी द्वार जो गंगा की ओर खुलता है। उस द्वार पर बाढ़ के समय गंगा के तल को मापने का एक मानक चिन्ह बनाया गया है जिससे महाराज बनारस किले में रहते हुये गंगा के बाढ़ तथा उससे काशी के आमजन जीवन पर पड़ने वाले प्रभाओं का आकलन कर सके जिसमें पहला निशान कच्छप बना है।

किले में चार फाटक है जिसमें पूर्वी दिशा में बना लाल दरवाजा दुर्ग का मुख्य द्वार है। इस किले में दो बड़े आंगन हैं, जिसमें पहला लाल दरवाजे के बाद तथा दूसरा झंडा द्वार के बाद; जिसमें रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला का कोट-विदाई का मंचन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि रामजी एक माह के लिए अयोध्या से काशी आते हैं जिनका काशी नरेश परम्परा के अनुसार आश्विन पूर्णिमा को विदाई करते हैं। इस मनोरम दृश्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में जनसैलाब जुटता है। झन्डा द्वार को झण्डा द्वार इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके शीर्ष पर बनारस स्टेट का ध्वज लगा हुआ है जिस पर दो मछलियों से बना घेरा तथा उसके बीच में सूर्य का चित्र टंगा हुआ है। यह ध्वज काशी नरेश जब किले में होते हैं तो झन्डा द्वार पर लगा रहता है और नगर से बाहर होने पर उतार दिया जाता है। अर्थात यह महाराज के नगर में होने का भी सूचक है।

धर्म घड़ी – रामनगर दुर्ग में काशी के विज्ञान तथा कला के अद्भुत ज्ञान संगम का प्रतीक धर्म घड़ी जो किले के अन्दर दूसरे तल पर स्थापित है। इसे रामनगर के ही इंजीनियर कहें या कारीगर मूल चन्द्र शर्मा ने वर्ष 1872 में बनाया था। यह घड़ी आधुनिक समय, दिन तथा तारीखों को तो बताता ही है साथ ही यह भारतीय ज्योतिष शास्त्र पर आधारित गणनाओं को भी व्यक्त करता है इस घड़ी में नक्षत्रों, ग्रहों, राशियों, सूर्योदय, सुर्यास्त, चन्द्रोदय, चन्द्रास्त के साथ ही घड़ी, घण्टा, पल तथा क्षण जैसे भारतीय समय मानकों का भी प्रदर्शन होता है इस घड़ी को लोग पंचाग घड़ी के रूप में या ज्योतिष घड़ी के रूप में भी पुकारते हैं इतने वर्षों में इस घड़ी की सिर्फ एक बार सन् 1923 में कुछ खराबियों की मरम्मत करनी पड़ी थी जो मूलचन्द्र के पुत्र बाबू मुन्नी लाल शर्मा ने किया था वर्तमान में इस धर्म घड़ी की देख-रेख आदि का कार्य शर्मा परिवार के वर्तमान पीढ़ी द्वारा किया जाता है।

धर्म घड़ी में किसी भी प्रकार की ऊर्जा का प्रयोग नहीं किया गया है इसमें सप्ताह में एक दिन चाभी देना होता है जो एक सूत की मोटी डोरी के साथ बंधे एक भारी वस्तु (पत्थर या लोहा यह स्पष्ट नहीं है।) को ऊपर कर देता है और उस भार के दबाव से घड़ी नियमित रूप से चलती रहती है और भार धीरे-धीरे नीचे आता जाता है और सप्ताह के अन्तिम में वह एकदम नीचे आ जाता है जिसे फिर चाभी के माध्यम से ऊपर कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया नियमित रूप से दोहराई जाती हैं। इस घड़ी की सहायता से ज्योतिष के विद्वान लोगों की कुण्डली, लग्न, पंचांग तथा अन्य ज्योतिषीय गणनायें करते हैं इस घड़ी की बनावट एक कमरे के बराबर है जिसे लकड़ी के सांचे में धातु की प्लेट पर सुन्दर तरह से उकेरा गया है जिस पर मध्य में एक घड़ी, दाहिने बायें सूर्य और चन्द्रमा की गति अलग-अलग स्थानों पर नक्षत्र, ग्रहों, राशियों का संयोजन है जो ज्योतिष शास्त्र में वर्णित रंगों व आकारों के है। यह घड़ी रोचक तथा कौतुहल भरा है, जो काशी की विज्ञान और कला की उत्कृष्ठता का परिचायक है, जिसके कारण दुनिया भर से लोग इसे देखने खिंचे चले आते हैं।

इस घड़ी का समय पर सूचित करने का तरीका भी अनोखा है। यह घड़ी 15 मिनट में घण्टी बजाता है लेकिन अलग-अलग स्वर में जैसे 15 मिनट पर ‘टिन’ की आवाज एक बार करता है, 30 मिनट बाद “टीन टन, टीनटन’ की दो आवाज करता है और 45 मीनट होने पर ‘टीनटन’ की तीन आवाजें करता है और घण्टा के पूरे होने पर ‘टन’ की आवाज जितना घण्टा होता है उतनी बार करता है।

व्यास मन्दिर – रामनगर दुर्ग में स्थित व्यास मन्दिर की मान्यता के अनुसार काशी में दर्शन पूजन और गंगा स्नान, दान का फल व्यास जी के दर्शन के बिना पूर्ण नहीं होता है इसलिए काशी में आने वाले सभी भक्त इस मन्दिर में व्यास जी के दर्शन के लिए जरूर आते हैं। यह मन्दिर अति प्राचीन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व कृष्णद्वैयपायन जिन्हें कालान्तर में वेद व्यास कहा गया, ने इसी स्थान पर बैठकर महाभारत की रचना प्रारम्भ की थी यह स्थान काशी के आग्नेय कोण पर स्थित है। यह गंगा के किनारे एक ऊँचा टिला था। जिस पर बैठकर वेद व्यास जी काशी का अवलोकन करते थे वेद व्यास के निवास के कारण ही रामनगर को मत्स्य पुराण में व्यास काशी कहा गया है।

यह मन्दिर किंवदंतियों के अनुसार लगभग 5000 वर्ष पुराना है। इस मन्दिर में वेद व्यास तथा शुकदेव लिंगरूप में स्थापित हैं तथा कालान्तर में इस मन्दिर में काष्ठजिह्वा स्वामी द्वारा काशी विश्वनाथ का शिव लिंग स्थापित किया जिसके बाद इस  मन्दिर में तीन लिंग के दर्शन होते हैं। यह मन्दिर प्रारम्भ में एक ऊँचे टीले पर गंगा तट पर स्थित था जो बाद में 1742 में किला के निर्माण के साथ ही दुर्ग के परिधि के अन्दर आ गया इस मन्दिर में माघ माह में दर्शन-पूजन, दान आदि का विशेष महत्व है इसमें प्रतिवर्ष वेद पारायण की परम्परा रही है जो माघ मास में होती है इस माह में काशी में वास करने वाले लोग इस मन्दिर में जरूर आते हैं और कीर्तन-भजन करते है ऐसी मान्यता है कि काशी में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को व्यास जी के दर्शन के बिना काशी वास का फल नहीं प्राप्त होता और वह किसी न किसी कारण से काशी से बाहर चला जाता है। अतः काशीवास के लिए व्यास का दर्शन अनिवार्य बताया गया है।

हनुमान मन्दिर – रामनगर दुर्ग में स्थित काले हनुमान मन्दिर की विशेष मान्यतायें है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार जब काशी नरेश दुर्ग का निर्माण करा रहे थे तो दुर्ग का गंगा से लगा हुआ दक्षिण-पश्चिम किनारा लाख प्रयास के बाद भी टिक नहीं रहा था बार-बार गंगा जी के तेज प्रवाह में बह जा रहा था। जिससे राजा परेशान थे तभी एक रात्रि को स्वप्न आया कि जिस भूमि पर दीवार बनाया जा रहा है उसके नीचे हनुमान जी की मूर्ति है। जिसे निकालकर स्थापित कराओ तो यह कार्य पूर्ण हो, और इस स्वप्न के अनुसार जब खोदाई हुयी तो हनुमान जी की मूर्ति मिली जिसे मजदूरों ने किले की उसी दक्षिणी दीवार पर रख दिया जिसके पास वह मूर्ति प्राप्त हुई थी। जिसके बाद वह दीवार गंगा में टिक गया और किले का निर्माण हो सका। राजा ने किले के निर्माण के दौरान गंगा महल में एक मन्दिर बनवाया जिसमें हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की जा सके लेकिन अज्ञात कारण से यह मूर्ति न जा सकी जिसके बाद यह मूर्ति उसी किले की दीवार पर तान्त्रिक विधि से स्थापित की गयी जिसके पास प्राप्त हुई थी। यह मूर्ति काली, दक्षिण मुखी है इस मूर्ति में हनुमान जी जमीन को दोनों हाथों से दबाये हुये हैं जिसके कारण यह माना जाता है कि यह मूर्ति गंगा के प्रकोप से किले को अपने हाथों से रोके हुये है। इस मन्दिर में वर्ष में एक बार जनसाधारण को दर्शन आश्विन मास की पूर्णिमा को होता है। इस मन्दिर का काशी राज से सम्बद्ध तथा महात्म का दर्शन एक प्रचलित लोक पंक्ति में होता है।

     राम नगरिया राम की, बसे गंग के तीर।

     अचलराज महाराज की चौकी हनुमत बीर।।

रामनगर दुर्ग संग्रहालय-

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महाराज अन्य देशी रियासतों की भाँति यहाँ भी राजतंत्र की समाप्ति हो गयी और बनारस स्टेट, देशी रियासत का भी भारतीय गणराज्य में विलय हो गया। रामनगर दुर्ग में संग्रहित अति दुर्लभ कलाकृतियों को सुरक्षित रखने की विचार धारा से प्रेरित होकर महाराजा विभूति नारायण सिंह ने दुर्ग के अन्दर ही एक संग्रहालय में समस्त राजसत्ता तथा राज परिवार के कलाकृतियों को कई वीथिकाओं में सुसज्जित कराकर जन साधारण के अवलोकनार्थ सुलभ कराया गया।

स्थापित विथिकाओं में अस्त्रों-शस्त्रों की वीथिका, हाथी-दाँत से निर्मित कला कृतियों की वीथिका, यान वीथिका, हौदा कक्ष, वस्त्रागार, जीव जन्तु वीथिका, भित्ति चित्र वीथिका, कला वीथिका, दरबार कक्ष के अलावा धर्म घड़ी भी प्रदर्शित है जिसकी कलाकारी बनारस रियासत के उत्कृष्ठ कला ज्ञान की परिचायक है। सन् 1990 में एक अलग से चित्र अनुभाग निर्मित हुआ जिसे रामलीला संग्रहालय नाम दिया गया। इसमें रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला से जुड़े सामाग्रियों का संग्रह किया गया है।

रामनगर दुर्ग संग्रहालय के यानवीथिका में 19वीं सदी के विटेंज कारों के साथ ही पारम्परिक यानों, बैलगाड़ी, नक्काशी युक्त बग्घी, घोड़ा इत्यादि का अनुपम संग्रह है हौदा कक्ष में स्वर्ण निर्मित ‘अम्बारी हौदा’ रजत हौदा, संग्रहित है। पालकी कक्ष में रानियों के भ्रमण आदि के कार्यों में आने वाले अनेक चाँदी, हाथी दात एवं लकड़ी की सुन्दर कलाकृतियों से सुसज्जित पालकी है। ताम जान, नोकदार, तोड़दार आदि है। वस्त्रागार में बनारसी वस्त्र उद्योग की एक अद्भुत झांकी दिखाई देती है। इसमें राज परिवार द्वारा उपयोग की गयी सोने-चांदी के तारों से बुने, रत्न जड़ित वस्त्र की एक बृहद शृंखला का संग्रह है शस्त्रागार में परम्परागत हथियारों ढाल-तलवारें, तीर-धनुष एवं स्वदेशी बन्दूकों के साथ ही आधुनिक विदेशी हथियारों का अनोखा संकलन है। हाथी दाँत वीथिका में रामनगर तथा बनारस के कलाकारों की कलाकारी की पराकाष्ठा का दर्शन होता है, जो इस संग्रहालय की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। जीव-जन्तु वीथिका में राजाओं द्वारा शिकार किये गये जन्तुओं के खालों को मूर्तरूप देकर सुरक्षित किया गया है। रामलीला संग्रहालय में रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में बनने वाले पात्रों के मुखौटे, सिंहासन, मुकुट एवं अस्त्र-शस्त्रों और अन्य वस्तुओं का संग्रह किया गय है।

महाराजा बनारस विद्या मन्दिर संग्रहालय काशी की राजशाही परम्परा तथा काशी की उत्कष्ट कला परम्परा की धरोहर को अपने अन्दर मूर्त्त रूप में संजोये हुये है। जिसका आज देश-विदेश से लोग आकर दर्शन करते हैं तथा काशी की परम्परा कला शैली, कारीगरी का जीवन्त रूप में अनुभव करते है।

सरस्वती भण्डार (काशीराज ग्रन्थालय)- किसी राज्य या राष्ट्र के निर्माण तथा उत्थान में उस राज्य के गौरवशाली इतिहास का लेख तथा वर्णन अति आवश्यक है तथा उसके इतिहास की गाथा को संजोने तथा आम जन मानस तक आसानी से पहुंचाने में विशेष योगदान पुस्तकालयों का होता है ऐसे में बनारस स्टेट कैसे पीछे रहता। यहाँ सरस्वती भण्डार नाम से एक पुस्तकालय भी है। इस पुस्तकालय में भारतीय वांग्मय के षड़दर्शनों पर आधारित अनेक हस्तलिखित चित्रमय ग्रन्थ संग्रहित है। इसमें गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हस्ताक्षरित पंचनामा भी सुरक्षित है। यहाँ संस्कृत साहित्य तथा रीतिकाल के दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह है इस ग्रन्थालय में जानकारो के अनुसार अनेकों दुर्लभ पुस्तके हैं, जिनमें काष्ठ जिह्वा स्वामी की दुर्लभ कृति ‘मानसपरिशिष्ट परिचर्चा प्रकाश’,  राजा रघुराज प्रताप सिंह का ‘सीता स्वयंवर’ भागवत अमृताम्बुजम’ (भागवत का पद्यानुवाद), साखी संप्रदाय के मुस्लिम कवि जिनका रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला में फुलवारी के अवसर पर गीत भी है ऐसे रामसखेदि कवि की संपूर्ण रचनावली, अंगद पैज तथा तुलसीदास से लगभग सौ वर्ष पूर्व ‘प्रेमदास’ जी का ‘प्रेमरामायण’ आदि न जाने कितने ही ज्ञात-अज्ञात दुर्लभतम् अप्रकाशित तथा अनुपलब्ध ग्रंथावलियों का जीवंत दस्तावेज है- सरस्वती भण्डार।

इस अतिप्राचीन पुस्तकालय की शुरूआत महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह ने किया था और बाद में इसका संचालन महाराजा विभूति नारायण सिंह के कार्यकाल तक हुआ। इस ग्रन्थालय से वर्तमान में ज्ञान गंगा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया तथा प्रशासकीय अयोग्यता के कारण यह बन्द पड़ा है।

ऐसे अनोखी एवं अनुपम कला, ज्ञान-विज्ञान, एवं परम्पराओं का जीवन्त संग्रह स्थल है काशीराज का रामनगर दुर्ग जिसको पर्यटक, दार्शनिक, ज्ञानी, विज्ञानी बरबस ही देखने आते रहते हैं।

-दिग्विजय त्रिपाठी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here