लोगों ने पसंद किया तो बस लिखता गया – मनु शर्मा

ऐतिहासिक व पौराणिक आख्यानों से नायकों के चरित्रा को लोक के निकट उपस्थित कर अद्भुत, आकर्षक व अनुकरणीय चित्रा बनाने वाले चितेरे को लोग प्रख्यात साहित्यकार डा0 मनु शर्मा के रुप में भी जानते हैं। अपने जीवन में झंझावातों से दो-दो हाथ करने के बाद आजीविका और सृजन की सीढ़ियों पर संतुलन बनाते हुए साहित्य के शिखर तक की यात्राा डा0 मनु शर्मा की जिजीविषा के प्रेरक अध्याय हैं। अपने कथा साहित्य में कृष्ण चरित्रा की व्यापकता, द्रौपदी और द्रोण की आत्मकथाएं लिखकर लेखन-सन्दर्भ के पौराणिक भण्डार की तरफ संकेत करने की पहल साहित्य के लिए एक नवीन आयाम है। 88 वर्ष की उम्र के इस पड़ाव पर कमजोर स्मृतियों को उनके सुपुत्रा ने सहारा दिया, किन्तु ये बातचीत संक्षिप्त रुप में ही सम्भव हो पायी। वार्तालाप का शेष अंश इस अभियान के संरक्षक व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ0 जितेन्द्र नाथ मिश्र के सौजन्य से साहित्यिक पत्राका सोच-विचार में प्रकाशित प्रमुख अंशों को जोड़कर साभार प्रस्तुत है-

सबसे पहले तो हम प्रारंभिक जीवन के विषय में ही जानना चाहेंगे। जितना स्मरण कर सकें, उन दिनों के विषय में हमें बतलाइये।

समझ नहीं आता कहां से शुरु करुँ? बहुत साधारण परिवार में पैदा हुआ। 1928  की आश्विन पूर्णिमा को तिथि थी, मेरे पिता पं0 रघुनाथ शर्मा अकबरपुर से यहां आए। विश्वेश्वरगंज में उन्होंने एक छोटी सी गमछे की दुकान जमाई थी। मुझे याद है कि छोटी अवस्था में मैं भी दुकान में उनकी सहायता किया करता था। कभी-कभी साइकिल पर गमछे लेकर फेरी भी लगा लेता था। इससे किसी तरह रोटी-दाल का जुगाड़ हो जाता था। लेकिन मैं 14-15 वर्ष रहा होंऊगा जब पिताजी की छत्रछाया उठ गई और गृहस्थी का सारा भार माता जी के कंधे पर आ पड़ा।

माताजी श्रीमती विट्ठन देवी यहां घासी टोला के कुलीन ब्राह्मण परिवार की थीं। अपनी तीन बहनों में वे सबसे बड़ी थीं। वे बहुत गुणी थीं। उनके हाथ से बने व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते थे। अचार मुरब्बे तो वे इतना अच्छा बनाती थीं कि अक्सर पड़ोस की स्त्रियां उनसे सीखने आतीं थी।

बेढ़ब जी बहुत बड़े आदमी और बड़े रचनाकार थे। नयी पीढ़ी के प्रोत्साहन में वे कोई कोर कसर नहीं रखते थे। मेरे विकास में तो उनका सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने मुझे अपनी शिक्षा जारी रखने का अवसर प्रदान काय। यह तो बतला ही चुका हूँ कि श्री शंभुनाथ वर्मा जी की सदाशयता से मुझे डी0ए0वी0 कॉलेज में छोटी-मोटी सेवा का अवसर मिल गया था। कार्यालय अथवा पुस्तकालय में विभिन्न रूप में काम करते हुए मैं व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रुप में इंटरमीडिएट हो गया था किन्तु बी0ए0 और एम0ए0 में कहीं सेवारत अध्यापक ही व्यक्तिगत परीक्षार्थी हो सकते थे। प्रधानाचार्य गौड़ जी ने मुझे कक्षाओं में अध्यापन का मौका दिया। उनके प्रमाण पत्रा के बिना मैं परीक्षा ही न दे पाता।

उन्हें भी अपना हुनर दूसरों को सिखाने में आनन्द आता था। उन्होंने मुझे भी यह सब सिखा दिया था। किस अचार में कौन-कौन सी सामग्री किस पद्धति से मिलायी जाय इसका बहुत अच्छा अभ्यास उन्होंने मुझे करा दिया था। वे कहती थीं कि सब जानना चाहिए। ब्राह्मण बालक हो, जीविका के लिए कोई दूसरी वृत्ति न हो तो सम्पन्न घरों में ‘महाराज’ के रुप में काम कर सकते हो। वैसे रोजमर्रे के जीवन में भी इस कला का महत्व कम नहीं है।

माताजी बड़ी दूरदर्शी, परिश्रमी, साहसी महिला थीं। परिवार के पालन के लिए लम्बे समय तक उन्होंने भारतेंदु भवन में रसोई बनाने का काम किया था। दो-दो घरों की रसोईं संभालते हुए भी लोकरीति और व्यवहार में वे किसी तरह की शिथिलता नहीं आने देती थीं। शादी-विवाह, मुंडन-छेदन तथा विविध अवसरों पर कब क्या करना चाहिए, इस विषय में वे कितने परिवारों की सलाहकार थीं। विभिन्न अवसरों पर कौन सा गीत गाया जाता है, यह कौन बता सकता है, यह टोले-मुहल्ले की स्त्रियां जानती थीं। कितनी कथाएं उन्हें कंठस्थ थीं और गीतों का कितना बड़ा खजाना उनके पास था, यह बतलाना संभव नहीं है।

माता जी की परवरिश में कोई कमी नहीं थी। तथापि पढ़ाई-लिखाई के अनुकूल वातावरण नहीं था। पढ़ाई-लिखाई हो सकी तो इसका कारण यह है कि आस-पास कुछ बड़े भले लोग थे। मिडिल तक की पढ़ाई तो खैर बड़ी समस्या नहीं थी। कबीरचौरा मिडिल स्कूल में पढ़ता था। बड़ा नाम था इस स्कूल का। बाबू दूधनाथ सिंह हेडमास्टर थे। बहुत कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासनप्रिय तथा समर्पित अध्यापक थे। बाबू अर्जुन सिंह और लालजी सिंह जैसे उनके सहायक थे जो निर्धारित समय के बाद भी पढ़ाते थे और उनके विद्यालय का परीक्षाफल कैसे सर्वोत्तम हो, इसके लिए हर संभव प्रयास करते थे। उस समय मिडिल तक की पढ़ाई खर्चीली नहीं होती थी। कबीरचौरा स्कूल से मैं मिडिल पास हो गया। उस जमाने में मिडिल पास कर लेने का भी बड़ा महत्व था। शादी-विवाह में स्त्रियां गाती थीं – ‘बन्ना मेरा  मिडिल पास है’।

हाईस्कूल में समस्या पैदा होती। लेकिन डी0ए0वी0 कॉलेज के बड़े बाबू श्री शंभूनाथ वर्मा हमारे परिवार के सहायक क्या अभिभावक की तरह मौजूद थे। बड़े भले आदमी थे। मध्यमेश्वर पर उनका मकान था। उसी में हमारा परिवार बिना किराए के रहता था। उन्होंने डी0ए0वी0 कॉलेज का फाटक दिखला दिया। कभी छोटा-मोटा काम भी मिल जाता और अनायास थोड़ी बहुत पढ़ाई-लिखाई भी हो जाती। उस समय इस विद्यालय के प्रिंसिपल पं0 हरिहरनाथ शुक्ल थे। विद्यालय का वातावरण बहुत अच्छा था और इसका काफी नाम भी था। यहां आते-जाते मैंने व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रुप में हाईस्कूल कर लिया। इस तरह शिक्षाक्रम में कोई व्यवधान नहीं हुआ।

जीविका के लिए थोड़ा बहुत अर्थोपार्जन करते हुए पढ़ाई-लिखाई जारी रखने का एक अच्छा सिलसिला यहां से प्रारंभ हो गया। इंटरमीडिएट, बी0ए0 फिर हिन्दी और राजनीतिशास्त्र में एम0ए0 सारी परीक्षाएँ प्राइवेट छात्र के रुप में बिना किसी व्यवधान के उत्तीर्ण करता गया। पीएच0डी0 नहीं कर सका था तो उसकी कमी भी आगे चलकर गोरखपुर विशविद्यालय द्वारा प्राप्त डी0लिट् की सम्मानित उपाधि द्वारा एक तरह से पूरी हो गई।

बेढब जी का क्या योगदान रहा है ?

बेढब जी बहुत बड़े आदमी और बड़े रचनाकार थे। नयी पीढ़ी के प्रोत्साहन में वे कोई कोर कसर नहीं रखते थे। मेरे विकास में तो उनका सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने मुझे अपनी शिक्षा जारी रखने का अवसर प्रदान किया। यह तो बतला ही चुका हूँ कि श्री शंभुनाथ वर्मा जी की सदाशयता से मुझे डी0ए0वी0 कॉलेज में छोटी-मोटी सेवा का अवसर मिल गया था। कार्यालय अथवा पुस्तकालय में विभिन्न क्षमताओं में काम करते हुए मैं व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रुप में इंटरमीडिएट हो गया था किन्तु बी0ए0 और एम0ए0 में कहीं सेवारत अध्यापक ही व्यक्तिगत परीक्षार्थी हो सकते थे। प्रधानाचार्य गौड़ जी ने मुझे कक्षाओं में अध्यापन का मौका दिया। उन प्रमाण पत्र के बिना मैं परीक्षा ही न दे पाता।

इसके साथ ही उनके भीतर प्रतिभा के परख की बड़ी अद्भुत क्षमता थी। अपने सम्पर्क में आने वाले सभी युवकों को वे कुछ लिखने और रचने की प्रेरणा देते थे। मुझे भी उनका सान्निध्य एवं सम्पर्क उपलब्ध हुआ यह मेरा सौभाग्य था।

डी0ए0वी0 कॉलेज में अध्यापन करते हुए आपने लेखन के क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित कर ली। लेखन के क्षेत्र में आपकी प्रवृत्ति कैसे हुई ?

 सब अपने आप होता गया। मैंने कभी योजना नहीं बनाई। सामने जो आया, करता गया। परिश्रम से जी नहीं चुराया। बात यह थी कि अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं से मैं जुड़ा था। उनके लिए अगर धारावाहिक रुप में व्यंग्य लिखना है तो मैंने चुनौती स्वीकार की। जितना अच्छा लिख सकता था लिखा। लोगों ने पसंद किया तो उत्साह बढ़ा। बस लिखता गया। एक समय संकटमोचन नाम से ‘जनवर्ता’ में पांच सात पंक्तियों की चुटीली कविता लिखता था। काफी समय तक लिखा और लोगों ने पसंद किया। मैंने उसके लिए कोई योजना थोड़ी ही बनाई थी। छोटी-छोटी कहानियाँ भी धारावाहिक रुप में आइंZ और फिर उन्होंने पुस्तक का रुप ले लिया। ‘गांधी लौटे’ भी इसी तरह लिखा गया। गांधी होते तो आज की स्थितियों में उन्हें कैसा लगता? शब्द मेरे हैं, विचार गांधी जी के। अखबारों में आया और लोगों ने पसंद किया।

सच यह है कि पढ़ने का शौक मुझे शुरू से था। जो सामने आ गया, उसे पढ़ता था और जैसा बन पड़े लिखता था। इसी तरह सब लिखा गया।

आपका लेखन मूलतः समाजोन्मुख था किन्तु उस श्रृंखला को आगे बढ़ाने के बजाय आप कृष्णकथा की ओर अग्रसर हो गए और फिर एक प्रकार से उसी में रम गए। इस परिवर्तन का ठोस कारण क्या था?

भक्ति दिखावे की चीज नहीं है। ईश्वर की सत्ता पर मेरा अटूट विश्वास है और मैं यह मानता हूं कि जो कुछ होता है, उसकी मर्जी से ही होता है। वह बाहर ही नहीं हमारे भीतर भी हैं। वह प्रेरित करता है। उसकी प्रेरणा की अनुभूति करते हुए निष्ठापूर्वक काम करें, यह हमारी जिम्मेदारी है। मैंने यही किया। मैंने भक्ति भावना से कृष्णकथा का पाठ नहीं किया। अपने समय और समाज के दबावों का अनुभव करते हुए मैंने बहुत सारा साहित्य पढ़ा। इसी क्रम में पुराणों को भी पढ़ा। महाभारत पढ़ते हुए कृष्ण के चरित्र ने मुझे बरबस खींच लिया। उपन्यास रचने के लिए मैंने कृष्ण को नहीं खींचा बल्कि कृष्ण ने ही मुझे खींच लिया। वास्तव में कृष्ण का चरित्र इतना व्यापक, इतना विस्तृत, इतना विविध एवं बहुआयामी है कि जिन्दगी का कोई रंग न किसी रुप में अपनी छाया देख सकती है। चरित्र तो भगवान राम का भी दिव्य है किन्तु वह मुझे उतना आकृष्ट नहीं कर सका। कृष्ण ने तो जबरन खींच लिया। ‘कृष्ण की आत्मकथा भी योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिखी गई। उसकी रचना भी टुकड़ो-टुकड़ो में हुई और जैसी बन पाई, यह कृति 08 खंडो में पाठकों के सामने है।’

आत्मकथा की शैली अपनाने का विशेष प्रयोजन क्या था ?

आत्मकथा की शैली अपनाने से काफी सहूलियत हो गई। इससे रोचकता बढ़ गई तथा बातें अधिक स्पष्टता और संक्षिप्तता के साथ रखना सहज संभव हो गया। फिर इस शैली में मेरे लेखन को पाठकों ने सराहा तो मुझे भी इसका अवलम्बन श्रेयस्कर लगा।

कृष्ण के अतिरिक्त द्रौपदी और द्रोण आदि की आत्मकथाएँ भी आपने लिखी है। उनके बारे में कुछ बतलाएं ?

वैसे तो ये सभी चरित्र कृष्णकथा के ही अंग हैं । यह कृष्णचरित्र की शक्ति है। क्या छूटा है इस महान चरित्र से। वे नंदनंदन हैं, वे वासुदेव हैं, गोपाल हैं, रास बिहारी हैं, सारथी हैं, मल्लविद्या के आचार्य हैं, युद्धनीति के ज्ञाता हैं, गीता के उपदेशक हैं, द्वारिकाधीश हैं और नर के सखा नारायण हैं। कोई ऐसा समय नहीं आएगा जब यह कथा अपनी प्रासंगिकता खो दे। इतनी भूमिकाएं हैं कि किसी न किसी में तो मन रमेगा ही। ‘डायनासोर के जीवाश्म का प्रयोग इसी अर्थ में मैंने किया होगा।’ कृष्ण के चरित्र ने मुझे जिस तरह खींचा मैंने तो उसी रुप में चरित्र को आगे बढ़ने दिया। साहित्य के आलोचक मेरी इस कृति से आज आकृष्ट होते नहीं दिखलाई पड़ते तो मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है। मुझे अटूट विश्वास यह है एक ऐसा विविध एवं अद्भुत चरित है कि हर जमाने के पाठक इसे पसंद करेंगे तथा इसकी कथा में रमेंगे। एक न एक दिन आलोचकों को भी इसे महत्व देना होगा। इसी अर्थ में मैंने डायनासोर के जीवाश्म का सन्दर्भ किया।

कृष्ण का चरित्र तो सचमुच बहुत व्यापक है लेकिन कोई न कोई बड़ा संदेश, उस चरित्र का कोई महत्वपूर्ण पक्ष अवश्य ही आपके आकर्षण का केंद्र रहा होगा। इस सम्बन्ध में कुछ बतला सकते हैं ?

मैंने पहले ही बतलाया, यह चरित्र ऐसा है जिसके सारे प्रसंग आकर्षक हैं। चाहे जहां से उठाओ यह चरित्र आपको घेर लेता है। पहले से कोई धारणा बनाकर मैंने कभी नहीं लिखा। बहुतेरे लेखक ऐसा करते हैं। पहले से विचार बना लेते हैं कि अमुक चरित्र के माध्यम से हमें यह कहना है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं। खोज-खोजकर पढ़ता था और पढ़ते हुए खोजता था। जैसा बन गया बन गया। सिद्धि मिली तो यह परमात्मा की कृपा है।

बनारस का तत्कालीन साहित्यिक परिवेश कैसा था और आज के साहित्यिक परिवेश में क्या अन्तर पाते हैं ?

सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय का जो साहित्यिक परिवेश था। बड़ा मुश्किल था। एक दूसरे से सम्पर्क बड़ा अच्छा रखते थे। अब वो इतना गुम्फित नहीं है। अब उसमें व्यक्तिवादिता बढ़ गयी है।

हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभाव होता जा रहा है। व्यक्तित्व प्रभावी हो रहा है। लोगों का जीवन बड़ा व्यस्त हो गया है। एकाकीपन हो गया है। चार आदमी जहां बैठकर बात करते थे उस संस्कृति का अभाव हो गया है लगता है कि इनके पास समय नहीं है । यह कुछ हद तक सही नहीं है। व्यक्ति आत्मकेन्द्रित हो गया है। व्यक्ति को सामूहिक रुप से सोचने का अवसर ही नहीं मिल पा रहा है।

भक्ति दिखावे की चीज नहीं है। ईश्वर की सत्ता पर मेरा अटूट विश्वास है और मैं यह मानता हूं कि जो कुछ होता है, उसकी मर्जी से ही होता है। वह बाहर ही नहीं हमारे भीतर भी है। वह प्रेरित करता है। उसकी प्रेरणा की अनुभूति करते हुए निष्ठापूर्वक काम करें, यह हमारी जिम्मेदारी है। मैंने यही किया। मैंने भक्ति भावना से कृष्णकथा का पाठ नहीं किया। अपने समय और समाज के दबावों का अनुभव करते हुए मैंने बहुत सारा साहित्य पढ़ा। इसी क्रम में पुराणों को भी पढ़ा। महाभारत पढ़ते हुए कृष्ण के चरित्रा ने मुझे बरबस खींच लिया। उपन्यास रचने के लिए मैंने कृष्ण को नहीं खींचा बल्कि कृष्ण ने ही मुझे खींच लिया। वास्तव में कृष्ण का चरित्रा इतना व्यापक, इतना विस्तृत, इतना विविध एवं बहुआयामी है कि जिन्दगी का कोई रंग, किसी रुप में अपनी छाया देख सकती है। चरित्रा तो भगवान राम का भी दिव्य है किन्तु वह मुझे उतना आकृष्ट नहीं कर सका। कृष्ण ने तो जबरन खींच लिया।

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