काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की भूमि दान की नहीं

आम लोगों में यह भ्रामक धारणा आज भी बनी हुई है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर की भूमि महाराज बनारस ने दान में दी थी। इस तरह की बातें अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में किंवदन्तियों पर आधारित लेखों, महामना पर आयोजित संगोष्ठी परिचर्चाओं, इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्रियों, तथा टीवी चैनलों पर भी आती रहती है। आश्चर्य तो तब होता तब खुद बी0एच0यू0 से सम्बद्ध प्राध्यापक भी अपने लेखों में इस तरह की तथ्यहीन बातें छानबीन किये बगैर लिख दिया करते हैं। कुछ पुराने लोगों के संस्मरण आलेखों में भी इस तरह की मनगढ़ंत कहानियाँ पायी जाती हैं। लेकिन हिन्दू विश्वविद्यालय के पुराने अभिलेखों और इस विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय जी के भाषणों-लेखों को देखने से जाहिर होता है कि इस विश्वविद्यालय की भूमि दान की नहीं, बल्कि खरीदी हुई है।

सन् 1920 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपाधि-वितरण समारोह में महामना मालवीय जी ने अपने दीक्षान्त भाषण में महामना मालवीय जी ने अपने स्पष्ट रूप से कहा था- “दो मील लम्बा और एक मील चौड़ा सुन्दर स्थान नगवा पर लगभग 6 लाख रूपये में खरीद लिया गया। इसी स्थान पर अब सुन्दर भवन  बन रहे हैं।” महामना ने सन् 1927 में विश्वविद्यालय हेतु धन के लिये देशवासियों के नाम एक अपील प्रकाशित करायी थी। उसमें भी उन्होंने कहा था- “ऋण चुकाने के लिये हमें 15 लाख रुपये की जरूरत है। 6 लाख रुपये तो जमीन खरीदने में लगाया गया।” (‘आज’ हिन्दी दैनिक, 27 अक्टूबर, 1927)।

‘हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0 (प्रकाशक-बी0एच0यू0 संस्करण 1966) के पृष्ठ 405-407 के अनुसार विश्वविद्यालय की भूमि में पहले 11 गाँव अवस्थित थे- नगवा दरबार (37.84 एकड़), भगवानपुर दरबार (14.46 एकड़), भगवानपुर (78.42 एकड़), नरिया (295.31 एकड़), धनंजयपुर (122.93 एकड़), खिजराही (52.00 एकड़), जंगमपुर (75.68 एकड़), सुसुवाही (133.08 एकड़), सीरगोवर्द्धनपुर (214.53 एकड़) और छितूपुर (191.28 एकड़), कुल 1215.53 एकड़।  इन गाँवों में करीब 7 हजार वृक्ष, 100 पक्का कुआँ, 20 कच्चा कुआँ, 40 पक्के मकान, 860 कच्चे मकान तथा पंचक्रोशी रोड पर कुछ मंदिर एवं धर्मशाला अवस्थित थे। भूखण्ड का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 1 हजार एकड़) ग्रामीणों के कृषि उपयोग में था, जिससे सरकार को 2764 रुपये वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। ‘हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0’ (पेज 234-35) के अनुसार उपरोक्त भूखण्ड में से 1961.28 एकड़ भूमि इन चार जागीरदारों-महाराजा बहादुर बनारस, राणा मुंशी माधवलाल, बाबू तेजनारायण सिन्हा और महंथ जंगमबाड़ी के अधीन थी जिन्हें राजस्व वसूली का चौथा हिस्सा मिलता था और शेष सरकार को। हाँ! विश्वविद्यालय का मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल परिसर के अन्दर जिस भूमि पर बना है, उसका कुछ हिस्सा काशी के सुप्रसिद्ध रईस बाबू शिवप्रसाद गुप्त का था, जिसे उन्होंने विश्वविद्यालय को दान कर दिया था। (प्रेरक प्रसंग-3, पेज 261)

Banaras Hindu University Aerial View

विश्वविद्यालय के लिये भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही सरकार के ‘लैण्ड एक्वीजिशन प्रोसीडिंग्स’ के तहत हुई थी। 2 जून 1913 के एक पत्रक के माध्यम से भारत के तत्कालीन शिक्षा सदस्य सर हारकोर्ट बटलर ने विश्वविद्यालय का बिल पास करने हेतु 5 शर्तें रखी थीं, जिन्हें हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी को पूरा करना था।उनमें से एक शर्त एक उपयुक्त स्थान के निर्धारण से सम्बन्धित थी, जहाँ विश्वविद्यालय का निर्माण हो सके। महामना मालवीय जी ने भूमि-चयन समिति के कुछ सदस्यों के साथ काशी में राजघाट, शिवपुर, सारनाथ, कमच्छा व नगवा क्षेत्र का व्यापक निरीक्षण किया। कमच्छा को छोड़कर अन्य सभी जगह पर्याप्त भूमि उपलब्ध थी, किन्तु अपनी परिकल्पना के अनुरूप जिस मिट्टी, आबोहवा एवं गंगा के ठोस कछार को वे विश्वविद्यालय के लिये उपयुक्त समझ रहे थे, वह सब नगवा क्षेत्र में ही उपलब्ध था। किन्तु इस क्षेत्र में पहले से 11 गाँव बसे हुए थे। इन वासिन्दों को यहाँ से हटाना और उन्हें अन्यत्र पुनर्वासित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। महामना ने ग्रामीणों को समझाया कि विश्वविद्यालय बनने से उन्हें क्या-क्या लाभ होगा, जैसे पास में ही उनके बच्चों को उच्च शिक्षा, नौकरी, रोजगार व व्यवसाय के अवसर मिलेंगे उनके जीवन-स्तर में परिवर्तन आयेगा और देश की उन्नति होगी। भीषण गरीबी के उस दौर में, जबकि आम देशवासियों के लिये ये सब अवसर सीमित रूप में उपलब्ध थे, जीविका का एकमात्र साधन खेती भी अत्यधिक लगान एवं करारोपण के कारण खास्ताहाल थी, महामना का यह प्रस्ताव प्रायः सभी ग्रामवासियों को मौजू लगा और सभी अपनी जमीन खाली करने के लिये राजी हुये। जिनके पास बाहर कोई जमीन नहीं थी, उन्हें पुनर्वासित कराने और वाजिब मुआबजा देने की शर्तें तय हुईं। यह महामना के असाधारण व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि गाँवों को हटाने एवं भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही में कहीं कोई विवाद नहीं हुआ। कास्तकारों (रैयतों) की स्वीकृति के बाद जिला प्रशासन की कार्यवाही पर पूरा भूखण्ड 27 जनवरी, 1917 को विश्वविद्यालय के अधीन हुआ और इसी के साथ विश्वविद्यालय का अपना एक अलग ‘महाल’ बना।

इस 1215.53 एकड़ के भूखण्ड से गाँवों को हटाते समय, जिन विस्थापितों के अपने जमीन बाहर नहीं थे, उनको बसाने के लिये विश्वविद्यालय ने परिसर के बाहर, समीप में ही अतिरिक्त भूखण्ड करीब 20 हजार रुपये में क्रय किया और इनमें आदित्यनगर एवं सुन्दरपुर नाम से दो गाँव बसाये गये; जिनका नामकरण क्रमशः महामना के शिक्षा-गुरु एवं विश्वविद्यालय के प्रथम प्रो वाइस-चान्सलर पण्डित आदित्यराम भट्टाचार्य और विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति सर सुन्दरलाल के नाम पर किया गया है। जो भूमिहीन लोग जितनी भूमि से विस्थापित हुये थे, उन्हें उतनी ही जमीन बाहर दी गई, किन्तु उन्हें कोई मुआबजा नहीं दिया गया, क्योंकि वे अपनी अन्य सभी सम्पत्ति के साथ विस्थापित हुये थे। जिन रैयतों को बाहर जमीन नहीं दी गई, उन्हें मुआबजा देने की बात तय हुई। इसके लिये विश्वविद्यालय ने बंगाल बैंक में जमा अपनी 50 लाख रूपये की स्थायी निधि के आधार पर बैंक से 5.5 प्रतिशत व्याजदर ओवरड्राफ्ट रूप में 6 लाख रूपये का कर्ज लिया, जिसमें से मुआबजे की निर्धारित राशि जिला प्रशासन के खजाने में जमा करायी गई। विश्वविद्यालय के लिये अवाप्त कुल 1300 एकड़ जमीन के बदले कुल 5,92,152/रुपये खर्च किये गये थे। (देखें-महामना द्वारा सन् 1929 में जारी ‘अपील फॉर सेकेन्ड क्रोर’, संकलित ‘बी0एच0यू0 : ए सिम्पोजियम’, पेज 41, प्रकाशक-महामना मालवीय फाउण्डेशन, 2012)। भूमि अधिग्रहण के बाद विश्वविद्यालय की इस जमीन का अधिकांश हिस्सा वर्षों तक खाली पड़ा रहा। इस खाली पड़ी भूमि में विश्वविद्यालय ने खेती का काम शुरू कराया। तय शर्तों के अनुसार इस कृषि भूमि का रेवेन्यू सरकार को दिया जाने लगा। शर्त यह थी कि जैसे-जैसे खाली पड़ी भूमि विश्वविद्यालय के शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यों के उपयोग में आती जायेगी, वैसे-वैसे रेवेन्यू की राशि कम होती जायेगी। जिला प्रशासन के इस शर्त को हिन्दू विश्वविद्यालय की कौन्सिल ने 17 जून 1927 को स्वीकार किया था।

अब प्रश्न है कि जब विश्वविद्यालय की भूमि क्रय की हुई है और विश्वविद्यालय को कई साल तक अपनी खाली पड़ी भूमि का रेवेन्यु सरकार को देना पड़ा, तब यहाँ काशीराज द्वारा जमीन दान में देने की बात कहाँ से आ गयी? आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने लिखा है- “महाराजा बनारस ने अपनी जमींदारी का हक यूनिवर्सिटी को सौंप दिया और कास्तकारी का हक 6 लाख रुपये में खरीदा गया।’ (महामना की जीवनी, सन् 1937, पेज 116)। विश्वविद्यालय भूमि अवाप्ति के सम्बन्ध में महामना और महाराजा बनारस के बीच जुड़ी तमाम किंवदन्तियाँ आमजन में प्रचलित हैं। किन्तु भूमि-अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया व वार्तायें सीधे जिला प्रशासन एवं भारत सरकार से होते हुये दिखाई पड़ती हैं। ‘हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी’ की प्रबन्ध समिति की बैठकों, शासन-प्रशासन के साथ पत्र-व्यवहार, कौन्सिल में बहस की कार्यवाहियों तथा शिलारोपण समारोह में दिये गये व्याख्यानों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि व्याख्यानों की भूमि दान में मिली और उसे महाराजा बनारस में दान दिया।

‘हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0 (प्रकाशक-बी0एच0यू0 संस्करण 1966) के पृष्ठ 405-407 के अनुसार विश्वविद्यालय की भूमि में पहले 11 गाँव अवस्थित थे- नगवा दरबार (37.84 एकड़), भगवानपुर दरबार (14.46 एकड़), भगवानपुर (78.42 एकड़), नरिया (295.31 एकड़), धनंजयपुर (122.93 एकड़), खिजराही (52.00 एकड़), जंगमपुर (75.68 एकड़), सुसुवाही (133.08 एकड़), सीरगोवर्द्धनपुर (214.53 एकड़) और छितूपुर (191.28 एकड़), कुल 1215.53 एकड़।  इन गाँवों में करीब 7 हजार वृक्ष, 100 पक्का कुआँ, 20 कच्चा कुआँ, 40 पक्के मकान, 860 कच्चे मकान तथा पंचक्रोशी रोड पर कुछ मंदिर एवं धर्मशाला अवस्थित थे। भूखण्ड का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 1 हजार एकड़) ग्रामीणों के कृषि उपयोग में था, जिससे सरकार को 2764 रुपये वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। ‘हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0’ (पेज 234-35) के अनुसार उपरोक्त भूखण्ड में से 1961.28 एकड़ भूमि इन चार जागीरदारों-महाराजा बहादुर बनारस, राणा मुंशी माधवलाल, बाबू तेजनारायण सिन्हा और महंथ जंगमबाड़ी के अधीन थी जिन्हें राजस्व वसूली का चौथा हिस्सा मिलता था और शेष सरकार को।

वैसे महाराजा बनारस श्री प्रभुनारायण सिंहजी की सहानुभूति मालवीय जी के प्रति काफी पहले से रही थी। सन् 1904 में बनारस के मिन्ट हाउस में विश्वविद्यालय के स्थापनार्थ जो पहली सभा आयोजित हुई थी, उसकी अध्यक्षता काशी नरेश श्री प्रभुनारायण सिंह ने ही की थी। किन्तु एक विस्मयजनक तथ्य यह है कि विश्वविद्यालय के स्थापनार्थ 28 नवम्बर, 1911 को रजिस्टर्ड ‘हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी’ की 61 सदस्यीय कमेटी में, अथवा धन-संग्रह अभियान के लिये गठित ‘डिपुटेशन कमेटियों’ की सदस्यता सूची में काशी नरेश का नाम कहीं नहीं मिलता, जबकि इनमें देश के तमाम राजा-महाराजाओं, जागीरदारों एवं गण्यमान व्यक्तियों के नाम सदस्य रूप में उल्लिखित हैं। सन् 1913 में काशी नरेश ने विश्वविद्यालय को 1 लाख रूपये का दान दिया था और 1916 में शिलारोपण कार्यक्रम के समय उपस्थित वायसराय, प्रान्तों के गवर्नर्स तथा राजा-महाराजाओं का अपने किले में स्वागत किया था। इसके अतिरिक्त इस राजा परिवार से महामना के गुजरने (1946) के बाद 14 अक्टूबर 1949 को 12 लाख रुपये और रामनगर किले के बैरक का एक हिस्सा और राज का हॉस्पिटल विश्वविद्यालय को दान में मिला था। उस समय डॉ0 विभूतिनारायण सिंह काशी नरेश थे। उस समय देशभर में रजवाड़ों की सम्पत्ति सरकार के अधीन लाने की कार्यवाही चल रही थी। उससे राज की सम्पत्ति और स्टेटस बचाने की जुगत में और केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री गोविन्दवल्लभ पंत के दबाव में काशीराज ने उक्त दान विश्वविद्यालय को दिया था। विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति पं0 गोविन्द मालवीय ने इसके लिये काफी प्रयास किया था। (हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0, पेज 776)। काशीराज परिवार का अन्य सहयोग श्रीमती एनीबेसेन्ट द्वारा कमच्छा (बनारस) में स्थापित सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज को मिला था। इस कॉलेज की कुछ भूमि व भवन इसी राज परिवार की देन हैं। यही कॉलेज आगे चलकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का न्यूक्लियस बना। कमच्छा में विश्वविद्यालय का शिक्षा संकाय, उसके छात्रावास तथा कोल्हुआ प्राइमरी पाठशाला भी अवस्थित हैं। करीब 80 एकड़ में फैली ये संस्थायें विश्वविद्यालय द्वारा क्रय की हुई भूमि पर बनी हैं। काशीराज की ओर से प्राप्त उक्त सहयोग के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन स्वरूप विश्वविद्यालय ने 31 मार्च 1929 को महाराजा प्रभुनारायण सिंह को प्रो चान्सलर निर्वाचित किया; अगस्त 1931 में उनके स्वर्गवास के बाद महाराजा आदित्य नारायण सिंह प्रो चान्सलर बनाये गये, जो 1939 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे। डॉ0 विभूति नारायण सिंह 18 दिसम्बर 1962 को प्रो0 चान्सलर और 1968 में चान्सलर बने। इस पद पर वे मृत्यु पर्यन्त 25 दिसम्बर, 2000 तक बने रहे।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कृषि-शिक्षा का आरम्भ सामान्य तौर पर सन् 1920 में ही हो गया था (यद्यपि इसके ‘कृषि अनुसंधान संस्थान’ का शिलान्यास 1929 में किया गया)। इस संस्थान के लिये परिसर में 500 एकड़ का फार्म आवंटित किया गया था, जिसमें आरम्भ से ही कृषि विशेषज्ञों की देख-रेख में अच्छी कृषि होने लगी थी। कुछ समय बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कृषि अनुसंधान कार्य हेतु गंगा किनारे स्थित महाराजा बनारस के 2100 एकड़ की प्लाट लीज पर लेने हेतु उनसे बात की। वह राजी हो गये और 12 जुलाई 1921 को उन्होंने उक्त प्लॉट 11600/- रुपये सलाना रेन्ट पर विश्वविद्यालय को प्रदान किया। रेन्ट की सलाना राशि अग्रिम व तत्काल काशीराज को दे दी गई। किन्तु वह जमीन बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में थी और उसमें कृषि कार्य करना काफी खर्चीला एवं प्राकृतिक रूप से असुरक्षित था। अतः शीघ्र ही उक्त भूमि त्याग दी गई और काशी नरेश ने रेन्ट की अग्रिम राशि विश्वविद्यालय को वापस कर दी। (हिस्ट्री ऑफ द बी0एच0यू0 पेज 463-64)।

(लेखक महामना फाउण्डेशन के महासचिव हैं तथा महामना मालवीय जी एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ऊपर गहन शोध के उपरान्त आपकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं)