साड़ी उद्योग

  काशी अपने आप में अद्भुत् नगरी रही है। यहां सिर्फ आध्यात्म मोक्ष, संस्कृति सभ्यता, तीर्थ धर्म ही नहीं है बल्कि कई ऐसे उद्योग भी रहे हैं। जिनका उद्देश्य सिर्फ धन ही अर्जित करना नहीं रहा है। अपितु वे बनारस की पहचान भी बन गये। की यहां पान, ठंडई, मौज-मस्ती के अलावा एक चीज जो पूरे विश्व में जानी जाती है वह है बनारसी साड़ी बनारसी साड़ियों की ख्याति पूरे भारत में रही है। बनारस आने वाले पर्यटक बनारसी साड़ीया लेना नहीं भूलते। वहीं विदेशी पर्यटक बनारसी साड़ियों को जनदीक से निहारने के लिए गाइडों के माध्यम से इन उद्योगों का निरीक्षण करते हैं। काशी में वस्त्र कला की एक गौरवशाली परम्परा रही है। यहां की वस्त्र कला से मुगल बादशाह भी काफी प्रभावित हुए। मुगलों को यहां की साड़ियां इतनी पसंद आयी कि मुगल कलाकार यहां की कला से तालमेल बिठाने लगे। बनारसी साड़ियों में जरदोजी कर उसे काफी आकर्षक बनाया जाता है। साड़ियों में रेशम व सूती धागे का प्रयोग भी खूब होता है। सादी विवाह के शुभ अवसरों पर बनारसी साड़ियों का महत्व और बढ़ जाता है। लकदक बनारसी साड़ियों के बीच महिलाएं खूब फबती हैं। काशी का साड़ी उद्योग काफी वृहद है। यहां साड़ियों को बुनने वालों को बुनकर कहा जाता है। साड़ी बुनाई के काम में यहां काफी संख्या में बुनकर लगे हुए हैं। जो दिन भर इसी काम को करते हैं। इस उद्योग में बुनकरों का पूरा परिवार लगा रहता है। साड़ी बुनाई का प्रशिक्षण अलग से नहीं दिया जाता है बल्कि बच्चे अपने बड़ों के साथ ही बुनाई करते-करते सीख लेते हैं। करीब 10 से 12 वर्ष की उम्र से बच्चे इस कार्य में लग जाते हैं। बुनकर ज्यादातर मुसलमान और कुछ हिन्दू भी हैं। करघे की खटर-पटर के बीच बुनकर मस्ती में साड़ियों की बुनाई करते हैं। काशी में साड़ी उद्योग मदनपुरा, लल्लापुरा, अलईपुर, आदमपुरा, जैतपुरा, चेतगंज, लोहता, बजरडीहा, नगवां में है। जहां साड़ी बुनाई का काम जोर-शोर से होता है। यहां से निकली साड़ियों की कीमत उसकी गुणवत्ता और ग्राहकों की पसंद पर निर्भर करता है। फिर भी साड़ियों की कीमत की शुरूआत 2 हजार से होती है। बनारसी साड़ी में इस्तेमाल होने वाले रेशमी धागे ज्यादातर कर्नाटक प्रदेश के बंगलौर शहर से यहां आते हैं। साथ ही काश्मीर, पश्चिम बंगाल, बिहार समेत अन्य जगहों से भी धागे आते हैं। बुनाई में खासकर मलवरी रेशम का प्रयोग किया जाता है।

    मलवरी रेशम 2 प्लाई टवीस्टेड यार्न होता है। जिसे बनारसी भाषा में कतान कहा जाता है। बनारसी साड़ियों में बूटी, बूटा, कोनिया बेल, जाल और जंगला झालर मोटिफ का प्रयोग पारम्परिक रूप से होता है।

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