पुरातत्व की खुदाई ने काशी को बताया इतना प्राचीन

ग्रन्थों में जो सन्दर्भ मिलते हैं उसमें बनारस के बारे में माइथालॉजिकल आधार होता है। हिन्दू माइथालॉजी का मानना है कि बनारस शिव के आगमन से पूर्व भी था। यह माइथालॉजी काशी, गंगा और शिव के त्रिकोण से बनी हुई है और इस माइथालॉजी में बनारस को शिव के पहले आवास के रूप में माना गया है। फिर शिव की आराधना पर गंगा यहाँ आईं तो इसे हम अपने आप ही बहुत प्राचीन मान लेते हैं, इसलिए हम सबके मानस में यह बैठा रहता है कि यह बहुत प्राचीन है। लेकिन कितना प्राचीन है, इसका निर्धारण कुछ वैज्ञानिक पद्धतियों से ही किया जा सकता है। क्यूंकि साहित्य में  बनारस, शिव और गंगा से सम्बन्धित जो माइथालॉजी है वह बहुत प्राचीन नहीं है। जिस ग्रन्थ में काशी खण्ड मिलता है वह मध्ययुगीन है। तो हमारे मन में यह प्रश्न आया कि पुरातत्व और इतिहास की दृष्टि से भी काशी का संदर्भ लेना चाहिए और काफी कुछ मिलता भी है। जैसे – अथर्ववेद में काशी का संदर्भ मिलता है , तो जितने संदर्भ मिल रहे हैं उसके आधार पर देखना यह है कि काशी का प्राचीनतम स्थल कितना पुराना था और उसका स्वरूप क्या था?छोटा गांव था, बस्ती थी या नगर था ? ये सवाल हैं ,क्यूंकि हर एक चीज का एक इतिहास है। कब कौन था? कब से बसा? इसको ध्यान में रखकर पुरातत्व का काम शुरू किया था ।

इसी क्रम में पहड़िया के पास अकथा की खुदाई की गयी, दूसरा शूलटंकेश्वर, तिलमापुर, कोटवा, राजघाट, रामनगर और आशापुर की खुदाई की। यहां का जब पूरा सर्वेक्षण शुरू किया तो  जितनी प्राचीन जगहें थीं , टीले थे ,जहाँ किसी और ने खुदाई की थी उसके आधार पर खुदाई की ।जैसे रामनगर हमने खुद नहीं खोजा, ज्ञान प्रवाह के डॉ0 नीरज पाण्डेय हैं ने वहां जाकर सामग्री एकत्र की थी तथा  प्रो0 आर0सी0 शर्मा जी ने कहा चलकर वहाँ खुदाई की जाए।  उनके सहयोग से वह खनन कार्य हुआ। अकथा में जब खनन कार्य प्रारम्भ हुआ तब मेरे मन में सारनाथ था कि सारनाथ अकेला बौद्ध तीर्थ नहीं होगा उसकी आपूर्ति के लिए अगल-बगल कुछ बस्तियाँ होंगी। कुछ लोग रहते होंगे। क्यूंकि वहाँ तो सिर्फ स्तूप हैं भिक्षु आते हैं लेकिन उन भिक्षुओं की आपूर्ति के लिए आस-पास कुछ होना चाहिए। तो हमने काम उस सर्वे से शुरू किया था। लेकिन जब पहाड़िया का खनन हुआ तो उसकी रिपोर्टिंग दर्ज कराई, उसके अवशेष बहुत पुराने आ गये। हमारे विभाग (बी0एच0यू0 का प्रा0आ0इ0सं0 एवं पु0) के प्रो0 नारायण ने 1970 के आस-पास खुदाई की थी तो उसके अवशेषों की प्राचीनता 800 ई0पू0 जा रही थी। लेकिन जब हमने अकथा की खुदाई की तो वहां 1800 ई0पू0 की पुष्टि हुई। उससे मन में यह जिज्ञासा हुई कि 1800 ई0पू0 सारनाथ के पास वरुणा नदी के किनारे अगर कोई बस्ती है तो क्या कारण है? इसलिए जब हमने रामनगर की खुदाई की तो जियोलॉजिस्ट को अपने साथ रखा। प्रो0 उमाकान्त शुक्ल हैं ,उनके साथ हमने काम किया। उन्होंने गंगा के इतिहास पर काम किया और यह ध्यान मेंं आया कि यह एक खास तरीके का जमाव है ; लाल मिट्टी का जो विन्ध्य से आता था। गंगा जब पहली बार बहना शुरू की और वह जो मिट्टी का जमाव है उसका सैम्पल वैज्ञानिक परीक्षण के लिए हमने भेजा । जिसका परिणाम यह आया कि गंगा आज से चालीस हजार ई0पू0 से यहाँ बह रही हैं। प्रो0 शुक्ला ने और भी तमाम काम किये हैं, इसी संदर्भ में  कई जगह बोरिंग्स किये हैं। अपने निष्कर्ष में उन्होंने यह स्थापित किया कि बहुत समय तक गंगा की  धारा थी क्योंकि यह पहले समतल था। एक तरफ हिमालय का जमाव आ रहा था दूसरी तरफ विन्ध्य का इसी के बीच छोटी सी जगह बीच इसी में से गंगा आकर बहने लगी। कभी इधर चली जाती कभी उधर। तो अगर बहाव चंचल है तो उसके आस-पास रहने वाला एक समय के बाद बह जायेगा इसकी धारा में लगभग सात हजार ई0पू0 पृथ्वी के भीतर हलचल हुई। जिसमें बनारस, रामनगर का भाग ऊपर हो गया और जहाँ आज गंगा बह रही है उनका निर्माण हुआ। इससे सालाना बाढ़ की सम्भावना कम हो गयी। तो इस प्रक्रिया के बाद जो जगह बनी वह आवास के लिए लोगों के रहने के लिए मुफीद जगह हो गयी। फिर गंगा के किनारे बस्ती का निर्माण हुआ।

अपनी गरिमामयी विरासत की जानकारी होना जरूरी है। जब आप उसे जानेंगे, समझेंगे तभी आपका लगाव होगा और जिससे लगाव हो जाता है फिर उसके संरक्षण के लिए आप खुद आगे आ जाते हैं। मैं आपको बताना चाहती हूँ मेरा अपना घर दिल्ली में है वहाँ जाती हूँ। तो बनारस की उन्नमुक्तपन को यहाँ के वातावरण को बहुत याद करती हूँ। जो आनन्द संकटमोचन में जब आप जाते हैं आपके बगल में कौन बैठा है कोई मैटर नहीं करता है।

 बनारस कितना पुराना है, यह तो सवाल है, उस पर पुरातत्व से मिले साक्ष्यों के आधार पर यह कह सकते हैं कि यह ऋग्वैदिक काल से हैं उस समय बनारस आवासीय नगर हो चुका था। बनारस में कई समुदाय आ रहे थे बनारस जो शहर है यह 500 bc पुराना है। अभी जो खुदाई करनी है , उससे और भी तथ्य सामने आयेंगे। अभी इतना कह सकती हूँ कि शहर का केन्द्र भाग बदलता रहा है वह भी गंगा के कारण रहा है। तो भू-संरचना के आधार पर यह बदल गया है और बात यह है कि वाराणसी कभी भी राजनैतिक नगर नहीं रहा। कोई भी राजा या राजकुमार यह दावा नहीं कर सकता उसने काशी को बनाया है जैसे तमाम अन्य शहरों के बारे में दावे किये जाते हैं। जैसे कौशाम्बी को कोसम्ब ने बसाया। इस तरह की बात यहाँ के संदर्भ में नहीं कही जा सकती।

– (प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता प्रो विदुला जायसवाल से हुई बातचीत पर आधारित)