दुर्दशा के दुर्ग में काशीराज पुस्तकालय

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-डॉ0 अवधेश दीक्षित
देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी जिस विरासत के लिये जानी जाती है उसमें यहां की विशिष्ट, संस्कृति, ज्ञान विज्ञान चिंतन, पाण्डित्य व रचनाधर्मिता की विशिष्ट ऊर्वरा शक्ति महत्वपूर्ण है। काशी न केवल धर्म और मोक्ष की नगरी के रूप में बल्कि ज्ञान-विज्ञान, दर्शन व चिंतन से जुड़े मनीषियों के वास-प्रवास तथा ऐसे सज्जनों के सामाजिक संरक्षण के लिये भी जानी जाती रही है। प्राचीन वाराणसी अपनी प्राचीनता के साथ ही आर्ष ज्ञान व विज्ञान के सुव्यवस्थित संरक्षण के लिये भी प्रसिद्ध रही है। आज भी शहर में तमाम पुराने पुस्तकालय, वाचनालय, प्रकाशन एवं पाण्डुलीपियों के दुर्लभ संग्रह संस्कृति के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में विद्यमान हैं। इसी प्रकार का एक दुर्लभ संस्थान पूर्व काशी नरेश स्व0 विभूति नारायण सिंह के संरक्षण में काशीराज न्यास की तरफ से पुराण प्रकाशन एवं काशीराज ग्रंथालय, संस्कृत साहित्य तथा रीति काल के दुर्लभ ग्रंथों के लिये महत्वपूर्ण ग्रंथालय के रूप में जाना जाता रहा है। यहां के पुराण प्रकाशन की उपादेयता आज भी जगजाहिर है। तमाम महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथों के प्रकाशन में काशीराज की तरफ से अत्यंत ही तत्परता के साथ पहल की गयी। तमाम ग्रंथों तथा शोध कार्य कर रहे विद्वतजनों की रचना प्रक्रिया में जब कभी संदर्भ ग्रंथों की बात आती है काशीराज पुस्तकालय हमेशा से संदर्भित कार्यों का अजस्र स्रोत सिद्ध होता रहा। सांस्कृतिक व साहित्यिक अभिरुचि के धर्मप्राण पूर्व काशीनरेश स्व0 विभूति नारायण सिंह के देहावसान के बाद से ही यह पुस्तकालय बंद रहने लगा। यह वही पुस्तकालय है जहां के दुर्लभ ग्रंथों एवं पाण्डुलिपियों के अवलोकन के लिये देश-विदेश से विद्वानों का समूह निरंतर काशीराज दुर्ग में जुटा रहता था।

अप्रकाशित पाण्डुलिपियां, दुर्लभ ग्रंथ प्रकाशन के अनेकों महत्वपूर्ण दस्तावेज, रीतिकाल के दुर्लभतम ग्रंथ ये सब मिलाकर हजारों की संख्या में पुस्तकों का कोई सुध लेने वाला नहीं है वर्ष 2000 में काशी नरेश की मृत्यु के पश्चात से अभी तक लगातार पुस्तकालय बंद है दुर्ग की प्राचीन व मोटी सीलन युक्त दीवारों के सहारे रखी गयी पुस्तकों और पाण्डुलिपियों का क्या हश्र हो रहा होगा यह सहज ही कल्पना किया जा सकता है। स्व0 विभूति नारायण के वारिस कुंवर अनंत नारायण सिंह के लिये संस्कृति व सभ्यता के दुर्लभ ग्रंथों का यह खजाना बिना मतलब की चीज हो चुकी है।  ऐसे में जब पूरे देश के लिये यह एक विशेष सांस्कृतिक धरोहर है; इसे निजी व अनुपयोगी संपत्ति मानकर कुंवर अनंत नारायण का उपेक्षात्मक रुख और भी खेदजनक है। 12 वर्षों के अधिक समय से लगातार बंद काशीराज पुस्तकालय न केवल दुर्भाग्य की अपितु सांस्कृतिक धरोहरों के दृष्टिहीन वारिसों के घोर अकर्मण्यता की कहानी भी प्रस्तुत कर रहा है।

अगर काशीराज ग्रंथालय में दुर्लभ ग्रंथों की बात करें तो जानकारों के मुताबिक यह फेहरिस्त बहुत ही लंबी है। वह भी तब जब कोई अकेला आदमी ग्रंथालय की पूरी विरासत को बयां करने का दावा नहीं करता। जिन महत्वपूर्ण पुस्तकों का विद्वत्जन जिक्र करते हैं उसमें एक से बढ़कर एक रोचक कृतियों का नामोल्लेख आता है। जहां एक तरफ काष्ठजिह्वा स्वामी की दुर्लभ कृति ‘मानस परिशिष्ट परिचर्चा प्रकाश’ है। तो वहीं दूसरी तरफ राजा रघुराज प्रताप सिंह का ‘सीता स्वयंवर’ तथा ‘भागवत अमृताम्बुजम्’ (भागवत का पद्यानुवाद) है। वहीं सखी संप्रदाय के मुसलमान कवि जिनका रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला में फुलवारी के अवसर पर गीत भी है; ऐसे रामसखेदि कवि की संपूर्ण रचनावली, अंगद पैज तथा तुलसीदास से लगभग सौ वर्ष पूर्व ‘प्रेमदास’ जी का ‘प्रेमरामायण’ आदि न जाने कितने ही ज्ञात-अज्ञात दुर्लभतम अप्रकाशित तथा अनुपलब्ध ग्रंथावलियों का जीवंत दस्तावेज है- काशीराज ग्रंथालय। उक्त समस्त ग्रंथ कितने आवश्यक हैं। इसका अंदाजा तब जाकर लगता है जब कभी कोई विद्वत्श्रेष्ठ अपनी पुस्तक रचना में अथवा महत्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान मंच से अपने अभिभाषण में बार-बार काशीराज ग्रंथालय तथा इसके संदर्भों का जिक्र करता हैं न केवल विश्वविद्यालयों के शोधार्थी बल्कि प्रोफेसरगणों की संख्या भी कम नहीं है। जो आये दिन स्थानीय लोगों तथा दुर्ग के पुराने कर्मचारियां से ग्रंथालय में पहुंच बनाने की सिफारिश करते दिखाई देते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि किसी को भी पुस्तकालय में प्रवेश की सफलता नहीं मिल पाती। मिले भी कैसे जब इसके वर्तमान वारिस को ऐसी सांस्कृतिक धरोहरों में कोई रुचि ही न दिखती हो। ऐसा नहीं है कि काशी के प्रबुद्ध समाज की तरफ से इस पुराण प्रकाशन तथा काशीराज ग्रंथालय के प्रति कभी चिंता न की गयी हो। तमाम अवसरों पर दुर्ग के वर्तमान स्वामी कुंवर अनंत नारायण से ग्रंथालय खोले जाने का मौखिक व लिखित आग्रह/अनुरोध भी किया जा चुका है। बावजूद इसके दुर्ग प्रशासन को इसकी कोई सुध नहीं। बात आगे बढ़ायी जाये तो थोड़ी कटु अवश्य प्रतीत होगी लेकिन जो प्रत्यक्ष सच्चाई है उस आइने में कुंवर अनंत नारायण के लिये ऐसी विरासत के प्रति संवेदनशीलता पूरी तरह से मर चुकी है। इसके पूर्व भी तमाम ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्व के धरोहरों का हेर-फेर, दो सौ साल से भी पुराने ऐतिहासिक स्मारकों का तोड़-फोड़ कर निजी प्रयोग तथा लाभ की अपेक्षाएं, विश्व प्रसिद्ध रामलीला के उन्नयन में निष्क्रियता तथा राज संपत्तियों के बेचने, विरासतों के प्रति उदासीनता तथा अपने परिवार में संपत्ति के तमाम कलहों में सक्रियता ही अब इस दुर्ग की पहचान बन चुकी है।

इस पूरे प्रकरण पर काशी के प्रबुद्ध तथा सचेत नागरिकों की तरफ से कई बार सकारात्मक पहले किये गये हैं। सांस्कृतिक विरासत के इस महत्वपूर्ण ग्रंथालय का लगातार बंद पड़े रहना न केवल काशीराज दुर्ग पर अपितु पूरे जागरूक समाज पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि किस तरह से हम अपनी विरासतों को लेकर बेपरवाह हो चुके हैं। प्रबुद्धजनों की तरफ से यही मांग उठाई जा रही है कि किसी भी तरह दुर्ग का यह काशीराज ग्रंथालय लगातार खुलना चाहिये।

ऐसी स्थिति में जब ग्रंथालय के संचालन में कुंवर अनंत नारायण वास्तव में असमर्थ हैं तो उन्हें निःसंकोच इसके लिये जन सहयोग की भावुक अपील करनी चाहिये। लेकिन अगर उक्त दोनों बातों का इरादा कुंवर अनंत नारायण छोड़ चुकें हों तो निश्चित ही भारत सरकर की पहल पर इस ग्रंथालय को अधिग्रहित कर किसी विश्वविद्यालय अथवा प्रतिष्ठित व सम्पन्न पुस्तकालय को दान करा देनी चाहिए ताकि साहित्य, संस्कृति तथा ऐतिहासिक महत्व के धरोहरों की अस्मिता बची रहे।

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