वास्तु स्थापत्य की काशी

पुराणों, महाकाव्यों में काशी के राजवंशों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध, जैन साहित्य में भी कुछ राजाओं का उल्लेख है। सबको मिलाकर देखा जाय तो कोई व्यवस्थित इतिहास बना पाना दुष्कर काम होगा। दिवोदास काशी के अधिपति थे। उनसे मुक्त क्षेत्र अविमुक्त काशी के अधिष्ठाता अविमुक्तेश्वर शिव यहाँ पूजे गये। जो भी हो इतिहास, गंगा और दिवोदास से पूर्व बसी काशी विश्व की अकेली नगरी है जो तमाम परिवर्तनों और झंझावतों के बावजूद एक सुनिश्चित भू-क्षेत्र में अज्ञात और ज्ञात इतिहास के अनुसार भी विद्यमान है। इससे यह अनुमान लगाना तनिक दुष्कर और दुरुह है कि हजारों हजार साल पुराना वाराणसी का वास्तु और स्थापत्य का गुजरा कल कैसा था। दुनिया के तमाम नगरों का कल जिस सरलता और सुगमता से बखाना जा सकता है उतनी सरलता से काशी का नहीं।

चीनी बौद्ध यात्रियों द्वारा वर्णित वृत्तान्तों या फिर वाल्मीकि कृत रामायण या वेदव्यास के महाभारत के वर्णनों की दृष्टि से भी कोई वास्तविक तस्वीर नहीं बन पाती। उपनिषद का कृषि कहता है ब्रह्मज्ञान करना हो तो जाओ काशी, बाद के सौत्रशास्त्र शिल्पादि की दृष्टि से काशी का उल्लेख करते हैं। इनमें से किसी भी लिखित स्रोत से वास्तु तथा स्थापत्य की दृष्टि से बहुत पुराने कल की कथा कहना वैज्ञानिक, तार्किक और तथ्यपूर्ण न होगा। वाराणसी के वर्तमान नगरीय क्षेत्र में से काशी का उल्लेखन के रूप में किया गया। भदैनी, मर्णिकर्णिका, गाय घाट जैसे कई मुहल्ले पुराने मुनिसिपल रिकार्डस् में उनके रूप में दर्ज है। मेरा ऐसा ख्याल है कि पुराणों में वर्णित असि और वरुणा नदियों के अतिरिक्त अन्य दो नदियों सहित अनेक विशाल सरोवरों, कुण्डों, तालाबों, कूपों, वापियों को पाटकर वर्तमान वाराणसी बसा है। जिसके चिन्ह मिलते हैं। गलियों की ढलान और किसी समय यहां जगह-जगह सीढ़ियाँ होने से इसकी पुष्टि होती है। अगस्ताकुण्ड मुहल्ला है यहां कहीं कुण्ड नहीं है। जबकि पितृकुण्ड मुहल्ले की तरह कुण्ड भी होना चाहिए था। रेवड़ी तालाब, मछोदरी, मैदागिन, मिश्र पोखरा, गौदौलिया, ब्रह्मनाल, सिगरा, हरतीरथ। ये सभी मुहल्ले हो गए हैं। कुण्ड तालाब केवल नामों में है। 1948 के बाद भी 25 से 50 की संख्या में कुण्डों को पाटकर बस्तियाँ बसायी गईं। फिर भी अवशेष वास्तु और स्थापत्य की दृष्टि से कल को बताया जा सकता है। सारनाथ के बौद्ध विहारों तथा राजघाट में हुए उत्खनन का काम पुरातात्विकों की देखरेख में और काल विवरण की सभी प्रचलित वैज्ञानिक विधियों से पुष्ट आचारों पर यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मौर्य, शुंग, गुप्त तथा परवर्त्ती राजवंशों के काल में वर्तमान वाराणसी के नगरीय क्षेत्र में वास्तु तथा स्थापत्य का क्या स्वरूप था। काशी राज्य की बात की जाय तो नौगढ़, चकिया, सोनभद्र तथा भदोही तक ज्ञात इतिहास से भी पूर्व के अनेक उदाहरण मिलेंगे। यद्यपि अभी तक वास्तु तथा स्थापत्य सम्बन्धी, प्रमाण कम हैं या नही ंके बराबर हैं। यह भी कह सकते है के गिरी गुफाओं में निवास काल के हैं।

काशी राज्य के पूर्व वाराणसी की स्थिति पूर्व वाहिनी गंगा के ऊँचे तटबन्ध वाले क्षेत्र से हुई है। गंगा और गोमती संगम के निकट चन्द्रावती में चौथे जैन तीर्थंकर चन्द्र प्रभु का अवतरण हुआ था जहाँ राजा डोयनदेव का किला हुआ करता था। वह कटान का क्षेत्र है। गंगा की धारा से आज भी किनारा कटता रहता है। किले का अधिकांश भाग धारा में विलीन हो चुका है। उससे पश्चिम एक वर्तमान में ढाब क्षेत्र है जिसमें मुस्तफाबाद, रामचन्दीपुर जैसे कुछ गाँव हैं। वर्षा में यह क्षेत्र टापू बन जाता है। वेगवती गंगा की एक धारा पूरे भू-भाग से इस क्षेत्र को अलग कर देती है। पानी न रहने पर रेती एक धारा रह जाती है। प्राचीन काल में मुख्य बस्ती इसके आस-पास या नगर रहा होगा जो अनवरत बाढ़ के थपेड़ों से विलीन हो गया तब नगरीय क्षेत्र और पश्चिम लगभग वरुणा नदी के संगम तक आया। वर्तमान काल में इस ढाब के निकट ही पहड़िया, अकथा और सारनाथ स्थित हैं। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में महात्मा गौतम बुद्ध के मृगवन में आने और धर्मचक्र के लिए स्थान चयन करने से यह सुनिश्चित है कि आस-पास वर्तमान अकथा, पहड़िया, ढाब, कपिलधारा में नगरीय सभ्यता रही होगी। इन सभी स्थानों से ढेर और पुराकालिक महल के अवशेष मिले। भू-माफियाओं ने काफी कुछ सामग्री इस भय से हटा बढ़ा दी कि पुरामहल होने से भूमि न छिन जाय। पहड़िया नामकरण किसी शैल शिखर के कारण नहीं हुआ। यह एक ढूहा था जिसके नीचे वाराणसी का काफी कुछ दबा हुआ था मोहन-जो-दारो की तरह महाभारत कालीन नगर तो मेरी समझ से वर्तमान ढाब क्षेत्र के आस-पास ही था जो गंगा में पूर्णतः विलीन हो चुका है।

मौर्य और गुप्तकालीन स्थापत्य का वर्गीकरण ईटों की परिभाषा के अनुसार किया जाता है। दोनों ही कालों में ईटों की मोटाई कम हुआ करती थी। वर्तमान ईटों से आधी जबकि लम्बाई-चौड़ाई अधिक यह ईटों का स्वरूप घटते-घटते मुगल काल तक लखौरिया या लखोटिया ईटों तक आ गया। वर्तमान में भी वाराणसी नगर के अधिकांश पुराने मकानों में इन ईटों को देखा जा सकता है। इससे यह अनुमान निकलता है कि वास्तु तथा स्थापत्य के लिए पकी हुई ईटों तथा मिट्टी के गारे का ही प्रमुख रूप से प्रयोग किया गया। जलवायु के अनुरूप ही वास्तु की दीवारें दो से चार फुट तक मोटी बनाई जाती थीं। दीवारें मोटी होने से शीत और गर्मी दोनों से बचत होती है।

यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि मोहन-जो-दारो, हड़प्पा, लोथल या अन्यान्य पश्मोत्तर भारत में जैसे नगरीय स्थापत्य और वास्तु के जो अवशेष मिले हैं उतने सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध तथा उन्नत नगरों के प्रयास गंगा घाटी में नहीं मिलेंगे। आर्य मूलतः बनों तथा ग्रामीण अंचलों में निवास करना पसन्द करते थे। वाल्मीकिकृत रामायण तथा वेदव्यास कृत महाभारत या अन्यान्य महाकाव्यों में अयोध्या तथा हस्तिनापुर की भव्य अट्टालिकों, भवनों, मन्दिरों (आवास) आदि का वर्णन, मात्र काव्य कौशल है। किसी द्वारका के सागर में विलुप्त अवशेषों के मिलने के दावे की खोज जारी है। सफलता मिल भी सकती है। लेकिन गंगा-यमुना जैसी नदियों के मध्य स्थित हस्तिनापुर या सरयू जैसी नदी में भव्य श्रद्धालिकाओं के पूर्णतः विलुप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती। विशेष रूप से तब जबकि ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि राम क्षेत्र मानवनिर्मित भी हो सकता है। वास्तविकता यह है कि वाराणसी तथा आस-पास इतिहास या ईस्वीं सन् के बाद तक मिट्टी-गोबर, बांस, सरकण्डे आदि के माध्यम से छोटे-बड़े वास्तु का निर्माण होता रहा है। पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेशों के ग्रामीण वास्तु की तरह छत भी गोबर मिट्टी की हुआ करती थी जिसका स्थान बाद में नरिया-थपुआ (खपरैल) ने ले लिया। अत्यधिक प्राचीन या कहें महाभारत कालीन अवशेषों के न मिलने का यही एक प्रमुख कारण है। ईटों और पत्थरों का स्थापत्य तथा वास्तु में प्रयोग लगभग नहीं था। मिट्टी के घरों में भी दो छत्ती निकाली जाती थी जिस पर पहुंचने के लिए बांस की सीढ़ी लगायी जाती थी।

राजघाट में गहड़वाल़ राजवंश (ई0 1000-1200) कि किले के भग्नावशेष यत्र-तत्र  दिख रहे हैं। इससे पूर्व के वास्तु तथा स्थापत्य मूलतः पक्की ईटों के हैं। गुप्तकाल में धमेक स्तूप सारनाथ में पत्थरों का प्रयोग किया गया। वाराणसी का सर्वाधिक प्राचीन मन्दिर कर्दमेश्वर महादेव (कन्दवा, पंचक्रोशी मार्ग पर स्थित) है जो पन्द्रहवीं सोलहवीं शताब्दी का है। यह एक पहले है कि गंगा की सतह से काफी ऊंचाई पर सड़क मार्ग से दूर दुर्गम वाराणसी के घाटों से लेकर मैदागिन चौक गोदौलिया मार्ग तथा उत्तर में मैदागिन राजघाट मार्ग तथा दक्षिण में गोदौलिया दशाश्वमेध मार्ग या घाट के दारेश्वर मन्दिर तक लगभग सभी मकान पत्थरों के हैं। इस क्षेत्र को पक्का महाल कहा जाता है। सिन्धिया और जल कल के पम्पिंग स्टेशन के अतिरिक्त राजघाट से अस्सी घाट तक लगभग साढ़े सात किलोमीटर तक गंगा की सतह से कहीं बीस कहीं तीस या इससे अधिक ऊंचाई तक पत्थरों से घाट सीढ़ियाँ बनाई गईं। सीढ़ियों के साथ कहीं गढ़ी वस्त्र बदलने के लिए कमरे, कहीं मन्दिर बनाये गये । इन सीढ़ियों से ऊपर तक की लगभग सभी इमारतें पत्थर की हैं। गलियों में पत्थर बिछाये गये। भवनों की दीवारें, फर्श, सीलिंग, सीढ़ियाँ, चबूतरा सब पत्थर से।

वाराणसी जनपद (चन्दौली के अलग होने से पूर्व) में चकिया, नौगढ़ क्षेत्र पहाड़ी रहे हैं। लेकिन ढुलाई की दृष्टि से दुर्गम। इससे आसान या चुनार से नाव द्वारा पत्थरों की ढुलाई। ढुलाई के बाद भारी भरकम मोट, पटिया को घाटों के ऊपर भी कई मंजिलों वाले वास्तु में प्रयोग। सहसा सब कुछ अचरज भरा है। बिना किसी यांत्रिक व्यवस्था के ईंटों की तुलना में पत्थरों के प्रयोग के पीछे क्या कारण हो सकते हैं यह बताना कठिन है। वास्तु में चौसल्ला आँगन, दालान, एक सदरी दरवाजा, एक या दो कुंआ, बैठक खाना, रसोई घर। स्नानागार हो न हो। इस तरह सामान्य भवनों का निर्माता होता था। महलों, मन्दिरों, मठों, वेधशाला या सार्वजनिक भवनों के वास्तु पर उन राज्यों या अंचलों के वास्तु निर्माण का प्रभाव है जिन्होंने घाटों और ऊपर भवनों का निर्माण किया पेशवा शासन काल में बने अधिक घाटों पर महाराष्ट्र की छाप मिलेगी। राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, आन्ध्र आदि राज्यों की रियासतों द्वारा निर्मित भवनों पर उन क्षेत्रों के वास्तु के चि मिलेंगे।

मुगल आक्रमणकारियों के आये दिन होने वाले भय से सुरक्षा की दृष्टि से पूरे पक्के महाल को कुछ फाटकों, दरवाजों द्वारों बांध दिया गया। आज भी जिन्दा है। बाँस फाटक, हनुमान फाटक, फाटक शेख सलीम, हाथी फाटक आदि। इसी प्रकार राज दरवाजा, पाटन दरवाजा आदि मुहल्ले हैं। अनेक घाटों पर उतरने वाली सीढ़ियों पर आज भी दरवाजे मिलते हैं। एक विलक्षण वास्तु का नमूना यह है कि कुछ मन्दिर दो तीन या चार मंजिल भूमि में कुओं जिसकी तलहटी में मिलेंगे। मणिकर्णिकेश्वर, काशी करवट, नीलकंट, शीतला गली (काश्मीरीमल की हवेली के दक्षिण निजी आवास में स्थित एक शिवलिंग) आदि। तीसरी विशेषता है बाद क्षेत्र से प्रभावित न होने पर भी दस बारह फुट ऊँची जगती ओर कहीं उतनी ऊँचाई पर आँगन घरों के आगे चबूतरा तथा प्रायः हर मकान में कुंआँ। किन्हीं मकानों में दो फुट व्यास में चौकोर गहरा कुंआ तो कहीं जोने की दीवार में आँगन से सटा कुंआँ। पत्थर, ईंट, सूखी चूने या बरी से चिनाई होती थी।

पक्के महाल तथा घाटें का निर्माण 17वीं सदी से 20वीं सदी तक तथा कुछ का निर्माण 15वीं 16वीं सदी तक ले जाया जा सकता है। 20वीं सदी तक पत्थरों का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया। आज से लगभग सौ डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बाहरी दीवार बिना प्लास्टर नंगी ईंटों वाले तथा पत्थर के सीमित उपयोग वाले कुछ अत्यन्त सुन्दर वास्तु निर्माण हुए लाल गिरजाघर, चौक तथा कोतवाली थाने, टाउनहाल, नीचीबाग, डाकघर, दीवानी न्यायालय भवन तथा बंगीय समाज के आगे का भवन दृष्टव्य है। बरी चूने का प्रयोग फर्श, छत तथा चिनाई में होता या बरी को गलाते समय शीरे, गुड़, मेथी जैसे कुछ कुछ सामानों का मिश्रण किया जाता था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुराने भवनों पर जरी का प्लास्टर भी दिखता है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि लोहे की सरिया या गर्डर का उपयोग बहुत सीमित या नगण्य था छत पाटने के लिए साख या शीशम की धरन तथा विभिन्न प्रकारों की पत्थर की पटिया का उपयोग किया जाता था खिड़की, दरवाजों के चौखट तथा पल्लों में मुख्यतः लकड़ी का प्रयोग होता था। भवनों की रंगाई गेरु, चूने, रामरज या इनके मिश्रण से तैयार रंगें से होती थी। धरन, पल्लों तथा चौखट में अलकतरे या तारकोल का मुख्यतः प्रयोग होता था। काँच का इस्तेमाल सार्वजनिक वास्तु या धनी वर्ग द्वारा खिड़की दरवाजों में किया जाता था। कभी-कभी रंग-बिरंगे काँच से सजाया जाता था। अजमतगद पैलेस इसका उदाहरण है। बंग समाज के लोगों द्वारा वास्तु के आगे पेड़, पौधे, लतायें सजाने का शौक जरूर था। यह पहचान भी थी। खिड़कियों, दरवाजों पर चित्र या पर्दा डालने की विशिष्ट प्रथा थी। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में सरकारी कार्यालयों में भी दरवाजों पर चिक लगा करती थी।

वास्तु तथा स्थापत्य की दृष्टि से वाराणसी आज एकदम गुजरे कल से अलग है। वाराणसी के पक्के महालों में ही पहले चार पाँच मंजिलें हुआ करती थीं। चौक की सड़क के पश्चिम के बाद जितने मुहल्ले थे पिछले सत्तर-अस्सी साल में पक्के हुए। ज्यादातर मकानों पर टिन या खपरैल दो मंजिले कुछ लखौरिया कुछ में दो तीन रद्दे के बाद दस इंच वाली ईंट की एक परता मिट्टी या सुखी चूने से चिनाई वाले। वह हॉरिजेन्टल विस्तार का जमाना था। मेरा अपना मकान छोटी पियरी मुहल्ले में है। 1945-46 में जब दूसरी मंजिल बनी तो उस छत से पंचगंगा घाट स्थित माधोराव का धौरहरा, ज्ञानवापी मस्जिद की गुम्बद, कमच्छा बिजली घर की चिमनी दिख पड़ती थी अब चार मकानों के बाद कुछ नहीं दिख पड़ता।

विगत बीस साल में वर्टिकल विस्तार का दौर शुरू हो गया। वाराणसी नगर की मुख्य सड़कों, चौड़े मार्गों या संकरी गलियों में भी आवासीय भवनों के भूखण्ड के बाहरी कमरों का दुकानों के रूप में उपयोग होता रहा है। लोहटिया, नखास से लेकर राजा दरवाजा, गोविन्दपुरा, चौक गोदौलिया, दशाश्वमेध तक बाजार के रूप में अंग्रेजी शासन काल में दशाश्वमेध, सब्जीमण्डी, विश्वेश्वरगंज की गल्ला मण्डी, सब्जी सट्टी, ठाकुर प्रसाद का कटरा पुराना चौक, राजा बाजार का ही उल्लेख किया जा सकता है। अब सड़कों और गलियों में भी भव्य स्थापत्य को तोड़-तोड़कर कटरों का निर्माण हो रहा है। अनेक वास्तु तथा स्थापत्य के दुर्लभ नमूने ध्वस्त हो गये। कटरा संस्कृति ने कई मुहल्लों की सूरत बदल ही है।

पुराने वास्तु के फोटोग्राफ, नक्शे या स्वरूप को सुरक्षित करने का कोई जतन नहीं किया  जा रहा है। केन्द्र और राज्यों के सांस्कृतिक विभागें का यह दायित्व है। पुरानी दिल्ली में इस दिशा में सांस्कृतिक विभाग द्वारा पहल की गई थी। वाराणसी विकास प्राधिकरण या नगर निगम जो भी पुराने भवनों या वास्तु को गिराकर उसके स्थान पर किसी प्रकार का निर्माण कराने के लिए नक्शा स्वीकृत करता है वह चाहे तो तोड़े जाने वाले भवन के वास्तु शिला का नक्शा, फोटोग्राफ तथा बनावट सम्बन्धी सभी विवरण देने की बाध्यता लगा सकता है और बिना इस औपचारिकता को पूरा किए प्रार्थनापत्र पर विचार न करने की शर्त लगा सकता है। ऐसा सभी विवरण स्टोर किये जानी चाहिए। आज के वाराणसी का महा विनाश वास्तु तथा स्थापत्य की दृष्टि से हो रहा है। ऐतिहासिक महत्व के और स्थापत्य तथा वास्तु के धरोहर श्रेणी के वास्तु को गिराकर नवनिर्माण किया जा रहा है। ऐसा कि भविष्य में वास्तविक स्वरूप की जानकारी ही न मिल सके।

आज वाराणसी में तीव्र गति से बहुमंजिले काम्प्लेक्स तो बन ही रहे हैं आवासीय कालोनियों का भी निर्माण हो रहा है। कई-कई कालोनियाँ अव्यवस्थित, अनियोजित तथा असंगत रूप से विकसित हुई हैं या हो रही हैं। नये वास्तु में वाराणसी के मौसमी चक्र, हवाओं के रूख और रोशनी के प्रति कम ही ध्यान दिया गया है। इसलिये कूलर, हीटर अनिवार्य बोझ हो गए हैं। आँगन रखने के चलन के साथ मकान के आगे चबूतरा बनाने का चलन भी समाप्त हो गया है। नगर के मूल स्वरूप के विनाश की स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को दिशानिर्देश देना पड़ा विशेषरूप से गंगा के तटवर्त्ती 200 मीटर के क्षेत्र में नवनिर्माण की मनमानी रोकने के लिए। आज जो भवन बन रहे हैं सीमेन्ट, लोहे, गिट्टी पर अधिक आधारित हैं लकड़ी का स्थान लोहे ने ले लिया धरन, पटिया की जगह स्लैट की ढलैया होने लगी। वर्त्तमान मुहल्लों में परिवारों के बीच आदान-प्रदान आपसी रिश्ते नाते और भाईचारे का जो सामाजिक तन्तु या वह आधुनिक वास्तु में समाप्त हो गया है। टापू की तरह अलग-अलग रहने की विवशता। इससे नगर की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता की जो कड़ी थी वह पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई।

मुहल्ले सुरक्षित और निरापद थे। कालोनियाँ कहां सुरक्षित हैं। हर कालोनी चोरी, डकैती, की शिकार है। बगल के बंगले में डाकेजनी हो रही है लेकिन पड़ोस के बंगले में रहने वाले को पता भी नहीं चलता। इतना खुलापन कि गार्ड और पालतू कुत्ते रखने की विवशता है। चहारदीवारी ऊँची करो, कंटीले तार लगाओ तमाम तरह के ऊपरी खर्च हैं फिर भी असुरक्षा है। आज विशाल कॉम्प्लेक्स बन रहे हैं। नगर के समीप ये पुराने हिस्सों में लोग फ्लैट की जिन्दगी एक अलग संस्कृति को जन्म देती है। दो, तीन, चार कमरों में कैद जिन्दगी। तंग गलियों के बजाय तंग कमरों में रहने की विवशता।

वाराणसी की संस्कृति के साथ एक खास पक्ष था जो आज विनाश की ओर हैं नगर के सम्पन्न, श्रेष्ठी और महाजन पक्के महाल के भव्य और आरामदेह भवनों में निवास तो करते थे लेकिन सभी के बाग-बगीचे नगर से बाहर मगर पैदल भी पहुँच के भीतर वाले क्षेत्रों में होते थे। वे सभी अब आबादी वाले मुहल्ले हो गए। नाटी इमली, रथयात्रा, महमूरगंज, नगवा, पहड़िया, आशापुर, सारनाथ तक ऐसे जाने कितने आउट हाउस या उद्यान हैं। इनका वास्तु अलग या सभी में नृत्य-गायन की महफिल वाले कक्ष के साथ कुछ कमरे जो सुसज्जित रहा करते थे। अवकाश, पर्व, त्यौहारों पर परिवार या मित्र मण्डली के साथ जमघट हुआ करता था। ऐसे लगभग सभी वास्तु खण्ड लगभग समाप्त हो चले हैं और उन पर बहुमंजिले काम्प्लेक्स खड़े होते जा रहे हैं। बाहरी अलंग कभी वाराणसी वासियों की संस्कृति की खास पहचान हुआ करती थी। वह संस्कृति आज बुरी तरह ढायी जा रही है कुछ इस तरह कि उसकी मिसाल तक न दी जा सके।

आये दिन होने वाले विजातीय हमलों तथा अत्याचारों के कारण पुरानी दिल्ली, लखनऊ तथा वाराणसी जैसे नगरों में कम खिड़की, दरवाजों वाले मजबूत और चाक चौबन्द वास्तु के निर्माण तथा तंग गलियों में एकजुट रहने तथा दैनिक आवश्यकता की सभी वस्तुओं के हाट बाजार स्थापित करने के पीछे दूसरा प्रमुख कारण था परिवहन की समस्या। वाराणसी की गलियों में सम्पन्न लोग पालकी, नालकी, खटोले का प्रयोग करते थे। बग्घी, विक्टोरिया, तांगे इक्के तक वाराणसी का विस्तार उतनी तेजी से नहीं हुआ जितना रिक्शे की चलन के बाद हुआ डीजल और पेट्रोल वाहनों की सुलभता जैसे-जैसे बढ़ती गई देखते-देखते शहरी सीमा छलांग पर छलांग लगाती चली गई। अब मूल शहर जिसे पक्का महाल कहा जाता था सिमट कर पुराना महाल रह गया। पक्के महाल के भवनों का निर्माण काल पाँच सौ साल पीछे तक ले जाया जा सकता है। बंगाली टोला, लाहौरी टोला सहित ब्रह्मघाट, प्रह्लाद घाट तथा आस-पास के वास्तु इसी काल सीमा के हैं।

कल के वाराणसी की रूपरेखा महानगर की योजना तथा परिवहन के सस्ते, सुलभ, सुचारू साधनों की परिकल्पना के आधार पर काफी कुछ की जा सकती है। गाजियाबाद तक पहुंचने वाली दिल्ली, कल्याण तक पसरने वाली मुम्बई और कानपुर, सीतापुर, फैजाबाद मार्गों पर पसरते लखनऊ की चाल को देखते हुए कल के वाराणसी का जो रूप होगा वह स्थापत्य तथा वास्तु की दृष्टि से गुजरे कल के वास्तु और स्थापत्य की दृष्टि से इतना अलग होगा जितना उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका यह भी कहा जा सकता है कि जितना पुरानी दिल्ली और नयी दिल्ली। परिवहन और यातायात ने ऐसा कर दिया है कि सूरत से मुम्बई तक नौकरी-पेशा वाला आदमी हर रोज आ जा रहा है। मुम्बई का प्रोफेशनल नयी दिल्ली सुबह शाम आ जा रहा है। उपस्थिति की अनिवार्यता न हो तो शायद उसकी भी आवश्यकता न पड़े। इसके आधार पर आने वाले कल को वाराणसी के वास्तु का एक स्वरूप आसानी के साथ खड़ा किया जा सकता है।

बेतहाशा बढ़ रही जमीन की दर और घटता हुआ कृषि उत्पादन का क्षेत्र विवश कर रहा है। लम्बवत विकास वास्तु स्थापत्य के लिए। वर्टिकल वास्तु। कहीं भूकम्प रोधी, कहीं स्वच्छन्द सामान्य रूप से वाराणसी भूस्खलन और भूकम्प से मुक्त क्षेत्र है। पिछला विनाशक भूकम्प 1934 में दर्ज किया गया तब ऐसी पिलर्स पर खड़ी इमारतों का निर्माण चलन में नहीं था इसलिए धनजन की व्यापक हानि नहीं हुई। भविष्य यानी कल के वाराणसी नगर के वास्तु में पत्थर की शिलाओं का कोई उपयोग नहीं होगा। अन्धेरे और कम खिड़की रोशनदान वाले वास्तु का दर्शन नहीं होगा। सदर दरवाजे, चबूतरे, आँगन, दालान, दीवारों में आले, ताखे के साथ धरन पटिया की बिदायी हो जायेगी। बहुमंजिले अपार्टमेन्ट स्वतंत्र वास्तु का स्थान ले लेंगे। वास्तु के आगे, पीछे या अगल-बगल कुछ खाली जगह छोड़कर चहारदीवारी के साथ निजी वास्तु निर्माण की चलन होगी। पत्थर के साथ ही लकड़ी के चौखट और पल्ले का स्थान ग्रिल, प्लाइउड, काँच, एल्युमिनियम, फाइबर का प्रयोग वास्तु निर्माण का मुख्य आधार होगा। मोजाइक, टाइल्स वर्त्तमान ग्रेनाइट, मार्बल या अन्य पत्थरों का स्थान ले लेंगे। पारम्परिक गेरू, चूने, रामरज के इस्तेमाज की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। लोहे की सॉकल, कुण्डी दरवाजों, दीवारों पर लगे कड़े-कड़ी खूंटी की तलाश संग्रहालयों में करनी होगी। छेद से चार फुट तक मोटी दीवारों और धरन पटिया पर एक फुट ऊँची मिट्टी पर गिट्टी पीटकर फर्श बनाने की कल्पना भी आने वाले कल के लोग कर सकेंगे यह नहीं कहा जा सकता है।

यह जरूर है कि पतली दीवारों ओर सीलिंग की वजह से हीटर, कूलर, ब्लोअर, मोटे पर्दों और कृत्रिम रोशनी पर निर्भरता बढ़ जाएगी। इलेक्ट्रानिक उपकरणों का उपयोग सुरक्षा, मौसम, मनोरंजन और किचेन बदलाव के क्षेत्र में बढ़ जाएगा। एक सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। शास्त्रश्रुति सम्भवतः तथा पारम्परिक मान्यताओं और सामान्य जलवायु से बेपरवाह वास्तु स्थापत्य की बिदायी। इस बिदायी का मनो-शारीरिक प्रभाव क्या पड़ता है इस पर शोध की आवश्यकता है। चिकित्सा विज्ञान सम्मत मत तो यह है कि अधिक ऊँचे स्थान पर श्वाँस, दमे जैसे रोगों से प्रभावित लोगों के लिए रहना अनुपयुक्त है। दस से सौ मंजिले वास्तु स्थापत्य में निवास करने वाले आयुवृद्ध लोगों के मनो-शारीरिक अध्ययन की आवश्यकता है। जिन देशों में ऐसे वास्तु हैं वहाँ इस दृष्टि से शोध हुए हैं या नहीं मुझे जानकारी नहीं।

कल का वाराणसी यातायात-परिवहन में मेट्रो, आटो, सार्वजनिक परिवहन की सुचारू और सस्ती उपलब्धता की परियोजनाओं को देखते हुए बाबतपुर, चोलापुर, राजातालाब, मार्कण्डेय महादेव, जक्खनी कटेसर, पड़ाव तक पसरा होगा तो पारम्परिक वास्तु स्थापत्य से पूर्णतः भिन्न होगा। इससे गलियों के पारम्परिक बाजारों के स्वरूप पर भी प्रभाव पड़ेगा। प्लाजा, मॉल, सुपर मार्केट, मार्ट स्टोर जैसे बाजारों का विस्तार होगा। उनके वास्तु-स्थापत्य के कुछ स्वरूप अभी दीख रहे हैं। गाँवों में नरिया-थपुआ निर्माण बन्द होने, लकड़ी की महंगाई तथा मिट्टी की दीवार बनाने वाले मजदूरों की कमी से अभी से ईंट, सीमेन्ट लोहे से वास्तु निर्माण होने लग गए हैं। भीषण गर्मी तथा अत्यधिक शीत में खुले गाँवों में ऐसे वायु कष्टकर सिद्ध हो रहे हैं विशेष रूप से आयुवृद्ध लोगों के लिए लेकिन विवशता है। सीमेन्ट, ईंट, टाइल्स पेण्ट, मार्बेल संस्कृति ने हड्डी टूटने के रोगियों की संख्या में वृद्धि की है, अन्य अनेक नये रोग दमा, श्वांस, उद्वेग, मानसिक अशान्ति भी आधुनिक वास्तु स्थापत्य की देन हैं। वाराणसी कल आध्यात्मिक, धार्मिक, सांस्कृतिक नगर होकर कुछ ऐसा होना जैसा वाराणसी काशी या बनारस किसी काल खण्ड में नहीं रहा।