ये हैं- काशी की ‘साढ़े तीन हवेलियां’

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आज के इस दौर में गगनचुम्बी ईमारतें, बंग्लो और बड़े मकानों का जाल सा बिछा हुआ है। इतनी खासियत सुख सुविधाओं के बाद भी इन आलीशान भवनों को देखने की ललक वर्तमान में शायद ही किसी को हो। लेकिन एक ऐसा दौर भी था जब शानदार ईमारतें लोगों का ध्यान बरबस ही अपनी तरफ खींच लेती थीं। ऐसे भवनों की चर्चाएं दूर-दूर तक हुआ करती थीं। लोग उन भवनों को देखने आते थे। खास बनावट और भव्यता इन भवनों को अन्य इमारातों से विशिष्ट और बेहतरीन बनाती थी। धर्म, आध्यात्म का शहर काशी भी ऐसे भवनों की विरासत समेटे हुए है जो कभी इस नगरी की शान हुआ करते थे। ऐसे ही ऐतिहासिक भवनों की श्रृंखला में काशी की हवेलियों का खास स्थान रहा है। इस शहर को साढ़े तीन हवेलियों का शहर भी कहा जाता है। ये हवेलियां किसी जमाने में बनारस के शानों-शौकत की प्रतीक हुआ करती थी। इन हवेलियों की दीवारों के भीतर रहने वाले लोग महज इन्हें पत्थरों से बना आशियाना नहीं समझते थे बल्कि अपनी थाती मानते थे। लेकिन आज ये हवेलियां उदासी और उपेक्षा का दंश झेल रही हैं। रामापुरा क्षेत्र में स्थित देवकीनंदन खत्री की हवेली, चौखम्भा में काठ की हवेली, पंचगंगा घाट पर कंगन वाली हवेली और सिद्धेश्वरी क्षेत्र में स्थित कश्मीरीमल की हवेली आज भी ध्यान आकर्षित करती है।

हवेली- ऐसे भवन जिसमें हर वे सुविधाएं हो जिससे की उसके बाहर जाना न हो उसे हवेली का नाम दिया जाता था। यानी कई कमरों, आंगन, बरामदे के अलावा अस्तबल और तहखाने दीवानखाने के साथ हवादार झरोखे किसी हवेली में रहते हैं। इसी कारण सामान्य भवन से हवेलियां अलग होती हैं।

देवकीनंदन की हवेली- रामापुरा मोहल्ले में स्थित देवकीनंदन की हवेली अपने स्थापत्य और बड़े द्वार के लिए जानी जाती है। इसकी दीवारें अपने आप में बोलती हुई प्रतीत होती हैं। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले प्रयाग के आनापुर के जमींदार बाबू देवकीनंदन सिंह काशी आये। इस दौरान वे यहां के एक ब्राह्मण के घर पर रूके। अंग्रेजी सरकार ने इन्हें रामापुरा मोहल्ले का कार्यभार सौंपा। इसी दौरान इन्होंने इस मोहल्ले में हवेली बनवाया। बताते हैं कि उस दौरान इंग्लैंड से तीन लिफ्ट आये हुए थे। जिसमें से एक लिफ्ट काशी में भी लगाने की योजना थी। देवकीनंदन सिंह अपनी हवेली में उस लिफ्ट को लगवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने हवेली में बाकायदा लिफ्ट लगाने के लिए स्थान का भी निर्माण करवा दिया था। लेकिन किसी कारण वश लिफ्ट उनको मिल न सका। जिससे हवेली में लिफ्ट लगाने का उनका सपना पूरा न हो सका। इसका उन्हें इतना आघात पहुंचा कि हवेली बनने के बाद वे उसमें कभी नहीं रहे। करीब 10 बीघे क्षेत्र में पत्थर से निर्मित इस हवेली की खास बात यह है कि यह विशुद्ध रूप से भारतीय स्थापत्य कला से बनी हुई है। इसके निर्माण में विदेशी स्थापत्य शैली का कोई प्रभाव नहीं था। हवेली का मुख्य द्वार काफी बड़ा है जिस पर की गयी कलाकारी बेहद ही सुन्दर है। पांच मंजिला इस हवेली के भीतर कई बरामदे और आंगन हैं।

वहीं हर मंजिल पर चारों ओर हवादार रोशनीयुक्त कमरे हवेली को और भी बेहतरीन बनाते हैं। वर्तमान में यह हवेली उपेक्षा का शिकार हो गयी है। हवेली की बाहरी दीवारों पर उपली सुखाने का कार्य किया जाता है। इसके दीवारों पर पेड़ उग आये हैं। साथ ही हवेली के बाहरी कमरों पर अतिक्रमण हो गया है। काशी के कई दौर को देख चुकी यह हवेली वर्तमान में अपनी दशा पर आंसू बहा रही है। पुरातन इतिहास को अपनी चौहद्दी में बांधे हुए यह हवेली अपने पुनरूद्धार की बाट जोह रही है। अगर जल्द ही इसके संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में शायद काशीवासी एक अमूल्य धरोहरों को खो देंगे।

कंगन वाली हवेली- पंचगंगा घाट के बगल में स्थित कंगन वाली हवेली अपनी समृद्ध पुरातन कला का दर्शन कराती है। गंगा जी के किनारे निर्मित इस पांच मंजिला हवेली की बनावट को देखकर अदभुत लगता है। उस दौर में जबकि संसाधन की बेहद कमी थी बावजूद इसके गंगा किनारे इतना बड़ा पत्थर से किया गया निर्माण दंग कर देता है। आज से करीब पांच सौ वर्ष पहले राजा मान सिंह ने इस भव्य हवेली का निर्माण करवाया था। पत्थर से निर्मित इस हवेली की खासियत यह है कि इसमें चार बड़े-बड़े आंगन हैं और आंगनों से सटे 20 बड़े बरामदे हैं। इन्हीं बरामदों से सटे कमरे हैं। हवेली में कुल 48 कमरे हैं। हालांकि कमरे बहुत बड़े तो नहीं लेकिन उनकी बनावट ऐसी है कि रोशनी और हवा की कोई कमी नहीं रहती है। हवेली के मुख्य द्वार से भीतर घुसते ही बड़े से आंगन में बांयी ओर राम जानकी का मंदिर है। इस हवेली की खासियत यह है कि मुख्य द्वार की ओर से देखने पर यह एक मंजिला दिखाई देती है लेकिन घाट से यह पांच मंजिला है। साथ ही हर मंजिल पर गंगा की ओर बने कमरों में लगे रोशनदान से सुरम्य मां गंगा की बहती अविरल धारा का दर्शन रोमांचित कर देता है। हवेली को राजा मान सिंह ने उस समय रामगोपाल गोस्वामी को दान कर दिया था। वर्तमान में उन्हीं के वंशज हवेली में रहते हैं। इस हवेली की भी दशा देवकीनंदन की हवेली से बहुत अलग नहीं है।काठ वाली हवेली- चौखम्भा सब्जी मंडी के पास स्थित काठ की हवेली स्थापत्य की दृष्टि से अन्य हवेलियों और भवनों से अलग है। इस हवेली का निर्माण ग्वालियर के पूर्व महाराजा ने लकड़ी से कराया था। मुख्य द्वार से लेकर हवेली के भीतर की दीवारों को लकड़ी के सहारे बनाया गया है। बताया जाता है कि इस हवेली को बनाने में काफी समय लगा था क्योंकि पक्के महाल की सकरी गलियों में इतने बड़े-बड़े लकड़ी लाने में काफी समय लग जाता था। पांच मंजिला यह काठ की हवेली आलीशान लगती है।

मुख्य द्वार होते हुए सीढ़ियां चढ़ने पर इस हवेली की भव्यता का अंदाजा लगया जा सकता है। बड़ा सा आंगन और उसके चारो ओर बने बरामदे हमारी समृद्ध परम्परा और जीवनशैली का आभास कराते हैं।

कश्मीरीमल की हवेली– सिद्धेश्वरी मोहल्ले में स्थित कश्मीरीमल की हवेली इस हवेली का निर्माण 1774 ई0 के आस-पास किया गया है। यह हवेली दो हिस्सों में बंटी हुई है। हवेली में निर्मित दीवानखाना, बरामदे, कमरे, तहखाने खासे आकर्षित करते हैं। यह हवेली भी आज हमारी विरासत है जिसे संजोने की जरूरत है।

कहा जाता है कि खण्डहर इमारत की बुलंदी का एहसास कराती हैं। लेकिन बनारस की इन नायाब इमारतों को खण्डहर होने से बचाना होगा, अन्यथा सिर्फ खण्डहर ही ऐसी इमारतों की भव्यता बयां कर पायेंगी।

-आनन्द पाण्डेय

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