कर्दमेश्वर महादेव मंदिर वाराणसी

कर्दमेश्वर महादेव मंदिरकर्दमेश्वर महादेव मंदिर अर्द्धचन्द्राकार रूप में प्रवाहित उत्तरवाहिनी माँ गंगा के किनारे स्थित विद्या और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी अपनी धार्मिक और पौराणिक स्थानांे की विशाल संख्या और उनमें व्याप्त विविधता के लिए विश्वविख्यात है। काशी की महिमा का उल्लेख अनेक पुराणों मंे मिलता है जिसमंे स्कन्द पुराण का काशी खण्ड (12वीं से 13वीं सदी) में है। सामान्य जनजीवन हो या आस्था का केन्द्र स्थल मंदिर सभी स्वयं मंे एक विस्तृत प्रभाव समेटे हुए है। काशी के धार्मिक परम्पराओं में यात्रा तथा यात्रा के दौरान काशी के खण्ड में स्थित देवालयों में दर्शन-पूजन का विशेष महत्व है। इसी क्रम में काशी की पंचक्रोशी यात्रा है। पंचक्रोशी यात्रा में पहले विश्राम के रूप में प्रसिद्ध है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से करीब 5 किलोमीटर की दूूरी पर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में यह मंदिर स्थित है। एक बड़े चतुर्भुजा तालाब के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर उड़ीसा के विकसित मंदिरों से प्रेरित है। साथ ही मूर्तिकला की सम्पन्नता लिए यह चंदेल इतिहास का प्रतीक है। संभवतः उत्तर भारत स्थापत्य कला के विस्तृत इतिहास की यह आखीरी कड़ी है। एक अभिलेख के अनुसार तालाब के घाटों का निर्माण रानी भवानी (1720-1810) द्वारा 1751 या 1757 में कराया गया है।

इतिहास व कालक्रम कर्दमेश्वर मंदिर का उल्लेख पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश के तौर पर है। यहीं पर पंचक्रोशी यात्री अपना पहला पड़ाव या विश्राम करते है। स्कन्द पुराण का काशीखण्ड स्पष्ट रूप कर्दमेश्वर का उल्लेख नहीं करता बल्कि एक कथा कर्दमेश्वर से अवश्य जुड़ी है। इस कथा के अनुसार एक बार जब प्रजापति कर्दम शिव पूजा मंे ध्यानमग्न थे। उनका पुत्र कुछ मित्रों के साथ तालाब में नहाने गया स्नान के दौरान उसे एक घड़ियाल ने खिंच लिया डरे हुए मित्रों ने यह बात कर्दम को बतायी कर्दम बिना बाधित हुए ध्यानमग्न रहे परन्तु ध्यानावस्था में ही वह पूरे विश्व के घटनाक्रम  को देख सकते थे। उन्होंने देखा कि उनका पुत्र एक जल देवी द्वारा बचाकर समुद्र को सौंप दिया गया है। जिसे समुद्र में गहनों से सजाकर शिव के गण को सौप दिया शिवगण ने शिव आज्ञा से बालक को उसके घर पहुंचाया। ध्यानावस्था से उठने पर कर्दम ने अपने पुत्र को सम्मुख पाया कर्दम का यहीं पुत्र कर्दमी के नाम से जाने गये तथा पिता की आज्ञा से वाराणसी चले आये।

कर्दमी ने एक शिवलिंग स्थापित कर पांच हजार वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप किया। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें वरूणा के पश्चिमी क्षेत्र के धन, माणिक्य, समुद्र, नदी, तालाब, वापी जल के प्रत्येक स्रोत का स्वामी घोषित किया एक अन्य वरदान ने शिव ने कहा कि मणिकर्णेश के दक्षिण-पश्चिम स्थित जो लिंग है वह वरूणेश के नाम से जाना जायेगा दिये गये वर्णन का सही स्थान पता लगाने पर इस बात पर सहमति बनती है कि बताया गया मंदिर वरूणेश मंदिर है कि कर्दमेश्वर मंदिर है काशीखण्ड तथा तीर्थ विवेचन खण्ड यह दर्शाते है कि वरूणेश लिंग गहड़वाल काल का है। जिसका सम्बन्ध कर्दम से है। जो बाद में कर्दमेश्वर नाम से जाना गया। वर्तमान कर्दमेश्वर मंदिर के निर्माण के सही समय का निर्णय कर पाना वस्तुतः जटिल है। हैवेल के अनुसार यह मुस्लिम आक्रमण के पहले का बना हुआ है। प्रो0 अग्रवाल के अनुसार यह गहड़वाल वंश का एकमात्र अवशेष है। वर्तमान मंदिर की दीवारों को देखकर यह प्रतीत होता है कि यह मंदिर 12वीं सदाब्दी के बाद बना है। मंदिर के शेषभाग अपने स्थापत्य विशेषता में मध्यकालीन स्थापत्य को दर्शाता है। इस प्रकार यह भी हो सकता है कि सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी के बाद किसी पुराने मंदिर के ध्वंसावेशेष पर बना हो इस प्रकार का काशीखण्ड कथा में वर्णित पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश्वर तथा वरूणेश्वर की व्याख्या हो सकती है कि इसी समय दोनों शिवलिंग अस्तित्व में रहे हो और समय के साथ कर्दमेश्वर महत्वपूर्ण होता गया और वरूणेश्वर अज्ञात रह गया। वास्तु योजना    कर्दमेश्वर मंदिर पंचरत प्रकार का मंदिर है इस तल छंद योजना में एक चैकोर गृर्भगृह अन्तराल तथा एक चतुर्भुजाकार अर्द्धमण्डप है। मंदिर का निचला भाग अधिष्ठान, मध्यभित्ति क्षेत्र माण्डोवर भाग है जिस पर अलंकृत तांखे बने हुए है।

उपरी भाग में नक्काशीदार कंगूरा वरांदिका व आमलक सहित सजावटी शिखर है। मंदिर का पुर्वाभिमुख मुख्य द्वार तीन फीट पांच इंच चैड़ा तथा छः फीट ऊँचा है। मंदिर का गर्भगृह जिसका बाहरी माप 12ग्12 फीट तथा भीतरी माप आठ फीट आठ इंच चैड़ा तथा आठ फीट लम्बा है। इसी गर्भृगृह के मध्य ही कर्दमेश्वर शिवलिंग अवस्थित है। गर्भगृह के ही उत्तर-पश्चिमी कोने में छः फीट की ऊचाई पर एक जल स्रोत है। जिससे शिवलिंग पर लगातार जलधारा गिरती रहती है। वास्तुशिल्प और मूर्तिशिल्प के आधार पर यह मंदिर बहुत ही रोचक है। मंदिर के विखण्डित कुर्सी या खम्भों की स्थिति को देखकर यह प्रतीत होता है कि मंदिर का अर्द्धमण्डप एक बेहतर निर्माण रहा होगा शिखर में भी आधुनिक तरह का छत तथा लकड़ियांे के आधार पर सादे पत्थरों द्वारा तैयार शिखर भी इस तथ्य को और स्पष्ट करते है। आधार की अपेक्षा खम्भे काफी हद तक सादे है। पत्तीयों या अर्द्ध हिरा का नक्काशी सजावट काफी खम्भों पर पन्द्रहीं शताब्दी में पाये जाते थे। कर्दमेश्वर मंदिर के अर्द्धमण्डप के दो स्तम्भों पर अभिलेख है। जो 14वीं-15वीं शताब्दी से है। जिनसे पुष्ट होता है कि अर्द्धमण्डप के निर्माण पुरानी सामग्री को पुनः प्रयोग में लाया गया है। कर्दमेश्वर मंदिर पर बनी मुर्तियां गढ़न के दृष्टिकोण से सामान्य प्रकृति की है। परन्तु कुछ आकृतियां जैसे दक्षिण भित्ती पर बनी उमा महेश्वर की मूर्ति खजुराहों की मंदिरांे पर बनी आकृतियांे की तरह है। लेकिन उनमें आकर्षण और मोहित करने वाली सुन्दरता का भाव है। इसी प्रकार उत्तरी तरफ निर्मित रेवती और ब्रम्हा की मूर्ति के केश सज्जा से स्पष्ट रूप से गुप्तकालीन मूर्ति कला का प्रभाव दिखता है।

मंदिर पर बनी आकृतियां पुष्ट और मृदु साथ ही चेहरे पर प्रभावकारी मुस्कान है। जबकि नाग और शेर का चित्र अपरिपक्कव व भावहीन है। इसी प्रकार विस्तार की दृष्टिकोण से ही मूर्तियों में शैलीगत विभिन्नताएं है। जैसे कुछ चित्रों में तीन पायल पहने हुए दिखाया गया है जो कि पूर्व मध्यकालीन विशेषता नहीं है। इस प्रकार की आकृतियां दुलादेव मंदिर (1150 ई0) खजुराहों में तथ उदयेश्वर मंदिर उदयपुर में देखने को मिलती है। इसी प्रकार सिरे पर उभरा हुआ त्रिकोणी मुक्का पट्ट तथा दो फंदो वाला कमरबंद भी सामान्य रूप से दुलादेव मंदिर में देखने को मिलता है। कुछ चित्रों में गोल पत्तीनुमा या लम्बवत आंख की संरचना वाली बिन्दी लगाये चित्र भी है। वामन तथा विष्णु की मूर्तियों में बने आभूषणों में घुँघरू की उपस्थिति भी बहुत बाद की मूर्ति शिल्प विशेषता है। ऐसे ही पश्चिमी भाग पर खड़ी मुद्रा में विष्णु की मूर्ति के माथे पर यु आकार की चिन्ह है जो वर्तमान समय में भी प्रचलित है। निःसंदेह कर्दमेश्वर मंदिर पर उतीर्ण मूर्तियां तेजस्वी व निश्चित क्रियाओं के साथ उनमें आकर्षण व जीवंतता का अभाव है। उनके चेहरे पर मुस्कान बाहर से थोपी गयी प्रतीत होती है। भले ही इन चित्रों खजुराहों के मंदिरों पर उत्कीर्ण चित्रों जैसा लालित्य मिश्रित तथा जीवंत भाव न हो परंतु मंदिर की भित्तियों पर उनकी स्थिति तथा मूर्ति विधवन्स के विवरण यह प्रमाणित करते हैं कि कुछ मूर्तियां बेहतर स्थिति में रही होंगी।     वर्तमान में मंदिर के सम्पुर्ण देख-रेख का कार्य उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।

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