ये है बनारस का सबसे पुराना मंदिर; जानिये पूरा तथ्य

अर्द्धचन्द्राकार रूप में प्रवाहित उत्तरवाहिनी माँ गंगा के किनारे स्थित विद्या और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी अपनी धार्मिक और पौराणिक स्थानों की विशाल संख्या और उनमें व्याप्त विविधता के लिए विश्वविख्यात है। काशी की महिमा का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है; जिसमें स्कन्द पुराण का काशी खण्ड प्रमुख है। सामान्य जनजीवन हो या आस्था का केन्द्र स्थल मंदिर, सभी स्वयं में एक विस्तृत प्रभाव समेटे हुए हैं। काशी की धार्मिक परम्पराओsं में यात्रा तथा यात्रा के दौरान काशी खण्ड में स्थित देवालयों में दर्शन-पूजन का विशेष महत्व है। इसी क्रम में पंचक्रोशी यात्रा में पहले विश्राम के रूप में प्रसिद्ध है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में यह मंदिर स्थित है। एक बड़े चतुर्भुजाकार तालाब के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर उड़ीसा के विकसित मंदिरों सा प्रतीत होता है। साथ ही मूर्तिकला की सम्पन्नता लिए यह चंदेल इतिहास का प्रतीक है। एक अभिलेख के अनुसार तालाब के घाटों का निर्माण रानी भवानी (1720-1810) द्वारा 1751 या 1757 में कराया गया है।

इतिहास व कालक्रम

वर्तमान कर्दमेश्वर मंदिर के निर्माण के सही समय का निर्णय कर पाना वस्तुतः जटिल है। ‘हैवेल’ के अनुसार यह मुस्लिम आक्रमण के पहले का बना हुआ है। ‘प्रो0 अग्रवाल’ के अनुसार यह गहड़वाल काल का एकमात्र अवशेष है। वर्तमान मंदिर की दीवारों को देखकर यह प्रतीत होता है कि यह मंदिर 12वीं शताब्दी के बाद बना है। मंदिर के शेषभाग अपने स्थापत्य विशेषता में मध्यकालीन स्थापत्य को दर्शाता है। इस प्रकार यह भी हो सकता है कि सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी के बाद किसी पुराने मंदिर के ध्वंसावशेष पर बना हो। नयी जानकारी के अनुसार यह बंगाल के लक्ष्मण सेन द्वारा बनाया गया था जो उनके पुत्रों के शिलालेख से पता चलता है; जिसमें यह भी कहा गया है कि इस तरह एक मन्दिर प्रयाग क्षेत्र में भी बनाया गया था जो वर्तमान में मिर्जापुर जिले के लरवक गांव में अर्द्ध समाप्त हालत में पाया गया है। धार्मिक मान्यतानुसार लरवक गांव प्रयाग क्षेत्र के अन्दर आता है। वस्तुतः यह मंदिर बंगाल के (गंगा सागर) सांख्य दर्शन के महर्षि कपिल के पुत्र कर्दम का साधना स्थल होने के कारण स्वतः स्वर्ग है। इस प्रकार का काशीखण्ड कथा में वर्णित पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश्वर तथा वरूणेश्वर की व्याख्या हो सकती है कि इसी समय दोनों शिवलिंग अस्तित्व में रहे हों और समय के साथ कर्दमेश्वर महत्वपूर्ण होता गया और वरूणेश्वर अज्ञात रह गया।

वास्तु योजना  

कर्दमेश्वर मंदिर पंचरथ प्रकार का मंदिर है इसकी तल छंद योजना में एक चौकोर गृर्भगृह अन्तराल तथा एक चतुर्भुजाकार अर्द्धमण्डप है। मंदिर का निचला भाग अधिष्ठान, मध्यभित्ति क्षेत्र माण्डोवर भाग है, जिस पर अलंकृत ताखे बने हुए है। ऊपरी भाग में नक्काशीदार कंगूरा वरांदिका व आमलक सहित सजावटी शिखर है। मंदिर का पूर्वाभिमुख मुख्य द्वार तीन फीट पांच इंच चौड़ा तथा छः फीट ऊँचा है। मंदिर का गर्भगृह जिसका बाहरी माप 12×12 फीट तथा भीतरी माप  8 फीट 8 इंच चौड़ा तथा 8 फीट लम्बा है। इसी गर्भृगृह के मध्य ही कर्दमेश्वर शिवलिंग अवस्थित है। गर्भगृह के ही उत्तर-पश्चिमी कोने में छः फीट की ऊँचाई पर एक जल स्रोत है, जिससे शिवलिंग पर लगातार जलधारा गिरती रहती है।

वास्तुशिल्प और मूर्तिशिल्प के आधार पर यह मंदिर बहुत ही रोचक है। मंदिर के विखण्डित कुर्सी या खम्भों की स्थिति को देखकर यह प्रतीत होता है कि मंदिर का अर्द्धमण्डप एक बेहतर निर्माण रहा होगा। शिखर में भी आधुनिक तरह का छत तथा लकड़ियों के आधार पर सादे पत्थरों द्वारा तैयार शिखर भी इस तथ्य को और स्पष्ट करते हैं। आधार की अपेक्षा खम्भे काफी हद तक सादे हैं। पत्तियों या अर्द्ध हीराकार नक्काशी सजावट खम्भों पर पन्द्रहवीं शताब्दी में पाये जाते थे। कर्दमेश्वर मंदिर के अर्द्धमण्डप के दो स्तम्भों पर अभिलेख है जो 14वीं-15वीं शताब्दी से सम्बन्धित है। इससे पुष्ट होता है कि अर्द्धमण्डप के निर्माण में पुरानी सामग्री को पुनः प्रयोग में लाया गया है। कर्दमेश्वर मंदिर पर बनी मूर्तियां शिल्प के दृष्टिकोण से सामान्य प्रकृति की हैं परन्तु कुछ आकृतियां जैसे दक्षिण भित्ति पर बनी उमा महेश्वर की मूर्ति खजुराहों की मंदिरों पर बनी आकृतियों की तरह है। लेकिन उनमें आकर्षण और मोहित करने वाली सुन्दरता का अभाव है। इसी प्रकार उत्तरी तरफ निर्मित रेवती और ब्रह्मा की मूर्ति के केश सज्जा से स्पष्ट रूप से गुप्तकालीन मूर्ति कला का प्रभाव दिखता है। मंदिर पर बनी आकृतियां पुष्ट और मृदु हैं साथ ही चेहरे पर प्रभावकारी मुस्कान है। जबकि नाग और शेर का चित्र अपरिपक्व व भावहीन है। कुछ चित्रों में गोल पत्तीनुमा या लम्बवत आंख की संरचना वाली बिन्दी लगाये चित्र भी हैं। वामन तथा विष्णु की मूर्तियों में बने आभूषणों में घुँघरू की उपस्थिति भी बहुत बाद की मूर्ति शिल्प विशेषता है। ऐसे ही पश्चिमी भाग पर खड़ी मुद्रा में विष्णु की मूर्ति के माथे पर यू आकार का चि है जो वर्तमान समय में भी प्रचलित है। निःसंदेह कर्दमेश्वर मंदिर पर उत्कीर्ण मूर्तियां तेजस्वी हैं परन्तु उनमें आकर्षण व जीवंतता का अभाव है। उनके चेहरे पर मुस्कान बाहर से थोपी गयी प्रतीत होती है। भले ही इन चित्रों पर खजुराहो के मंदिरों पर उत्कीर्ण चित्रों जैसा लालित्य मिश्रित तथा जीवंत भाव न हो परंतु मंदिर की भित्तियों पर उनकी स्थिति तथा मूर्ति विध्वन्स के विवरण यह प्रमाणित करते हैं कि कुछ मूर्तियां बेहतर स्थिति में रही होंगी।

वर्तमान में मंदिर के सम्पूर्ण देख-रेख का जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग का है। पुरातत्व विभाग द्वारा मन्दिर पर किये गये कृत्रिम रंगों के प्रयोग से पत्थरों को हुए नुकसान के मद्देनजर सफाई एवं संरक्षण का कार्य किया जा रहा है।

संदर्भ- कर्दमेश्वर मन्दिर : उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ