चलाना होगा मूल्य शिक्षा का अभियान – कमलाकर मिश्र

आज समाज में चारो तरफ विसंगतियों के चित्रा ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। ध्यान से देखें तो सबकी जड़ों में मूल्यों का अभाव जान पड़ता है। समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में विसंगतियों और असंतुलन के कारणों की पड़ताल करने से यह तथ्य स्पष्ट हो चुका है कि पूरे समाज को खासकर शिक्षा ग्रहण कर रहे बालकों तथा नई पीढ़ी को उनके पारिवारिक, शैक्षिक व सामाजिक परिवेश में आदर्श, आचरण व मूल्यों का जब तक समावेश नहीं किया जा सकेगा तब तक सुन्दर और संतुलित आदर्श समाज की संकल्पना पूरी नहीं हो सकती।  ऐसे ही विमर्श को लेकर काशी हिन्दू विश्वद्यिलाय के पूर्व प्राध्यापक व मूल्य शिक्षा के मर्मज्ञ विद्वान प्रो0 कमलाकर मिश्र से हुई बातचीत के प्रमुख अंश ।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में आप किस प्रकार की रिक्तता महसूस करते हैं?

आज भारतवर्ष मूल्य संकट से गुजर रहा है। स्वतंत्रता के समय भारतवासी मूल्य चेतना से प्रेरित हो अपने लक्ष्य के लिए दृढ़ संकल्पित थे। वहीं स्वतंत्रता के उपरान्त लगातार स्वार्थ की वजह से मूल्यों का क्षरण हुआ है। सबसे चिंताजनक जो बात है वह यह कि आज भी हमारे शिक्षा व्यवस्था में मूल्य शिक्षा की कोई समग्र योजना नहीं है। शिक्षा के विविध आयामों का भले ही विकास और प्रसार हो रहा हो, लेकिन समाज के संतुलित संचालन के लिए आवश्यक मूल्य शिक्षा की योजना वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के अध्याय से गायब सी जान पड़ती है। विषयगत ज्ञान के अतिरिक्त जिस प्रकार के विवेक की आवश्यकता मनुष्य को समाज जीवन में आवश्यक है वह मूल्य- विवेक ही है।

मूल्य शिक्षा को कैसे समझा जा सकता है?

मूल्य शिक्षा की बात अन्य शिक्षा से अलग है। मूल्य शिक्षा का मतलब शाब्दिक ज्ञान का अर्जन मात्र नहीं है। अगर हम मोटे शब्दों में कहें तो इसे चरित्र शिक्षा या नैतिक शिक्षा भी कह सकते हैं। आर्ष विद्या की परम्परा में इसे हम धर्म शिक्षा के रूप में जानते थे। धर्म का मतलब रिलीजन नहीं। धर्म का अर्थ नैतिक, आध्यात्मिक तथा चारित्रिक अर्थों में लिया जाना चाहिए। आजकल हम सामान्य बोलचाल में वैल्यू को मूल्य कहते हैं। लेकिन उसका असली अर्थ मूल्य नहीं बल्कि पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ मतलब पुरुष + अर्थ। अर्थ का मतलब प्राप्तव्य; जो वस्तु हम पाना चाहते हैं उसे अर्थ कहते हैं। इसलिए भी हमारे जीवन में धर्म सबसे बड़ा मूल्य है। ‘वैल्यू’ का अर्थ अंग्रेजी में क्पेपतमक (वांछित) है इस तरह से पुरुष के अर्थ में उस वस्तु को केवल वांछित ही नहीं बल्कि वांछनीय भी होना चाहिए और जो वांछनीय हो वह निश्चित ही समाज व नैतिकता के सापेक्ष होना चाहिए। प्राचीन वांग्यमय में बहुत ही व्यावहारिक ढंग से इन सबके लिए मानदंड तय किये गये थे-

     “परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्”

          अथवा “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत” इस तरह वांछनीय को हम धर्म के माध्यम से जानते हैं और धर्म को व्यावहारिक तरीके से समझने की कोशिश करते हैं।

इसे विद्यार्थियों में कैसे सम्प्रेषित करेंगे?

इस तरह से ‘वैल्यू एजुकेशन’ का कोई व्यवस्थित पाठ्यक्रम नहीं है। समाज में शुरू से ही सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियां काम करती रहीं हैं। समाज, सत्ता और व्यवस्था के समुचित संचालन के लिए शुरू से ही कठोर दंड की व्यवस्था रही है। व्यवस्था के संचालन के लिए हर बार कठोर दंड की व्यवस्था ही हितकर नहीं होती, लेकिन संतुलित समाज संचालन में कई आयाम ऐसे हैं जहां कठोर दण्ड व्यवस्था के लिए अति आवश्यक है। एक पुरानी कहावत है कि- “राजा सोता है लेकिन उसका दण्ड जागता है”। हाँ! लेकिन यह दण्ड व्यवस्था शिक्षक का काम नहीं है यह काम सरकार और व्यवस्था का है। किसी भी समाज का समग्र विकास तभी हो सकता है जब उसमें मूल्य समाहित हो। आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में और क्रियान्वयन में भी मूल्य को समाहित करना एक बड़ी चुनौती का प्रश्न है और निश्चित ही यह काम पूरी तरह से शिक्षक का ही है।

मूल्य शिक्षा के क्षेत्र में आपकी तरफ से क्या प्रयास किये गये ?

यह सब बातें जब ध्यान में आयीं तो हमें और हमारी तरह सोचने वाले मित्र समूह को लगा कि इसके लिए एक व्यावहारिक प्रयास शुरू करना चाहिए ताकि महामना के इस पवित्र परिसर में मूल्य शिक्षा के अलख द्वारा एक बड़े समुदाय को अभिप्रेरित किया जा सके। हम लोगों ने पहले एक मीटिंग की कि विद्यार्थियों के लिए कौन-कौन से टंसनम आवश्यक हैं तथा इस मूल्य शिक्षा का तरीका क्या हो, प्रणाली क्या हो? ताकि यह सब केवल उपदेशात्मक बनकर न रह जाय।

मूल्य शिक्षा का मतलब शाब्दिक ज्ञान का अर्जन मात्रा नहीं है। अगर हम मोटे शब्दों में कहें तो इसे चरित्रा शिक्षा या नैतिक शिक्षा भी कह सकते हैं। आर्ष विद्या की परम्परा में इसे हर्म धर्म शिक्षा के रूप में जानते थे। धर्म का मतलब रिलीजन नहीं धर्म का अर्थ नैतिक, आध्यात्मिक तथा चारित्राक अर्थों में लिया जाना चाहिए। आजकल हम सामान्य बोलचाल में ’वैल्यू‘ को मूल्य कहते हैं। लेकिन उसका असली अर्थ मूल्य नहीं बल्कि पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ मतलब पुरुष + अर्थ। अर्थ का मतलब प्राप्तव्य; जो वस्तु हम पाना चाहते हैं उसे अर्थ कहते हैं। इसलिए भी हमारे जीवन में धर्म सबसे बड़ा मूल्य है।

इसके लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हम लोग लगभग 2 दर्जन साथी एकजुट होकर विचार-विमर्श की प्रक्रिया में आगे बढ़े; जिसमें प्रमुख रूप से प्रो0 अजीत नारायण त्रिपाठी, प्रो0 चन्द्रकला पाड़िया, प्रो0 अवधेश प्रधान, प्रो0 लखोटिया समेत हम सभी शामिल थे। हमारे साथी प्रो0 अजीत नारायण त्रिपाठी जी ने तो वैल्यू एजूकेशन के लिए बकायदा वालेन्ट्री रिटायरमेंट ले ली। कई बैठकों और विचार के उपरान्त हमने यह बात गहराई से महसूस किया कि मूल्य शिक्षा का कार्य केवल उपदेश मात्र से नहीं चलने वाला है इसके लिए वह प्रणाली विकसित करनी पड़ेगी जिसमें आदर्श आचरण का समग्र व्यावहारिक प्रतिबिंब परिलक्षित हो। इसकी शुरूआत हमने आपसी बातचीत एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से की। विद्यार्थी, श्रोता और वक्ता सभी मिलकर सहभागिता के साथ दो घण्टे का प्रश्नोत्तर एवं विचार-विमर्श किया करते थे, जिनसे धीरे-धीरे तमाम महत्वपूर्ण बातें खुद आयोजकों के समझ में भी आने लगी। इस दो घण्टे में एक घण्टा समझाने का और एक घण्टा प्रश्नोत्तर व सहचिंतन के लिए था। स्थान का चयन मूल्य निष्ठा को समर्पित महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय जी की साधना स्थली-‘मालवीय भवन’ से की गयी। छात्रों व आगन्तुकों को मूल्य शिक्षा व मूल्य विमर्श केवल कोरा आदर्श का पाठ न प्रतीत हो इसके लिए संवाद की प्रस्तुति तथा मूल्य शिक्षा पर विमर्श के अलग-अलग तरीके विकसित किये गये ताकि इसका लाभ व्यापक स्तर पर समाज को मिल सके। यह अभियान निजी प्रयास से शुरू किये गये थे। इसलिए इस प्रकार के अभियान को कोई प्रशासकीय मदद तब तक नहीं मिली थी। अपने समूह में तथा समूह के प्रयास से जुटाये गये चंदे के माध्यम से यह कार्यक्रम लगभग 10-12 वर्षों तक चलता रहा। बाद में विश्वविद्यालय की तरफ से इस अभियान को आंशिक मदद मिलनी शुरू हुई इसके उपरान्त 2011-12 में विश्वविद्यालय के पहल से मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के स्थापना की गई जो पूरी तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रति उत्तरदायी संस्था के रूप में काम कर रही है।

वर्तमान मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र, इसकी गतिविधियों तथा अधिकारियों के बारे में आपकी क्या राय है?

(हँसते हुए) आप सभी इसके बारे में स्वयं विस्तार से जानते हैं। मेरी तरफ से कोई टिप्पणी न की जाय; यह अच्छा होगा।

वर्तमान में अपनी गतिविधियों के बारे में बतायें?

वर्तमान में हमलोगों ने मिलकर काशी इंस्ट्टियूट ऑफ योग एण्ड वैल्यू एजुकेशन नाम से एक संस्था बनायी है जिसके माध्यम से मूल्य एवं योग की शिक्षा के प्रति सकारात्मक कार्य किये जा रहे हैं। इसकी तरफ से हम लोगें ने महोबा में मूल्य शिक्षा पर आधारित एक विद्यालय की शुरूआत भी की है जहां पर पाठ्यक्रम के रूप में मूल्य शिक्षा शामिल हैं। मैंने वाराणसी स्थित अपने मकान का निचला हिस्सा इस अभियान के लिए समर्पित कर दिया है।

छात्र जीवन के दौरान विश्वविद्यालय से जुड़ी स्मृतियों को साझा करें।

सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल के पीछे मेरा एक साथी रहता था। तब हम लोग सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल में बारहवीं के छात्र थे। एक दिन की बात है, मैं अपने दोस्त के कमरे की तरफ जा रहा था। तभी देखता हूं कि एक अम्बेस्डर कार गेट की तरफ से होते हुए उस जगह तक जाकर खड़ी हुई जहां मेरा साथी एक कमरे में रहता था। कार खड़ी होती है; कार से तत्कालीन कुलपति आचार्य नरेन्द्र देव जी उतरते हैं और पड़ोसी से पूछ कर सीधे उस छात्र के कमरे पर पहुंचते हैं। मैं कुलपति आचार्य नरेन्द्र देव जी को देखकर थोड़ा सा अचकचा कर कार के पीछे ही खड़ा रहता हूँ। देखता हूँ कि आचार्य जी मेरे साथी को लिफाफे में कुछ पकड़ाते हैं, उसका कुशल क्षेम पूछकर उसे आशीर्वाद एवं प्रोत्साहन देते हुए पुनः अपनी कार में वापस बैठते हैं और लौट जाते हैं। अब मैं अपने मित्र के पास जाता हूँ और उससे पूछता हूँ कि “ये तो कुलपति आचार्य नरेन्द्र देव जी थे, ये तुम्हारे कमरे पर क्यों आये थे और इन्होंने लिफाफे में क्या दिया?” मेरा मित्र बताता है कि उसने कुलपति कार्यालय में एक अर्जी भेजी थी कि “प्रार्थी बहुत गरीब है, प्रार्थी के पिता जी की  मृत्यु हो चुकी है एवं उसकी माता किसी प्रकार से मजदूरी करके उसको शिक्षा दिला रही हैं। आगे प्रार्थी पढ़ाई करने में असमर्थ है। इसलिए महानुभाव से मदद की अपेक्षा रखता हूँ”। उसने आगे बताया कि उसके प्रार्थना पत्र को पढ़कर कुलपति जी स्वयं कमरे तक आये और उसे सहायता के रूप में धनराशि प्रदान किये।

ऐसे थे आचार्य नरेन्द्र देव, गरीब विद्यार्थियों को अक्सर वो अपने पास से मदद दिया करते थे। कुलपति के रूप में छात्रों के प्रति पूर्ण सदाशयता एवं छात्र हितों का सम्पोषण आचार्य नरेन्द्र देव के स्वभाव में गहराई से जुड़ा हुआ था। ऊपर की घटना एक छोटा सा नमूना मात्र है कि किस तरह आचार्य नरेन्द्र देव विश्वविद्यालय के छात्रों तथा अध्ययन-अध्यापन के प्रति सजगता एवं संजीदगी रखते थे।

आचार्य नरेन्द्र देव जी से जुड़ी एकाध अन्य स्मृतियाँ हों तो इसे जरूर बतायें।

कुर्ता-धोती पहनने वाले बहुत दुबले-पतले से दिखने वाले से खाटी ईमानदार व्यक्तित्व के स्वामी का नाम नरेन्द्र देव था। तमाम बार हम लोगों ने अपने छात्र जीवन के दौरान उनके भाषण सुने; हर बार लगता था कि वह दिल की गहराईयों से बोल रहे हैं। एक समाजवादी चिंतक के रूप में समाज की विषय परिस्थितियों को लेकर आचार्य नरेन्द्र देव के मन में गहरी पीड़ा थी। लखनऊ विश्वविद्यालय में कुलपति का कार्यकाल पूरा करने के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति बनकर आये। आचार्य नरेन्द्र देव के स्वागत में कैण्ट स्टेशन से लेकर बी0एच0यू0 गेट तक कई तोरण द्वार बनाये गये थे। आचार्य नरेन्द्र देव जी को सुनते हुए हमेशा ऐसा लगा कि वो समाज में वास्तविक समता चाहते थे। समाज की जाति व्यवस्था तथा जाति में भी उपजाति जैसे हास्यस्पद बातों से वो बहुत दुःखी रहा करते थे। विषमता की इन व्यवस्थाओं को बदलने की चाहत उनके भाषणों में हर बार झलकती थी और समाजवादी दर्शन का मुख्य लक्ष्य- ‘आर्थिक समता’ पर भी उनका गहरा चिंतन-मनन था। समाज में सच्ची समता की स्थापना की पीड़ा तथा समाजवादी विचार को सत्ता व्यवस्था के जरिये लागू करने व हस्तक्षेप की प्रेरणा से नरेन्द्र देव फैजाबाद से चुनाव भी लड़े; लेकिन शायद लोग इस सच्चे सपूत के मंतव्य को समझ नहीं पाये। फलतः ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ एवं परिवर्तन का संवाहक समाजवादी योद्धा चुनाव के इस मैदान में हार गया।

मेरे गुरू प्रो0 टी0आर0वी0 मूर्ति से आचार्य नरेन्द्र देव की गहरी दोस्ती थी। प्रो0 टी0आर0वी0 मूर्ति का0हि0वि0वि0 के दर्शन विभाग के प्राध्यापक तथा प्रख्यात दार्शनिक थे। टी0आर0वी0 मूर्ति और आचार्य नरेन्द्र देव प्रतिदिन सबेरे साथ में टहलने जाते थे गुरू जी अक्सर आचार्य नरेन्द्र देव जी की दार्शनिक समझ एवं चिंतन की तारीफ हम विद्यार्थियों से किया करते थे। उन्होंने बताया कि आचार्य बहुत ज्यादा ईश्वरवादी नहीं थे। धर्म व ईश्वर के नाम पर वर्तमान कर्मकाण्ड की अतिशयता, पाखण्ड और आवरण का अतिरेक भी इसका कारण है; इन्हीं बातों को लेकर नरेन्द्र देव का बौद्ध धर्म के प्रति गहरा झुकाव भी था। बौद्ध दर्शन में उनकी गहरी रूचि व ज्ञान के नाते आचार्य नरेंद्र देव संस्कृत व पालि की अच्छी जानकारी रखते थे। कुल मिलाकर समाज के सर्वांगीण उन्नयन की प्रतिबद्धता को समर्पित आचार्य नरेन्द्र देव अपने पूरे व्यक्तित्व एवं कृतित्व में एक सच्चे व अनुकरणीय राष्ट्र भक्त थे।

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