भारत के चमकते अतीत का श्रेष्ठतम संग्रहालय “भारत कला भवन”

काशी महानगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित भारत कला भवन भारतीय कला-साहित्य इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रियों से युक्त भारत के समृद्धतम् संग्रहालयों में से एक है। काशी अपने उद्भव काल से ही भारतीय आध्यात्म, दर्शन, साहित्य संगीत और कला का केन्द्र रहा है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में गौरवान्वित विश्व के इस प्राचीनतम् जीवित महानगर का अतीत अनेक उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में इस महानगर को सारी दुनिया में विशेष स्थान प्राप्त है। यहाँ की प्राचीन वस्त्र कला, मूर्ति कला, स्थापत्य और चित्रकारी की चर्चा भारत के बाहर के तमाम देशों में आज भी होती रहती है। काशी की माटी में भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य, दर्शन और आध्यात्म की सुगन्ध अरसे से रची-बसी है। यहाँ के जन जीवन में सदैव से ही भारतीय प्रतिबिम्बित होती रही है। यहाँ किसी न किसी रूप में पूरा भारत देखने को मिल जाता है।

 काशी की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर काशी के महान कलावेत्ता पद्मविभूषण स्व0 रायकृष्णदास ने यहाँ एक ऐसे संग्रहालय के निर्माण का संकल्प लिया, जिसमें भारत की आने वाली पीढ़ी को समृद्ध भारतीय कला, साहित्य और इतिहास का प्रभावकारी रूप में दर्शन कराया जा सके। कलामनीषी राय कृष्णदास ने अपनी सोच को साकार करने के लिए 1920 में ‘भारतीय ललित कला परिषद’ नामक संस्था का गठन किया। गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष थे। संस्था के गठन का उद्देश्य था भारतीय कला संस्कृति का प्रचार-प्रसार1 इस संस्था के माध्यम से राय कृष्ण दास के नेतृत्व में संगीत, कला एवं भारतीय संस्कृति के साथ ही साहित्य के उत्थान के लिए अनेक आयोजन और प्रयास किये गये। कालान्तर में इस संस्था का विश्व विख्यात भारतीय कला, पुरातत्व सामग्रियों के संग्रहालय, भारत कला भवन के रूप में रूपान्तरण कर दिया गया।2

भारत कला भवन के इस मातृ संस्था की स्थापना शुरू में गोदौलिया जैसे काशी के हृदय क्षेत्र के एक छोटी सी जगह में हुई थी।3 चित्रकला, संगीत और अन्य कलात्मक और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से गौरवमय भारतीय अतीत को आने वाली पीढ़ी भारतीय जनमानस के साथ ही विश्व समुदाय के सम्मुख ले जाने के उद्देश्य से गठित, इस संस्था के संस्थापकों में देश के चोटी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शामिल रहे, जिसमें अध्यक्ष गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर के अलावा बंगाल शैली के विख्यात कलाकार अवनिन्द्रनाथ ठाकुर उपाध्यक्ष एवं स्वयं राय कृष्णदास जी इसके सचिव थे। बाद में भारत कला भवन के रूप में परिवर्तित इस संस्था के क्रिया-कलापों और कलात्मक संग्रह को देखकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘यंग इण्डिया’ में तीन अक्टूबर 1929 को एक अपील जारी करते हुए लिखा- “मैंने इस संस्था के भव्य मण्डप को देखा है जिसमें इस संग्रहालय की स्थापना होगी, और इसमें प्रदर्शनार्थ लगायी जाने वाली कलाकृतियों के संग्रह को भी देखा है। नागरी प्रचारिणी सभा के इस संग्रहालय में सभी कला प्रेमियों से उदारतापूर्वक सहयोग की अपेक्षा है।”4

इस संग्रहालय को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ले आने में जिन महापुरूषों की प्रमुख भूमिका रही है उनके नाम इस प्रकार हैं- महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय, पण्डित मोतीलाल नेहरू, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद, श्री सुभाषचन्द्र बोस, डॉ0 भगवानदास, डॉ0 ए0के0 कुमारस्वामी, श्री जयशंकर प्रसाद, श्री मैथिलीशरण गुप्त, डॉ0 के0पी0 जायसवाल, श्री चन्द्रधर शर्मा, ‘गुलेरी’, श्री शिवेन्द्रनाथ बसु, श्री सीताराम शाह, श्री ओ0सी0 गांगुली, प्रो0 बीरबल साहनी, श्री गोविन्द मालवीय,
श्री ज्योतिभूषण गुप्ता, पण्डित बृजमोहन व्यास, उस्ताद राम प्रसाद, श्री श्रीप्रकाश, शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस, श्री शैलेन्द्र डे, निकोलस रोरिच, डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल, डॉ0 मोतीचन्द्र, डॉ0 एलिश बोनर, डॉ0 डब्ल्यू0जी0 आर्चर, श्री एस0एच0 वात्स्यायन। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति स्व0 डॉ0 विभूतिनारायण सिंह के संरक्षकत्व में सन् 1950 में इस  संग्रहालय को विश्वविद्यालय में शामिल किया गया।5

    गोदौलिया के एक छोटे से कमरे से होकर, सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, क्वींस कालेज, नागरी प्रचारिणी सभा से होता हुआ यह संग्रहालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित, कृषि विभाग से गुजरकर मालवीय भवन होते हुए आज जैसा भव्य रूप पा सका। इसमें चित्र, वस्त्र, रोरिक, एलिस बोनर, मूर्ति, बनारस अलंकरण, मृण्मूर्ति, महेन्द्र कुमार, साहित्य-विभाग जैसे ग्यारह खण्ड और बीथिकायें हैं जिनमें विभिन्न श्रेणी की अनेक दुर्लभ कलाकृतियाँ संग्रहित हैं। इन दुर्लभ कलाकृतियों की जोड़ दुनिया के चर्चित संग्रहालयों में भी देखने को नहीं मिलती। इस संग्रहालय में ‘उदयन वासवदत्ता का ठीकरा’ कार्तिकेय, शेख फूल, हम्जानामा, प्रसाधिका, औरंगजेब का फरमान, बीदरी के बर्तन और मुगल ग्लास जैसी दुर्लभ भारतीय कलाकृतियाँ शामिल हैं।

    इस महत्त्वपूर्ण कला संग्रहालय में आज एक लाख से ज्यादा कलाकृतियाँ संग्रहीत हैं। जिनमें सिक्के, मूर्तियाँ, टेराकोटा, चित्र, पोट्रट, धातु के अस्त्र-शस्त्र, पुराने गहने और पाण्डुलिपियाँ सोने की मुहरे, मनके, महत्त्पूर्ण दस्तावेज, साहित्यिक वस्तुओं के साथ ही विश्व के श्रेष्ठतम भारतीय लघु चित्रों को भी संग्रहित किया गया है।

भारत कला भवन में संग्रहित महत्त्वपूर्ण सामग्रियों का विवरण इस प्रकार है-

  1. 1. चित्र- संग्रहालय में दसवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक के चित्रों का संग्रह है। इसमे भारतीय चित्रकला की सम्पूर्णता दिखाई पड़ती है। संग्रह में पूर्वी भारत के चित्रित बौद्ध ग्रन्थ, पश्चिमी भारत के चित्रित जैन ग्रन्थ तथा कतिपय अन्य चित्रित ग्रन्थ और लोर चन्दा, चौर पंचशिका, मृगावत, पूर्व व प्रारम्भिक मुगलकालीन शाहनाम, मुगल सम्राट अकबर जहाँगीर, शाहजहाँ तथा अन्य मुगल कालीन सम्राटों के समय के अनेक दुर्लभ लघुचित्र यहाँ उपलब्ध हैं। ये चित्र राजस्थान के मेवाड़ बूंदी, कोटा, किशनगढ़ बीकानेर, जयपुर नाथद्वारा, बसोहली, गुलेर, कांगड़ा, विलासपुर गढ़वाल के पहाड़ी शैली के साथ ही पटना, बनारस, अवध तथा दक्षिणी क्षेत्र के कम्पनी शैली के हैं    इस संग्रहालय में बीसवीं सदी के प्राख्यात चित्रकारों अवनिन्द्र नाथ ठाकुर, गगनेन्द्रनाथ, नन्दलाल, यामिनी राय, शैलेन्द्र डे, राम गोपाल विजयवर्गीय एवं अन्य समकालीन चित्रकारों के चित्र भी संरक्षित हैं।
  2. मूर्ति- कला भवन के मूर्तियों का संग्रह अत्यन्त समृद्ध है। यहाँ मौर्य काल (लगभग तीसरी शताब्दी ई0पू0) से लेकर तेरहवीं, चौदहवीं शताब्दी तक की मूर्तियाँ संग्रहित हैं। इनमें भरहूत से प्राप्त निमिंगल जातक, फैजाबाद से मिली प्रसाधिका (द्वितीय शताब्दी ई0) आन्ध्र से प्राप्त नलगिरी विजय (द्वितीय शताब्दी ई0) बनारस से प्राप्त कार्तिकेय (पाँचवी सदी ई0), शाहाबाद, बिहार से प्राप्त इन्द्राणी (छठवीं शदी ई0) एटा से प्राप्त कल्याण सुन्दर मूर्ति, शिवविवाह एवं नटराज की प्रतिमा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
  3. वसन- कलाभवन के वसन विभाग में सूती, रेशमी तथा ऊनी वस्त्र का लम्बा चौड़ा संग्रह है। जिसमें बनारसी किमखाब तथा कश्मीरी शाह, विशेष उल्लेखनीय हैं। सोने और चाँदी के तार की कढ़ाई वाले वस्त्रों के अलावा हथकरघे पर बनी मिश्रित कशीदाकारी वाले कश्मीरी शाही तूश की शाल अपने आप में अद्वितीय है।
  4. मृणमूर्ति- मिट्टी की पुरानी मूर्तियों के संग्रह में हड़प्पा काल से लेकर अठारहवीं और उन्नसवीं शती तक की वस्तुयें संग्रहित हैं। भारत कला भवन गंगा के मैदानी भाग (उत्तर प्रदेश) में मिलने वाली मूर्तियों के संग्रह के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इनमें मृदंग वादक, शिव मस्तक एवं झूला झूलती युवती विशेष उल्लेखनीय हैं।
  5. मुद्रायें- कला भवन मुद्राओं का भी समृद्ध संग्रह है। यहाँ थलाई से (पीटकर) बनी मुद्रायें, ढलकर बने ताँबे के सिक्के, इण्डों ग्रीक शासकों के सिक्के, कुषाण एवं गुप्तकालीन स्वर्ण एवं रजत मुद्रायें तथा दिल्ली सुल्तान एवं शासकों के सिक्के उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश एवं भारत सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किये गये आधुनिक सिक्के भी संग्रह में रखे गये हैं।
  6. साहित्य- भारत कला भवन के साहित्य संग्रह विभाग में प्राचीन भारत के दैनिक क्रिया यथा कर्मकाण्ड, संगीत शास्त्र ज्योतिष आयुर्वेद, शिल्पशास्त्र आदि विषयों से सम्बन्धित करीब 6000 हस्तलिखित पोथियाँ संग्रहित हैं। इसके अलावा आधुनिक हिन्दी के- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, मुंशी प्रेमचन्द्र, निराला, मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, राहुल सांस्कृत्यायन, रामचन्द्र शुक्ल, रायकृष्णदास, महादेवी वर्मा, अज्ञेय तथा हिन्दी के अन्य कई प्रमुख साहित्यकारों की हस्तलिखित साहित्य भी यहाँ संग्रहित हैं।
  7. सज्जाकला- भारत कला भवन के समृद्ध संग्रहालय में मध्यकाल में लिखित आभूषण शीशे की सामग्री, धातुकला, तथा अस्त्र-शस्त्र का बेजोड़ संग्रह है। इनमें जहाँगीर का लेखयुक्त मदिरा का प्याला। अनुष्ठान तथा मीनाकुमारी के आभूषण एवं शाही गड़गड़ा और विभिन्न कामदार बर्तन, पीतल एवं ताँबे के ज्योतिष पत्र आदि प्रमुख हैं।

    इस समृद्ध और विशाल संग्रहालय में छात्रों और अध्येताओं के शोध के लिए ढेरों ग्रन्थों से समृद्ध साधन सम्पन्न पुस्तकालय एवं आधुनिक समय के दृश्य श्रव्य शैक्षणिक साधनों से युक्त संगोष्ठी कक्ष उपलब्ध हैं। यह समृद्ध संग्रहालय अपने वर्तमान रूप में देशी-विदेशी पर्यटकों और शोधार्थियों के आकर्षण का विशेष केन्द्र है, नियमित ढेरों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ के दुर्लभ संग्रह को देखने आते रहते हैं।

    देश के इस अद्वितीय कला संग्रहालय के निर्माण से लेकर कलाकृतियों के संग्रह तक की प्रत्येक गतिविधि में राय कृष्णदास की कला के प्रति समर्पणयुक्त तपस्या ही मुख्य आधार है।

भारत कला भवन का महत्त्व

आजादी के पूर्व देश के कला एवं पुरा संग्रहालयों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। ये संग्रहालय गोदामों से अधिक कुछ भी नहीं थे। राय कृष्णदास जी के द्वारा स्थापित भारत कला भवन देश के पूर्ववर्ती कला संग्रहालयों से अलग एक शैक्षणिक संस्थान जैसा है। यहाँ आकर कोई भी भारतीय दर्शक आज अपने कला संस्कृति की थाती को देखकर आत्मगौरव का अनुभव करता है। वहीं आजादी से पहले इन पुरानी वस्तुओं को देखने के बाद संवेदनशील दर्शक सोचने लगता था कि “जिस देश समाज की कला संस्कृति इतनी समृद्ध है, जिसका इतिहास इतना गौरवपूर्ण है उस देश के लोग अंग्रेजों के गुलाम कैसे है?” दर्शकों के मन में इस प्रकार की सोच तभी पैदा हो सकती है जब कलाकृतियाँ सुव्यवस्थित और प्रेरक ढंग से रखी जाये और उनके विषय में बताने वाले लोग भी सुशिक्षित जानकार और प्रेरक हों।

स्व0 राय कृष्णदास जी ने भारत कला भवन के निर्माण में इस बात का पूरा ध्यान रखा था। ‘कला नवजागरण’ के रूप में साहित्य और कला के माध्यम से आजादी के संघर्ष का उन्हें गम्भीर अनुभव था जिसके कारण कला और साहित्य का, राष्ट्र की आजादी और देश के नवनिर्माण में क्या भूमिका हो सकती है, इसे अच्छी तरह जान गये थे। भारत कला भवन की स्थापना भी उन्होंने इन्हीं मूल्यों की स्थापना के लिए ही की थी। इस प्रकार यह संग्रहालय आम संग्रहालयों से हटकर राष्ट्रीयता का प्रेरणा स्रोत है।

वास्तव में गोरे लोग एक ओर भारत की धरोहरों को उनके गौरवमयी सूचनाओं के साथ जनता के सामने नहीं आने देना चाहते थे, दूसरी ओर इन्हें चुपके से अपने देश में ले जाने की फिराक में भी लगे रहते थे। हमारे विदेशी शासक किसी भी हालत में यह नहीं चाहते थे कि हम भारतीय अपने गौरवशाली परम्पराओं और अतीत को जाने समझे और यह महसूस करें कि भारत कभी विश्वगुरू और सोने की चिड़ियाँ रहा है। ये विदेशी लोग हमेशा यही चाहते थे कि हम दीन हीन बने रहें जिससे वे हमें लूटकर अपनी तिजोरी भरते रहे और हम उनके सामने दीन बनकर दुम हिलाते हुए हमेशा ही याचना की मुद्रा में खड़े हों। उनकी नियत थी कि हमारी प्राकृतिक और सांस्कृतिक क्षमताओं का अनवरत दोहन करते रहें।

इसके लिए उन्होंने अपनी सोची-समझी चाल के तहत हमें हमारी संस्कृति, परम्परा और सम्पदाओं से हमेशा ही दूर रखने का प्रयास किया, क्योंकि वे जानते थे ज्यों ही इस देश के लोग अपनी परम्पराओं, सम्पदाओं और संस्कृति के प्रति जागरूक हो जायेंगे, तब इन्हें गुलाम बनाये रखना सम्भव नहीं रहेगा। इसलिए ही उन्होंने कलाकृतियों के संग्रह के नाम पर अंधेरे गोदामों का निर्माण कर पुरा कलाकृतियों अंधेरों में कैद कर उन्हें संग्रहालय नाम दिया और इनमें ढेरों से बहुमूल्य कला-सम्पदा को लगातार अपने देश भेजा।

राय कृष्णदास जी ने अपने शैशवावस्था से ही इस परिस्थिति को देखा था, यही कारण था कि उनके मन में बचपन से ही एक संग्रहालय की परिकल्पना स्थायी रूप ले चुकी थी, जिसमें कलाकृति, दस्तावेज एवं पूरा सामग्री प्रत्येक व्यक्ति के लिए सर्वसुलभ हो। भारत कला भवन के रूप में उन्होंने अपने इसी सपने को मूर्त रूप दिया।

कलाकृतियों के अलावा यहाँ तमाम ऐसे दस्तावेज भी हैं जो समाज में लम्बे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक भ्रमों का निवारण कर सच और असलियत को सामने लाकर समाज तोड़ने वाले अंग्रेजों द्वारा प्रस्तुत झूठे इतिहास का पर्दाफाश भी कर देते हैं। यहाँ ऐसी सूचनायें संरक्षित और सुरक्षित हैं, जिन्हें देखकर हम अपनी राजनैतिक, सामाजिक-व्यवस्था और जीवन की उत्कृष्ट प्रणालियों से रूबरू होकर अपने गौरवपूर्ण अतीत को जानकर स्वयं में उत्साह का संचार पाते हैं।

राय कृष्णदास जी की यही सोच थी कि वे इन सामग्रियों को प्रदर्शनियों के माध्यम से कला भवन के विभिन्न कक्षों में प्रदर्शन के साथ ही अन्य कार्यक्रमों के द्वारा नियमित देश के लोगों और सुधीजनों के सम्मुख लाने के लिए प्रयत्नशील रहें। उनके इसी सोच को ध्यान में रखकर भारत कला भवन प्रशासन वर्ष में कई बार नियमित प्रदर्शनी और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है।

भारत कला भवन के विषय में चर्चित लोगों की सम्मतियाँ

    कला भवन के संग्रह को अनेक देशी-विदेशी विशिष्टजनों ने देखकर अपनी सम्मति प्रदान की, जिनमें से कुछ यहाँ दिये जा रहे हैं-

(1)  संग्रह बहुत अच्छा – महात्मा गाँधी।

(2)  जब कभी भी इस संग्रहालय में आया, मुझे प्रसन्नता हुई। मैं आशा करता        हूँ कि भविष्य में यह संग्रहालय अपने विशाल संग्रह के साथ कला          संग्रहालय का रूप लेगा-पं0 जवाहरलाल नेहरू

(3)  मुझे इस संस्था में आकर प्रसन्नता हुई नेताजी सुभाषचन्द्र बोस।

(4)  भारतीय चित्रकला के विशाल संग्रहों में से एक है। यह भविष्य में एक तीर्थ     केन्द्र बनेगा। सर मर्टियर ह्वीलर (पुरातत्त्वविद् एवं भारतीय पुरातत्त्व के पूर्व     महानिदेशक)

(5)  भारत कला भवन यदि विशालतम चित्र संग्रह नहीं है तो विशाल चित्र     संग्रहालयों में से एक हैं – स्टीला केमरिश

(6)  निकट भविष्य में भारत कला भवन समस्त कलाकारों के लिए तीर्थ बन जायेगा     शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस

(7)  इस संग्रह को देखकर मैं अत्यन्त उत्साहित हुआ स्वती स्लाव शेरिच

(8)  भारत कला भवन भारतीय कलाकृतियों का मात्र भारत ही नहीं समस्त विश्व का     दुर्लभ केन्द्र है। मोर्टियर व्हिलर (पुरातत्त्वविद्)

(9)  यह भारत का सर्वोत्कृष्ट संग्रहालय है। इसमें संग्रहित प्रत्येक कृति का अपना     महत्व है स्टेला केमरिस (भारतीय कला के प्राध्यापक)

(10) कला भवन ऐसा उपवन है जिसमें शताब्दियों की स्मृतिलताएँ फूलकर दर्शन के     मन पर छा जाती है मैथिलीशरण गुप्त

(11) यहाँ फिर से आकर दिल बहुत खुश हुआ। इस सुन्दर संग्रह को जब मैं देखता     हूँ मुझे खुशी होती है। पं0 जवाहरलाल नेहरु

(12) कला भवन भारत की आत्मा का शिल्प हो सके, ऐसी कामना है महादेवी वर्मा

(13) कला भवन को देखकर अत्यन्त सन्तोष हुआ डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद (भारत के     प्रथम राष्ट्रपति)

(14) यह हिन्दू विश्वविद्यालय का कीर्ति तिलक है। प्रसिद्ध गांधीवादी

(15) यह संग्रहालय भारतीय कला का ऐसा नमूना है जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। यह स्पष्ट रूप से श्रेष्ठतम संग्रह का नमूना है। 0सी0 गांगुली

(16) भारत कला भवन भारतीय कला का दुर्लभ संग्रहालय है, न केवल देश में बल्कि     सम्पूर्ण विश्व में यह अपनी भव्यता और मात्रा में अनोखा है। रियर्ड एटिंग     हाऊजेन (फेयर आर्ट गैलरी, संयुक्त राज्य अमेरिका से सम्बद्ध)

जन-जन में भारतीय कला गौरव के प्रचार-प्रसार में रत भारत कला भवन

    कला भवन की सुन्दर सुव्यवस्थित व्यवस्था एवं महत्त्वपूर्ण भारतीय कला इतिहास एवं सांस्कृतिक वस्तुओं के संग्रह एवं वर्षभर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के चलते यहाँ प्रतिवर्ष कला, इतिहास सहित एवं संस्कृति से सम्बन्धित सामग्रियों का आगमन होता रहता है। आज ये वस्तुएँ अधिकतर दान में ही प्राप्त हो रही है। नवीन सामग्रियों की प्राप्ति के चलते कला भवन के गौरव में नियमित संवृद्धि हो रही है। आज कोई भी सामग्रीदाता कला भवन को दान देकर गौरव का अनुभव करता है और उसे ऐसा लगने लगता है कि उसके द्वारा संग्रहीत वस्तु को उचित स्थान प्राप्त होगा और वह अधिकतम लोगों की दृष्टि में आ सकेगी। इसके साथ ही दर्शक यहाँ धरोहर के सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो जाता है।

    कला भवन की वर्तमान समृद्धि और प्रसिद्धि का श्रेय राय कृष्णदास जी के कला समर्पण और अनुभव को ही जाता है। इसके चलते ही कला भवन नियमित रूप से भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य, इतिहास की धरोहरों के संग्रह एवं समृद्धि के नित नये कीर्तिमान बनाता जा रहा है।

    आज महत्त्वपूर्ण भारतीय कला, इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य से सम्बन्धित वस्तुओं के इस अप्रतिम संग्रह को देखने भारत कला भवन में नियमित ढेरों देशी-विदेशी दर्शक आते रहते है, विदेशों से आने वाले सांस्कृतिक अध्ययन दलों के साथ ही राजनैतिक प्रतिनिधि मण्डलों की भी अच्छी खासी संख्या होती है। इसके अलावा विदेशों से आने वाले विश्वस्तरीय राजनैतिक लोगों के साथ ही शोधार्थी और अध्येताओं की भी अच्छी-खासी संख्या होती है। विदेशों के राजनैतिक शीर्ष पुरुषों, अधिकारियों और प्रतिनिधि मण्डलों का आगमन निश्चय ही भारत कला भवन के भारतीय सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक और कलात्मक महत्त्व के कारण ही होता है।

    इसी प्रकार कला भवन में नियमित रूप से देश के विभिन्न भागों से शैक्षणिक प्रतिनिधि मण्डलों के अतिरिक्त वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिकारियों, शोध छात्रों, अध्येताओं, मन्त्रियों सहित अन्य महत्त के लोगों का आगमन होता रहता है। भारी संख्या में कला भवन में नियमित महत्त्वपूर्ण अभ्यागतों का आगमन जहाँ कला भवन के महत्त्व को प्रमाणित करता है वहीं स्व0 राय कृष्णदास जी के द्वारा समृद्ध भारतीय कला संस्कृति, इतिहास एवं साहित्यिक गौरव को भारतीय जन-जन में पहुँचाने के साथ ही विश्ववासियों में सम्प्रेषित कर भारतीय कला एवं संस्कृति का यशोगान कर कलामनीषी स्व0 राय कृष्णदास जी की कलाप्रेमी सोच को अनवरत जीवन्तता एवं सक्रियता प्रदान कर रही है।

    अतः राय साहब के कार्यों के मूल्यांकन करते समय हमें उस काल की स्थिति- परिस्थिति का भी अध्ययन करना होगा। साथ में भारतीय समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन करना होगा, तब इसके आधार पर ही हमें राय कृष्णदास के कार्यों को कसौटी पर रखकर उसका मूल्यांकन कर सकेंगे।

    अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राय साहब ने एक संघर्षपूर्ण मार्ग का चयन कर भावों, अभावों के संघर्ष में वे सदैव अर्जुन की तरह केवल अपने लक्ष्य की ओर देखते है। लक्ष्य के लिए आने वाले किसी तरह के मान-अपमान से वे विचलित नहीं होते। वे मृत्युपर्यन्त अपने लक्ष्य को नहीं भूले। यही उनके जीवन की मूल पूंजी, जो उन्हें आम आदमी से हटाकर महापुरूषों की श्रेणी में खड़ा कर देती है।

                                                                                                                                                                                                             जगनारायण

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