चमकते अतीत का श्रेष्ठतम संग्रहालय “भारत कला भवन” काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)

0

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित भारत कला भवन भारतीय कला-साहित्य इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रियों से युक्त भारत के समृद्धतम् संग्रहालयों में से एक है। काशी अपने उ˜व काल से ही भारतीय आध्यात्म, दर्शन, साहित्य संगीत और कला का केन्द्र रहा है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में गौरवान्वित विश्व के इस प्राचीनतम् जीवित महानगर का अतीत अनेक उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है।

कला और संस्कृति के क्षेत्र में इस महानगर को सारी दुनिया में विशेष स्थान प्राप्त है। यहाँ की प्राचीन वó कलाए मूर्ति कलाए स्थापत्य और चित्रकारी की चर्चा भारत के बाहर के तमाम देशों में आज भी होती रहती है। काशी की माटी में भारतीय कलाए संस्कृतिए साहित्यए दर्शन और आध्यात्म की सुगन्ध रची-बसी है। यहाँ के जन-जीवन में सदैव से ही भारतीय प्रतिबिम्बित होती रही है। यहाँ किसी न किसी रूप में लघु भारत की झलक मिल जाती है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित भारत कला भवन भारतीय कला-साहित्य इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रियों से युक्त भारत के समृद्धतम् संग्रहालयों में से एक है। काशी अपने उ˜व काल से ही भारतीय आध्यात्म, दर्शन, साहित्य संगीत और कला का केन्द्र रहा है।

भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में गौरवान्वित विश्व के इस प्राचीनतम् जीवित महानगर का अतीत अनेक उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में इस महानगर को सारी दुनिया में विशेष स्थान प्राप्त है। यहाँ की प्राचीन वó कलाए मूर्ति कलाए स्थापत्य और चित्रकारी की चर्चा भारत के बाहर के तमाम देशों में आज भी होती रहती है। काशी की माटी में भारतीय कलाए संस्कृतिए साहित्यए दर्शन और आध्यात्म की सुगन्ध रची-बसी है। यहाँ के जन-जीवन में सदैव से ही भारतीय प्रतिबिम्बित होती रही है। यहाँ किसी न किसी रूप में लघु भारत की झलक मिल जाती है।  काशी की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर काशी के महान कलावेŸाा पùविभूषण स्व0 रायकृष्णदास ने यहाँ एक ऐसे संग्रहालय के निर्माण का संकल्प लिया, जिसमें भारत की आने वाली पीढ़ी को समृद्ध भारतीय कलाए साहित्य और इतिहास का प्रभावकारी रूप में दर्शन कराया जा सके।

कलामनीषी राय कृष्णदास ने अपनी सोच को साकार करने के लिए 1920 में ‘भारतीय ललित कला परिषद’ नामक संस्था का गठन किया। गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष थे। संस्था के गठन का उद्देश्य था कि भारतीय कला संस्कृति का प्रचार-प्रसार। इस संस्था के माध्यम से राय कृष्ण दास के नेतृत्व में संगीत, कला एवं भारतीय संस्कृति के साथ ही साहित्य के उत्थान के लिए अनेक आयोजन और प्रयास किये गये। कालान्तर में इस संस्था का विश्व विख्यात भारतीय कला, पुरातत्व सामग्रियों के संग्रहालय, भारत कला भवन के रूप में रूपान्तरण कर दिया गया।भारत कला भवन संग्रहालय, वाराणसी भारत कला भवन के इस मातृ-संस्था की स्थापना शुरू में गोदौलिया जैसे काशी के हृदय क्षेत्र के एक छोटी सी जगह में हुई थी।

चित्रकला, संगीत और अन्य कलात्मक और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से गौरवमय भारतीय अतीत को आने वाली पीढ़ी भारतीय जनमानस के साथ ही विश्व समुदाय के सम्मुख ले जाने के उद्देश्य से गठित, इस संस्था के संस्थापकों में देश के चोटी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शामिल रहे, जिसमें अध्यक्ष गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर के अलावा बंगाल शैली के विख्यात कलाकार अवनिन्द्रनाथ ठाकुर उपाध्यक्ष एवं स्वयं राय कृष्णदास जी इसके सचिव थे। बाद में भारत कला भवन के रूप में परिवर्तित इस संस्था के क्रिया-कलापों और कलात्मक संग्रह को देखकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘यंगइण्डिया’ में तीन अक्टूबर 1929 को एक अपील जारी करते हुए लिखा- ‘मैंने इस संस्था के भव्य मण्डप को देखा है जिसमें इस संग्रहालय की स्थापना होगी, और इसमें प्रदर्शनार्थ लगायी जाने वाली कलाकृतियों के संग्रह को भी देखा है।

नागरी प्रचारिणी सभा के इस संग्रहालय में सभी कला प्रेमियों से उदारतापूर्वक सहयोग की अपेक्षा है। इस संग्रहालय को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ले आने में जिन महापुरूषों की प्रमुख भूमिका रही है, उनके नाम इस प्रकार हैं- महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय, पण्डित मोतीलाल नेहरू, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद, नेता जी सुभाषचन्द्र बोस, डाॅ0 भगवानदास, डाॅ0 ए0के0 कुमारस्वामी, कवि जयशंकर प्रसाद, श्री मैथिलीशरण गुप्त, डाॅ0 के0पी0 जायसवाल, श्री चन्द्रधर शर्मा, ‘गुलेरी’, श्री शिवेन्द्रनाथ बसु, श्री सीताराम शाह, श्री ओ0सी0 गांगुली, प्रो0 बीरबल साहनी, श्री गोविन्द मालवीय, श्री ज्योतिभूषण गुप्ता, पण्डित बृजमोहन व्यास, उस्ताद राम प्रसाद, श्री श्रीप्रकाश, शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस, श्री शैलेन्द्र डे, निकोलस रोरिच, डाॅ0 वासुदेवशरण अग्रवाल, डाॅ0 मोतीचन्द्रए डाॅ0 एलिश बोनर, डाॅ0 डब्ल्यू0जी0 आर्चर, श्री एस0एच0 वात्स्यायन। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति स्व0 डाॅ0 विभूतिनारायण सिंह के संरक्षकत्व में सन् 1950 में इस संग्रहालय को विश्वविद्यालय में शामिल किया गया। गोदौलिया के एक छोटे-से कमरे से होकर, सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, क्वींस कालेज, नागरी प्रचारिणी सभा से होता हुआ यह संग्रहालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित, कृषि विभाग से गुजरकर मालवीय भवन होते हुए आज जैसा भव्य रूप पा सका। इसमें चित्र, वó, रोरिक, एलिस बोनर, मूर्ति, बनारस अलंकरण, मृणमूर्ति, महेन्द्र कुमार, साहित्य-विभाग जैसे ग्यारह खण्ड और बीथिकायें हैं जिनमें विभिन्न श्रेणी की अनेक दुर्लभ कलाकृतियाँ संग्रहित हैं।

इन दुर्लभ कलाकृतियों की जोड़ दुनिया के चर्चित संग्रहालयों में भी देखने को नहीं मिलती। इस संग्रहालय में ‘उदयन वासवदŸाा का ठीकरा’ कार्तिकेय, शेख फूल, हम्जानामा, प्रसाधिका, औरंगजेब का फरमान, बीदरी के बर्तन और मुगल ग्लास जैसी दुर्लभ भारतीय कलाकृतियाँ शामिल हैं। इस महŸवपूर्ण कला संग्रहालय में आज एक लाख से ज्यादा कलाकृतियाँ संग्रहीत हैं। जिनमें सिक्के, मूर्तियाँ, टेराकोटा, चित्र, पोर्टेट, धातु के अó-शó, पुराने गहने और पाण्डुलिपियाँ सोने की मुहरे, मनके, महत्वपूर्ण दस्तावेज, साहित्यिक वस्तुओं के साथ ही विश्व के श्रेष्ठतम भारतीय लघु चित्रों को भी संग्रहित किया गया है।भारत कला भवन में संग्रहित महŸवपूर्ण सामग्रियों का विवरण इस प्रकार है-चित्र- संग्रहालय में दसवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक के चित्रों का संग्रह है।

इसमें भारतीय चित्रकला की सम्पूर्णता दिखाई पड़ती है। संग्रह में पूर्वी भारत के चित्रित बौद्ध ग्रन्थ, पश्चिमी भारत के चित्रित जैन ग्रन्थ तथा कतिपय अन्य चित्रित ग्रन्थ और लोर चन्दाए चैर पंचशिका, मृगावत, पूर्व व प्रारम्भिक मुगलकालीन शाहनामा, मुगल सम्राट अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा अन्य मुगल कालीन सम्राटों के समय के अनेक दुर्लभ लघुचित्र यहाँ उपलब्ध हैं। ये चित्र राजस्थान के मेवाड़ बूंदी, कोटा, किशनगढ़ बीकानेर, जयपुर नाथद्वारा, बसोहली, गुलेर, कांगड़ा, विलासपुर गढ़वाल के पहाड़ी शैली के साथ ही पटना, बनारस, अवध तथा दक्षिणी क्षेत्र के कम्पनी शैली के हैं। इस संग्रहालय में बीसवीं सदी के प्राख्यात चित्रकारों अवनिन्द्र नाथ ठाकुर, गगनेन्द्रनाथ, नन्दलाल, यामिनी राय, शैलेन्द्र डे, राम गोपाल विजयवर्गीय एवं अन्य समकालीन चित्रकारों के चित्र भी संरक्षित हैं।मूर्ति- कला भवन के मूर्तियों का संग्रह अत्यन्त समृद्ध है। यहाँ मौर्य काल (लगभग तीसरी शताब्दी ई0पू0द्ध से लेकर तेरहवीं, चैदहवीं शताब्दी तक की मूर्तियाँ संग्रहित हैं।

इनमें भरहूत से प्राप्त निमिंगल जातक, फैजाबाद से मिली प्रसाधिका (द्वितीय शताब्दी ई0द्ध आन्ध्र से प्राप्त नलगिरी विजय (द्वितीय शताब्दी ई0) बनारस से प्राप्त कार्तिकेय (पाँचवी सदी ई0) शाहाबाद, बिहार से प्राप्त इन्द्राणी (छठवीं शदी ई0) एटा से प्राप्त कल्याण सुन्दर मूर्ति, शिवविवाह एवं नटराज की प्रतिमा अत्यन्त महŸवपूर्ण हैं। व कलाभवन के वसन विभाग में सूती, रेशमी तथा ऊनी वó का विषाल संग्रह है। जिसमें बनारसी किमखाब तथा कश्मीरी शाह, विशेष उल्लेखनीय हैं। सोने और चाँदी के तार की कढ़ाई वाले वóों के अलावा हथकरघे पर बनी मिश्रित कशीदाकारी वाले कश्मीरी शाही तूश की शाल अपने आप में अद्वितीय है।मृणमूर्ति- मिट्टी की पुरानी मूर्तियों के संग्रह में हड़प्पा काल से लेकर अठारहवीं और उन्नसवीं शती तक की वस्तुयें संग्रहित हैं। भारत कला भवन गंगा के मैदानी भाग (उŸार प्रदेश) में मिलने वाली मूर्तियों के संग्रह के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इनमें मृदंग वादक, शिव मस्तक एवं झ्ाूला झ्ाूलती युवती विशेष उल्लेखनीय हैं।मुद्रायें- कला भवन में मुद्राओं का भी समृद्ध संग्रह है। यहाँ थलाई से (पीटकर) बनी मुद्रायें, ढलकर बने ताँबे के सिक्के, इण्डों ग्रीक शासकों के सिक्के, कुषाण एवं गुप्तकालीन स्वर्ण एवं रजत मुद्रायें तथा दिल्ली सुल्तान एवं शासकों के सिक्के उपलब्ध हैं।

इसके अतिरिक्त ब्रिटिश एवं भारत सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किये गये आधुनिक सिक्के भी संग्रह में रखे गये हैं।साहित्य-भारत कला भवन के साहित्य संग्रह विभाग में प्राचीन भारत के दैनिक क्रिया यथा- कर्मकाण्ड, संगीत शाó, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिल्पशाó आदि विषयों से सम्बन्धित करीब 6000 हस्तलिखित पोथियाँ संग्रहित हैं। इसके अलावा आधुनिक हिन्दी के- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदीए चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, मुंशी प्रेमचन्द्र, निराला, मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, राहुल सांस्कृत्यायन, रामचन्द्र शुक्ल, रायकृष्णदास, महादेवी वर्मा, अज्ञेय तथा हिन्दी के अन्य कई प्रमुख साहित्यकारों की हस्तलिखित साहित्य भी यहाँ संग्रहित हैं।सज्जाकला- भारत कला भवन के समृद्ध संग्रहालय में मध्यकाल में लिखित आभूषण शीशे की सामग्रीए धातुकलाए तथा अó-शó का बेजोड़ संग्रह है। इनमें जहाँगीर का लेखयुक्त मदिरा का प्याला।

अनुष्ठान तथा मीनाकारी के आभूषण एवं शाही गड़गड़ा और विभिन्न कामदार बर्तन, पीतल एवं ताँबे के ज्योतिष पत्र आदि प्रमुख हैं। इस समृद्ध और विशाल संग्रहालय में छात्रों और अध्येताओं के शोध के लिए ढेरों ग्रन्थों से समृद्ध साधन सम्पन्न पुस्तकालय एवं आधुनिक समय के दृश्य श्रव्य शैक्षणिक साधनों से युक्त संगोष्ठी कक्ष उपलब्ध है। यह समृद्ध संग्रहालय अपने वर्तमान रूप में देशी-विदेशी पर्यटकों और शोधार्थियों के आकर्षण का विशेष केन्द्र है, नियमित ढेरों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ के दुर्लभ संग्रह को देखने के लिए आते रहते हैं। देश के इस अद्वितीय कला संग्रहालय के निर्माण से लेकर कलाकृतियों के संग्रह तक की प्रत्येक गतिविधि में राय कृष्णदास की कला के प्रति समर्पणयुक्त तपस्या ही मुख्य आधार है।

-जगनारायण

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here