शिलालेखों एवं मुद्राओं के आधार पर बनारस का इतिहास

एक अध्ययनशिलालेखों एवं मुद्राओं के आधार पर बनारस का इतिहास:

एक अध्ययनभूमिका – बनारस के इतिहास पर अनेकों विद्वानों ने शहर के अलग-अलग काल खण्डों, साहित्यिक एवं पौराणिक आधारों पुरावशेषों, मुद्राओं के द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इतिहास लिखा है। सिर्फ कुछ ही पुस्तकों में शिलालेखों, ताम्रपत्रों, मूर्ति पर अंकित लेखों एवं मुद्राओं पर अंकित लेखों एवं मुद्राओं पर अंकित नामों के आधार पर शहर के इतिहास का विवेचन किया गया है।

यद्यपि प्राचीन एवं मध्यकालीन सामग्रियों का समावेश अनेक ग्रन्थों में किया गया है, परन्तु 18वीं शदी से 20वीं शदी तक प्राप्त एवं वर्तमान में शहर में अलग-अलग जगहों पर उपलब्ध लेखों का कहीं भी उल्लेख नहीं है; जबकि यही वह समय है, जब वर्तमान शहर का निर्माण अलग-अलग राज्यों के राजाओं, धनिकों जमींदारों एवं अंग्रेजों के सम्मिलित प्रयासों से हुआ था। पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों से आधुनिक जीवनशैली के अंघानुकरण की वजह से अनेकों प्राचीन हेवेलियों, महलों, मठों, को तोड़कर या तो बहुमंजिली इमारतों में या आधुनिक स्वरूपों में बदल दिया जा रहा है। कुछ जगहों पर पुराने नामों को छुपाने के तथा आत्मप्रसिद्धि के लिये नये शिलापट्ट या पुराने लेखों एवं अलंकरणों को मिटा दिया जा रहा है, अतः अभी यदि उन शिलापट्टांे को फोटोग्राफ के साथ लिपिबद्ध नहीं किया गया तो बनारस शहर का इतिहास अधूरा रह जायेगा। इसके अलावा बनारस के इतिहास पर प्रामाणिक किताब ‘काशी का इतिहास’ का प्रथम संस्करण 1962 में छपा था। इस पुस्तक के छपने के पश्चात भी कई शिलालेखों की खोज पुरातत्वविदों द्वारा किया गया है, अतः इन सभी पुरातात्विक खोजों के आधार पर पुनः बनारस शहर का इतिहास लेखन अति आवश्यक है।

पूर्व शोध प्रबन्ध-

बनारस के इतिहास से सम्बन्धित जो भी शिलालेख या ताम्रपत्र मिले हैं वे या तो ‘इण्डियन एण्टेक्यूरी’, ‘जर्नल आॅफ एसेयाटिक सोसाइटी’, ‘एपिग्रफिका इण्डिका’, ‘प्रागधारा’ एवं कुछ अलग-अलग पत्रिकाओं या विभिन्न म्यूजियम के ‘कैटलाग’ में शामिल हैं, परन्तु समग्र रूप से वाराणसी के इतिहास लेखन के परिप्रेक्ष्य में इनका कहीं उल्लेख नहीं है।

पूर्व शोध प्रबन्धों से सम्बद्धता एवं अकादमिक महत्व:

‘इण्डियन एण्टेक्यूरी’, ‘एपिग्राफिका इण्डिका’ के अलग-अलग खण्डों ‘प्रागधारा’ के विभिन्न संख्याओं में एवं अनेकों विद्धानों द्वारा अलग-अलग ग्रन्थों में इससे सम्बन्धित लेखों, शहर के विभिन्न धराहरों, कुण्डों, घाटों पर लगे हुए अप्रकाशित शिलापट्टों के संकलन से बनारस शहर के इतिहास के कालक्रम में अनेकों अप्रकाशित ऐतिहासिक घटनाओं का कालक्रम निर्धारित हो जायेगा।  उदाहरण स्वरूप बनारस के घाटों के नाम हमें सर्वप्रथम गहड़वाल नरेश गोविन्दचन्द्र देव के ताम्रपत्रों से पता चलता है, परन्तु घाटों के निर्माण के सम्बन्ध में यह मत प्रचलित है कि 18वीं शदी के प्रारम्भ से घाटों के पक्का करने का क्रम चालू होता है। इस सम्बन्ध में ‘फ्यूरर’ का एक लेख महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि ‘‘किसी रघुनाथ ठण्डन ने पंचगंगा घाट को पक्का करवाया था’’ फ्यूरर का अनुमान है कि रघुनाथ टण्डन राजा टोडरमल के कोई निकट सम्बन्धी थे। परन्तु यह शिलालेख अप्राप्य है, एवं कुछ विद्वानों का मत है कि यह शिलालेख नकल है। परन्तु ‘द इण्डियन एण्टैक्यूरी’ अक्टूबर 1924 में ‘दयाराम साहनी’ के लेख ‘मणिकर्णिका’ घाट (बनारस) स्टोन इन्सक्रिशन आॅफ विरेश्वरा (विक्रम) संवत् 1359 के आधार पर बनारस के घाटों के पक्का करवाये जाने की तारीख बहुत पीछे चली जाती है। इसी प्रकार शिलालेखों एवं मुद्राओं पर अंकित लेखों से बनारस के इतिहास का पुर्नलेखन करने पर अनेकों अनछुए पहलुओं एवं नये चरित्रों का समावेश इस शहर के इतिहास में होगा।

अध्याय आयोजन –

अध्ययन की सुविधा के हेतु प्रस्तुत शोध परियोजना को निम्नलिखित अध्यायों में विभक्त करके अध्ययन किया जायेगा।

  1. भूमिका- बनारस के इतिहास में लेखों का महत्व
    • लेखों के प्रकार
    • लेखों की भाषा
  2. बनारस का इतिहास: प्राचीन काल से हिन्दू युग तक
    • मौर्य युग से गाहड़वाल युग तक प्राप्त शिलालेख, मुद्राओं का क्रमवार उल्लेख
    • उपरोक्त लेखों के आधार पर बनारस का इतिहास (3)
  3. सल्तनत युग से अवध के नवाबों तक
    • इस काल के प्राप्त शिलालेख एवं मुद्राओं का क्रमवार उल्लेख
    • उपरोक्त लेखों के आधार पर काशी का इतिहास
  4. ईस्ट इण्डिया कम्पनी से स्वतंत्रता प्राप्ति तक
  5. ईस्ट इण्डिया कम्पनी से लेकर स्वतंत्रता तक प्राप्त शिलालेख का क्रमवार उल्लेख।
    • उपरोक्त के आधार पर बनारस का इतिहास।
  6. सिर्फ नाम वाले लेखों का क्रमवार उल्लेख
  7. उपसंहार
  8. संदर्भ ग्रन्थ –
    •  ज्ीम प्दकपंद ।दजपुनंतल  (इसके अलग-अलग टवस)
    • ‘एपिग्राफिका इण्डिका’ (इसके अलग-अलग टवस)
    • श्रवनतदंस व ि।ेपंजपब ैवबपमजल . 4. ‘प्रागधारा’
    • काशी का इतिहास, डाॅ0 मोती चन्द्र
    •  ैमंस ंदक ैमंसपदह व ित्ंरहींज, डाॅ0 पृथ्वी कुमार अग्रवाल
    • ब्ंजंसवहनम व िजीम ैंतदंजी उनेमनउ इल क्ंलं छंजी ैंीदपण्
    • ‘गाइड आफ सारनाथ’-मजूमदार9. काशी नगरी एक रूप अनेक; प्रकाशन विभाग भारत सरकार
    •  बारानोसीर इतिकथा (बाँग्ला); तपन कुमार घोष

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