गुरूधाम मंदिर वाराणसी

दरअसल गुरूधाम मंदिर सिर्फ एक मंदिर न होकर गुरू को समर्पण भी है। महाराजा घोषाल ने इस मंदिर का निर्माण अपने गुरू श्री कृष्ण को समर्पित किया था। ‘गुरूधाम’ का शाब्दिक अर्थ ‘गुरू का धाम’ है। धाम मतलब ज्योति, आलोक, तेज, और गुरू वह जो अज्ञानरूपी अंधेरे को दूर करे।

     (गिरति अज्ञानम् इति गुरूः)

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना इस मंदिर के अवलोकन मात्र से दिख जाता है। यह वही स्थान है जहां नौबतखाना चरण पादुका मंदिर और मुख्य मंदिर बनाये गये हैं। मुख्य मंदिर का निर्माण कमल की आठ पंखुड़ियों पर हुआ। मुख्य भाग में गर्भगृह का निर्माण हुआ है जो सुषुम्ना नाड़ी की प्रतीक है। ठीक बगल में गोलाकार सीढ़ीनुमा संरचना है जो सीढ़ियों को त्रिभुजाकार रूप प्रदान करती है। गोलाकार सीढ़ियां वास्तव में अस्तित्वहीनता की प्रतीक हैं जो शून्य की महत्ता को इंगित करती है। महान संस्कृत व दर्शन ज्ञाता महामहोपाध्याय, गोपीनाथ कविराज के अनुसार गुरूधाम के समान ‘भाव प्रतीक’ मंदिर अन्य कोई मंदिर नहीं है। एक अन्य यादगार स्थापत्यकला नमूना मंदिर के गर्भगृह और बरामदे में दिखता है। जहां सूत्रधार ने आठ अंक को महत्व देते हुए अष्टभुज दीवारों का निर्माण किया है। वास्तव में स्थापत्य कला की दृष्टि से यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम तथा पश्चिमी शैली का प्रतिनिधित्व करता है।

नौबतखाना-

नौबत मतलब शहनाई। वास्तव में नौबतखाना मुगल स्थापत्य कला का उदाहरण है। मंदिर में प्रवेश करते ही पूर्वाभिमुख नौबतखाना है। लाखौरी ईटों से बना यह एक मंजिला नौबतखाना खम्भों और दीवारों पर टिका है इसके ऊपरी भाग पर जहां संगीतज्ञ रियाज किया करते थे। वहीं भक्त अपने दुःखों को छोड़कर संगीतमय वातावरण का आनंद लिया करते थे। नौबतखाने के बरामदे के उत्तर दिशा की ओर एक अभिलेख है जिसमें मंदिर निर्माण से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियां लिखी है। वर्तमान में यह बांके बिहारी श्रीवास्तव की देखरेख में है जो मंदिर के समीप ही रहते हैं। अभिलेख से प्राप्त सूचनाएं संस्कृत भाषा में है।

नारायण कुण्ड-

अन्य प्राचीन मंदिरों की तरह गुरूधाम मंदिर में भी एक जलकुण्ड है जो नौबतखाने के दाहिनी ओर अवस्थित है जिसका नाम नारायण कुण्ड है। वर्तमान में यह कुण्ड नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह सूख चुका है।

आठ प्रवेश द्वार-

मुख्य मंदिर अष्टभुज दीवारों से घिरा है। जिसके आठ द्वार हैं। ये आठ द्वार आठ दिशाओं की ओर केन्द्रित हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के अलावा पूर्वोत्तर (ईशान कोण) दक्षिण-पूर्व  (अग्नि कोण) दक्षिण-पश्चिम (यम कोण) तथा उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) हैं। दीवारों की उंचाई 3 दशमलव 15 मीटर व चौड़ाई 30 दशमलव 48 सेंटीमीटर है। द्वारों के नाम भारत के आठ पवित्र शहरों पर रखे गये हैं। ये हैं काशी (पूर्व), मथुरा ईशान कोण, माया (उत्तर) अयोध्या (वायव्य कोण) पश्चिम पुरी (यम कोण), कांची (दक्षिण और गुरू अग्नि कोण)। दरवाजों के फ्रेम में चुनार के पत्थरों का प्रयोग किया गया है। दरवाजों की लम्बाई और चौड़ाई 1 दशमलव 47 गुणे 76 दशमलव 2 मीटर है।

काशी द्वार मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार है। यह दरवाजा दो बड़े-बड़े खम्भों के बीच है। अन्य द्वारों से इस द्वार को अलग करने के लिए एक दूसरे को घूरते दो शेरों का निर्माण किया गया है जो दरवाजे के शिखर पर हैं अतः इसे सिंहद्वार भी कहते हैं। चूंकि काशी को अविमुक्त क्षेत्र भी कहते हैं अतः पूर्वाभिमुख द्वार मंदिर का काशी द्वार है।

मुख्य मंदिर-

मुख्य मंदिर का गर्भगृह भी अष्टभुज दीवारों से घिरा हुआ है। जिसके चार द्वार पूरब, पश्चिम उत्तर दक्षिण की तरफ हैं। वर्तमान में गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। गर्भगृह के ठीक बगल में त्रिभुजाकार पतली सीढ़ियां हैं, जो वृत्ताकार रूप लेती हैं। वस्तुतः यह सुषम्ना नाड़ी का प्रतीकात्मक रूप है। यह तीन मंजिला मंदिर तीन लोकों का प्रतीकात्मक निरूपण करती है, जो र्भु भुवः और स्वः है और दो गर्भगृह क्रमशः पहले एवं दूसरे मंजिल पर अवस्थित हैं। पहले मंजिल के बरामदे का स्थापत्य निचली मंजिल के स्थापत्य के ही समान है। एक खूबसूरत गुम्बद दूसरी मंजिल पर बनाया गया है। जमीनी तल के गर्भगृह में गुरू का चित्र बनाया गया है। पहले तल पर ईश्ता (राधा कृष्ण युगल) का चित्र बनाया गया है जबकि द्वितीय तल के गर्भगृह में कोई चित्र मूर्ति नहीं है। वर्तमान में गणेश की सुखासन मुद्रा में बैठी हुई मूर्ति है जिनके चार हाथ हैं, सदानंद कार्तिकेय की मयूर पर बैठी मूर्ति रथ आरूढ़ सूर्य की चार हाथों वाली खड़ी हुई मां लक्ष्मी की मूर्ति समभंग मुद्रा में चार हाथों वाली पद्पीठ पर बैठी गजाभिषेक लक्ष्मी और बैठी हुई मां अन्नपूर्णा की मूर्ति अत्यन्त दर्शनीय मूर्तियां हैं।

चरण पादुका मंदिर-

यह मंदिर मुख्य मंदिर के ठीक पीछे पश्चिम दिशा में स्थित है। इस मंदिर का गर्भगृह चतुर्भुज आकार में है। चरण पादुका अष्टभुज आकार में चारो ओर से घिरा हुआ है। इस अष्टभुज वृत्त के अन्दर बंगाली भाषा में खुदा एक छोटा अभिलेख भी है। जहां तक चरण पादुका की बात है यहां बहुत से मांगलिक प्रतीक पद्म, ध्वज, मत्स्य, शंक अवस्थित हैं। यहां द्वार और बरामदे सभी चारो दिशाओं में चुनार के बलुआ पत्थर के बने हैं। पूर्व और पश्चिम दिशा के बरामदे आठ खम्भों पर हैं। वहीं पूर्व पश्चिम दिशा के बरामदे दोनों तरफ से छह खम्भों पर टिके हैं। छत के उपर चतुर्भज आकार के पत्थर से बना रेलिंग भी आकर्षण का केन्द्र है। इस मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पादुका भवन है जो पूर्वाभिमुख है।

वर्तमान स्थिति-

वर्तमान समय में मंदिर में जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा है। इसका सम्पूर्ण देख-रेख क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी सुभाष यादव के जिम्मे है तथा कार्य आवास-विकास परिषद वाराणसी द्वारा कराया जा रहा है। जीर्णोद्धार का यह कार्य नवम्बर 2014 में विश्व धरोहर सप्ताह में सम्पूर्ण कराने का लक्ष्य है। तभी आम जनता के लिए खोला जायेगा। स्मारक के जीर्णोद्धार कार्य के सम्बंध में श्री यादव ने बताया कि इस मंदिर को स्मारक घोषित किया गया है। इसके लिए पूरा प्रयास किया जायेगा कि जैसा यह अपने मूल स्वरूप में था उसी तरह रहे। इसके लिए स्मारक में प्रयोग हुए चुनार के बलुआ पत्थरों तथा शाल की लकड़ी का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार की ओर से मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए एक करोड़ 29 लाख रूपये का बजट पास किया गया है। मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान मंदिर के स्तम्भ, पट्टियां, रंग, अनुकृतियों के स्वरूप यथा सम्भव मौलिक बनाने का पूरा प्रयास किया जायेगा। साथ ही 1 दशमलव 73 एकड़ के मंदिर परिसर को (प्राप्त नोटिफिकेशन के आधार पर ) पूरी तरह साफ-सुथरा व हरा-भरा बनाया जायेगा। जिससे बड़ी संख्या में पर्यटक आकर्षित हो मंदिर देखने पहुंचेंगे।

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