गंगा एवं गंगा आरती

गंगामाँ गंगा भारत की जीवन रेखा हैं। गंगा इस देश की संस्कृति, सभ्यता, सामाजिक एवम् आर्थिक स्थिति की पोषक हैं। “वील एवम् टेस्टमिंथ” में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- “गंगा भारत की वह नदी है, जिसको इसके सारे नागरिक प्यार करते हैं, जिसके इर्द गिर्द भारतीय सभ्यता की यादें, आशायें, डर, विजय का संगीत और पराजय का दर्द समाया है। गंगा भारत की पुरातन संस्कृति एवम् सभ्यता की प्रतीक हैं जो सदा प्रवाहमान होते हुए भी वही पुरानी गंगा हैं।” गंगा विश्व की महानतम नदियों में अपना प्रमुख स्थान रखती हैं। गंगा की सुन्दरता, शक्ति ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवम् धार्मिक महत्व निश्चित ही सर्वोत्कृष्ट और अनमोल है। यह हिन्दुओं की माँ हैं तो इसी के तट के पास सारनाथ (पहले ऋषिपत्तन) महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। यह जैनो, सिक्खों तथा इस्लाम के लिए भी उतना ही पवित्र हैं। करोड़ो भारतीय अपनी भौतिक एवम् आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पुर्ति हेतु माँ गंगा पर निर्भर करते हैं। हर भारतीय इन्हें श्रद्धा से गंगा जी कहता है जिसे पाश्चात्य सभ्यता के लोगों ने गैंगेज बना दिया। “केवल माँ गंगा के पूजन से मानव के सारे देवी देवताओं के पूजन का पुण्य मिल जाता है” “अग्नि पुराण”। ब्रह्म पुराण में लिखा है-

गंगा गंगेति यः योजनानाम् शतैरपि।

मुच्यते सर्व पापेभ्यः विष्णु लोकं स गच्छति।।

अर्थात कई सौ योजन दूर से (1 योजन=13 किलोमीटर) थीं माँ गंगा का जाप करने से मनुष्य स्वयम् को सभी पापों से मुक्त कर निर्वाण को प्राप्त करता है। भारत वर्ष के सर्वकालिक महान लेखक माननीय तुलसीदास जी ने भी लिखा है :

गंगा सकल मुद मंगल मूला।

सब सुख करनि हरनि सब सूला।।

अर्थात् गंगा सभी मंगलकारी घटनाओं की मूल हैं। ये सभी प्रकार के सुख को प्रदान करती हैं और सभी कष्टों का विनाश करती हैं।

गंगा अपने उद्गम स्थल गोमुख (उत्तरांचल) से करीब 2500 कि0मी0 की यात्रा कर अन्ततः पश्चिम बंगाल के गंगा सागर के पास बंगाल की खाणी में मिलती हैं। गंगा बेसिन का क्षेत्रफल लगभग 10 लाख वर्ग कि0मी0 है। इनके जल का करीब 60% यमुना, घाघरा, कोसी एवम् गंडक नदियों से आता है। गंगा बेसिन देश की सबसे उपजाऊ भूमि है। सम्भवतः यही कारण रहा होगा कि देश की सभी प्राचीन महत्वपूर्ण शहर इसके तट पर अवस्थित है। देश की जनसंख्या का 37% भाग (लगभग 40 करोड़) गंगा बेसिन में रहता है। 100 से ज्यादा शहर जिनमें से 29 शहर ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या लाखों में है इसके किनारे स्थित हैं। इन शहरों में केवल कुछ में ही उचित प्रदूषण शुद्धिकरण संयंत्र उपलब्ध है। बढ़ती हुई जनसंख्या ने माँ गंगा के सामने असंख्य समस्यायें उत्पन्न कर दी है।

गंगा को सदा नीरा भी कहा जाता है। सदा से ही इनके अमृत रूपी जल का पान किया जाता रहा है। परन्तु आज माँ गंगा अपने पुत्रों द्वारा किये जा रहे पापों से, अत्याचारों से दुःखी हैं। आज भारत की प्राणधारा जर्जर है प्रदूषण से, बन्धन से। आज आवश्यकता है गंगा की प्राचीन गौरव एवम् सांस्कृतिक वैभव को पुर्नस्थापित करने की। वैदिक काल से आधुनिक काल तक गंगा का महिमागान उसकी उपयोगिता को रेखांकित करता है। ऋग्वेद में नदी सुक्त में नदियों के महिमागान के क्रम में गंगा का सर्वाधिक माहात्म्य वर्णित है।

इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शतुद्रि।

स्तोम सचता पुरुष्णया।।

असिक्या मरुद्धधे वितस्तया।़।़र्जी कीये।

शृणुह्या सुषोमया।।

गंगा हिमालय की पुत्री है, मैना की बेटी है और शिव प्रिया उमा की छोटी बहन। उनके सौन्दर्य पर प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें हिमालय से मांगा एवम् तीनों लोकों में स्थापित किया अतः उन्हें “त्रिपथगा” भी कहा जाता है। महाभारत के 25 वें अध्याय में श्रेष्ठ देश, श्रेष्ठ जनपद, श्रेष्ठ आश्रम, श्रेष्ठ पर्वत और श्रेष्ठ नदियों के प्रसंग में वर्णित है कि वे देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है जहाँ से गंगा (भागिरथी) बहती है। माँ गंगा की श्रेष्ठता निम्न श्लोम में परिलक्षित होता है-

दिवि ज्योतिर्यथा।़।़दित्यः पितृणां चैव चन्द्रमा :।

देवेश्च तथा नृणां गंगा च सरितां तथा।।

अर्थात् स्वर्गवासी देवताओं में जैसे सूर्य का तेज श्रेष्ठ है, जैसे पितरों में चन्द्रमा तथा मनुष्यों में राजाधि राज्य श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सभी नदियों में गंगा जी उत्तम है। यदि हम वाराणसी के इतिहास पर नजर डाले तो हम देखते हैं कि सदा से ही शहर पवित्र रहा है और उसकी पवित्रता में शायद चार चाँद माँ गंगा ने लगाया है। 19वीं शताब्दी तक बनारस, काशी या आनन्दवन बाग बगीचों का शहर यहाँ सुन्दर और जल राशि से परिपूर्ण कई कुण्ड एवम् तालाब थे। शहर की जनसंख्या कम थी तथा कहीं भी फ्लश टायलेट नहीं थे। अतः गंगा की जलधारा सर्वथा पवित्र थी। परन्तु 20वीं शदी में तथा उसके बाद अन्धाधुंध विकास की होड़ में बनारस ने भी माँ गंगा की दुर्दशा में खुलकर सहयोग किया है।

वाराणसी में गंगा के प्रदूषण की शुरूआत सम्भवतः 1790 में हो गयी जब दशाश्वमेध घाट के पास सार्वजनिक शौचालय बने। 1860 में इसी घाट के पास नाले द्वारा मलजल का गंगा में उत्सर्जन प्रारम्भ हुआ। 1866 में बनारस शहर में नगर पालिका की स्थापना के साथ 1892 से 1912 के बीच मलजल के गंगा में उत्सर्जन की व्यवस्था राजघाट के पास की गयी। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में फ्लश टायलेट के प्रचलन के पश्चात् गंगा की दुर्दशा सीमा से अधिक हो गयी। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के द्वारा उत्सर्जित प्रदूषकों का चौथाई हिस्सा अकेले गंगा में डाला जाता है।

शिव नगरी काशी को आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान करने वाली जीवनदायिनी-मोक्षदायिनी पतित पावनी माँ गंगा की आराधना काशीवासी अपने अनोखे अंदाज में करते हैं। यह आराधना पूरे विश्व में ‘गगा आरती’ के रूप में विख्यात है प्रतिदिन सूर्यास्त के पश्चात गोधुलि बेला में काशी के अधिकतर घाटों पर ‘गंगा आरती’ का आयोजन होता है, परन्तु दशाश्वमेघ घाट पर होने वाली गंगा आरती अद्भुत है। आरती के लिये घाट की सिढ़ियों पर विशेष तौर से चबूतरों का निर्माण कराया गया है। चबूतरों पर पाँच-सात-ग्याहर की संख्या में प्रशिक्षित पण्डों द्वारा घण्टा-घड़ियाल एवं शंखों के ध्वनि के साथ गंगा की आरती एक साथ सम्पन्न की जाती है। इन पण्डों की समयबद्धता इतनी सटीक होती है कि झाल आरती पात्र (हर पात्र में 108 दीप होते हैं), से आरती, पुष्प वर्षा एवं अन्य क्रिया एक समय में एक साथ होता है।

    इस मनोरम दृश्य का आनन्द लेने एवं आरती में सहभागी बनने के लिये देशी-विदेशी सैलानी एवं स्थानीय लोगों का आगमन घाट पर होता है। दर्शक घाट की सिढ़ियों एवं नौकाओं से इस आराधना का साक्षी बनने के लिये उत्सुक रहते हैं। आरती के समय दर्शक भाव विभोर होकर माँ गंगा की वन्दना की धारा में प्रवाहमान होते हैं।

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