स्वतंत्रता संग्राम और बनारस

स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद वर्तमान में जब हम अपने राष्ट्र के 200 वर्षों के पराधीनता के समय को देखते हैं तो हमें यह अध्ययन होता है कि अंग्रेजी शासन के विरूद्ध भारत के प्रायः हरेक भाग एवं शहरों में जन आन्दोलन एवं विद्रोह हुए थे। इन विद्रोहों में कुछ प्रमुख एवं कई स्थानीय स्तर पर व्यक्ति एवं छोटे स्थानीय समूहों के द्वारा किया गया था। बड़े विद्रोहों का तो ऐतिहासिक लेखा-जोखा मिल जाता है, परन्तु कोई शहर केन्द्रित स्थानीय विद्रोहों का उस स्थान के तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं, सरकारी पत्रावलियों एवं कुछ एक का लोक गाथाओं में उल्लेख मिलता है। शहर बनारस में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध कई विद्रोह हुये, उनका क्रमवार उल्लेख आगे है।

1774 ई0 में अवध के नवाब सुजाउदौला की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र आसफउदौला गद्दी पर बैठे एवं इस्ट इण्डिया कम्पनी से नये बन्दोबस्त के अनुसार राजा चेतसिंह के नाम जो भू-भाग था उन पर मालिकाना हक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का हो गया एवं 1776 ई0 में राजा चेत सिंह को कम्पनी की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें कोई ऐसी शर्त नहीं थी जिससे निश्चित मालगुजारी कभी बढ़ाई न जा सके। गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स एवं राजा चेत सिंह के बीच कम्पनी शासन के शुरूआत से ही वैमनस्यता बनी रही एवं विभिन्न कारणों से यह मन मुटाव बढ़ता ही रहा एवं हेस्टिंग्स ने भी राजा को तंग करने की ठान रखी थी। इन्हीं परिस्थितियों में कटुता अपने चरम पर पहुँच गयी 15 अगस्त 1781 को वारेन हेस्टिंग्स बनारस आया एवं 16 अगस्त को मैकहम को हुक्म दिया कि वे राजा चेत सिंह को शिवाला घाट पर स्थित महल में गिरफ्तार करके रखा जाये, एवं राजा की गिरफ्तारी के पश्चात वहाँ लेफ्टिनेंट स्टाकर, स्काट एवं साइक्स रखे गये, स्काट के साथ फौज की दो कम्पनी भी थी।

मैकहम ने अपने एक मातहत चेतराम को राजा के पास पत्र देकर भेजा कि हेस्टिंग्स उनके पत्र से खुश है, परन्तु चेतराम के द्वारा राजा चेत सिंह के साथ बद्तमीजी से पेश आता देखकर मनियार सिंह ने चेतराम को ललकारा एवं इसी शोरगुल में बाहर गोलियां चलने लगी एवं चेतराम राजा चेतसिंह से लिपट पड़ा इस पर ननकू सिंह नजीब ने चेतराम के दो टुकड़े कर दिये एवं राजा के आदमी उन कम्पनी के सिपाहियों पर टूट पड़े एवं उन्हें अफसरों सहित मार गिराया। शिवाला घाट के लड़ाई में कम्पनी के बयासी आदमी मारे एवं तिरानबे सिपाही घायल हुये थे।

राजा चेत सिंह को मनियार सिंह ने सलाह दी की वे तुरंत माधोदास की बाग में जाकर वारेन हस्टिंग्स को गिरफ्तार करें, परन्तु बक्सी रूदाक्द के सलाह पर वो रामनगर भाग गये यदि वे उस समय हेस्टिंग्स पर हमला कर देते तो शायद भारत का इतिहास और कुछ होता। शिवाला घाट पर चेत सिंह के किले के गेट के सामने सफेद संगमरमर पर एक शिलालेख है जिसमें लिखा है कि-

 

This tablet has been erected by the Govt. of the united provinces to preserve the last earthly resting place of Lieut arch scott is battalion Sepoy jarsymes 2nd J stalker resd body guard who were killed with 200 Sepoy 17th 1781 near this spot doing their duty

 

वर्तमान में लहुराबीर में जहाँ I.M.A. भवन है वही इन सिपाहियों को दफनाया गया था एवं वर्तमान I.M.A. भवन के निर्माण के समय इन कब्रों को अन्यत्र स्थानान्तरित किया गया था। आसफउदौला के मृत्यु के पश्चात् अवध के गद्दी के लिये दो प्रतिस्पर्धी हुये एक वजीर अली एवं दूसरे सआदत अली। वजीर अली कुछ दिनों तक अवध के नवाब बने एवं उन्हें उनके खराब चाल चलन की वजह से पदच्युत होना पड़ा एवं सहादत अली को गद्दी सौंपी गयी वजीर अली को बनारस में डेढ़ लाख सालाना का पेंशन देकर माधोदास के बगीया में रखा गया। वजीर अली की हैसियत उस समय एक साधारण नागरिक की ही थी परन्तु अपने ठाट-बाट, हथियारबन्द सिपाहियों को साथ लेकर चलने एवं अधिकारियों की बात न मानने से बनारसियों पर यह प्रभाव डालते थे कि वे स्वतंत्र राजा हैं।

1755 के जनवरी में वजीर अली को बनारस छोड़कर कलकत्ता जाने का आदेश दिया गया, उस समय बनारस में प्रमुख अफसर थे मि0 चेरी जो गर्वनर जनरल के प्रतिनिधि एवं मि0 डेविस बनारस के जज और मजिस्ट्रेट, वजीर अली ने मि0 चेरी के घर पर जाकर उन पर आक्रमण कर चेरी इनके सेक्रेटरी मि0 इवांस एवं कैप्टन कानवे को मार डाला। इसके बाद वे मि0 डेविस के घर पर हमला बोले परन्तु मि0 डेविस बच गये। इसी बीच शहर में विद्रोह शुरू हो गया। कुछ अंग्रेज सिपाहियों को मार डाला गया एवं बनारस के कुछ अंग्रेजों के घर पर आग लगा दी गयी। परन्तु शाम होने तक शहर में पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया था, वजीर अली के कुछ साथी फौज का मुकाबला करते हुये मारे गये। स्वयं वजीर अली आजमगढ़ की ओर भाग गये, वजीर अली के प्रमुख सहयोगी के रूप में जगतगंज के जगत सिंह, भवानी शंकर, शिवदेह चितईपुर के एवं शिवनाथ सिंह ब्रह्मताल में रहते थे। जगत सिंह एवं भवानी शंकर को मृत्युदण्ड दिया गया, परन्तु शिवनाथ सिंह ने अपने सहयोगी बहादुर सिंह अपने मकान को अंग्रेज सिपाहियों द्वारा घेरे जाने को देखकर चौबीस घण्टे तक अपने को एक कमरे में बन्द रखा एवं उसके बाद अपने साथियों सहित निकलकर कई सिपाहियों को मारने एवं घायल करने के पश्चात् लड़ते हुए अपने प्राण त्यागे। ब्रह्मनाल में सब्जी मंडी के पीछे, तारा मन्दिर के सामने इनकी याद में एक चौरा बना है, वर्तमान में लोग इनका नाम तो भूल गये हैं, परन्तु यह याद करते हैं कि इसी जगह पर किसी वीर ने अंग्रेज सिपाहियों से लोहा लिया था। इनका श्रृंगार होली के दिन शाम को होता है।

पुनः 1810 ई0 में कम्पनी सरकार ने बनारस में गृहकर (भवन कर) लगाया, बनारसवासी गृहकर का कभी नाम नहीं सुने थे अतः उन्होंने इस कर के विरूद्ध सामूहिक धरना देने का मन बनाया एवं इसके लिये बड़ी तैयारियां की गयीं। बनारस के तीन लाख लोग आग न जलाने की शपथ लेकर अपना काम छोड़कर अपने मकानों को बन्द करके मैदान में बैठ गये। सरकारी अधिकारी जनता को मनाने के लिये अनेक प्रयास किये एवं अन्त में सरकार को झुकना पड़ा एवं बनारस की जनता को फाटक बन्दी, चौकीदारी और फाटकों के मरम्मत के खर्च को कर के रूप में लेने के खर्च से मुक्त कर दिया गया, धार्मिक स्थलों एवं निर्धनों को भी इस कर से मुक्त रखा गया।

इसी क्रम में एक थे भंगड़ भिक्षुक जो कम्पनी के कानून को ठेंगे पर रखते थे, इनके गिरफ्तारी पर कम्पनी ने पाँच सौ रूपये का इनाम रखा था। एक बार भंगड़ भिक्षुक को कटेसर से लौटते समय गिरफ्तार करने की नियत में सिपाहियों ने जब घेरा तो भिक्षुक भाग कर अपने त्रिलोचन घाट पर स्थित मढ़ी में जा छुपे; जो भी सिपाही इन्हें पकड़ने जाता वह जिन्दा नहीं बचता। अंत में लकड़ी मंगवाकर उस मढ़ी के मुंह में एवं चारों तरफ लकड़ी रखकर आग जलवा दी गयी जिसमें भंगड़ भिक्षुक जलकर भस्म हो गये।

1852 ई0 में शहर बनारस में पुनः गड़बड़ी फैली। इस बलवे के मुख्यतः दो कारण थे। पहली अफवाह यह फैली कि जेल में हिन्दू कैदियों के भोजन में परिवर्तन से उनका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा, एवं बनारस की फाटक बन्दी तोड़ना एवं सांड़ों को पकड़वाकर ‘काजी-हौद’ में बन्द करना था, जिसका विरोध ‘नागर बन्धु’ कर रहे थे, इन्हीं दोनों कारणों से शहर में अफवाह का बजार गर्म हो गया एवं बनारस के सभी दुकान, बजार बन्द हो गये। नाटी इमली में बनारस के कलेक्टर मि0 गाबिन्स एवं कोतवाल गोकुलचन्द ने सभी को इकट्टा कर समझाना चाहा परन्तु लोग इस पर गौरेय्या (यही का चिलम) फेंकना शुरू कर दिये एवं धीरे-धीरे बलवा बढ़ता गया। तीन दिनों तक बजार बन्द रहे एवं अलग-अलग स्थानों पर काशी की जनता इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन करती रही। चार दिन के बाद बिना किसी विशेष नुकसान के यह झगड़ा समाप्त हो गया। बनारस के इतिहास में इस विद्रोह को (गौरेय्याशाही) के नाम से जाना जाता है।

1857 के गदर में जब पूरा उत्तर भारत जल रहा था तो बनारस में इस आग के कुछ चिनगारियां ही गिरीं, देशी सिपाहियों ने एक जून को खाली की गयी बैरकों में आग लगा दी एवं चार जून को जब देसी सिपाहियों से हथियार लेने के इरादे से उन्हें परेड पर बुलवाया गया तब अंग्रेजों को अपनी तरफ बन्दूक लेकर आता देख सिपाही भड़क गये एवं अपने अफसरों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। इसी की देखा-देखी 13 नं0 पलटन में भी विद्रोह हो गया, परन्तु जल्दी ही कर्नल नाइल के अगुवाई में इस विद्रोह को ठंडा कर दिया गया। छावनी में गोलियों की आवाज सुनकर शहर में गड़बड़ी फैल गयी। कुछ अंग्रेज अफसर कचहरी के छत पर इकट्ठा होकर अपना बचाव करना चाह रहे थे; उसी समय इन अफसरों पर सिक्ख सिपाही हमला करने वाले थे, परन्तु शहर में राजनैतिक शरणार्थी सरदार सुरजीत सिंह ने सिक्ख सिपाहियों को इस आक्रमण को करने से रोक लिया इस कार्य में इनके सभी जजो के नजीर गोकुलचन्द भी थे।

गदर के दौरान तरह-तरह के अफवाह फैलने एवं अलग-अलग तरफ से आक्रमण के सूचना को देखते हुये शहर में 9 जून से फौजी कानून लागू किया गया एवं राजघाट तक किलेबन्दी कर दी गयी थी। इसका प्रमाण हमें आदिकेशव घाट पर लगे एक शिलालेख से मिलता है, जिसमें लिखा है कि- पुनः आदि केशव मन्दिर में पूजा प्रारम्भ (1863 से शुरू) हुआ इसके पहले सुरक्षा कारणों से यह बन्द था।