जानिय देवदीपावली का पूरा इतिहास – विकास वाराणसी

देवदीपावली अप्रितम, अद्भुत एवं अविस्मरणीय शायद ये अलंकारपूर्ण शब्द भी देवदीपावली की गरिमा का बखान करने में कमजोर पड़ जायें। इस त्यौहार की ऐसी लोकप्रियता जिसका गवाह बनने के लिए काशीवासियों का जनसैलाब तो छोड़िये विदेशी भी खिंचे चले आते हैं और उस खास निशा का आनंद उठाते हुए बरबस ही कह उठते हैं- ‘फैबुलश‘। दुल्हन की तरह सजे घाटों के सामने देवदीपावली की रात पूर्णिमा का चांद भी काशी में फीका नजर आता है। लाखों दीपों से जगमागा उठने वाले घाटों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि अंतरिक्ष के सितारे जमीं पर उतर आये हैं और सभी मिलकर काशी का अभिनंदन कर रहे हैं। ‘देवदीपावली‘, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो जा रहा है देवों की दीपावली। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पतित पावनी मां गंगा के तीरे घाटों पर देवों के स्वागत में लाखों दीप एक साथ टिमटिमा उठते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवदीपावली के अवसर पर देवलोक धरती पर उतर आता है और समस्त देवता एक साथ मिलकर देवादिदेव भगवान शिव की महाआरती करते हैं। काशी और देवत्व के इस अनुपम मिलन का साक्षी बनता है- अथाह जनमानस।

देवदीपावली की तैयारी घाटों पर एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। अस्सी से लेकर राजघाट तक के घाटों को सजाने के लिए लोग जी-जान से जुट जाते हैं। देवदीपावली वाले दिन तो सुबह से ही घाटों पर दीपों को रखने का क्रम शुरू हो जाता है। दीपों से लोग स्वास्तिक, ओम, रंगोली सहित अन्य मंगलकारी प्रतीकों का आकार देते हैं। घाटों को सजाने का काम भी बड़ा ही परिश्रमपूर्ण होता है। घाटों की सीढ़ियों पर दीपों को सजाने में जितनी आसानी होती है वहीं, ढलाननुमा सीढ़ियों पर दीपों को रखने में उतनी ही दिक्कत होती है। बावजूद इसके गीली मिट्टी को ढलाननुमा सीढ़ियों पर चिपका कर दीपों को उसी के सहारे रखा जाता है।

देवदीपावली के खास आकर्षण का केन्द्र दशाश्वमेध, पंचगंगा, राजेन्द्र प्रसाद, शीतला घाट रहता है। इन दोनों घाटों के सामने गंगा की मद्धिम लहरों के उपर नावों पर बने बड़े-बड़े मंचों पर होने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। वैसे दीप प्रज्जवलन की शुरूआत पंचगंगा घाट से होती है। जहां महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनवाया गया हजारा दीप स्तम्भ पर शाम को करीब पांच बजे दीप जलाये जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे सभी घाट रोशनी से नहा उठते हैं और आसमान सतरंगी आतिशबाजी से रंगीन हो जाता है। गंगा की कल-कल करती धारा और घाटों पर लपकते लौ में जलते दीपों की श्रृंखला विहंगम दृश्य प्रस्तुत करती है। एक ओर जहां लोगों की भीड़ एक से दूसरे घाटों पर आते-जाते हुए इस दृश्य का मजा उठाते अघाती नहीं है वहीं, गंगा में हजारों नावों पर सवार लोग इस मनोरम दृश्य का अवलोकन करते हुए इसे अपने कैमरों में कैद करते हैं।

दशाश्वमेध और शीतला घाट की सीढ़ियों पर तो लोग दोपहर बाद से ही कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं। जिससे दोनों घाटों पर बने बड़े से मंच पर होने वाले कार्यक्रम का लुत्फ उठा सकें। लोगों के रोमांच की पराकाष्ठा उस समय चरम पर होती है जब गंगा आरती शुरू होती है। इस दौरान घाटों के अलावा गंगा में इधर-उधर बिखरे नाव एक साथ इसी दोनों घाटों पर सिमट जाते हैं। इस पल का नजारा देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी चि़त्रकार ने कैनवास पर अपनी कल्पना की कूची से तस्वीर बनायी है। वहीं, लोगों के आकर्षण का केन्द्र कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनायी गयी इंडिया गेट का प्रतिरूप भी होता है। इस दौरान सेना के अधिकारियों के समक्ष गाॅड आॅफ आॅनर भी दिया जाता है। इसके अलावा मंच पर संगीत की सुर सरिता भी बहती है, जिसमें चर्चित कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं।

हाल के वर्षों में देवदीपावली की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि अब इसका आयोजन घाटों की चैहद्दी को पार कर गंगा उस पार रेती तक पहुंच गया है। उस पार भी कई जगह दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बात जो देवदीपावली की सुंदरता में चार चांद लगाती है वह है घाटों को सजाने की प्रतिस्पर्धा। कई समितियां अलग-अलग घाटों को सजाने का काम करती हैं। इस दौरान अपने घाट को सजाने में हर समिति जी-तोड़ प्रयास करती है। घाटों के श्रृंगार की इस प्रतिस्पर्धा में अस्सी से लेकर राजघाट तक की जो समग्र तस्वीर परिलक्षित होती है वह लाजवाब बन जाती है। घाटों को सजाने का काम सिर्फ समितियां ही नहीं करती हैं बल्कि आम जनमानस जो घाटों को अपनी विरासत समझता है वह भी दीप प्रज्जवलन में सहयोग करता है। कई लोग अपने घर से ही घाटों पर दीया, बाती और तेल लेकर भी पहुंचते हैं और बिना किसी औपचारिकता के बनारसीपन के साथ दीप जलाने में लग जाते हैं।

देवदीपावली का इतिहास– धर्म और आस्था के केन्द्र काशी में नवीनता को परंपरा का रूप लेते देर नहीं लगती। जीवन को उल्लासपूर्ण बनाने का जो मर्म काशीवासियों के पास है वैसा शायद ही किसी के पास होगा। छोटी सी शुरूआत को भी अदभुत विस्तार देने की खास प्रवृत्ति काशी की रही है। तभी तो 18वीं सदी में पंचगंगा घाट पर महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने़ हजार दीप एक साथ प्रज्जवलित कर देव आराधना की थी, जिसने धीरे-धीरे परंपरा का रूप धारण करती गयी। 1773 ई0 में महारानी ने पंचगंगा घाट पर ही दीप जलाने के लिए  हजारा दीप स्तम्भ का निर्माण कराया, जिस पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन महारानी ने दीप प्रज्ज्वलित किया था। दीप जलाने की कड़ी में 1930 में काशी नरेश ने यु़द्ध में शौर्यपूर्ण प्रदर्शन के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों के सम्मान में दशाश्वमेध घाट पर देव-दीपावली के दिन आकाशदीप जलवाया था। पंचगंगा घाट पर 1986 में राजनाथ पाण्डेय उर्फ नारायण गुरू ने कुछ लोगों के साथ देवदीपावली को विधिवत मनाने की परंपरा का सू़त्रपात किया। इस त्यौहार के विस्तार के लिए 1989 में केन्द्रीय देवदीपावली समिति का गठन किया गया।

देवदीपावली के दिन पहली बार करीब 100 लोगों ने दीप जलाये थे। 1998 में देवदीपावली के पावन अवसर पर महाआरती हुई थी। 1999 में कारगिल यु़द्ध में शहीद हुए देश के सपूतों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा शुरू हुई। जिसके तहत इंडिया गेट की प्रतिमूर्ति बनायी जाती है, जहां सेना के अधिकारियों की मौजूदगी में गाॅड आॅफ आॅनर दिया जाता है।

पौराणिक मान्यता- देवदीपावली के बारे में पौराणिक मान्यता भी बड़ी रोचक है। कथा के अनुसार काशी के प्रथम शासक दिवोदास ने क्रोधित होकर काशी में समस्त देवी-देवताओं के प्रवेश पर रोक लगा दिया था।  ऐसी परिस्थिति में देवता काशी में आने के लिए व्याकुल हो गये । तब देवता छिपकर गंगा घाटों पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने आते थे। बाद में देवताओं के काशी प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया गया। इस निर्णय से प्रसन्न देवताओं ने दीपमालाओं से सजे विजय दिवस मनाने के साथ देवादिदेव भगवान शिव की आराधना में कार्तिक पूर्णिमा पर महाआरती किया। ऐसा माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही देवदीपावली मनायी जाने लगी। एक दूसरी घटना के अनुसार त्रिपुर नाम का एक दैत्य था, जिसने खूब उत्पात मचा रखा था। उसके भय से लोग त्रस्त हो गये थे। उससे निबटने के लिए कार्तिकेय के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध कर उसका संहार किया। इस विजय पर कार्तिकेय के साथ महादेव की महाआरती की गयी एवं नगर को दीपमालाओं से सजाया गया।

-आनन्द पाण्डेय

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