संकट में हैं काशी के कुण्ड-तालाब

जल तीर्थों के जुझारू योद्धा ई0 सुरेंद्र नारायण गौड़ अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन बनारस को लेकर उनकी चिंता और चिंतन लगातार हमारे बीच बना हुआ है। इसी क्रम में उनके द्वारा कुंडों तालाबों को बचाने के लिए किये गये हस्तक्षेप को पढ़िए इस लेख में-

काशी विश्व की प्राचीनतम जीवन्त नगरियों में से एक है जिसकी विगत पाँच हजार वर्षों का अपना एक इतिहास है। वास्तव में काशी ताल, तलैया, सरोवर, जलाशय और कुण्डों तथा कूपों वाला वनाच्छादित इलाका था। जिस प्रकार काशी के कण-कण में शिव का बास है और इसी दृष्टि से वह पूजनीय बन गया है। उसी तरह से इस धार्मिक नगरी की कुण्ड, सरोवर, तथा कूपों की गणना भी जल तीर्थ के रूप में की जाती रही है। 18वीं शताब्दी में काशी (वाराणसी) जल प्रवाह, कुण्डों एवं वन की स्थिति वास्तव में कैसी थी नक्शे में दर्शायी गयी है।

    (वाराणसी) अपनी काशी की यह स्थिति उस समय थी जब राजा दिवोदास का वाराणसी में शासन था और आबादी काशीराज दिवोदास की छत्रछाया में (वर्तमान में राजघाट फोर्ट, काशी रेलवे स्टेशन, बसंत कालेज, वरूणा नदी का तटवर्ती इलाका) रहती थी। इतिहास बदलता रहता है क्योंकि कालचक्र में ठहराव नहीं आता। इसी प्रकार जो आबादी पौराणिक काल में वर्तमान काशी से काफी दूर रहती थी वह समय के बदलने के साथ ही आगे बढ़ती रही और कालान्तर में उसने ‘आनन्द कानन’ के नाम से विख्यात इलाके को अपने आगोश में ले लिया। आज का वाराणसी, बनारस या धर्मक्षेत्र काशी ही आनन्द कानन है जहाँ कभी घने जंगल, सरोवरों व कुण्डों की भरमार थी। वाराणसी में तो मुहल्ले-मुहल्ले में जैसे मन्दिर अवस्थित हैं उसी तरह थोड़ी-थोड़ी दूर पर एक से बढ़कर एक जलतीर्थ और कुण्ड विद्यमान हैं। इनका धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही शहर के प्राकृतिक स्वरूप को ये कुण्ड और सरोवर संतुलित रखते थे। वाराणसी के पूरे क्षेत्र का तीन चौथाई इलाका वनाच्छादित जलाशयों का था।

    बढ़ती आबादी तथा कंक्रीट के जंगलों के फैलाव के बावजूद इनके कुण्डों का स्वरूप अभी कायम है लेकिन जिस तरह से इनकी उपेक्षा की जा रही है उससे यही आभास होता है कि एक समय स्वच्छ जल से लबालब भरे और नगर की जल आपूर्ति के कभी भण्डार रहे, ये कुण्ड जल्दी काल के निष्ठुर गाल में समा जायेंगे। क्योंकि न तो इनके रख-रखाव की किसी को चिन्ता है और न स्थानीय लोग और जिला प्रशासन इस बारे में उत्सुक हैं। आबादी के दबाव तथा नगर को महानगर का स्वरूप देने के लोभ में पता नहीं कितने सरोवरों को पाटा जा चुका है। कोतवाली क्षेत्र में स्थित हंस-तीर्थ (जिसके नाम पर हरतीरथ मुहल्ला है) अब अस्तित्व में ही नहीं है। भू-माफियाओं ने बड़े ही नियोजित ढंग से इसको पाट दिया और टुकड़ों-टुकड़ों में उस पर कब्जा हो गया।

    उसी प्रकार वाराणसी विकास प्राधिकरण ने भी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर ‘तार-तीर्थ कुण्ड’ 10वीं सदी का रानी भवानी द्वारा निर्मित ओंकालेश्वर महादेव का सुन्दर पक्का तालाब (आराजी नं0 233 रकबा एक बीघा एक विस्वा) जो छित्तनपुरा मुहल्ले के लबे रोड पर था उसे पाटकर एकता नगर कालोनी बनाकर बेच दिया गया और तालाब के शेष भाग पर कुछ दबंगों ने कब्जा कर भवन निर्माण कर रखा है।  छित्तनपुरा स्थित श्री ओंकालेश्वर महादेव के तीर्थ शुभोदक कूप (आराजी नं0 2075 पर है) जो ओंकालेश्वर मंदिर के पूरब में जिसे कुछ अवांछनीय लोगों ने अभी हाल ही में  पाटकर कब्जा कर लिया है परन्तु जिला प्रशासन उदासीन रहा। इस महत्वपूर्ण काशी की सांस्कृतिक धरोहर तालाब व कुण्डों की न ही पैमाइश करायी जा रही है और न ही कोई वैधानिक संरक्षण की अब तक कोई व्यवस्था की गई है।

    शहर की घनी आबादी के बीच दो विशाल कुण्ड दुर्गाकुण्ड व लक्ष्मीकुण्ड का धार्मिक महत्व होते हुये भी उपेक्षित है। अब तक शासन एवं प्रशासन से रख-रखाव व संरक्षण के लिये कोई कारगर ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गयी है जिसके कारण काशी के धार्मिक सांस्कृतिक धरोहरों तालाब व कुण्डों का अस्तित्व खतरे में है।

    इन कुण्डों की उपेक्षा तथा सरोवरों को पाट दिये जाने का खामियाजा अब नागरिकों को अच्छी तरह भुगतना पड़ रहा है। कुण्डों तथा अन्य जलाशयों के कारण न तो शहर में वर्षा का पानी लगता था और न कभी पेय जल का संकट होता था। वर्षा का पानी स्थान-स्थान पर इसलिए नहीं लगता था, क्योंकि शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में जलाशयों की भरमार थी और वहाँ तक वर्षा के पानी को अबाध पहुँचने का मार्ग भी था। किन्तु आबादी बढ़ने और नगर का विस्तार होने के साथ ही अतिक्रमण की मानसिकता के कारण एक ओर तो जलाशयों को उनके प्राकृतिक स्वरूप से ही वंचित करने का सुनियोजित अभियान चलाया गया तो दूसरी ओर भू-माफियाओं ने कुण्डों, पोखरों, तालाबों व सरोवरों पर कब्जा कर लिया। दूसरी ओर दुकानदारों ने पटरियो को दुकानों में समाहित कर सरोवरों तथा अन्य कुण्डों आदि की जल सप्लाई लाइन को हमेशा के लिये बाधित कर दिया।

    पानी आपूर्ति ठप्प हो जाने से जहाँ तालाब व पोखरे न केवल सूख गये बल्कि भू-जल का स्तर भी कम हो गया। जलाशयों के आस-पास के मकानों में कुओं का जल स्तर अब 100 फुट से भी अधिक नीचे पहुंच गया है। जबकि दो-तीन दशक पहले 30 से 40 फुट पर पानी उपलब्ध रहता था।

    सन् 1822 में ब्रिटिश इंजीनियर द्वारा जारी वाराणसी के सम्भवतः पहले अधिकृत मानचित्र में इस शहर के जलाशयों तथा जल तीर्थों का सम्यक चित्रण है। मानचित्र में जहाँ एक-एक जलाशयों, सरोवरों व कुण्डों के बारे में अधिकृत जानकारी दी गई है वही इस बात को भी दर्शाया गया है कि इस नगर में गंगा व वरूणा ही नहीं बल्कि मत्स्योदरी (मछोदरी), मन्दाकिनी (आज का मैदागिन) तथा गोदावरी नाम जल श्रोत भी थे, जो वास्तव में नदियाँ थी और उनका जल बराबर गंगा नदी में गिरता था। प्रकारान्तर से ये जल श्रोत गंगा के स्तर को जहाँ बनाये रखने में मदद करते थे तो दूसरी ओर नगर में जलापूर्ति के साधन होने के साथ ही भू-जल के स्तर को भी एक निश्चित स्तर पर रखते थे। भौगोलिक परिवर्तनशीलता के कारण ये नदियाँ प्रतीक रूप में मन्दाकिनी (मैदागिन पार्क) अब कम्पनीबाग में और मत्स्योदरी अब वर्तमान में मछोदरी पार्क में सिमट गयी है। गोदावरी की धारा नई सड़क से होते हुये दशाश्वमेघ घाट के पास गंगा में मिल जाती थी। इस बीच में डेढ़सी का पुल था।

    महानगरों के सुन्दरीकरण की योजना स्थानीय स्तर से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गयी है। शहरों के चौराहो, मार्ग विभाजकों तथा सड़कों के किनारों को सुन्दरीकरण में शामिल कर लिया जाता है, लेकिन काशी जैसी प्राचीनतम धार्मिक नगरी के ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक गाथाओं से परिपूर्ण कुण्डों, कूपों, बावलियों तथा अन्यान्य जल सरोवरों के रख-रखाव अथवा उनके आस-पास के स्थलों के विकास अथवा सुन्दरीकरण एवं संरक्षण के लिए कोई ठोस व्यवस्था आज तक नहीं की गई। क्षेत्रीय नागरिकों के प्रयास से कभी-कभार कुछ हुआ भी तो वह ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुआ।

    यदि स्थानीय प्रशासन पानी के इन आगाध श्रोतों का संरक्षण करने के लिये पैमाइश करा कर वास्तविक कब्जा के लिये उपाय करे तो इससे अनेक तरह का लाभ होगा और सबसे बड़ा फायदा तो पानी के संकट को एक सीमा तक दूर किया जा सकता है।

                                                                                                                                                                                                      

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