वर्तमान काशी में मिट्टी, सांचा और मूर्तियाँ

सर्वविद्या की राजधानी काशी नगरी का कला पक्ष प्राचीनकाल से ही अत्यन्त सुदृढ़ और व्यापक रहा है। इस क्रम में यहाँ की मृण मूर्तियों का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर के चर्चित कला संग्रहालय भारत कला भवन में संरक्षित राजघाट के उत्खनन में प्राप्त पांचवीं शती ई0 की भगवान् शिव की मृण प्रतिमा सम्भवतः यहाँ की पत्थर की मूर्तियों से भी पुरानी है। यह काशी की मृण मूर्ति कला के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के दस्तावेज सरीखी है।1

वर्तमान पृष्ठभूमि – काशी की यह प्राचीन कला यहाँ के अनेक कुम्हार परिवारों में आज भी परम्पराओं के रूप में जिन्दा है। वाराणसी में मिट्टी से बनी मूर्तियाँ पूजा और सजावट के कार्यों में प्रयुक्त होती हैं। काशी के पारम्परिक कारीगरों द्वारा बनायी गयी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ दीपावली, धनतेरस और गणेश चतुर्दशी के अवसर पर विशेष रूप से पूजी जाती हैं। इसके अतिरिक्त इन पारम्परिक कुम्हार मूर्तिकारों के हाथों बनी देवी-देवता और पशु-पक्षियों की मृण मूर्तियाँ सजावट के लिए भी घरों में रखी जाती है।

इक्कीसवीं सदी के प्लास्टिक, फाइबर और वैज्ञानिक युग में भी काशी की मिट्टी की मूर्तियों और खिलौनों की मांग का बना रहना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इन मूर्तियों में अब भी दमखम और जीवन्तता है जिसके कारण ही इनकी मांग लगातार बनी हुई है। वाराणसी महानगर एवं इसके आस-पास के ग्रामीण अंचलों में समय-समय पर लगने वाले मेले-ठेले के अलावा दशहरा, दीपावली और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे पर्वों पर ये मूतियां खूब बिकती हैं। रथयात्रा, दुर्गा जी, सारनाथ और सोरहिया, जीवित्पुत्रिका तथा अन्य सभी तरह के स्थानीय पर्वों एवं मेलों के मौकों पर काशी में मिट्टी से बनी मूर्तियों (खिलौनों) की बिक्री अब भी खूब होती है।

सांचे से बनी पोली मूर्तियां वस्तुतः पूनः उत्पादित कृतियां होती है। इसके लिए किसी आकृति विशेष की मूर्ति का सांचा विशेष श्रेणी के कलाकारों द्वारा बना लिया जाता है। पुनः इन सांचों में ढालकर ढेरों मूतियां, मांग के अनुसार बनाकर भारी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। इस प्रकार छोटे आकार की ढेरों मूर्तियां थोड़े समय में तैयार हो जाती है। बनारसी भाषा में सांचे से थोक भाव में मूर्ति बनाने के इस काम को ‘पथाई’ का काम कहते है। ये सांचे दो भागों में होते है जिनमें जरूरी सामग्रियों के साथ गुंथी हुई गीली मिट्टी की पर्त को भरकर उसे अंगुलियों से अच्छी तरह दबाया जाता है। पुनः सांचे के दोनों भागों को आपस में जोड़कर मूर्तियों के दोनों हिस्सों को आपस में जोड़कर सांचों से निकाल लिया जाता है। सांचों में गीली मिट्टी भरने से पहले सांचे में आँवे की बारीक राख को कपड़ों से छानकर उसे पोटली में बांध कर छिड़क लिया जाता है। इससे गीली मिट्टी से आकार प्राप्त करने वाली मूर्तियां आसानी से सांचे के बाहर निकल आती है। सुखाने और आंवे में पकाने के बाद इनकी रंगाई करके बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है।2

वाराणसी में इस प्रकार के सांचों में बनी मूर्तियों के बनाने वाले ढेरों कारीगर और निर्माता हैं। लक्सा, जद्दूमण्डी, रेवड़ी तालाब, सोनारपुरा, बजरडीहा, लल्लापुरा और सोनिया के अलावा महानगर के कई बाहरी स्थानों पर भी मिट्टी की मूर्तियां बनती हैं। इस स्थानों पर बनने वाली लक्ष्मी-गणेश की मिट्टी की पकी मूर्तियों की बनारस और बनारस के बाहर आज भी अच्छी मांग है।

काशी में मिट्टी की मूर्तियों के निर्माण में लगे हुए शिल्पकारों (कारीगरों) को काम के अनुसार निम्न तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –

(1)  आकृति और चित्रों को देखकर या अपनी कल्पनाओं से मृण मूर्ति बनाने              वाले मूर्तिकार

(2)  सांचे में मूर्ति के विभिन्न अंगों को जोड़कर मूर्ति को सम्पूर्ण आकार प्रदान          करने     वाले मिट्टी के कलाकार।

(3)  सांचे से मिट्टी की मूर्ति बनाने वाले कारीगर।

(1)  काशी में मिट्टी से मूर्ति निर्माण में लगे इस श्रेणी के कलाकारों को वास्तविक     मूर्तिकार माना जाता है। वास्तव में मिट्टी के कलाकार ये ही हैं। इस श्रेणी के     कलाकार किसी व्यक्ति का चित्र या चेहरा देखकर या अपनी कल्पनाओं से मूर्ति     बनाने में दक्ष होते हैं। ये अपने हाथों बनी कलात्मक मूर्तियों के सांचे बनाकर     इनसे भारी मात्रा में मूर्तियां बनाने का भी काम करते हैं।

(2)  काशी की मृण मूर्ति निर्माण के क्षेत्र में लगे हैं दूसरे तरह के वे लोग हैं जिन्हें     कलाकार कहा जा सकता है। काशी की मूर्तिकला के इन कलाकारों का विशेष     महत्त्व है।

इस तरह के मृग मूर्ति कलाकारों की संख्या काशी में सांचाकारों से कम है। इस श्रेणी के कलाकार सांचे में ढले ठोस या पोले अंगों को आपस में जोड़ने के साथ ही मूर्ति के कुछ भाग को स्वयं बनाते हैं। ये प्रतिवर्ष दुर्गापूजा, कालीपूजा, विश्वकर्मापूजा एवं सरस्वतीपूजा के अवसरों पर मूर्तियाँ तैयार करते हैं। इस श्रेणी के कलाकारों द्वारा बनायी गयी पूजा के लिए बनने वाली मूतियाँ मूलतः बंगाल शैली की होती है। इन मूर्तियों के हाथ और चेहरों आदि को सांचों में ढाल लिया जाता है, पुनः पेट, वक्ष आदि जो पुआल और लकड़ी के ढांचे पर पहले से बनाकर तैयार रखा जाता है, से जोड़कर पूरी मूर्ति तैयार कर ली जाती है। इन मूर्तियों की मिट्टीके सूख जाने पर इनकी रंगाई का काम होता है। उसके बाद इनके अलंकरण यथा केश-विन्यास, गहने, मुकुट और वस्त्र पहनाने का काम किया जाता है। ये मूर्तियां पूरी तरह कच्ची मिट्टी की होती है जो पानी के प्रभाव से घुलने लगती है। इस श्रेणी की तैयार मूतियां अत्यन्त आकर्षक होती हैं। इन्हें पूजा काल में स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है। पूजा सम्पादित हो जाने पर इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। पूजा के अवसरों पर इस प्रकार की देवी-देवताओं की मिट्टी की मूर्तियों की मांग काशी के आस-पास के क्षेत्रों में भी होती है। काशी के मूर्तिकारों के साथ ही दशहरे में प्रतिवर्ष मूर्ति बनाने के लिए बनारस आने वाले बंगाल के मूर्तिकारों द्वारा बनायी गयी मूर्तियां बनारस से बाहर गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, चन्दौली सोनभद्र तथा बनारस से सटे हुए बिहार के निकटवर्ती क्षेत्रों में भी यहीं से ले जायी जाती हैं। इस प्रकार बनारस में बनी बंगाल शैली की आधुनिक मिट्टी की मूर्तियों का व्यावसायिक पक्ष बहुत अच्छा है।3

काशी शैली की मृण मूर्तियों की विशेषता –

    मृण कला में मूर्ति में वस्त्र और केश तथा अन्य सभी अलेकरण रंगों और मूर्ति में उभारकर दिखाया जाता है यहाँ की मूलशैली अलग से किसी तरह का समायोजन नहीं होता और बड़ी मूर्तियां यहाँ पुवाल और ढ़ांचे का सहयोग नहीं लिया जाता।

काशी में मूर्तिकला का विकास –

    काशी में मृण मूर्तिकला को व्यवस्थित रूप देने में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के मूर्तिकला-विभाग के साथ ही महात्मा गांधी विद्यापीठ के मूर्तिकला-विभाग और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध वसन्त कन्या महाविद्यालय में विशेष रूप से काम हो रहा है। यद्यपि इन तीनों संस्थानों में ही मृदा कला के प्रसार का पर्याप्त काम किया जा रहा है लेकिन यहाँ काशी की परम्परागत मृण मूर्तिकला के संरक्षण की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं हो रहा है। काशी में मूर्तिकला के प्रचार-प्रसार और विकास में इन तीनों ही संस्थानों में कमच्छा स्थित वसन्त कन्या महाविद्यालय के रीडर श्री लम्बोदर नायक विशेष रूप से कार्यरत हैं। चित्रकला का शिक्षक होने के बावजूद वे छात्राओं को अलग से स्वयं के खर्चे पर मृण कला का शिक्षण देते हैं। वास्तव में इस राष्ट्रीय स्तर के कलाकार शिक्षक में शान्ति निकेतन में सीखी गयी समस्त कलात्मक विधाओं को अपने छात्रों में उतार देने की चाह उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करती है। मृदा कला के क्षेत्र में उनका अधिकतम कार्य कोटा के क्षेत्र में हैं यद्यपि वसन्त कन्या महाविद्यालय के पूर्व कला प्राचार्य स्व0 शान्तिरंजन बोस ने अपने कार्य के दौरान काशी में बंगाल शैली की भौतिक मृण मूर्तिकला पर विशेष रूप से काम किया। उन्होंने काशी में बंगाल शैली में मूर्ति निर्माण का काम शुरू किया था। श्री लम्बोदर नायक उनको आदर्श मानकर अपनी छात्राओं को व्यक्तिगत खर्चे पर मिट्टी की मूर्तिकला का प्रशिक्षण देते हैं।4

काशी में प्रथम श्रेणी के मिट्टी की मूर्ति बनाने वालों की संख्या बहुत कम है। काशी में इस प्रकार पारम्परिक मृण मूर्ति कलाकारों में आज सर्वाधिक चर्चित नाम जद्दूमण्डी के बद्रीप्रसाद प्रजापति का है। इनके हाथ से बनी स्व0 इन्दिरा गांधी, ऐनी बेसेन्ट, गौतम बुद्ध, मदर टेरेसा, पूर्व काशीनरेश स्व0 विभूति नारायण सिंह, डॉ0 भानुशंकर मेहता की मूर्तियों की काफी तारीफ हुई है। इसी क्रम में गौतम बुद्ध की सांचे से बनी (पकी) मूर्ति प्रतियों की एक लम्बी खेप अमेरिका में भी निर्यात हुई है। बद्रीप्रसाद को चित्र देखकर या माडल को सामने बैठाकर किसी की भी मूर्ति बनाने में महारत हासिल है। इस कलाकार ने इस विधा की तालीम अपनी परम्पराओं से प्राप्त किया है। इन्हें कई सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। वास्तव में बद्री प्रसाद प्रजापति काशी की मौलिक मूर्तिकला के संवाहक हैं।5

प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ –

    बदलते परिवेश में काशी की मृण मूर्ति निर्माण में प्लास्टर ऑफ पेरिस का पर्याप्त प्रयोग होने लगा है। संगमरमर और पत्थर की व्यावसायिक मूर्ति निर्माण में लगे लोग पहले प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ बनवा लेते हैं पुनः उन्हीं के आधार पर काट नाप कर पत्थर और संगमरमर की मूर्तियों को काट-छांट कर बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त प्लास्टर ऑफ पेरिस से सांचे में ढाल भारी मात्रा में मूर्तियां तैयार हो रही है। इन मूर्तियों को स्प्रेगन से रंग कर आकर्षक रूप दे दिया जाता है। ये मूर्तियां आकर्षक और टिकाऊ होती है। वर्तमान समय में इनकी स्थानीय और बाहरी क्षेत्र में प्रचुर मांग है।

उपसंहार

    काशी की मृण मूर्तिकला लगभग पांच दशकों से लगातार बंगाल शैली से प्रभावित हो रही है। मृण मूर्तियों पर अलंकरण, केश-विन्यास, इसका स्पष्ट प्रमाण है। बंगाल शैली के इस प्रभावीकरण की प्रक्रिया में दुर्गापूजा में बंगाल से आने वाले कलाकारों की विशेष भूमिका है। ये कलाकार दशहरे से कई माह पहले ही अपने स्थानीय ठिकानों पर आकर मूर्ति निर्माण में लग जाते है। दुर्गापूजा के अवसर पर इनके द्वारा बनायी गयी मूर्तियां अन्तिम रूप से तैयार होकर पाण्डालों में स्थापित हो जाती है।6

बंग्ला शैली में बनी दुर्गा मूर्तियों की देखा-देखी बनारसी कारीगरों ने शिव-पार्वती, विश्वकर्मा और गणेश तथा माँ काली और श्रीकृष्ण की बड़े आकार वाली मूर्तियों को इसी शैली में प्रस्तुत करना शुरू किया है जो परम्परागत काशी शैली की मूर्तियों की तुलना में ज्यादा आकर्षक लगती है।

काशी में बनने वाली बड़े आकार की दुर्गापूजा, कालीपूजा, विश्वकर्मापूजा में पूजी जाने वाली मूर्तियां कच्ची मिट्टी की होती है, क्योंकि ये पुआल और लकड़ी के आधारों पर टिकी होती है, इन्हें दो कारणों से नहीं पकाया जाता-

(1)  इन मूर्तियों को पकाने पर पुआल और लकड़ी जल जायेगी।

(2)  विसर्जन के समय गलकर गंगा में समाहित नहीं हो पायेगी।

(3)  काशी की वर्तमान मृण मूर्तियों पर बंगाल की मूर्ति निर्माण विशेष रूप से प्रभाव     साफ दिखता है। काशी की मौलिक मूर्तियों में जहाँ बाहरी अलंकरण का अभाव     रहता है वहीं इन मूर्तियों में केश वस्त्र और मुकुट के साथ ही किसी भी तरह     के अलंकरण को रंगों और मूर्ति में मृदा से उभारा जाता है।

काशी के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शिक्षा का केन्द्र होने के कारण भारत के सभी क्षेत्रों के लोगों का आगमन हुआ है। यहाँ सम्पूर्ण भारत को एक साथ देखा जा सकता है इसलिए काशी को लघु भारत या इण्डिया भी कहते हैं। अनेक विद्वानों का ऐसा मत है कि जो व्यक्ति भारत को देखना जानना चाहते हैं। यदि उनके पास पर्याप्त समय न रहे तो काशी के परिभ्रमण से उनका उद्देश्य पूरा हो जायेगा। काशी की इसी विशेषता के कारण यहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले उत्सव, पर्व को एक ही स्थान पर देखा जा सकता है। यहाँ भारत अक्सर मृण मूर्तियों का निर्माण, स्थापना, पूजन और उनका गंगा में विसर्जन होता रहता है। इनमें सर्वाधिक मृण मूर्तियों का निर्माण दशहरा के अवसर पर दुर्गापूजा के लिए भगवती दुर्गा की मूर्तियों के रूप में होता है जिनको काशी के विभिन्न क्षेत्रों में बने पण्डाल में स्थापित कर शारदीय नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिनों में प्राण प्रतिष्ठा के साथ सविधि पूजन-अर्चना के बाद दशहरे के दिन गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसी क्रम में यहाँ शिल्प के देवता विश्वकर्मा जी की मूर्तियो की भी एक दिवसीय पूजा होती है। दीपावली के अवसर पर यहाँ के बंगाली परिवारों में माँ काली के मृण मूर्ति की पूजा होती है, इसी प्रकार के कई अन्य प्रदेशों की संस्कृति के द्वारा अनेक मृण मूर्ति पूजक अनुष्ठान होते हैं जिनके लिए यहाँ मिट्टी की मूर्तियों का वर्ष के अधिकतम निर्माण कर उनको अलंकृत कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।7

– मधुज्योत्सना

काशी में मेघदूत पर बने वर्षा चित्र

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