काशी की प्रमुख रामलीलायें

रामनगर की  रामलीला- रामनगर में रामलीला का आरम्भ सन् 1830 के आस-पास काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने कराया। काशी की रामलीलाओं में रामनगर की रामलीला सर्वाधिक प्रसिद्ध है। श्रावण कृष्ण चतुर्थी को प्रथम गणेश पूजन के साथ पंच स्वरूपों (राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) का चयन एवं नामकरण होता है। भादो शुक्ल चतुर्थी को द्वितीय गणेश पूजन के साथ चौक पक्की पर रामचरितमानस के बालकाण्ड के दोहे का पाठ आरम्भ होकर भादो शुक्ल त्रयोदशी तक 175 दोहों का पाठ होता है। भादो  शुक्ल चतुर्दशी को ‘रावण जन्म’ से लीला का मंचन आरम्भ होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘श्रीराम उवपन-विहार, सनकादिक-मिलन, पुरजनोपदेश के साथ सम्पन्न होती है। कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा को अनूठी जीवन्त लीला ‘कोट विदाई’ का आयोजन होता है। रामलीला के पंच स्वरूप एवं लीला के अन्य मुख्य पात्र काशीराज दुर्ग में पधारते हैं। काशीराज उनका पूजन कर भोग लगाते हैं एवं दक्षिणा प्रदान कर उनकी विदाई करते हैं। रामलीला के संवादों एवं पदों की रचना काष्ठजिह्वा स्वामी एवं महाराज रघुराज ने की है, जो मानस के अनुसार ही है। सैकड़ों वर्ष पूर्व रचे इन संवादों में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। आज भी यहां की लीला सूर्यास्त के पश्चात पारम्परिक लैम्प पंचलाइट (पेट्रोमैक्स) की रोशनी में सम्पन्न होता है। पात्रों के वेश-भूषा भी पुराने हैं केवल पंचस्वरूपों का चयन होता है जो रामनगर के बाहर के होते हैं, इन्हें एक माह पूर्व से ही कठिन प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। शेष पात्र पीढ़ी दर पीढ़ी अपने भूमिका को जीते हैं। यहां पात्रों को संवाद कंठस्थ कराया जाता है बिना ध्वनि विस्तारक यंत्र के ये ऊँची स्वर में संवाद करते हैं। लीला के प्रसंगानुसार ही स्थल नियत हैं, जैसे-अयोध्या, जनकपुर, पम्पासर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका आदि। प्रतिदिन लीला संपन्न होने के पष्चात होने वाली आरती भी विषेष है। प्रभु दर्षन के इस नयनाभिराम दृष्य हेतु विषेष रूप से लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वनवास के समय मूर्ति स्वरूप मुकुट धारण किये रहते हैं परन्तु उस पर काली पट्टी बांध दी जाती है जो मुकुट का प्रतीकात्मक निषेध करती है। धनुष यज्ञ, सूपर्णखा नासिका छेदन व लक्ष्मण शक्ति के दिन तोप से सलामी दी जाती है। लीला ‘काशीराज धर्मार्थ निधि ट्रस्ट’ द्वारा आयोजित होती है, जिसमें राज्य सरकार से भी अनुदान प्राप्त होता है। ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं काशी नरेश है एवं लीला के प्रधान दर्शक होते हैं। एक माह तक चलने वाले इस विष्व प्रसिद्ध रामलीला में प्रतिदिन हजारें की संख्या में नेमी दर्शकों (रोज आने वाले) के साथ-साथ देष-विदेष से लाखों लोगों का आगमन होता है। यहां की रामलीला दर्शकाभिमुख नहीं होती, पात्र अपनी भूमिका में रहते हैं और दर्शक उनके हाव-भाव से संवाद को समझते हैं। दर्शकों में यह विशेषता होती है अधिकांश लोगों को संवाद स्मरण रहता है। ऐसा कहा जा सकता है कि रामलीला मंचन के समय दर्शक, दर्शक न होकर पात्र की भूमिका में आ जाते हैं, जैसे- राम बारात में बाराती, वनवास के समय वनवासी व युद्ध के समय सैन्य भूमिका में। नेमी दर्षकों का अन्दाज ही अलग होता है। काषी की गहरेबाजी, साफा-पानी, बहरी अलंग, खान-पान व भाँग को यहां के रामलीला के समय देखा जा सकता है। प्रतिदिन रामलीला आरम्भ होने से पूर्व इनमें व्यस्त नेमी दर्षक तिलक-त्रिपुंड लगाये प्रभु श्रीराम के दर्षन में मस्त रहते हैं।

लाट भैरव की रामलीला – यह काशी की सबसे प्राचीन रामलीला है, अतः इसे आदि रामलीला भी कहते हैं, जो स्वयं में एक सांस्कृतिक विरासत भी है। गोस्वामी तुलसीदास के समय (सन् 1543) में मेघा भगत द्वारा लाट भैरव की रामलीला का शुभारम्भ किया गया। ‘काशीखण्ड’ के अनुसार यहां की लीला बाल्मीकि रामायण पर आधारित होती थी। जो कुछ समय पश्चात् रामचरित मानस के अनुसार होने लगी। यहां की रामलीला अश्विन कृष्ण अष्टमी के ‘मुकुट पूजा’ से आरम्भ होकर कार्तिक पंचमी को कोट विदाई के साथ सम्पन्न होती है। लीला के प्रसंगों के अनुसार इनका स्थान भी नियत है। विश्वेश्वर गंज को अयोध्या, धनेसरा तालाब को सुरसरी, लाट भैरव कों पंचवटी तथा गंगा-वरुणा के संगम के पार को लंका तथा इसी तरह अन्य कई स्थानों को प्रसंगानुसार माना जाता है। यहां की लीला में तिथियों के साथ ही नक्षत्रों का भी ध्यान दिया जाता है। पुनर्वसु नक्षत्र में ही ‘मुकुट पुजा’ किया जाता है तथा विजयादशमी के श्रवण नक्षत्र में ही ‘रावण वध’ के प्रसंग का मंचन किया जाता है। श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास लीला का प्रसंग 14 दिन (तिथियों के अनुसार) में पूरा किया जाता है और वनवास के प्रसंग के दौरान मूर्ति स्वरूपों को केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है। पात्रों का श्रृंगार सादे स्वरूप में किया जाता है। लाट भैरव की रामलीला में पात्रों के श्रृंगार में रामरज, चन्दन तथा तुलसीमाला की प्रधानता रहती है, राज्याभिषेक और राजगद्दी के समय स्वरूपों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। मनुष्य रूपी विग्रह के रूप में काशी में होने वाली अन्य रामलीलाओं की अपेक्षा यह सबसे अधिक लम्बी दूरी को तय करने वाली यात्रा होती है, जिसे वनगमन से भरत मिलाप तक की लीलाओं में देखा जा सकता है।

चित्रकूट की रामलीला – यह भी काशी की प्राचीन रामलीला है। इस रामलीला की शुरूआत भी मेघा भगत ने की थी। इस लीला में भी पहले बाल्मिकी रामायण पर आधारित संवाद होते थे रामचरित मानस की रचना हो जाने के पश्चात् यह लीला मानस के अनुसार ही होने लगी। यहां की लीला में श्रीराम जी की मुकुट प्रतिदिन नयी होती है। चित्रकूट रामलीला की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहां संवाद बहुत ही कम या नहीं के बराबर होता है, इसके स्थान पर रामचरित मानस का पाठ होता है। रामलीला प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण नवमी को ‘मुकुट पुजा’ के साथ आरम्भ होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ सम्पन्न होती है। ‘मुकुट पुजा’ के पश्चात् यहां की लीला अयोध्याकाण्ड से आरम्भ होता है और दूसरे दिन ‘राज्याभिषेक’ लीला का आयोजन होता है। अट्ठारहवें दिन नाटी इमली के मैदान पर विश्व का सबसे कम समय का सबसे बड़ा मेला ‘भरत मिलाप’ का आयोजन होता है, यह मेला काशी के लख्खा मेले के रूप में जाना जाता है, पांच से दस मिनट के इस नयनाभिराम दृश्य के दर्शन हेतु काशी नरेश के साथ ही लाखों लोगों का देश-विदेश से आगमन होता है। भरत मिलाप के समय इसके सम्मान में काशी की अन्य सारी रामलीलाओं को विराम दिया जाता है। भरत मिलाप के दूसरे दिन आत्मविरेश्वर मन्दिर में धनुष-बाण की झांकी का दर्शन होता है। ऐसी मान्यता है कि आयोध्या में स्वयं श्रीराम ने बाल रूप में यह धनुष-बाण मेघा भगत को दी थी। यहां की रामलीला के सम्बन्ध में एक जनश्रुति यह भी प्रचलित है कि सन् 1868 में रामलीला मंचन के समय तत्कालीन पादरी मैकफर्सन ने हनुमान का पात्र बने पं0 टेकराम भट्ट को उकसाया कि- “महाकाव्य के अनुसार हनुमान सौ योजन समुद्र लांघ गये थे। आप यह वरूणा नदी पार कर दो तो हम मानेंगे, नहीं तो लीला बंद कर दी जायेगी”। यह सुन हनुमान बने पात्र ने श्रीराम से आज्ञा लेकर एक छलांग में वरुणा नदी पार कर दिये वरुणा नदी पार करने के पश्चात् उनका स्वर्गवास हो गया, उनका मुखौटा आज भी वरुणा तट पर स्थित हनुमान मन्दिर में सुरक्षित है।

तुलसीघाट की रामलीला – सम्भवतः रामचरित मानस के आधार पर होने वाले रामलीलाओं में यह प्रथम रामलीला है। रामचरित मानस की रचना करने के पश्चात् गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के अनुसार ही यहां पर रामलीला आरम्भ किया था। यहां की रामलीला सन् 1580 के आस-पास आरम्भ हुई थी। वर्तमान रामलीला समिति का पंजीकरण सन् 1933 में हुआ था जबकि भानुषंकर मेहता के अनुसार अखाड़ा तुलसीदास (जो आज भी रामलीला का आयोजन करती है) के लगभग 225 वर्ष पुराने वसीयत में यह उल्लेख है कि-‘सदा की भांति इसे चलाते रहना’। अट्ठारह दिवसीय इस रामलीला का शुभारम्भ आश्विन कृष्ण नवमी को ‘मुकुट पूजा’ के पश्चात् राज्याभिषेक और कोपभवन से आरम्भ होकर श्रीराम के अयोध्या लौटने तक के प्रसंग की लीला का मंचन होता है तथा कार्तिक एकादशी को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ रामलीला सम्पन्न होती है। इस लीला में भी प्रसंगानुसार स्थान नीयत है। लोलार्क कुण्ड, आनन्द बाग, दुर्गाकुण्ड, लंका (बी0एच0यू0 मुख्य द्वार) संकटमोचन मन्दिर तथा तुलसीघाट सहित अन्य स्थानों पर लीला के प्रसंगों का मंचन किया जाता है। यहां श्रीराम और सीता के लिये दो-दो मुकुटों का प्रयोग अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार किया जाता है। तुलसीघाट के लीला के हनुमान का मुखौटा पीतल का है, जिनकी पूजा भी की जाती है, एवं अशोक वाटिका के प्रसंग के में हनुमान के दो स्वरूपों को दो पात्र पूरा करते है एक बालरूप में दूसरे बड़े रूप के बनवास के समय पात्र छोटे मुकुट धारण कर जटायुधारी एवं घुटने तक के वस्त्र में नंगे पैर धनुष-बाण लिये चलते है। ऐसा कहा जाता है कि काशीराज उदितनारायण सिंह यहां नियमित लीला देखने आते थे, लीला के समय एक दिन उनके पुत्र ईश्वरीनारायण सिंह अत्यधिक बीमार थे। इससे महाराज चिंतित थे। रामलीला के राम ने तुलसीदल महाराज को देकर कहा की इसे युवराज को खिला दीजिये। महाराज ने तुलसीदल को युवराज को खिलायी, जिससे वह रातभर में ही स्वस्थ हो गये। उसी समय महाराज ने रामनगर में भी रामलीला कराने का निश्चय किया।

चेतगंज की रामलीला- सन् 1888 में बाबा फतेराम ने ‘चेतगंज रामलीला समिति’ की स्थापना कर यहां रामलीला का शुभारम्भ किया। उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति ‘रामलीला समिति’ को दान कर दी तथा लीला आयोजन के लिये आवश्यक धन को एकत्र करने का नायाब तरीका भी खोज निकाला कि लीला क्षेत्र के प्रत्येक दुकानदार प्रतिदिन एक पैसा रामलीला समिति को देंगे। यह तरीका तत्कालीन समय में सार्थक हुआ और रामलीला आयोजन के लिये धन इकट्ठा होने लगा। बाद में काशी के रईसों, सेठ, साहूकारों ने इस लीला में स्वेच्छा से सहयोग करने लगे। वर्तमान में रामलीला समीति द्वारा लीला क्षेत्र के घरों एवं दुकानदारों से चन्दे के द्वारा धन एकत्रित किया जाता है। आश्विन अमावस्या को मुकुट पूजा के साथ लीला आरम्भ होकर कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ लीला सम्पन्न होती है। यहां रामचरितमानस के अनुसार ही सम्पूर्ण रामलीला का मंचन होता है एवं विभिन्न लीला प्रसंगों के अनुसार स्थान नियत है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (करवाचौथ) को मंचित सूर्पणखा नासिका छेदन (नक्कटैया) विश्व प्रसिद्ध और काशी के लख्खा मेले में शुमार है। चेतगंज के नक्कैटया के प्रति काशी की जनता में एक उत्साह बना हुआ है। सैकड़ों की संख्या में लाग-स्वांग निकाले जाते है, जिसमें अन्य जनपदों एवं प्रदेशों के भी लागो-स्वांगो की सहभागिता होती है, इनमें प्रतिस्पर्धा रहती है। जो लाग-स्वांग सर्वश्रेष्ठ होता है उसे रामलीला समिति द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। इस दिन पूरे मेला क्षेत्र को आकर्षक विद्युत झालरों से सजाया जाता है। इस सजावट में भी प्रतिस्पर्धा रहती है। मेला क्षेत्र में इतने श्रद्धालुओं का आगमन होता है कि पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती। इस ऐतिहासिक नक्कटैया के जुलूस में आध्यात्मिक प्रवृति के साथ-साथ समसामयिक एवं सामाजिक सरोकार से जुड़ी आकर्षक झांकियों का भी प्रदर्शन होता है। सन् 1857 के असफल विद्रोह के पश्चात काशी की जनता अंग्रेजों के अत्याचार से मर्माहत थी, अपने क्रोध को प्रदर्शित करने के लिये काशी की जनता ने इसी रामलीला के नक्कटैया जुलूस को माध्यम बनाया। सन् 1920 के असहयोग आन्दोलन के समय भी आयोजकों ने इसी जुलूस के माध्यम से लोगों में राजनीतिक चेतना, जनचेतना तथा राष्ट्रभक्ति के संचार का माध्यम बनाया। डॉ0 भगवानदास, डॉ0 सम्पूर्णानन्द, आचार्य नरेन्द्र देव, प्रेमचन्द्र, जयशंकर प्रसाद आदि लोगों ने इस रामलीला के नक्कटैया को नया स्वरूप देने का सार्थक प्रयास किया।

खोजवा की रामलीला – प्राचीन समय में यह रामलीला मानसरोवर, सोनारपुरा और केदारघाट पर होती थी, जिसे महात्मा आपादास जी आयोजित करते थे। महात्मा आपादास जी का स्वर्गवास हो जाने के पश्चात श्री गोकुल साहु ने काशीनाथ साहु तथा जगन्नाथ साहु के सहयोग से इस रामलीला का खोजवा में मंचित करना आरम्भ किया और जीवनपर्यन्त तन-मन-धन से रामलीला में अपना सहयोग प्रदान किया। इसके पश्चात् श्री गोविन्द प्रसाद कपूर, सहदेव प्रसाद गुप्त, नन्हकु माली तथा अन्य लोगों ने रामलीला आयोजन को जारी रखा। तत्कालीन रामलीला कमेटी के द्वारा रामलीला आयोजन के संचालन के लिए एक समिति बनायी गयी, जो 98 वर्ष़ों से क्षेत्रीय लोगों के सहयोग द्वारा रामलीला का आयोजन निरन्तर कर रहा है। भादों की कृष्ण त्रयोदशी को मुकुट पुजा व श्री रामायण जी की आरती होती है। कुवार कृष्ण अष्टमी को ‘पार्वती जी की तपस्या’ के साथ लीला प्रसंग आरम्भ होकर कार्तिक कृष्ण पंचमी को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ सम्पन्न होती है। सोनारपुरा चौराहे से दशमी, सरायनन्दन तक लगभग चार किलो मीटर के लीला क्षेत्र में विभिन्न स्थानों का प्रसंगनुसार स्थान नियत है। रामलीला के दौरान मूर्ति स्वरूपों का प्रसंगानुसार श्रं‘गार किया जाता है। प्रतिदिन के लीला स्थान को आकर्षक विद्युत झालरों से सजाया जाता है एवं ध्वनि विस्तारक यंत्र से संवाद को वहां उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालुओं के कानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। यहां की रामलीला में शिव व श्रीराम जी की बारात धूमधाम से निकाली जाती है। धनुष यज्ञ, सूपर्णखा नासिका कर्ण छेदन (नक्कटैया) एवं भरत मिलाप का प्रसंग विख्यात है। जिसके आकर्षण लॉग-स्वांग निकाले जाते हैं। इन प्रसंगों के दौरान ज्यादा संख्या में श्रद्धालुओं का आवागमन होता है। जबकि लीला में हजारों लीला प्रेमियों का आगमन होता है।

इसके अतिरिक्त औरंगाबाद, काशीपुरा, दानगंज, गायघाट, नदेसर, आशापुर, लल्लापुरा, लोहता, लहरतारा, चिरईगांव, दारानगर, लक्सा, पाण्डेयपुर, मर्णिकर्णिकाघाट, शिवपुर, रोहनिया, फुलवरिया, बड़ागांव सहित लगभग पचास मुहल्लों के साथ ही वाराणसी के केन्द्रिय कारागार में भी दस दिवसीय रामलीला का मंचन होता है। यहां शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन ‘नारदमोह’ से लीला प्रारम्भ होता है। एक माह पूर्व से ही इसकी तैयारी आरम्भ हो जाती है और लगभग 35 पात्र इसमें भूमिका अदा करते हैं दिन में होने वाली इस रामलीला के पात्रों के साज-सज्जा व अन्य सामानों को बाहर से मनाया जाता है जिसका सारा खर्च कारागार प्रशासन वहन करता है।   लाट भैरव की रामलीला – यह काशी की सबसे प्राचीन रामलीला है, अतः इसे आदि रामलीला भी कहते हैं, जो स्वयं में एक सांस्कृतिक विरासत भी है। गोस्वामी तुलसीदास के समय (सन् 1543) में मेघा भगत द्वारा लाट भैरव की रामलीला का शुभारम्भ किया गया। ‘काशीखण्ड’ के अनुसार यहां की लीला बाल्मीकि रामायण पर आधारित होती थी। जो कुछ समय पश्चात् रामचरित मानस के अनुसार होने लगी। यहां की रामलीला अश्विन कृष्ण अष्टमी के ‘मुकुट पूजा’ से आरम्भ होकर कार्तिक पंचमी को कोट विदाई के साथ सम्पन्न होती है। लीला के प्रसंगों के अनुसार इनका स्थान भी नियत है। विश्वेश्वर गंज को अयोध्या, धनेसरा तालाब को सुरसरी, लाट भैरव कों पंचवटी तथा गंगा-वरुणा के संगम के पार को लंका तथा इसी तरह अन्य कई स्थानों को प्रसंगानुसार माना जाता है। यहां की लीला में तिथियों के साथ ही नक्षत्रों का भी ध्यान दिया जाता है। पुनर्वसु नक्षत्र में ही ‘मुकुट पुजा’ किया जाता है तथा विजयादशमी के श्रवण नक्षत्र में ही ‘रावण वध’ के प्रसंग का मंचन किया जाता है। श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास लीला का प्रसंग 14 दिन (तिथियों के अनुसार) में पूरा किया जाता है और वनवास के प्रसंग के दौरान मूर्ति स्वरूपों को केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है। पात्रों का श्रृंगार सादे स्वरूप में किया जाता है। लाट भैरव की रामलीला में पात्रों के श्रृंगार में रामरज, चन्दन तथा तुलसीमाला की प्रधानता रहती है, राज्याभिषेक और राजगद्दी के समय स्वरूपों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। मनुष्य रूपी विग्रह के रूप में काशी में होने वाली अन्य रामलीलाओं की अपेक्षा यह सबसे अधिक लम्बी दूरी को तय करने वाली यात्रा होती है, जिसे वनगमन से भरत मिलाप तक की लीलाओं में देखा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त औरंगाबाद, काशीपुरा, दानगंज, गायघाट, नदेसर, आशापुर, लल्लापुरा, लोहता, लहरतारा, चिरईगांव, दारानगर, लक्सा, पाण्डेयपुर, मर्णिकर्णिकाघाट, शिवपुर, रोहनिया, फुलवरिया, बड़ागांव सहित लगभग पचास मुहल्लों के साथ ही वाराणसी के केन्द्रिय कारागार में भी दस दिवसीय रामलीला का मंचन होता है। यहां शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन ‘नारदमोह’ से लीला प्रारम्भ होता है। एक माह पूर्व से ही इसकी तैयारी आरम्भ हो जाती है और लगभग 35 पात्र इसमें भूमिका अदा करते हैं दिन में होने वाली इस रामलीला के पात्रों के साज-सज्जा व अन्य सामानों को बाहर से मनाया जाता है जिसका सारा खर्च कारागार प्रशासन वहन करता है।

-धीरज कुमार गुप्ता

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