नहीं सूख सकता शास्त्रीय संगीत का वट वृक्ष – गिरिजा देवी

विश्व की प्राचीनतम् नगरी काशी जहाँ गलियों में वेद मन्त्रााsं के साथ-साथ संगीत भी आत्मा की तरह बसती है। शायद यही वजह है कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बनारस घराने का अलग ही रुतबा है। इस घराने में एक अलग स्थान रखती हैं- गिरिजा देवी। संगीत जगत में ’अप्पा जी‘ के नाम से प्रसिद्ध गिरिजा देवी का जन्म पं0 रामदास राय के यहां हुआ। संगीत की शुरुआती शिक्षा पिता जी से प्राप्त हुई और एक ऐसे दौर में जब लड़कियों का मंच पर जाना अच्छा नहीं माना जाता था; लेकिन पिता जी ने हमेशा इनका साथ दिया। पाँच वर्ष की अवस्था से ही पं0 सरजू प्रसाद मिश्र और श्री चन्द्र मिश्रा से संगीत की विधिवत् शिक्षा लेनी शुरु की और जल्दी ही इनकी गिनती देश के शीर्ष कलाकारों में होने लगी। अपने खास गायन शैली और खनकती आवाज से ’अप्पा जी‘ कजरी, ठुमरी और चैती का पर्याय बन गयीं।

आपका संगीत में जुड़ाव किस प्रकार हुआ?

फ्यूजन ने सब चौपट किया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि संगीत में प्रयोग तो हो लेकिन उसकी मधुरता खोनी नहीं चाहिए। संगीत में भाव जरुर हो, जिससे कि गायक और श्रोता में सम्बन्ध बना रहे। प्रयोग के नाम पर संगीत में कर्कशता और शोर न हो।

देखो भइया ! बचपन में सभी को एक शौक होता है। उस समय किसी को खेलने-कूदने का था तो किसी को पहलवानी का। हम अपने बाऊजी के पास रहकर गीत सीखा करते थे। कभी सोचा नहीं था कि दुनिया भर में इतना सम्मान मिलेगा। एक शौक था संगीत का, मैनें वही किया। मुझे बचपन से ही संगीत से इतना लगाव था कि किसी अन्य शौक की तरफ मेरा ध्यान ही नहीं गया। घर में संगीत की महफिल सजती थी जिसमें छोटे-बड़े सभी कलाकार आते थे और मुझे यह बड़ा अच्छा लगता था। बाऊजी को संगीत का शौक था, वही शौक मुझे उनसे विरासत में मिला। अपने रियाज में बड़े बुजुर्गों को सुनने-समझने का जो मौका मिला उसका बड़ा फायदा हुआ। संगीत के रियाज के साथ -साथ घर का भी कार्य करती थी।

जब आपने अपनी संगीत साधना शुरु की उस समय समाज में लड़कियों पर कई प्रकार की बंदिशें थीं? ऐसे में क्या कठिनाइयां आईं और किस तरह आपने इसे जारी रखा ?

मैं शुरू में कॉलेज में प्रार्थना वगैरह करती- करवाती थी। उस समय लड़कियां संगीत सीखती तो थीं लेकिन मंचीय प्रस्तुति नहीं देती थीं। पं0 मदन मोहन मालवीय जी ने यहां संगीत की क्लास शुरु करवाई, जिसमें ओंकार नाथ ठाकुर आये, उनकी बेटियां गाया करती थीं। उसमें सिद्धेश्वरी देवी, विद्याधर बाई जैसी हस्तियां आया करती थीं। लड़कियों की सबसे पहले मंच पर गायन की परम्परा महाराष्ट्र में शुरु हुई। घर-गृहस्थ लड़कियां गाने लगी थीं। इसलिए दूसरा महत्व महाराष्ट्र से बढ़ा। फिर बंगाल में भी बहुत लड़कियां निकलीं, जो गाना जानती थीं। इस मामले में यू0पी0, बिहार सबसे कमजोर था। लोग कहते थे कि – ‘घूंघट काढ़ के जा गंगाजी दर्शन करा, भींगलै कपड़ा में चल आवा।’ समय बदला, रेडियो स्टेशन खुल गये। मैंने 1949 में सबसे पहले आल इण्डिया रेडियो के लिए गाया। इसके बाद 1951 में आरा (बिहार) में कार्यक्रम प्रस्तुत किया फिर खुद-ब-खुद रास्ते बनते गये। हिन्दुस्तान भर में गाया, विदेशों से भी आमंत्रण आने लगा। इसमें कोई हमें तकलीफ ही नहीं हुई। कोई रोक टोक नहीं था, केवल मां थीं जिनको तकलीफ थी। कहती थी- “गाना गावत हऊ कहीं शादी-बियाह ना होत हौ। “अब एकै यही से समझा लक्ष्मी बाई के यहां कौन लड़ाकू भयी। मीराबाई के घरे कै ठे भक्तिन निकलनी?” इसी से समझा जाये कि कितने साहित्यकार, वीरांगनायें, नर्तकियां निकलीं जिनके पास कोई आधार नहीं था। हमारी शास्त्रीय संगीत का जो वटवृक्ष है, उसे किसी से कोई खतरा नहीं है। कई लोग हमसे पूछे कि उ0प्र0 में कैसे गाना आया। अरे “उ0प्र0 में रामजी जनमलन तब से सोहर गवात हौ, कृष्ण जी बांसुरिये बजा-बजा कर हजारन लोगन के बेहोश करत रहलन। गनेश जी क सब यही ठीहन हौ। सब लोग देव-दानव यहीं नाचत-कूदत रहलन। संगीत जगत में उ0प्र0 से बड़ा कोई नाम ना हौ?”

आपकी गायकी के विविध पक्ष हैं। आपकी पहचान खासतौर से ठुमरी से की जाती है।

मुझे गायकी के हर प्रकार और राग पसंद है। चाहे वो खयाल ठुमरी, टप्पा, चैती, लोकगीत हो या पक्के राग। लेकिन हमसे ज्यादातर फरमाइश ठुमरी की ही होती है। लोग ठुमरी ही सुनना चाहते हैं। जहां तक ठुमरी की बात है बाबू जयदेव सिंह, गुलाम अली खान साहब के लड़के- मुनव्वर जी ने भी कहा कि ठुमरी मद्रास में पद्म करके गायी जाती थी। 500 वर्ष पहले। फिर पद्म को लेकर और ख्याल को काटकर ठुमरी छोटी बनायी गयी, क्योंकि नृत्य में भाव दिखाने में बहुत मोहक हो जाता था और हल्का भी था। इसको उपशास्त्रीय भी कहा जाता था, इसलिए ठुमरी की चलन यहां थी। लोकगीत की चलन भी यहां थी इसलिए हमारे गुरुओं ने भी शब्दों के अनुसार गाये ताकि भाव स्पष्ट हो जाए।

संगीत में प्रहर का क्या महत्व है ?

हर प्रहर का एक गाना होता है। अब सबेरे भैरो, ललित ये सब सही लगेगा। फिर जैसे-जैसे दिन निकलता है राग बदलते जाते हैं। राग का तो कोई ज्ञान ही नहीं कि कितने हजार राग हैं ? लेकिन खास राग में सौ-सवा सौ ऐसे राग हैं जो कि नियमित रुप से गाते हैं। बड़े कलाकार दस-पन्द्रह राग अपने हाथ में ऐसा रखतें है कि उनके जैसा कोई नहीं गा सकता।

संगीत के परिप्रेक्ष्य में आज के बनारस को किस तरह देखती हैं ?

वर्तमान में यूनिवर्सिटी या आज के बच्चे लोग एकेडमी बना रहे हैं लेकिन हम उसमें सम्मिलित नहीं हैं, क्योंकि डेढ़ साल तक हम विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर क्लास लिए जिसमें खयाल का, तराने का, ठुमरी का सबकी शिक्षा थी। हम तो बनारस वालों से कहे कि हम यही काम करना चाहते हैं लेकिन किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। हमारे वरिष्ठ लोग हमें कलकत्ता ले गये जहां हमनें 38 वर्षों तक अपनी सेवायें दीं और हम कम से कम पचासों ऐसे कलाकारों को बता सकते हैं जो बाहर विदेशों में कन्सर्ट कर रहे हैं। इतना तो तैयार किया और अब भी कर रहे हैं। अब इतनी उम्र हो गयी कि तान तो इन लोगों से नहीं लगवायेंगे, लेकिन हां! शब्द, साहित्य और संगीत, स्वर की पहचान जरूर करवाती हूं। राहुल मिश्रा, रोहित मिश्रा, मोहित मिश्रा आदि लोग आज कन्सर्ट कर रहे हैं। बाहर हम लगे हैं कि हमारी शास्त्रीय संगीत की कोई बराबरी न करे और कर भी नहीं सकता जहां खुद गणेश, सरस्वती विराजते हों वहां बराबरी कोई न कर पायेगा।

फ्यूजन को आप संगीत में किस तरह से देखती हैं? शास्त्री गायन में आजकल फ्यूजन का टेंड चल पड़ा है।

फ्यूजन ने सब चौपट किया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि संगीत में प्रयोग तो हो लेकिन उसकी मधुरता खोनी नहीं चाहिए। संगीत में भाव जरुर हो जिससे कि गायक और श्रोता में सम्बन्ध बना रहे। प्रयोग के नाम पर संगीत में कर्कशता और शोर न हो।

अब कोई शंकराचार्य जैसा शास्त्रार्थ करने वाला बचा है क्या ? ये दुनिया बदल रही है और बदलती चली जाएगी। जो नए लोग पुरानी चीजों को रख लें रहे हैं वही बहुत कृपा कर रहे हैं। ऐसा ही रहा तो केवल गाना-बजाना ही नहीं जायेगा बल्कि उठना-बैठना, संस्कार-संस्कृति सब चला जायेगा। 28 बरस बाद पद्मभूषण सम्मान मिला। अब हमें कोई उपाधि, पैसा, अखबार, प्रचार की जरुरत नहीं है बस यही कामना है 88 बरस की ऊमर में कि हमारे बच्चे पढ़ लिख जायें और उस विरासत को सम्भाल रखें जिसके लिए इतना परिश्रम किया है। हम अपनी परम्परा को सैकड़ों बच्चों को सौंप रहे हैं। मां सरस्वती की बहुत बड़ी कृपा रही। सीखने वालों से बताते हैं कि दो ही गाना गायें लेकिन शुद्धता से गायें।  नई पौध तैयार करने में लगे हैं। अब देखिये रविशंकर जी, बिसमिल्लाह जी, जैसे- बड़े नाम इस शहर से जुड़े रहे हैं लेकिन कोई शिष्य नजर नहीं आ रहा, इसलिए अब हम यही कर रहे हैं। काशी कला-धाम के माध्यम से पूर्वजों की विरासत के प्रति युवा पीढ़ी को जागरुक करने की इच्छा है। इनसे यह सन्देश और ज्ञान युवाओं में देना है कि हमारे पूर्वजों ने क्या किया, और किस तरह संगीत की किस विधा से जुड़े रहे।

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