भोजपुरी सिनेमा और काशी

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वर्ष 2013 में भारतीय सिनेमा ने अपने सौ वर्ष पूरे किये साथ ही भोजपुरी सिनेमा ने अपना अर्द्धशतक लगाया। 1963 में प्रदर्शित विश्वनाथ शाहाजादी की फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ से भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती है। हालांकि मुम्बई के फिल्म उद्योग में 20वीं सदी के पांचवे दशक में भोजपुरी के कई लेखक कवि कलाकार सक्रिय थे। हिन्दी फिल्मों से भोजपुरी के प्रथम परिचय का श्रेय बरहज के मोती बी0ए0 का दिया जाना चाहिए जिन्होंने ‘फिल्मीस्तान’ स्टूडियों में अशोक कुमार तथा निर्माण विभाग के कर्ता-धर्ता शशिधर मुखर्जी को एक गीत सुनाया जिसके बोल थे-

     ‘काटेना कटे मोरा दिनवा, गवनवा कब होई।

     पिया के अगनवा मिलनवा कब होई।

     यह गीत ‘एक कदम’ फिल्म के लिए रिकार्ड किया गया था पर यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई।

पचास के दशक में जब आजादी के बाद भाषाई आधार पर भारत का पुनर्गठन हो रहा था। उसी दौर में फिल्म उद्योग की भी दशा और दिशा में बदलाव हो रहा था। सत्यजीत रे ने “पाथेर पांचाली” बनाकर प्रादेशिक अथवा आंचलिक भाषाओं में सिनेमा बनाने की संभावना की और बल दिया। भोजपुरी सिनेमा बनाने की तत्कालीन समय में ललक इस एक प्रसंग में भी दिखती है जब कलकता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “भोजपुरी” के सम्पादक रघुवंश नारायण सिंह को 6 मई 1954 को सनराइज पिक्चर के प्रबंधन जवाहर चतुर्वेदी ने एक पत्र लिखा- “ए सवाल पर विचार करे खातिर कुछ छन दिहल जाय। का ई सम्भव बा कि उत्तर प्रदेश औ बिहार के स्थानीय भाषा में सिनेमा बनावल जा सकेला”। सन् 1961 में नितिन बोस के निर्देशन मे बनी “गंगा जमुना” में पहली बार अवधी भाषा संवाद का इस्तेमाल और भोजपुरी गीतों के प्रयोग ने भारतीय बोलियों में फिल्म निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

काशी से हुई विधिवत शुरूआत- भोजपुरी सिनेमा के क्षेत्र में काशी ने नेतृत्वकर्ता की भूमिका पर्दे पर तथा पर्दे के पीछे दोनों रूपों में निभाई। सन् 1961 में ही जब फिल्म उद्योग भयंकर मंदी के दौर से गुजर रहा था और ऊँचे “स्टार कॉस्ट” की वजह से फिल्म बनाना कठिन कार्य था तब बनारस ने इसकी अगुवाई की।

बिहार के धनबाद के गिरीडीह के अभ्रक व्यापारी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी जिन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद ने भोजपुरी में फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था वे मुम्बई पहुंचे। दादर में प्रीतम होटल में नजीर हुसैन से मिले जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाना चाहते थे। इस प्रकार जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के नेतृत्व में ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण की योजना बनी। फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बिहार के गीतकार शैलेन्द्र को गीत और संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गयी। बनारस के ही रहने वाली कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया तथा खलनायक के रूप में बिहार के रामायण तिवारी ने भूमिका निभाई। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर फिल्म का मुहुर्त सम्पन्न हुआ। फिल्म की शूटिंग का भी श्री गणेश वाराणसी से हुआ इस प्रकार पूरी यूनिट बनारस आई। जहां नायक असीम कुमार के जंगमबाड़ी स्थित बंगले पर सभी कलाकार रूके। केवल नाजीर हुसैन और नायिका कुमकुम होटल डी पेरिस में ठहरे।

सन् 1963 में फिल्म के बनके तैयार हो जाने पर फिल्म का मुम्बईया फिल्म की तरह प्रीमियर हुआ। बनारस में पहली बार किसी फिल्म का प्रीमियर हुआ प्रकाश टाकीज में हुए इस प्रीमियर में शहर के गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया था जिसमें पत्रकार मोहन लाल गुप्त (भैया जी बनारसी) कृष्णदेव प्रसाद गौंड, बृजपाल दास, सुधाकर पाण्डेय जैसी हस्तियां थी। प्रदर्शन के एक सप्ताह के भीतर ही फिल्म की खबर दूर-दूर तक फैल गयी। प्रकाश टाकीज के बाहर लोगों का तांता लगने लगा और कहा जाने लगा “गंगा नहा, विश्वनाथ जी के दरसन कर।़, गंगा मइया देख।़ तब घरे जा।

इसके बाद भोजपुरी फिल्म निर्माण में काफी तेजी आई 1963 से लेकर 1967 के बीच सौ से ज्यादा भोजपुरी फिल्म बनी जिनमें लागी नाहीं छूटे रामा, विदेशिया हमार संसार, बलमा बड़ा नादान, कब होई गवना हमार आदि फिल्मे रहीं।

यहाँ 1964 में प्रदर्शित विदेशिया का उल्लेख आवश्यक होगा जिसमें भोजपुरी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटककार और कवि भिखारी ठाकुर को गाते हुए दिखाया गया है। जिनको पर्दें पर जीवित देखना भोजपुरी को सिनेमा जैसा सशक्त माध्यम मिले बिना सम्भव नहीं था। इस प्रकार भोजपुरी फिल्मों में बनारस की सहभागिता प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से बनी हुई है। भोजपुरी में फिल्म निर्माण के तेजी के दौरान कई फिल्मे फ्लाप भी हुई क्योंकि भोजपुरी से अनजान लोग भी इस क्षेत्र में कूद पड़े और जल्दी ही भोजपुरी के मिठास फिल्मों से खोने लगी और एक दशक तक भोजपुरी फिल्म निर्माण क्षेत्र में सन्नाटा छा गया।

लम्बे समय बाद फिल्म दंगल (1977) से भोजपुरी का रंगीन दौर शुरू हुआ जब सामन्तवादी ठाकुर और परिवर्तनवादी नायक के संघर्ष पर निर्देशक रवि कुमार व निर्माता बच्चू भाई शाह ने फिल्म बनाई जिसमें बनारस के सुजीत कुमार तथा प्रेमनारायण, राम सिंह, शोभाखोटे, अरूणा ईरानी ने अभिनय किया गया था। इस दौर की उपलब्धि रही कि फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जिसके निर्देशक दिलीप बोस निर्माता अशोक जैन और कलाकारों में कुणाल के साथ जाज, गौरी खुराना, अरुणा ईरानी, हरीश, जय श्री आदि थे। इस फिल्म में चित्रगुप्त के संगीत ने धूम मचा दी थी। यह फिल्म बनारस छपरा पटना, गोरखपुर के अलावा मुम्बई के मिनर्वा टाकीज में चार हफ्ते से ज्यादा चली और उस दौर में यह मॉरीशस में प्रदर्शित हुई और पुनः 20-28 फरवरी 2000 में द्वितीय भोजपुरी महासम्मेलन (मॉरीशस) में भी प्रदर्शित हुई थी।

भोजपुरी फिल्मों में बनारस में बोली जाने वाली कासिका को लाने का श्रेय एस0एन0 त्रिपाठी फिल्म ‘विदेशिया’ में किया था। कुमकुम द्वारा निर्मित फिल्म-लागी नहीं छूटे राम और नाजिर हुसैन कि हमार संसार में भी यही बोली रही।

इस प्रकार बनारस से शुरू हुआ भोजपुरी फिल्मों का सफर बदस्तूर जारी है और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के रूप में फल-फूल रहा है, भोजपुरी सिनेमा ने ना सिर्फ भारत बल्कि विश्व के अनेक देशों में लोकेशन शूटिंग से लेकर प्रदर्शन तक का सफर तय किया है। नये कलाकारों में रवि किशन, मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) के साथ हिन्दी सिनेमा के दिग्गज कलाकार (अरूणा ईरानी, अरूण गोविल, राज बब्बर, रजा मुराद) भी भोजपुरी सिनेमा में काम कर रहे हैं। सन् 2006 में प्रदर्शित गंगा, में महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अभिनय किया। भोजपुरी फिल्म का उद्योग सलाना 1000 करोड़ रुपये का हो गया है और फिल्मे करोड़ों में व्यवसाय कर रही है। मनोज तिवारी, अभिनीत, “ससुरा बड़ा पइसा वाला” कमाई के नये रिकार्ड बनाये हैं और दर्शकों में मॉरीशस, सूरीनाम, वेस्टइंडीज, फिजी, नेपाल, जैसे देशों को शामिल किया।

बनारस में भोजपुरी सिनेमा को बहुत सी प्रतिभाएं दी है जिनमें कलाकारों में स्व0 कन्हैया लाल, लीला मिश्रा, कुमकुम, सुजीत कुमार, पदमा खन्ना, साधना सिंह, नारायण तिवारी, मधु मिश्रा, जे0 मोहन, देव मलहोत्रा, केवल कृष्ण, रत्नेश्वरी, रामचन्द्र विश्वकर्मा, पूनम मिश्रा, सोनी राठौर, अशोक सेठ, मास्टर संजय, स्मृति मिश्रा, मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव निर्माता-निर्देशकों की कड़ी में कुन्दन कुमार, देवी शर्मा, सुन्दर दार, हरिमोहन सिंह आदि थे।

-अरविन्द कुमार मिश्र

 

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