बनारसी ठलुओं की कहानी उर्फ़ दास्तान-ए ठलुआ क्लब

1 मई 1961 को सायंकाल सिद्धगीरि बाग स्थित विश्वनाथ मुखर्जी के आवास पर सर्व श्री देवानन्द शर्मा, देवीकान्त मिश्र, केशव लाल भट्ट, विरेश्वर भट्टाचार्य बण्डुल आदि एकत्र हो बनारस में व्यस्त होती जीवनशैली के बारे में चर्चा कर रहे थे। चर्चा में ठलुआ क्लब के कल्पनाकार बाबू गुलाबराय और पंडित शिवनाथ शास्त्री के विचारों का भी स्मरण किया गया सभी के मध्य सहमति बनी की बाबू गुलाबराय के कल्पना को आकार दिया जाय एवं ठलुआ क्लब की स्थापना कर बनारस से भाग रही बनारसी मस्ती को संरक्षित किया जाय। फलस्वरूप एक राशि नाम देव शिव, शनि को आराध्य मानकर ठलुआ क्लब की स्थापना की गयी। विश्व के अनूठे इस क्लब में अध्यक्ष को गणपति, सचिव को ठलुआबीर, संयोजक को ठलुआमांत्रिक, कोषाध्यक्ष को ठलुआ कुबेर तथा प्रचारमंत्री को ठलुआनारद कहा जाता है।

हास्य गंधर्व कृष्णदेव प्रसाद गौंड ‘बेढब बनारसी’ को क्लब का पहला गणपति बनाया गया। अभिनंदन के साथ ही बनारसी मस्ती की तरंग से परिचित कराने वाले अन्य कार्यक्रम जैसे गीत, संगीत, कविता पाठ, काव्य पाठ, नाटक व नौटंकी का आयोजन किया जाता है। अब बात आती है ठलुआ कौन है या ठलुअत्व को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। ठलुआ शुद्ध बनारसी शब्द है और यह केवल बनारस में रहकर ही समझा जा सकता है। जिस प्रकार साधक को ब्रह्म का ज्ञान होता है उसी प्रकार बनारसी मस्ती में रमने वाले को ठलुअत्व की प्राप्ति होती है कोई व्यक्ति किसी चौराहे पर सौ जूते खाये तब भी मुग्ध रहे वहीं दूसरी ओर उसे किसी सभा का सभापति या मुख्य अतिथि बनाकर माला पहनाई जाये और उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन न हो अर्थात जिसे न आशा हो न निराशा, तो वह ठलुआ बन सकता है।

पण्डित कमलापति त्रिपाठी के अनुसार “यदि लघु शब्द कोश के अनुसार ठलुआ का अर्थ बेकार और आवारा मान लिया जाय तो इस रूप में भगवान श्रीकृष्ण सबसे बड़े ठलुआ थे। राजा होकर भी बेचारे जीवनभर राज सुख नहीं भोग सके, उल्टे रथ हांकते रहे। आवारा तो खैर थे ही।” रूसों का कहना है कि यदि सही मायने में ठलुआ बनना है तो समाज जैसा करता है, तुम हमेशा उसका उल्टा करो। कुछ दिनों के बाद देखोगें कि आप ठीक कर रहे है और लोग आपका अनुकरण करने लगेंगे। यानि समाज यदि बैठकर पानी पीता है तो आप लेटकर पानी पीजिये। यदि आप बिना किसी मजबूरीवश ऐसा कर सके तो आप देखेंगे कि आप ठीक कर रहें है। ठलुआ क्लब के संस्थापक बाबू गुलाब राय ने ठलुआ कौन है और उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं, को निम्न प्रकार परिभाषित किया है – “दुःखी हों, किन्तु रोवें नहीं और यदि रोवें तो रोने में हँसने की आनन्द लें। अपने सिवाय सारे संसार को मूर्ख मानें। धन कमा लेने के कौशल को मूखर्ता नहीं तो कम-से-कम धूर्तता समझें। भूखों मरते हों, किन्तु स्वाभिमान वश भिक्षा के लिए हाथ न पसारें। पसारें भी तो अपने दाता की ओर सिंह के समान गुर्राते रहें।

धनवान हों तो इतने कि बिना हाथ-पैर चलाये उनके घर में सोने-चाँदी के ढेर लगे रहें, किन्तु हिसाब-किताब करते समय उनका सिर दर्द करने लगे। विद्वान हों किन्तु अपने आदर, सम्मान की आकांक्षा न हों। नौकरीपेशा हों, जिनकी नौकरी छूट गयी हो अथवा छूटने वाली हो; और उन्हें भविष्य में नौकरी मिलने की आशा भी न हो तो भी मस्त हो। बीमार हो किन्तु शय्यासेवी न हों। आसन्न मृत्यु न हो, परन्तु जीने की भी दृढ़ अंश न रखते हो। बातूनी हों, पेट भरने लायक कमाने की धूर्तता रखते हो किन्तु रुपया-पैसा कमाने की बात करने को असभ्यता समझते हों। ठंडई-भांग के शौकीन हो, न छानते हों तो बुरा भी न मानें वास्तव में ठलुआ वह व्यक्ति है जिसे गांधीवाद से प्रेम है न मार्क्सवाद से चिढ़। ठलुओं का परम धर्म है मुख्यरूप से परचर्चा और गौणतः परिचर्चा करना। ठलुआ क्लब में परम निठल्लु टाईप के वयस्क सदस्य होते हैं तथा महिलाओं से परहेज किया जाता है, परहेज इसलिए किया जाता है कि यदि दोनों एक जगह एकत्र हो जाये तो गदर होना तय हैं। क्लब के कार्यक्रमों में सभी को बांचने की स्वतंत्रता होती है पर जांचने की नहीं। क्लब का प्रतीक ‘कमण्डल में त्रिशुल’ लोगों को स्पष्ट रूप से बतलाता है कि हंसने-हँसाने वाले को कमण्डल में समाहित कर लिया जाता है जबकि इसके विपरीत तूनकमिजाज, मुंह लटकाये मनहूसों को त्रिशुल दिखाकर भगाया जाता है। क्लब को न सदस्य बनाने की चिंता होती है न फंड की, आया तो जय श्री राम न आया तो राम-राम।

क्लब की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जो स्वतंत्र जीवन व्यतीत करता हो, जिसमें बनारसी मस्ती की झलक हो अपने क्षेत्र का विद्वान, कलाकार, या साधारण कार्यकर्ता हो, उनका अभिनन्द किया जाय। ठलुआ क्लब की भाषा में जिसे ‘मुण्डन’ कहा जाता है। यह अभिनन्दन पूर्णतः बनारसी अंदाज से होता है और उसकी समां इस कदर बनती है कि थोड़े समय के लिए वहां उपस्थित लोग स्वयं को भूल जाते हैं। अभिनन्दन के लिए चयन करते समय यह नहीं देखा जाता कि व्यक्ति राजा है या रंक, बस उसे ठलुआ क्लब के मानकों पर खरा उतरना पड़ता है। ‘मुण्डन’ (अभिनंदन) करवाने के लिए न तो क्लब के नाईयों को पटाया और न ही किसी ठलुआ सदस्य को सटाया जा सकता है, जिस पर भी ठलुआ सदस्यों की गिद्ध दृष्टि पड़ी बस हो गया उसका मुण्डन (अभिनंदन)। समाज, साहित्य या अन्य क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों का ठलुआ क्लब अभिनंदन कर उन्हें विशिष्ट उपाधि प्रदान करता है। यदि ऐसा कोई नहीं मिलता तो अपने ही बीच के किसी व्यक्ति का अभिनंदन कर दिया जाता है। जिन व्यक्तियों का अभिनंदन किया जाना होता है उनके बारे में पहले से पता लगा लिया जाता है कि वह किस व्यक्तित्व के हैं। उनका इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, गुणा-गणित आदि का पता उनके नजदीकियें से जुटाई जाती हैं। उसी के अनुसार उनका अभिनंदन पत्र तैयार किया जाता है। जिसमें उससे सम्बन्धित अच्छाईयां, बुराईयां जीवनशैली, क्रियाकलाप आदि का व्यौरा रहता है। फिर बेबाकी से हांस्य व्यंग्य के माध्यम से उन पर कटाक्ष किया जाता है। जिसमें इस बनारसी अभिनन्दन को झेलने की क्षमता न हो उन्हें कुछ छूट भी दी जाती है। दो-चार व्यक्ति ही ऐसे रहे जिन्हें इस कटाक्ष से बख्श दिया गया। विनोदपूर्ण अभिनन्दन करने के साथ ही उनके प्रति सम्मान की अनुभूति भी लोगों को करायी जाती है कि किन गुणों के कारण वह अभिनंदनीय है। ठलुआ क्लब ने आरम्भ काल से अब तक अपने कार्यक्रमों का व्यौरा ‘एक कोड़ी एक’ से छः कोड़ी छः’ तक के खण्डों में संग्रहीत किया है। अब तक सर्वश्री डॉ0 सम्पूर्णानन्द, बेढ़ब बनारसी, बेधड़क बनारसी, मनोरंजन कांजीलाल, भानूशंकर मेहता, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, नजीर बनारसी, पण्डित गोपीनाथ कविराज, पण्डित राज राजेश्वर शास्त्री द्रविड़, सुमित्रानन्दन पंत्र, विस्मिल्ला खां, महादेवी वर्मा, पण्डित विष्णुकांत शास्त्री (पूर्व राज्यपाल, उत्तर प्रदेश), डॉ0 भगवानदास अरोड़ा आदि अन्य सैकड़ों लोगों का अभिनन्दन किया जा चुका है। मधुशाला की नशे में मस्त हरिवंशराय बच्चन ने भी ठलुआ क्लब से अपने अभिनंदन की बात कही परंतु ठलुआ आराध्य शनि को यह न भाया और वह अभिनंदित नहीं हो पाये, परंतु उनकी मदिरालय गाथा भगवान शिव एवं काशी के ठलुआगणों ने सुनी तो मस्त हो गये। भगवान शिव की कृपा हुई, ठलुआ क्लब ने उनकी अनमोल कृति ‘मधुशाला’ का अभिनंदन किया। विश्व के इस अनोखे क्लब पर सन् 1972 एवं सन् 1979 में दो शोध पत्र प्रस्तुत किये गये, इन ठलुओं के कारनामों से दो लोग डॉक्टरेट हो पाये। क्लब की गोष्ठियां, कार्यक्रम आदि का शुभारम्भ शनि वंदना से होता है। पहले यह वंदना संस्कृत में होती थी परंतु बाद में क्लब के सदाबहार ठलुआ रामगोपाल सर्राफ ने खड़ी बोली में इसकी रचना की और सभी कार्यक्रमों में स्वयं ही उपस्थित सभी ठलुओं के समक्ष इसका पाठ करते हैं। प्रारम्भ में क्लब का सभी कार्य अर्थात अभिनंदन करने वाले व्यक्ति की तलाश से लेकर अभिनंदन पत्र तैयार करने तक विश्वनाथ मुखर्जी करते थे। बनारसी मस्ती को जीवंत रखने के लिए ‘यह बनारस है’, ‘बना रहे बनारस’, ‘एकादशी’, ‘बंडा’ एवं ‘फटीचर’ पत्रिका का प्रकाशन भी हुआ। सन् 1995 के पश्चात् उनकी स्मृति शेष रहने पर क्लब की गतिविधियों पर अवरोध उत्पन्न हो गया। क्लब से जुड़े पुराने ठलुआ विनोद कुमार अग्रवाल ‘मामा जी’ और चन्द्र कुमार शाह ने प्रमोद शाह एवं विनय कुल के सहयोग से स्वर्णिम इतिहास वाले क्लब को अतित होने से बचाया और गाहे-बगाहे क्लब के मुखपत्र ‘फटीचर’ का पुनः प्रकाशन निरंतर कर रहे हैं। क्लब समय का विशेष ध्यान रखता है। कोई आये, देर से आये या न आये क्लब समय से अपना कार्यक्रम आरम्भ कर देता है। 

ठलुआ क्लब द्वारा तैयार किया गया पं0 राजेश्वर आचार्य का अभिनंदन पत्र

(Date: 23 Nov 2014)

पं0 राजेश्वर आचार्य का बनारसी गायकी से उसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं जिस प्रकार बनारस का रसगुल्ले अथवा दिल्ली का लड्डू से। बनारस में धन्धे पर मुहल्ले है जैसे चाउरछटवा, पिसनहरिया, लोहोटिया मगर बनारस का संगीत दो मुहल्लों में सिमटने पर भी किसी का नाम संगितिया नहीं है। धन्धों पर टोले और गलियाँ तो हैं जैसे कचौड़ीगली, खोआगली, चंवरगलियां अथवा सूतटोला, कुन्दीगरटोला वगैरह मगर तबलागली, सारंगीगली, शहनाई टोला, दुक्कड़टोला या टुनटुनिया टोला नहीं है। जबकि घंघरू के धंधे पर घुघुरानीगली और बाँसुरी बनाने वालों को मुरलीगली है।

      पं0 राजेश्वर आचार्य का जन्म इनमें से किसी मुहल्ले, गली या टोले में नहीं हुआ। इनका जन्म वन में हुआ। पुराणों में वर्णित भद्रवन, मुगलकाल से पूर्व भयदायिनी और अब भदैनी के जिस उत्तरमुखी भवन में आपका जन्म हुआ उसके सामने काशी के अकेले पेट पशु चिकित्सक का आवास होने से वन में जन्मने की पुष्टि होती है।

      आपका जन्म तब हुआ जब भीषण अकाल से बंगाल कराह रहा था और बनारस में प्लेग की अंतिम महामारी से लोग मुहल्ला-टोला छोड़कर भाग रहे थे। महात्मा गांधी, महामना मालवीय सहित लाखों देशवासी जेलों में सड़ रहे थे। सारी दुनिया विश्वयुद्ध की चक्की में पिस रही थी और जापान ने कोलकता तक बमबारी शुरू कर दी थी। तिसपर भी इनके पुण्यश्लोक माता-पिता ने रामबोला की तरह विपत्ति समझमर फेंकने के बजाय पाल-पोस कर बड़ा करने का जोखिम मोल लिया। विश्व की ऐसी तमाम विपत्तियों को टालने के लिए उस समय इनके आवास के निकट असि-गंगा संगम पर स्वामी करपात्री जी को अतिविराट यज्ञ का अनुष्ठान करना पड़ा।

      डॉ0 राजेश्वर आचार्य की संगीत शिक्षा उस दौर में शुरू हुई जब दूरदर्शी तथा बुद्धिमान अभिभावक पढाई-लिखाई में फिसड्डी बच्चे को आई0टी0आई0 पालिटेक्निक, संगीत जैसे तमाम पाठ्यक्रमों में इसलिए भर्ती करा देते थे कि दाल-रोटी का ठिकाना हो जाय। इस सोच का परिणाम है डॉ0 राजेश्वर संगीतकार।

      शास्त्रीय संगीत की उस परिपाटी को आपने अपनाया जिसे मियाँ तानसेन ने नैमिषारण्य के जंगल में छोड़ दिया। उस धुपद शैली के अवशेष मोहन-जो-दारो, हड़प्पा, लोथल सहित सैदपुर भितरी, सारनाथ तथा राजघाट के पुरातात्विक अवशेषों की भाँति यत्र-तत्र वैसे ही मिल जाते हैं जैसे तस्करी से लाए सामान। वह तो भला हो काशीराज न्यास का जिसने महाशिवरात्रि पर्व पर चार-पांच दिनी धुपद मेले का उसी तरह आयोजन शुरू किया जैसे बनारसी कालीन को प्रमोट करने के लिए कालीन मेला या बनारसी साड़ी का बाजार बनाने के लिए हस्तशिल्प मेलों की विवशता सरकार के सिर आ पड़ी।

      उस्ताद फैय्याज खाँ, उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से लेकर अनेक भारतरत्न संगीतकारों में आप वैसे ही अकेले डाक्टर हैं जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आवास पर लगी काशी में इकलौती करील की झाड़ अथवा एवरेस्ट पर झाड़-झंखाड़। यह इनका शौर्य ही है कि पानी में रहकर मगर से बैर ठाना-बनारसी छोड़ थाम लिया ग्वालियर घराना। संगीत में उसी तरह घराने चलते हैं जैसे आजकल पूँजीपूतियों और राजनीतिक दलों में घराने चलते हैं। कैराना घराना, ग्वालियर घराना, लखनऊ घराना आदि-आदि

      रंग चित्रकला का ही आधार नहीं। डॉ0 राजेश्वर आचार्य का रंगरेजों से दूर-दूर का रिश्ता नहीं मगर रंग की रंगशाला में ये रंगीन हुए। संगीत मार्तण्ड पं0 ओंकारनाथ ठाकुर ‘प्रणवरंग’ के निरीक्षण में पं0 बलवंतराव भट्ट के ‘भावरंग’ के अन्तर्गत संगीत सीखने के कारण पं0 राजेश्वर आचार्य ‘प्रभावरंग’ से रंगीन हुए। रंगीन मिजाजी इसी संगीत की देन है। खयाल, ध्रुपद, धमार के साथ ही भक्ति संगीत में पारंगत होने की इन्होंने इक्कीसवीं सदी में नादानी की।

      बनारस घराने को ठेंगा दिखाने का आपको दण्ड यह मिला कि विश्वनाथ की नगरी में गोरक्षनाथ की नगरी के लिए जिलाबदर हो गया। जहाँ सत्ताइस साला साढ़ेसाती उतारकर आप टंच बनारसी ठलुआ के रूप में धुवपदिका बने जलतरंग में उतराए हुए हैं।

      धुपद में तलसीदास को गठियाकर आपने कीर्तिमान बनाया। तुलसी साहित्य को संगीत से संजीवनी देकर उत्कृष्ट श्रद्धांजली अर्पित की। तुलसी के पड़ोस के प्रति आपका यह ठलुआ भाव अच्छे पड़ोसी होने का देशवासियों को स्थायी भाव प्रदान करता है। साढ़े बारह घण्टे पानी पीटने का आपने कीर्तिमान बनाया। इसी तरह साढ़े तेरह घण्टे अनवरत गला रेतने का भी विश्व कीर्तिमान हथियाया।

      संगीत को समर्पित संस्थाओं की स्थापना, कार्यक्रमों का संयोजन तथा उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, रिम्पा, उत्तर प्रदेश ललित कला एवं संगीत विकास परिषद जैसे सम्मानित संस्थाओं की उच्च कुर्सियां तोड़ी। दर्जनों ख्यातिलब्ध आयोजनों के समन्वयक के रूप में आरोह किया। शोध जैसे मगजमारू काम के कारण सुदिन में ही आपकी लहरीली केशराशि ने वानप्रस्थ ले लिया या रंग बदलना शुरू कर दिया।

      संगीत की बंदिशों का गुणा-भाग करते शब्दों की रगड़-पिस करने वाली आपकी व्यास शैली की वाग्मिता मनोहारी है। जब आप शब्दों की तान छोड़ते हैं तो व्याकरणप्रिय गणपति के शुण्ड के भीतर की मृदुमुस्कान से मन मुदित हो जाता है। इस समय आकरी-चाकरी, हाजिरी-अटेंडेंस के जंजाल से सिर से पैर तक परमुक्त मुक्तकाशीधाम में ठलुआ संस्कृति का संधान करने लगे हैं। रागों, उनकी धर्मपत्नियों, पुत्र-पुत्रियों और पुत्रवधुओं के भरे-पूरे परिवार की दरबानी का गुरुतर दायित्व गुरुभाव से पूर्णकर नटराज के परमप्रिय वाहन बने विचरणशील है। इसलिए सर्वांग महामुंडन के महत अधिकारी है। आप आरोह-अवरोह, विलंबित और द्रुत चौदह मात्रा वाले चौताल में चौकड़ी भरते रहे यही भगवान भास्कर के योग्य सुपुत्र शनिदेव से हमारी प्रार्थना है।

      सौभाग्य से आपके पास ऊपरवाले का दिया सब कुछ है पर दुर्भाग्य, नीचे वाले का दिया कुछ नहीं है। सो आज ठलुआ क्लब अपनी पूरी दम लगाकर आपकी ‘ठलुआ सुरताज की दुर्लभ उपाधि से श्रं‘गारित करता है। आपकी जय-जयकार करता है, बारंबार करता है।

शिव के त्रिशुल पर बसी प्राचीन नगरी काशी के संस्कृति, परम्परा, कला एवं विरासत के संरक्षण व विकास हेतु वर्तमान में आधुनिक विचारधारा तेजी से प्रवाहित हो रही है। यह विचारधारा वास्तविकता के धरातल पर प्रवाहमान होती है या विर्सजित रूप अख्तियार कर लेती है यह तो स्वयं भगवान शिव जाने। पूरे देश में काशी के विकास का मुद्दा केन्द्र में है।  काशी को क्योटो जैसा बनाने का स्वप्न दिखाया जा रहा है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय निकाय, विभिन्न संस्थाओं द्वारा अपनी-अपनी योजनायें प्रस्तुतकर व्यापक व सर्वांगीण विकास की बातें कही जा रही है परंतु यहां की संस्कृति, परम्परा लोक उत्सव की प्राणवायु बनारसी मस्ती को संरक्षित करने की बात किसी ने नहीं की। स्वयं में बेमिशाल, अनोखे, अक्खड़-फक्कड़ मदमस्त वाली संस्कृति क्या दुनिया के किसी शहर में है सिवाय बनारस के। जिसे देखने, समझने और जीने को पूरे दुनिया से लोग भागे चले आते हैं। दुनिया को ठेगें पर रखने की बनारसी कला में न तो यहां के लोगों में घमण्ड होता है और न ही ईर्ष्या। इस अनोखी नगरी के अक्खड़, मदमस्त, निराले मस्ती के अनोखे अंदाज को संजोने और संवारने का बीड़ा उठाया काशी की ही संस्था ठलुआ क्लब ने।

रामगोपाल सर्राफ द्वारा रचित ठलुआ क्लब की शनि वंदना

ओम शनिच्चराय नमः

जय शनि देवा, स्वामी जय शनि देवा,

जो कोई तुमको ध्यावे मिले उसे मेवा,

ओम जय शनि देवा…..

ठलुआ क्लब की नींव में तुम ही हो साधक,

उसको मार भगाते जो बनता बाधक,

ओम जय शनि देवा…..

शरण तुम्हारी आए करा देता है मस्त,

रुष्ट हो गए जिस पर, रहता बस वह त्रस्त,

ओम जय शनि देवा…..

बच्चे-बूढ़े एक साथ नहीं कोई दंगा,

हांस-नाच के जाओ, बिना दिए चंदा,

ओम जय शनि देवा…..

महिमा तुम्हारी न्यारी, नहीं लगाया तेल,

ठेंगे पर तुम रखते शुद्धता का ये खेल,

ओम जय शनि देवा…..

शिव-शनि एक राशि के पूरक हैं दोनों,

निर्भय होकर बोलो, ठलुए ही दोनों,

ओम जय शनि देवा…..

वर्तमान में ठलुआ क्लब वाराणसी के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया गया है जिसपे हज़ारो लोग जुड़कर “बनारसीपना” करते रहते हैं

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