बदलाव में कहीं खो न जाये बनारस – नीलकण्ठ पुरुषोत्तम जोशी

काशी भले ही धनवान न रही हो लेकिन विद्वता और विद्वानों के मामले में तो यह नगर सदियों से समृद्ध रहा है। इस प्राचीन जीवंत शहर में समस्त विषयों के विशेषज्ञ हुए हैं। यहां की हर गली-मोहल्ले में ऐसे-ऐसे महापंडित मिल जायेंगे जिनके पास जानकारियों का ऐसा खजाना है कि उनसे किसी भी विषय को बखूबी में जाना जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान का सिरमौर रहा यह शहर आज भी विद्वता की परम्परा को आगे बढ़ा रहा है। काशी के विद्वानों की कड़ी में पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक और इतिहासकार, लेखक, संग्रहालयविद सहित तमाम क्षेत्रााsं में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ0 नीलकंठ पुरूषोत्तम जोशी का नाम प्रमुख है। डॉ0 नीलकंठ पुरूषोत्तम जोशी उन चुनिंदा बनारसियों में हैं जिन्हें चलती-फिरती लाईबेरी कहा जा सकता है। उम्र के लगभग 80 बसंत से ज्यादा देख चुके और राधाकृष्णन के कुलपतित्व में बीएचयू के छात्रा रहे डॉ0 जोशी आज भी उसी तरह जिज्ञासु रहते हैं जैसे बचपन में थे। यही कारण है कि डॉ0 जोशी उम्र के इस पड़ाव पर भी पढ़ते-लिखते रहते हैं। काशी के विद्वानों के साक्षात्कार की कड़ी में डॉ0 जोशी जी से मिले तो उन्होंने न केवल काशी बल्कि ज्ञान-विज्ञान के कई पहलुओं पर बेबाकी से अपने अनुभव साझा किये। प्रस्तुत है डॉ नीलकंठ पुरूषोत्तम जोशी से बातचीत के प्रमुख अंश-

बतौर इतिहासकार बनारस को आप कैसे देखते हैं?

इतिहास और परम्परा की दृष्टि से यह शहर अत्यन्त प्राचीन है। पृथ्वी पर मुक्ति का क्षेत्र होने की मान्यता ने इस शहर को और भी अधिक ऐतिहासिक बना दिया। देश के सुदूरवर्ती राजा और रानी भी इस नगर में आकर रूकते थे। जिससे इस नगर में बहुत से मंदिरों, भवनों का निर्माण हुआ। इस शहर की ऐतिहासिकता के अंश आज भी हमें ऐसे मंदिरों भवनों के देखने से मिल जाते हैं। साथ ही परम्परा की दृष्टि से भी यह शहर अपने में बहुत कुछ समेटे हुए है।

पिछले कुछ दशकों से काशी में आये बदलावों को आप किस रूप में लेते हैं?

कोई भी वस्तु चिर निरंतर एक सी नहीं रह सकती। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। काशी भी आदिकाल से लेकर अब तक बहुत से परिवर्तनों से होकर गुजरी है। कभी “वेद, शास्त्र और साहित्य के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका में रहने वाली काशी वर्तमान में आधुनिक विषयों को भी अपने में आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रही है। यह परिवर्तन का ही तो प्रभाव है। परिवर्तन के दौर में भी यह हमारा कर्तव्य है कि सांस्कृतिक सम्पदाओं को संजोया जाय। साथ ही नई पीढ़ी को इन सम्पदाओं से जोड़ा जाय। परिवर्तन तभी सार्थक है जब हम नई संस्कृति, सभ्यता को अपनाने के साथ जो हमारी थाती है उसे न भूलें। क्योंकि उसी से हमारी पहचान है।”

काशी वेद, वेदांगों, शास्त्रों, कर्मकाण्डियों का गढ़ माना जाता था लेकिन आज कहीं न कहीं इसमें कमी आयी है। आपको क्या कारण लगता है?

”वेद, शास्त्रा और साहित्य के रूप में शिक्षा के क्षेत्रा में अग्रणी भूमिका में रहने वाली काशी वर्तमान में आधुनिक विषयों को भी अपने में आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रही है। यह परिवर्तन का ही तो प्रभाव है। परिवर्तन के दौर में भी यह हमारा कर्तव्य है कि सांस्कृतिक सम्पदाओं को संजोया जाय साथ ही नई पीढ़ी को इन सम्पदाओं से जोड़ा जाय। परिवर्तन तभी सार्थक है जब हम नई संस्कृति, सभ्यता को अपनाने के साथ जो हमारी थाती है उसे न भूलें। क्योंकि उसी से हमारी पहचान है।“

काशी में संस्कृत पाठशालाओं में विद्यार्थियों को वेद, शास्त्र, उपनिषद की बाकायदा समुचित शिक्षा दी जाती थी। इन पाठशालाओं से निकलने के बाद विद्यार्थी इतना तैयार होता था कि समाज में लोगों को अपने उत्तरों से संतुष्ट कर देता था। लेकिन आज शिक्षण की वह परम्परा टूट रही है। जिससे यह खालीपन आया है। शिक्षण की इस परम्परा को भी जीवित करना होगा। एक और बात- कर्मकाण्ड में अब जीवन-यापन विषय भी आ गया है। वर्तमान परिस्थितियां बदल चुकी हैं। पारम्परिक पुष्टता के साथ वैदिकों को आधुनिक ढंग से इस तरह प्रशिक्षित करना होगा कि वे विषय को गहराई से समझ सकें। जिससे कि वे विद्यार्थियों अथवा यजमानों को सन्तुष्ट कर सकें। जैसे यदि किसी ने पूछ दिया कि अनुष्ठान में पत्नी को पति के बांयीं ओर क्यों बैठाया जाता है। ऐसे में जब तक विषय पर गहराई से पकड़ नहीं होगी तब तक ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते। एक और बात- समाज में वैदिकों को अलग दृष्टि से देखा जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वैदिक होने का मतलब समाज में पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है। ऐसे में महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि वैदिकों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जाय।

काशी के ऐतिहासिक भवनों, मंदिरों सहित अन्य धरोहरों को कैसे बचाया जा सकता है?

मूलतः काशी वरूणा की ओर यानी उत्तर दिशा में बसी है। यह अलग बात है कि वर्तमान में हर दिशा में काशी का विकास हो रहा है। पुराने बनारस जिसे पक्का महाल कहा जाता है में कई फाटक बने हुए हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से बनाये गये थे। इन फाटकों के भीतर गलियां हैं। वास्तव में काशी के इन अमूल्य धरोहरों को संजोने के लिए हमें कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि थोड़ा चेतने और सजग होने की जरूरत है। सरकार के साथ समाज को भी जिम्मेदार होना होगा। गलियों को साफ रखना होगा साथ ही उन्हें हो सके तो और चौड़ा करना पड़ेगा। जबकि मंदिरों, प्रचीन इमारतों को बचाये रखने के लिए भी प्रयास करना होगा। यह शहर अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है। आधुनिकता के साथ हमें उसे संजोने की तरफ भी ध्यान देना होगा।

बनारस के संग्रहालयों के बारे में आपकी क्या राय है और इन संग्रहालयों में आम लोगों की रूचि को कैसे बढ़ाया जा सकता है?

1941 में इण्टरमीडिएट, हरिश्चन्द्र इंटर कालेज से करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गया, जहां से पीएचडी की। मेरे विद्यार्थी जीवन में बीएचयू के कुलपति राधाकृष्णन जी थे। उनका हम विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। पहले के शिक्षकों का अपने शिष्यों से आत्मिक लगाव हुआ करता था। शिक्षक छात्रों के आदर्श हुआ करते थे।

मैं अपने सरकारी कार्यकाल के दौरान दो संग्रहालयों का अध्यक्ष था। एक तो मथुरा संग्रहालय एवं दूसरा लखनऊ संग्रहालय का। इन दोनों संग्रहालयों का दायित्व सम्भालने के दौरान मेरे गुरू ने मुझे सलाह दी कि संग्रहालय के प्रत्येक संग्रह के बारे में मौखिक जानकारी होनी चाहिए। संग्रहालय की कोई वस्तु बाहर नहीं जानी चाहिए। मैंने उनके दिये सुझावों पर ही कार्य किया। लेकिन आज इन नियमों का कोई पालन नहीं करता। परिणाम स्वरूप संग्रहालयों की दशा दयनीय हो गयी है। वर्तमान में संग्रहालयों को आर्थिक रूप से काफी धन मुहैया कराये जा रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से इतना धन मिलने के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है। बनारस के संग्रहालयों की बात की जाय तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित भारत कला भवन सबसे खस्ताहाल में है। यही हाल सारनाथ और सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संग्रहालय का भी है।  सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय स्थित संग्रहालय का तो मैं संस्थापक सदस्य रहा हूं। हमारे समय में संग्रहालयों में लोगों की रूचि बढ़ाने के लिए समय-समय पर विभिन्न स्कूलों में प्रदर्शनी लगवायी जाती थी, जिससे बच्चों में पुरानी वस्तुओं और उनको जानने की जिज्ञासा बढ़ती थी। लेकिन वर्तमान में इस तरह के आयोजन नहीं हो रहे हैं। संग्रहालय मात्र सरकारी कार्यालय की तरह खुल रहे हैं और बंद होने तक सीमित हो गये हैं। इस स्थिति को बदलना होगा तभी संग्रहालय की दशा सुधर सकती है।

क्या कारण है कि बनारस के लख्खा मेले में अब वह उत्साह कहीं न कहीं फीका पड़ता जा रहा है जो पहले हुआ करता था?

देखिये, आज समाज में परस्पर सम्बंधों में बिखराव आ गया है। परिणामतः संस्कार का जो बीज बड़े बुजुर्ग बच्चों में डालकर और उसे उत्तम आदर्शों से सींचते थे वह अब नहीं रहा। परिणामतः हर उत्तम व्यवहार में गिरावट हुई है। अब स्वस्थ मनोरंजन की जगह फूहड़ गानों और फिल्मों ने जगह ले लिया है। युवाओं में पारम्परिक विधाओं के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है। हमारे समय में जब बनारस की आबादी बेहद कम थी उस समय बड़े-बड़े मेलों में लाखों की भीड़ पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ जुटती थी। लेकिन आज बनारस की आबादी इतनी बढ़  जाने के बाद भी लख्खी मेलों में भीड़ नहीं जुटती। लोगों की सोच में परिवर्तन आया है। वर्तमान समाज अर्थ प्रधान हो गया है। लोगों में सुकून और निश्चिंतता का भाव समाप्त हो रहा है।

अपने छात्र जीवन और वर्तमान को देखते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को कहां पाते हैं।

अध्ययन अध्यापन का भी स्तर गिरा है। अब छात्रों में विद्यार्जन की ललक नहीं है। महज डिग्री लेकर नौकरी पाने की चाह लिए छात्र लगे हुए हैं, जिस कारण गुणवत्ता में कमी आयी है। वहीं शिक्षक अब अध्यापन तक सीमित नहीं है वह अब राजनीतिक, सामाजिक आयोजनों में रूचि लेने लगा है। हमारे समय में छात्रों को कालीदास द्वारा रचित रघुवंशम के मात्र दो सर्ग को पढ़ाया जाता था, इन्हीं दो सर्गों को पढ़ने के बाद वह पूरे रघुवंशम को पढ़ने समझने के योग्य हो जाता था। अब गुरू शिष्य परम्परा भी समाप्त हो गयी है। आदर्श शिक्षकों की कमी हो गयी है। पहले गुरूओं के सम्बंध छात्रोंं से अध्ययन-अध्यापन के बाद भी बने रहते थे। लेकिन आज इनके बीच सम्बंध ही नहीं हैं। वर्तमान में विद्यार्थियों के आंदोलन तो खूब होते हैं लेकिन वह पढ़ने-पढ़ाने के लिए न होकर किसी और ही उद्देश्य से हो रहे हैं, जो कि चिंता का विषय है।

आप अपने बारे में कुछ बतायें।

मेरे पिताजी मध्य प्रदेश में पेशे से चिकित्सक थे। मेरा जन्म वहीं पर हुआ। सेवानिवृत्त होने के बाद पिताजी मोक्षपुरी काशी में भोसला घाट पर आकर बस गये। उस समय मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। गुर्जर पाठशाला से मेरी प्राथमिक शिक्षा हुई। वहीं, गुरूओं के कहने पर मैंने अनौपचारिक रूप से वेदों और शास्त्रों का भी अध्ययन किया। 1941 में इण्टरमीडिएट, हरिश्चन्द्र इंटर कालेज से करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गया, जहां से पीएचडी की। मेरे विद्यार्थी जीवन में बीएचयू के कुलपति राधाकृष्णन जी थे। उनका हम विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। पहले के शिक्षकों का अपने शिष्यों से आत्मिक लगाव हुआ करता था। शिक्षक छात्रों के आदर्श हुआ करते थे। सार्वजनिक जीवन के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी शिक्षकों का व्यवहार अनुकरणीय होता था। लेकिन अब वह बात नहीं रही। पढाई के बाद पुरातत्व विभाग में कार्यरत हो गया। मैंने हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी में पुस्तकें भी लिखी हैं। जिसमें प्राचीन भारतीय मूर्ति विज्ञान, मथुरा की मूर्ति कला प्रमुख है।

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