बनारस की साहित्यिक परंपरा

  शिव प्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय की विलक्षण कथाकृति बहती गंगा में अठ्ठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी का वह छिट-पुट बनारस है जिसमें पूरा बनारस देखा जा सकता है। चलिये यहीं एक प्रश्न उठाएं। रुद्र ने इसका नाम ‘बहती गंगा’ क्यों रखा जबकि बनारस में गंगा को सिलसिलेवार पक्के घाट मिले हैं। असी से लेकर राजघाट तक? क्या यही ‘कहानी’ के अंतर्प्रवाह से बनते शिल्प की मांग थी या कोई और मन्तव्य? शायद इसलिए कि बनारस में जितना ठहराव है उससे ज्यादा गति है, जितना वैराग्य है उससे ज्यादा राग, जितनी कलह है उससे ज्यादा मैत्री, जितना आध्यात्म है उससे ज्यादा लौकिकता और जितना शास्त्र है उससे ज्यादा लोक है। ‘गति ही है जो सभी स्थिरताओं को घिस कर चमकाती जा रही है।’ रुद्र ने उस बनारस को लिखा जिसकी जनता बार-बार राजा चेत सिंह के साहस और उम्मीद पर आमदा थी। बनारस के गली कूचे के बच्चे आज भी, भले ही थोड़ा बिगाड़ कर, यह गाते मिल जाएंगे कि ‘घोड़े पर हौदा, हाथी पर जीन, जल्दी में भाग गयल, वारेन हेस्ंिटग’।

    वारेन हेस्टिंग को इस तरह खदेड़ने का आंदोलन उठा देने वाले राजे-महाराजे या महानायक नहीं, बल्कि देह के साथ चेतना दुरुस्त रखने वाले पहलवान, साधु-सन्यासी, चित्रकार, गायिकाएँ, रूप बाजार की स्त्रियां, गरीब स्त्री-पुरुष और बच्चे थे। रुद्र ने यह बनारस कल्पना से नहीं गढ़ा था, वाचिक परंपरा के जीवित रुप में इसे देखा और पहचाना था। बनारस ऐसा ही है। हमेशा ज्ञान-विज्ञान, चिंतन, आध्यात्म और सौन्दर्य बोध को प्रतिरोध की सशक्त संरचनाओं में ढालने के लिए तत्पर और बेचैन। ‘लोक’ इसकी आत्मा है और ‘लोक’ ही इसकी धुरी। ‘परलोक’ यहां लोक की ही काम्य आदर्शीकृत छवि है। ऐसा अलमस्त बनारस कि ईश्वर को भी न केवल इस लोक को सुधारने के काम पर लगा दिया बल्कि लगातार निगरानी में भी।

    दूर जहां तक दृष्टि जाती है वहां देखिए- बुद्ध, लोक की मुक्ति का विधान खोजते यहां चले आए। जीवन की स्थूलता और प्रतिगामिता के समग्र तिरस्कार से बनती वह प्रबुद्ध चेतना ही जैसे अग्नि की तरह चिंतन और सृजन की पूरी परंपरा में अपने आधार ढूंढती रही है। गौतम बुद्ध एक आंदोलन का नाम है। वर्ण-व्यवस्था की अमानवीयताओं से टकराती उनकी प्रज्ञा ने मनुष्य, और मनुष्य में अंतर करने वाली आचार-संहिता और भाषा का स्पष्ट विरोध किया। लोक की सबलता का यह स्वर पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में पुनः कबीर, रैदास और तुलसी में प्रकट होता है। सत्ता केंद्रित संस्कृति की संसाधन संपन्नता से टकराते कबीर की ‘लुकाठी’ का भाष्य करें। आश्चर्यजनक लगता है कि पूर्व मध्यकाल के इस फकीर कवि ने यह जान लिया था कि मनुष्य के लिए सबसे कठिन चुनौती ‘बाजार’ है। आज इस बाजार के लिए हमारे देश का सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। आर्थिक-सामाजिक आत्मनिर्भरता, संस्कृति, भाषा, स्मृति सब कुछ।

    तुलसी की चिंता में भी भक्ति और कविता की सामाजिक जवाबदेही के प्रश्न बराबर थे। अपने देशकाल के सर्वविध्वंस को निहत्था कर देने वाले अनुभवों के बावजूद तुलसी ने मनुष्य की जयगाथा का स्वप्न लिखा है। काशी की जड़ता ने उन्हें चारों तरफ से घेरा था। भाषा और संवेदना के अभिजात शास्त्रीय ठिकानों की ओर से आने वाले आक्षेप, निंदा और तिरस्कारों को तुलसी ने अपार जनस्वीकृति की उमड़ती महानदी में बहा दिया था। विनय के साथ तुलसी में रोष था और प्रतिरोध भी।

    उत्तर-मध्यकाल के रीतिवादी दौर में पंडितराज जगन्नाथ ने अपनी रचना के साथ-साथ अपने जीवन संघर्ष से काशी के कर्मकाण्ड विरोध का अध्याय लिखा किंतु यह संभवतः समूचे इतिहास का यथास्थितिवाद को मजबूती देने वाला दौर था। यही कारण था कि भारतेन्दु ने अपना सबसे पहला और जरूरी कार्य, रीतिवाद विरोध, निश्चित किया था। भारतेन्दु हिंदी नवजागरण की बहुत मजबूत कड़ी थे। इस धार्मिक आध्यात्मिक शहर में उनके होने का अर्थ था। भारतेन्दु मंडल की छटा देखिए : बालकृष्ण भट्ट, प्रेमधन, राधाचरण गोस्वामी, प्रताप नारायण मिश्र सघ्भी गहरी रचनात्मक मैत्री में अभिन्न। साहित्य उनके लिए यश साधन या आत्म प्रकाशन भर नहीं था बल्कि जमाने को भीतर से बदलने वाला हथियार था। कवि वचन सुधा, बाल बोधिनी, हरिश्चन्द्र चंद्रिका, काशी पत्रिका जैसी पत्र-पत्रिकाएं साहित्यिक-सामाजिक मुद्दे पर सक्रिय और गंभीर थी। भारतेन्दु मंडल के रूढ़िवाद विरोध का आलम यह कि मुद्राराक्षस नामक नाटक में एक चरित्र अभिनीत करते हुए बालकृष्ण भट्ट ने पिता का श्राद्ध कर दिया था। कल्पनातीत है कि कितना अस्वीकार, कितनी निंदा उन्हें झेलनी पड़ी होगी।

    समाज की पुनर्रचना के लिए रूढ़िभंजन के ऐसे साहस की कमी नहीं थी, उस युग के लेखकों में। साम्राज्यवाद विरोध के साथ भारत की स्वाधीनता की बड़ी स्पष्ट आकांक्षा भारतेन्दु में व्यक्त हुई है कि – ‘स्वतत्व निज भारत गहें’। एक अलख जगाई जा रही थी जिसमें निज भाषा उन्नति सहित आर्थिक-सामाजिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के साथ कितनी संस्थाएं, अखबार, पत्रिकाएं, रंचमंच, लोकविधाएं आदि साम्राज्यवाद के विरोध के स्वर को दूर तक ले जा रहे थे। यह विरासत अपने पूरे अग्रगामी सार के साथ प्रेमचंद, प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी, शिव प्रसाद मिश्र, रूद्र काशिकेय और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसी विभूतियों में फलीभूत हुई है।

    प्रेमचंद ने भारतीय किसान के हित के केन्द्र में सामंती साम्राज्यवादी शोषण की जड़ों को पहचानते हुए अपना रचनात्मक विकास पाया। हंस जैसी पत्रिका के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया। अभाव, बीमारी, अंग्रेज सरकार का विरोध, क्या-क्या उन्हें नहीं झेलना पड़ा। उधर प्रसाद के यहां ‘भारतीयता’ भिन्न सांस्कृतिक सार के रूप में निर्मित हो रही थी। हंस, इंदु, हिंदी गल्प माला जैसी पत्रिकाएं आधुनिक भारत की पुनर्रचना के शक्ति स्रोतों को अपने आदर्शों के अनुरूप खोज रही थीं। बीसवीं शताब्दी के इस आरंभिक दौर के बनारस में विविध साहित्यिक हलचलें थीं। काशी में उस समय मैथिलीशरण गुप्त, जैनेन्द्र, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे रचनाकारों का आना-जाना और परस्पर संवाद था। इसके अतिरिक्त शिवपूजन, सहाय, उग्र, शांतिप्रिय द्विवेदी और विनोद शंकर व्यास जैसे रचनाकार यहां थे। रायकृष्णदास ने केदारनाथ पाठक का जिक्र किया है जो अपने साहित्यिक ज्ञान में बहुत चौकस थे। साहित्यिक और यथार्थ के रिश्ते को समझने की बेचैनियों के कई रूप थे। प्रसाद और जैनेन्द्र में ही नहीं, प्रेमचंद की भी यथार्थ और यथार्थवाद संबंधी उलझने बनी हुई थीं। इस बनारस के बहुत पास धड़कने वाला हृदय प्रयाग था।

    आचार्य शुक्ल ने सुमित्रानन्दन पंत को छायावाद का महत्वपूर्ण कवि माना। वे उनकी लोक मंगल की कसौटी पर ज्यादा खरे उतर रहे थे। यह कबीर, तुलसी, भारतेन्दु, और प्रेमचंद की ही रियासत थी कि शुक्ल जी की वस्तुवादी आलोचना दृष्टि को ऐसी धार मिली। सुदूर शांतिनिकेतन में कबीर के गहरे स्वीकार में रचे-बसे रवीन्द्र नाथ ठाकुर से हजारी प्रसाद जी को एक अन्य कबीर मिल रहे थे। प्रतिरोध की संस्कृति की परंपरा की सशक्त कड़ी होकर वे नाथ-सिद्ध साधना की लोक सम्पृक्त चेतना की अभिव्यक्ति थे।

    छायावादी दौर में बनारस में ‘यथार्थवाद’ को लेकर गंभीर बहसों और निष्कर्षों का रूप दिखाई देता है। जयशंकर प्रसाद ने ‘यथार्थवाद’ पर विचार किया, यद्यपि उनकी रचनादृष्टि की प्राथमिकताएं भिन्न थीं। जीवन की सूक्ष्मसारता को भावसत्ता के रूप में बदलकर व्यक्त करना उनकी विशेषता थी। वे अर्थ की सघन सारमयी संरचना के रचनाकार थे तथा स्थूलताओं को प्रत्येक स्तर पर तिरोहित करने के पक्ष में थे। इन्हीं कारणों से ‘यथार्थवाद’ को उनकी सहानुभूति प्राप्त नहीं हुई। उन दिनों जैनेन्द्र भी यथार्थ और यथार्थवाद संबंधी प्रश्नों के संदर्भ में प्रेमचंद से संवाद में थे। जैनेन्द्र की भी यथार्थवाद संबंधी दृष्टि में प्रसाद जी के समान भाववादी प्राथमिकताएं फलीभूत हुईं।

    सन् 1950-55 के दौर की नई कहानी, नई कविता से बनारस की उल्लेखनीय संबद्धता यही थी कि नामवर सिंह ने उसकी प्रवृत्तियों, प्रतिमानों की पड़ताल की। उनके अनुसार निर्मल वर्मा की ‘परिंदे’ शीर्षक कहानी हिन्दी की पहली नई कहानी है। उनका आलोचक उस कहानी में संवेदना और भाषा का नया रूप देख रहा था। इस प्रश्न पर उन्हें बाकायदा ‘घेराव’ झेलना पड़ा है किन्तु आज भी वे अपनी इस मान्यता पर डटे हुए हैं। कहना न होगा कि यह ‘डटे रहना’ बनारस का ही वह शिल्प है जो व्यक्तित्व को जमीनीं आत्मविश्वास देता है। वह आत्मविश्वास जो न केवल ‘आधुनिकता’ की जातीय समझ देता है बल्कि फैशन और पैशन के तौर पर चलाई जा रही उत्तर- आधुनिकता की समूची असलियत जानता है। यह नामवर सिंह ही थे जिन्होंने परंपरा और स्मृति के पुनर्पाठ के भीतर बहुराष्ट्रीय पूंजी के विखंडनवादी चरित्र से बनते इस उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श को अपने ढंग के विखंडन के पाठ के जरिए समझाया था। वे सदैव जीवन के अर्थ को उसके गतिमान संघर्ष में कला की चुनौतियों के साथ लेने वाली कृतियों के प्रशंसक रहे हैं। यह भी है कि अपनी पसंद-नापसंद की कड़ी निगरानी करने वालों के लिए वे एक बड़ी बौद्धिक चुनौती साबित होते हैं। ‘जातीयता’ का यह अंतः स्वर केदारनाथ सिंह और रामदरश मिश्र की रचनाओं में उनके अपने रचनात्मक संघर्ष के अनुरूप प्रकट हुआ है। केदारनाथ सिंह ने अवश्य अपने शिल्प को नोक-पलक से दुरुस्त रखने के मोर्चे पर अतिरिक्त सावधानी ली है। उनके यहां ‘अर्थ’ की सूक्ष्म संरचनाएं, मिलती हैं। बहुत संभव है कि सदी के इस सख्त आलोचक की निकटता और निगरानी ने उन पर इस ‘अतिरिक्त’ के लिए दबाव बनाया हो।

    ‘नयी कहानी’ का वह दौर बनारस के रचनात्मक पाठ में अलग तरीके से घटित होता है। संभवतः इसका कारण बनारसी मध्यवर्ग की प्रवृत्ति की विलक्षणता हो जिसके लिए ‘संकटबोध’ का वह निर्धारित रूप उस समय मान्य नहीं था।

    उन्हीं दिनों द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ मध्यवर्गीय जीवनानुभवों को उम्मीद और राग के शिल्प में लिख रहे थे। शिव प्रसाद सिंह भी अस्तित्ववाद की वैसी चपेट में नहीं थे। रामदरश मिश्र और केदार नाथ सिंह भी शीघ्र ही उन कल्पित-आरोपित स्थितियों से निकल आए। रामदरश मिश्र, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह उस दौर में विद्यार्थी थे और इस प्रतीकात्मक रुझान को उत्सुकता के साथ देख रहे थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपने शिष्यों को हिंदी साहित्य के इतिहास के उन दिनें में परंपरा को समझने और उससे टकराने का विवेक दिया जिन दिनों परंपरा पिछड़ी हुई चीजों के खाते में डाल दी गई थी। नामवर सिंह की प्रखरता तथा शिवप्रसाद सिंह के इतिहास प्रेम में द्विवेदी जी का ही तप निरंतर प्रवाह में है।

    सातवें दशक में द्विवेदी जी ने बनारस छोड़ दिया था। नामवर सिंह, शिव प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र जैसे शिष्यों के गुरु थे वे। प्रगतिशील हिंदी आलोचना के शिखर नामवर सिंह सुमधुर कंठ के साथ उन दिनों ‘झुपुर-झुपुर धान के समुद्र में, हलर-हलर सुनहरा विहान’ गाते थे। केदार नाथ सिंह रुमानियत के बावजूद नये मोटिक्स और मेटाफर्स के लिए संघर्ष में थे। रामदरश मिश्र ने त्रिलोचन के प्रभाव से अपनी रुमानियत के मुक्त होने का उल्लेख भी किया है। बनारस का प्रगतिवादी स्वर रोमांटिक किस्म की प्रगतिवादिता से भिन्न था। त्रिलोचन यहां काफी समय तक रहे। उनके समने कई रचनाकारों की पीढ़ियां अपने संघर्ष में थी। केदार, रामदरश मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, विष्णु चंद्र शर्मा और बाद में धूमिल भी। बाद के दिनों में प्रायः नयी कविता के उतार के दिनों में राजकमल चौधरी, ऐलेन गिन्सबर्ग भी यहां आए।

    धूमिल को रूढ़िभंजकता और स्पष्ट अस्वीकारता का तेवर कबीर और भारतेन्दु की परंपरा से मिला। देश के इतिहास का यह बड़ा ही तोड़-फोड़ भरा दौर था। तमाम बड़ी प्रतिभाएं मध्यवर्गीय अनुभववाद की चपेट में अपनी कलम तोड़ रहीं थी। धूमिल ने ऐसे बौद्धिक छल से तय होती संवेदना और भाषा के समूचे नाटक को तार-तार कर दिया। पूंजीवादी जनतंत्र का सच्चा तीखा आलोचनात्मक स्वर धूमिल में दिखाई दे रहा था। यही नहीं, देश समाज या मनुष्य का संकट उनके लिए बौद्धिक जुगाली की चीज नहीं था। मध्यवर्गीय अवसरवाद की कठिन संरचनाओं की पहचान धूमिल में ऐसे ही नहीं थी। धूमिल का रचनात्मक तेज इतना प्रखर हुआ कि नई कविता के तमाम ठहरावों को तोड़ने वाला कारगर शिल्प उनसे ही संभव हुआ। धूमिल बनारस की रचना परंपरा में एक बड़ा नाम है।

    बनारस में मौजूदा देशकाल वैश्विक पूंजी के असर से बदलती आर्थिक सामाजिक संरचनाओं का है। लोकतंत्र की घानी में अब केवल पानी ही पानी है। बनारस कहीं ज्यादा पूंजी आधरित क्लास संस्कृति की चपेट में है। बनारसी लोग भौंचक होकर देख रहे हैं कि बनारसीपन भी सांस्कृतिक उत्पाद में बदला जा रहा है। औद्योगिक घराने, तारांकित, होटल्स, फैशन ट्रेन्ड्स और टूरिज्म ने मुनाफा उगाही का क्षेत्र बना लिया है। काशीनाथ सिंह और ज्ञानेन्द्रपति के सामने अपसंस्कृति की इन गहरी व्यूह रचनाओं को समझने की चुनौतियाँ हैं। काशीनाथ सिंह ने सबसे पहले इसे परजीविता को पोसने वाली भाषा को तिरस्कार के साथ लिया है। उनके संस्मरणों में काशी अपने प्रतिरोध के पूरे अंतर्पाठ में व्यक्त हुई है।

    सातवें दशक के आरंभिक दौर में नवलेखन के इर्द-गिर्द जुटती गतिविधियों के करीब अकविता का विध्वंसक अस्वीकार एक उत्तेजक माहौल रच रहा था। हालांकि कविता की जमीनी पकड़ फिर भी बनी रही जिसे धूमिल में देखा गया। धूमिल पूँजीवादी जनतंत्र के प्रति तीखे आलोचनात्मक कवि थे और भाव तथा भाषा के दोमुंहेपन की राजनीति को सर्वत्र तोड़ रहे थे। सन् 1965 के आस-पास नामवर सिंह ने बनारस छोड़ा। विद्यासागर नौटियाल यहां थे। कवि विजेन्द्र और विश्वनाथ त्रिपाठी यहां थे। शिव प्रसाद सिंह ने लंबी रचनात्मक सक्रियता पाई। सातवें दशक के सक्रिय रचनाकारों में काशीनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह और धूमिल महत्वपूर्ण थे। कथाकार रमाकांत आज अखबार में काम करते थे। काशीनाथ सिंह पर भी आरंभ में अकविता के चरम निषेधवादी मुहावरों का प्रभाव था। क्रमशः वे यथार्थ के साथ अधिक जिम्मेदारी भरे संबंध के साथ आगे आए।

    इन्हीं दिनों के बनारस में मैनेजर पाण्डेय की आलोचनात्मक प्रखरता आकार ले रही थी। पाण्डेय जी ने हिंदी आलोचना को आचार्य द्विवेदी की परंपरा में चिंतन और पुनराविष्कार के रूप में विकसित किया। भक्तिकाल को कबीर, सूर और तुलसी की वृहत्रयी की प्रचारित रूढ़ि से निकाल कर मीरा की भक्ति और जीवन संघर्ष से जोड़कर उन्होंने अपने सटीक इतिहास बोध का परिचय दिया है। साहित्य का इतिहास उनके लिए एकरेखीय निरंतरता नहीं है। साहित्यिक सामग्री की अंतर्संबद्धता की जांच के संदर्भ में वे आचार्य शुक्ल की वस्तुवादी दृष्टि का विकास हैं। मार्क्सवाद उनके लिए जड़ीभूत मूल्य नहीं बल्कि ‘विजन’ है। मैनेजर पाण्डेय का गुरूकुल था बनारस।

    सूर्यकाल बनारस की हैं। धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं में लिखते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण पाठकीय स्वीकृति अर्जित की। इस बनारस के आधुनिक रचनात्मक परिदृश्य में भारतेन्दु के व्यंग्य की सचेतन दृष्टिवानता मौजूद रही है। छठें-सातवें दशक में बेढब बनारसी, बेधड़क बनारसी और भैया जी बनारसी के व्यंग्य का एक स्तर था। आज में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट कांजिलाल थे। शंभुनाथ सिंह की परंपरा में श्रीकृष्ण तिवारी और बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने गीतों से जगह बनाई। वे आज भी मंच पर एक गंभीर जिम्मेदार उपस्थिति हैं। नजीर बनारसी को कोई कैसे भूल सकता है? शेख हर्जा और गालिब के स्वर को अपने स्वर में शामिल कर उन्होंने ‘गंगा’ के लिए बराबर अपना स्नेह लिखा। बनारस के क्लासिक साहित्यिक चिंतन के पृष्ठों पर आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, केशव प्रसाद मिश्र, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, सीताराम चतुर्वेदी, विद्यानिवास मिश्र, शांतिप्रिय द्विवेदी, भोला शंकर व्यास, डॉ0 देवराज और प्रेमलता शर्मा की परंपरा में रेवा प्रसाद द्विवेदी, प्रो0 रामजी उपाध्याय, प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी, राममूर्ति त्रिपाठी के साथ-साथ भानुशंकर मेहता, कुंअर जी अग्रवाल और कमलिनी मेहता भी हैं। डॉ0 बच्चन सिंह, डॉ0 शुकदेव सिंह, डॉ0 चौथी राम यादव और मनु शर्मा तथा डॉ0 युगेश्वर रचनात्मक सक्रियता की मिसाल हैं। उनके आगे भी बनारस की कई पीढ़ियां बनी हैं। डॉ0 कमल गुप्त, कुसुम चतुर्वेदी, डॉ0 विश्वनाथ प्रसाद डॉ0 जितेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ0 ब्रह्मा शंकर पाण्डेय, डॉ0 राम सुधार सिंह तथा डॉ0 श्रीप्रसाद के भीतर पुराने बनारस के साथ नया बनारस भी है।

    धूमिल की रचनाशीलता के दिनों में बनारस में उनके रूढ़िभंजक स्वर के करीबी डॉ0 वाचस्पति, गोरख पाण्डेय, महेश्वर और नागानंद मुक्तिमंठ थे। वाम रुझान के कंचन कुमार आमुख पत्रिका निकालते थे। इन दिनों के बनारस में बलराज पाण्डेय, अवधेश प्रधान और वाचस्पति उस विरासत की करीबी कड़ियाँ हैं तथा रचना और आलोचना के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। विनय दुबे, अब्दुल बिस्मिल्लाह, रमाकांत, देवेन्द्र और दिनेश कुशवाहा को भी बनारस की ही परंपरा में देखना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रतिमा वर्मा, अनुराधा बैनर्जी, मुक्ता, नीरजा माधव, बीरबाला, नाहिद, शशिकला त्रिपाठी, प्रकाश उदय, सुरेश्वर त्रिपाठी, बलभद्र, पी0 चंद्र विनोद, लोलार्क द्विवेदी और अशोक सिंह, बृजबाला सिंह भी रचनात्मक समृद्धि के जरूरी पृष्ठ हैं।

    इस प्रकार संवेदना और भाषा की जड़ीभूत परतों को तोड़ने की परंपरा काशी में निरंतर मजबूत और दिशावान हुई हैं। काशीनाथ सिंह ने बनारस की जिंदगी को विघटित करने वाले वैश्विक पूंजी के दुष्चक्र को पहचाना है। उनकी रचनाशीलता में यह वैकल्पिक संस्कृति के लिए संघर्ष चेतना की खोज है, जिसमें निरंतरता बनी हुई है। जीवन का ऐसा विद्रूप उनके कॉमिक ट्रीटमेंट से अलग तरीके से निरस्त होता है। बाजार की दुरभिसंधियों से आक्रांत मामूली आदमी की यातना और संघर्ष की गहरे मानवीय लगाव से छूने वाले ज्ञानेन्द्रपति, काशी की रचनाशीलता का दूसरा महत्वपूर्ण शिखर हैं। उनके भीतर सुखिया संसार के भीतर बढ़ती दुख की सुरंगों को पहचनाने तथा संवेदनशील मनुष्य की बेचैनी मिलेगी। उनकी प्रसिद्ध काव्यकृति गंगातट में बनारस कई रंगों, अनुभवों और सूक्ष्मताओं में मौजूद है।

    बनारस की सर्वथा नई पीढ़ी को सभी गहरी उत्सुकता, आश्वस्ति और दुलार से देख रहे हैं। साहित्य और संस्कृति के लिए बहुत मुश्किल हो चले इस दौर में लघु पत्रिकाओं की बड़ी ही सार्थक हस्तक्षेप भरी उपस्थिति है। इनके द्वारा बिल्कुल नए अछूते क्षेत्रों से कथ्य, संवेदना और शिल्प सामने आ रहा है। वागर्थ और कथादेश के नवलेखन अंकों से इन उपस्थितियों को पूरा फोकस मिला है। बनारस से इन रचनाकारों में व्योमेश शुक्ल, चंदन पाण्डेय, पंकज पराशर, विमल पाण्डेय, श्रीकांत दुबे, अक्षय उपाध्याय आदि हैं। आश्चर्य है कि इन सभी युवा रचनाकारों में महत्वाकांक्षा से कहीं ज्यादा रचनात्मक ताप के लिए जूझने की गंभीरता है। बड़ी संभावनापूर्ण दस्तकों के रूप में अल्पना मिश्र हैं जिनकी रचनात्मक शख्सियत में काशी प्रतिभा और विरासत साथ है। इन दिनों डॉ0 कुमार पंकज अपने विशिष्ट गद्य के साथ ध्यान खींच रहे हैं।

    डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय के लेखन में क्लासिकी का अंतर्प्रवाह है तथा रमेश पाण्डेय और ओम धीरज के रचना लोक में यथार्थ की चुनौतियों से जूझने की तैयारी देखी जा सकती है। डॉ0 अवधेश प्रधान आलोचना में स्मृति और आधुनिक चेतना से समृद्ध शख्सियत हैं। बलराज पाण्डेय कहानी और यथार्थ के रिश्तों को सुसंगत ढंग से लेने वाले आलोचक और लेखक हैं। ‘केशव शरण’ सृजनात्मक क्षमता-संपन्न कवि हैं और महत्वपूर्ण ढंग से छप रहे हैं। डॉ0 वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी काव्य शास्त्र और रंग चिंतन से जुड़े हैं। डॉ0 सदानंद शाही के संपादन में साखी बनारस से निकल रही है। डॉ0 चंद्रबली सिंह के अनूठे सहयोग और अशोक पाठक की सक्रियता से जलेस की जनपक्ष नामक पत्रिका काशी प्रतिमान के संपादक हैं। इस पत्रिका के धूमिल अंक की अत्यधिक सराहना हुई। इसके अतिरिक्त डॉ0 देव, अरविंद चतुर्वेदी, डॉ0 अशोक पाठक जैसे कवि रचनाकारों की सक्रियता भी है। बनारस की साहित्यिक हलचलों की निरंतर सहभागी के रूप में लोलार्क द्विवेदी, डॉ0 दीनबंधु तिवारी, मेयार सनेही, डॉ0 शहजाद, सलीम राजा और डॉ0 देवी प्रसाद कुँवर है। डॉ0 गया सिंह पारंपरिक ओज की नई रचना की तरह हैं। गोपाल प्रधान, समीर पाठक तथा प्रभात कुमार मिश्र हिंदी आलोचना के सशक्त दृष्टिवान स्वर हैं।

    बनारस की साहित्यिक सरगर्मियों में यथास्थितिवाद के अपने पैंतरे हैं। यहीं संत है तो सीकरी भी यहीं हैं। बनारस अपने रचनाकारों का रचनात्मक पदार्थ भी बना है। ज्ञानेन्द्रपति के गंगातट का जिक्र हुआ है। बहती गंगा में यह है, विश्वनाथ मुखर्जी की बेजोड़ कृति बना रहे बनारस में देखिए, रामदरश मिश्र की आत्मकथा रोशनी की पगडंडिया’ में है। शिवप्रसाद सिंह की गली आगे मुड़ती है, वैश्वानर और नीला चांद में काशी के प्राचीन और नए पूर्वपक्ष काशी ही है। काशीनाथ सिंह के अपना मोर्चा तथा काशी का अस्सी में भी बनारस है तो अब्दुल बिस्मिल्लाह की झीनी-झीनी बीनी चदरिया में कबीर के वंशज जुलाहें का पूंजी और टेक्नोलॉजी आधारित व्यवस्था से जूझना लिखा है। केदारनाथ सिंह के लिए बनारस मिथक में फैलता यथार्थ है। उसमें विराट और सूक्ष्म है तो स्थूल, परजीवी और क्षुद्र भी। यद्यपि कबीर की तरह ही वे इन्हें समावेश में नहीं बल्कि संघर्ष में देखते हैं। यह सत्य है कि उत्तर आधुनिक चुनौतियों से जूझने वाली छवि है, इसलिए वे उत्तर कबीर लिख पाए। अष्टभुजा शुक्ल ने भी बनारस पर कविताएं लिखी हैं। अंत में बनारस की साहित्यिक परंपरा एकरेखीय सतही और सीधी नहीं है इसमें विविधता है, गहराई है और उलझाव भी है किंतु कुल मिलाकर गति और उन्नयन का पलड़ा भारी है।

                                                                                                                                                         चंद्रकला त्रिपाठी

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