बनारस, का हाल बा गुरू!

तीन लोक से न्यारी काशी, सो काशी सेइय कस न, जो मजा बनारस में वो न पेरिस में न फारस में, कासी कबहुँ न छाँड़िये, मोरे मन भावै काशी की गली वगैरह वगैरह उक्तियाँ, सूक्तियाँ, मुहावरे और काव्य पंक्तियाँ संस्कृत काव्य परंपरा से लेकर लोकमन तक पसरी बिखरी हैं। लब्बो लुबाव ये कि काशी माने वाराणसी माने बनारस के बारे में जो कहा जाय वो कम और उसी बनारस पर लिखना, ये तो और बड़े जोखिम का काम। ना बाबा ना, बहुत कठिन है नापना बनारस जैसा शहर। पर बामन ने भी तो तीन पग में सारी दुनिया नाप ली थी। लेकिन बनारस है तीन लोक से न्यारा और इसकी हर गली, हर मुहल्ला अपने में एक दुनिया समेटे हुए है।

कई साल पहले इटली के शहर वेनिस जाना हुआ था मेरा। वेनिस के पोर्ट पर उतरा तो लगा कि अरे ये तो बनारस के दशाश्वमेघ घाट जैसा ही है। गलियों में घुसा तो बिल्कुल बनारस की गलियाँ याद हो आईं। फर्क बस इतना कि बनारस अपनी मस्ती में मस्त, धूल, गर्द, गंदगी के साथ और वेनिस की गलियाँ थोड़ी साफ सुथरी। बनारस में आज भी किसी कोने अतरे रुपये दो रुपये में कट चाह (चाय) मिल जायगी और वेनिस में हो सकता है किसी कि ओस्क में 50 यूरो (3000 रूपये) एक कॉफी के लिए ढीले करने पड़ें। पर वेनिस में लगा कि साफ सुथरे बनारस में ही आ गए हम। और मजे की बात देखिये कि अभी हाल में एक लेख पढ़ते समय मैंने पाया कि सुनीति कुमार चटर्जी ने बनारस की गलियों की तुलना वेनिस से की है।

मित्रों शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलते। बनारस भी है एक शाश्वत सत्य इसीलिये यह बरसों से नहीं बदला। बनारस, खाँटी बनारस। बहरी (बाहरी) बनारस भले बदलता रहे पर जरा खड़े होकर देखिये तो चौक, ठठेरी बाजार, चौखंबा, गोदौलिया, मनकनका (मर्णिकर्णिका घाट) अस्सी, मैदागिन, मच्छोदरी, पंचगंगा, दशासुमेध (दशाश्वमेध) कितने मुहल्ले, कितनी गलियाँ, सब जस की तस। आप खाँटी बनारसी को विदेश में भी पहचान लेंगे उसकी बोली सुनते ही। उसके उच्चारण में जो बनारसीपन है न – भोजपुरी, काशिका और गंगा के पानी के बीच लहराता झूलता, फट्ट से बता देगा कि ‘ई पक्का बनारसी है’। हो सकता है कि कंधे पर गमछा रखे कोई मिल जाय और मुँह में करीने से रखे पान से टपकी कोई छोटी सी बूँद उसके सूट के वैभव को बढ़ा रही हो और हो सकता है कि यह सब न भी हो पर बनारस में जो जी लिया वह तर गया। बिहारी को याद करें ‘अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग।’ पर यह बूड़ना आसान नहीं है भइय्या। बनारस पत्तागोभी की परत की तरह है। जितना खोलो उतने खम। ऐसे बनारस को एक फर्लांग में देखना अपने आप में “ज्यों रहीम नट कुंडली सिमिटि कूदि कढ़ि जाँहि“ जैसा ही है।

चलिये शुरुआत करते हैं बनारस के चौक से। चौक हर शहर का एक तरह से दिल होता है। हर शहर में चौक नाम की कोई न कोई जगह होती ही है। पुराने घरों में भी चौक हुआ करता था। छोटा हो, बड़ा हो, घर में चौक होगा ही और शहर में भी। इसी चौक के पूरब पश्चिम हैं बनारस की गलियाँ और उत्तर दक्षिण की ओर मुख्य सड़क जिसमें से गुजरते समय आपको लहराती बलखाती नदी होना पड़ता है। वरना सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। रिक्शे का हैंडिल या हुड, स्कूटर का पहिया, गाय और सांड़ों के सींग या राह चलते किसी का धक्का आपको सुमधुर बनारसी गालियाँ देने के लिये उत्प्रेरित कर सकता है। इसी चौक के पूर्वी मुहाने पर है भद्दूमल की कोठी जिसके नीचे और अगल बगल कई बरसों से स्थित है पान सुपाड़ी, इत्र, तेल, फुलेल, अमावट, बड़ी, अचार, नमकीन, नानखटाई और न जाने काहे काहे की दुकानें। यहीं बीच सड़क पर एक से एक आम, लीची, पपीता और जितने भी देशी और आभिजात्य फल हैं सबकी दुकानों के बीच गौ माता और उनके वंशज पगुराते हुए खड़े बैठे मिल जाएँगे। आपको लोकतंत्र का इससे बढ़िया जीवंत उदाहरण कहीं और न मिलेगा।

कहा जाता है कि बहुत पहले यहाँ श्मशान हुआ करता था। पर आज यह सबसे अधिक जीवंत इलाका है जो लगातार चहचह करता है। शहर का सबसे ऊँचा स्थान होने का गौरव इसे प्राप्त है। यह नए शहर और पुराने शहर का संधि स्थल है। सड़क के पश्चिमी तरफ है चौक थाना और चौक थाने के पास उत्तर पूर्वी कोने पर है कब्रगाह । इस कब्रगाह का किस्सा भी अजीब है, जो औरंगजेब के जमाने का है। बकौल विश्वनाथ मुखर्जी -“काशी में उन दिनों नगर के कोतवाल साहब किसी विधवा महिला पर फिदा हो गये। उन  दिनों नगर का बादशाह कोतवाल ही होता था। कोतवाल  का प्रस्ताव विधवा तक पहुँच गया। संभव है कि उसने इसके विरुद्ध नगर के लोगों से सहायता माँगी हो और लोग मुकर गये हों । जब कहीं से कोई सहायता नहीं मिली तब उस विधवा ने कोतवाल से दो महीने का समय माँगा ताकि एक अनुष्ठान पूरा कर ले।

कोतवाल अपने घमण्ड में चूर था। उसे अपनी शक्ति पर विश्वास था कि ‘वन का गीदड़ जायगा किधर?’ कोतवाल ने कहा- “अमुक तारीख को निकाह होकर रहेगा। मैं कोई बहाना नहीं सुनना चाहता।”

विधवा भी काफी सयानी थी। एक दिन वह रात के सन्नाटे में चुपचाप दिल्ली रवाना हो गयी। सम्राट के दरबार में आकर उसने अपनी कहानी सुनाई। औरंगजेब ने कहा- “घबड़ाने की बात नहीं है बेटी। अब तुम जैसे आयी थी, वैसे चली जाओ। मैं इंतजाम करता हूँ। पर यह बात किसी से मत कहना। मौके पर सब काम हो जायगा।“

समय गुजरता गया। निकाह की तारीख से एक दिन पहले विधवा के पास सूचना आ गयी कि कल सबेरे निकाह की जगह पहुँच जाना। बेचारी क्या करती? सम्राट को मन ही मन कोसती हुई उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ कोतवाल, काजी वगैरह मौजूद थे। तैयारी पूरी हो गयी थी। आँसुओं की गंगा से सारा वक्षस्थल भीग रहा था। ठीक इसी समय दर्शकों की भीड़ चीरता हुआ एक बूढ़ा आदमी चबूतरे पर आकर खड़ा हो गया। पूछा- ‘यह क्या हो रहा है?’

     कोतवाल ने कहा- ‘दिखाई नहीं दे रहा है?’

बूढ़े ने काजी से पूछा- ‘क्या आपने इस निकाह में लड़की की रजामंदी ले ली है।?’

काजी अपने घमण्ड में चूर था। कोतवाल शहर का मालिक होता है जब वही सहायक है तब वह मरदूद कौन है?

उसने गरजकर कहा- ‘तुम्हारी यह हिम्मत? काजी से सवाल करते हो जबकि देख रहे हो कि कोतवाल हुजूर का निकाह हो रहा है। तुम होते हो कौन पूछने वाले?’

कोतवाल ने कड़क कर कहा- ‘अरे कोई है? मारकर ढकेल दो इस बूढ़े को?’

चबूतरे पर मौजूद व्यक्ति ज्यों ही आगे बढ़े त्यों ही नीचे लाठियाँ लिये खड़े दो सौ जवानों ने लाठियाँ उठाकर कहा- ‘खबरदार, अगर किसी ने बादशाह पर हाथ लगाया तो उसकी लाश जमीन पर गिर पड़ेगी।’

बादशाह का नाम सुनते ही कोतवाल और काजी के चेहरे बदरंग हो गये। उन्होंने चकित भाव से देखा- ‘नीचे चारों ओर काफी लठैत खड़े हैं। तभी खच से आवाज हुई और कोतवाल का सिर धड़ से अलग हो गया। यह दृश्य देखते ही काजी तुरंत औरंगजेब के पैरों के पास गिरकर माफी माँगने लगा।

औरंगजेब ने कहा- ‘कोतवाल से ज्यादा गुनाहगार तुम हो। निकाह के पहले तुमने लड़की से रजामंदी नहीं ली। यह सबसे बड़ा गुनाह है। कोतवाल को उसके गुनाह की सजा मिल गयी। माबदौलत हुक्म देते हैं कि तुम्हें जिंदा दफना दिया जाय ताकि तुम्हारी जैसी हरकत आगे और कोई काजी न करे।

कोतवाल का कब्रगाह चौक थाने के पास उत्तर पूर्व कोने पर है जहाँ अक्सर उत्सव होता है और न जाने कितने राह चलते लोग मत्था टेकते हैं। काजी साहब सुँघनी साव के सामने वाली मस्जिद में जिंदा चुनवा दिये गये थे।“

विश्वनाथ मुखर्जी ने बनारस पर खूब लिखा। किसी शहर को इतनी गहराई से जानना अपने आप में महत्वपूर्ण है। उनकी पुस्तक बना रहे बनारस वास्तव में बनारस का मुकम्मल दस्तावेज है। इधर एक पुस्तक खूब चर्चित हुई है बनारस पर। आप समझ तो गए ही होंगे, फिर भी बता ही देते हैं- काशी का अस्सी, काशीनाथ सिंह वाली। और तो और सुप्रसिद्ध रंगकर्मी उषा गांगुली ने इसके सौ से अधिक नाट्य प्रदर्शन कर दिए।

चलिए, फिर से चलते हें चौक पर। चौक थाने से सटा हुआ है विशालाक्षी भवन जिसके तलघर में है बनारस के प्रमुख प्रकाशनों में से एक विश्वविद्यालय प्रकाशन। साहित्यिक और तमाम तरह की पुस्तकों का प्रकाशनस्थल। बनारस का सबसे बड़ा पुस्तक विक्रय केंद्र। उसके संस्थापक रहे पुरुषोत्तमदास मोदी जी स्वयं साहित्यप्रेमी थे। पं. माखनलाल चतुर्वेदी के साथ खूब रहे वे। मोदी जी थे तब तमाम लेखक और साहित्यप्रेमी वहाँ आते जाते रहते थे। दिन भर कोई न कोई सुधीजन, साहित्यकार या लेखक मोदी जी के सामने बैठा मिल जाया करता था। यह साहित्यकारों का केंद्र रहा है। मोदी जी द्वारा भारतीय वांग्मय नामक सूचनात्मक साहित्यिक लघु पत्रिका की शुरुआत की गई थी जो आज भी जारी है। अब विश्वविद्यालय प्रकाशन की कमान अनुराग और पराग मोदी के हाथों में है।

चौक में ही दूसरे बड़े प्रकाशन केंद्र हैं मोतीलाल बनारसीदास, चौखंबा संस्कृत सीरीज और चौखंबा विद्याभारती। मोतीलाल बनारसीदास ने भारतीय संस्कृति, दर्शन और परंपरा से सम्बद्ध साहित्य विशेष रूप से छापा है और चौखंबा संस्कृत सीरीज व विद्याभारती ने संस्कृत साहित्य। चौक में स्थित प्रकाशन केंद्रों का बनारस के साहित्य जगत के लिये विशेष महत्व है। इसी इलाके में कभी नंदकिशोर एंड संस नाम का प्रकाशन केंद्र अपने समय का सबसे बड़ा प्रकाशन केंद्र था। चौक में ही है चित्रा सिनेमा, बनारस का पहला सिनेमा हाल । फिल्मी दुनिया से बनारस को परिचित कराने में चित्रा की बड़ी भूमिका रही है। बरसों पहले की मुझे याद है जब मैंने उसमें श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ देखी थी। इसी पिक्चर हॉल में ‘जय संतोषी माता’ ने अपने प्रदर्शन के सारे रिकार्ड तोड़े थे। यह सिनेमा हॉल अब बंद पड़ा है।

पुराने सिनेमा हालों की बात करें तो चित्रा के एक तरफ एक फर्लांग पर है राधा चित्र मंदिर और दूसरी तरफ आधे फर्लांग पर दीपक और कन्हैया चित्र मंदिर। दीपक और कन्हैया चित्र मंदिर अब शॉपिंग माल का रूप ले चुके हैं और राधा चित्र मंदिर अब बंद हो चुका है।

दीपक सिनेमा की एक विशेष बात सन् 1975 तक की जो आज भी याद है वह है हर रविवार को सुबह बच्चों की फिल्मों का विशेष प्रदर्शन। उस समय ये शो हाउसफुल हुआ करते थे और टिकट मिलना मुश्किल होता था। अब न तो बच्चों की गंभीर फिल्में रहीं और न उन्हें देखने की चाहत वाले माता पिता। आइये थोड़ा आगे चलें। चौक थाने के सामने भद्दूमल की कोठी के बगल से जो गली अंदर घुस रही है वह जरा आगे जाकर बँट जाती है शाखाओंं, दर शाखाओं में। सामने घुसते ही आपको पहले मिलेंगी सुपाड़ी की दुकानें, तरह तरह की सुपाड़ी। रंग बिरंगी, मीठी, सीठी, गीली, सूखी, चाँदी और सोने के वर्क लगी देशभर के अलग अलग प्रांतों से आई सुपाड़ियाँ। और उसके बाद साड़ियाँ की दुकानें जिन्हें यहाँ के लोग गद्दी कहते हैं। हर बिल्डिंग में साड़ी की गद्दियाँ, नीचे, ऊपर, तीसरी चौथी मंजिल पर, हर जगह। रानीकुआँ से लेकर घुसते जाइये तो नंदन साहू लेन तक। एक एक दुकान का टर्न ओवर लाखों में, पर दुकान देखकर आप ये अंदाज नहीं लगा सकते। शाम होते ही ये गलियाँ अधिक गुलजार हो जाती हैं। काँख में 3×1 फुट के डिब्बे दबाए कारीगर गद्दियों पर अपना माल दिखाते मिल जाते हैं। इनमें अधिकतर कारीगर मुसलमान हैं। साड़ी के थोक व्यापारी अधिकतर हिंदू। अनेक व्यापारियों के अपने करघे भी चलते हैं। हिंदू मुसलमान के ऐसे अद्भुत मेल मिलाप की गवाह रोज ये गलियाँ बनती हैं। यहाँ तक कि जब कभी कभार सियासी कारणों के चलते वैमनस्य भी पैदा होता है और दंगे जैसी अप्रिय घटनाएँ घटती हैं तब भी इन कारीगरों और व्यापारियों के संबंधों में न तो खटास आती है न कोई बैर पैदा होता है। इसीलिये बनारस की साड़ी गंगा जमुनी संस्कृति की अद्भुत देन कही जा सकती है।

यहीं से एक गली फूटती है कचौड़ी गली। मिठाई और कचौड़ियों के लिये प्रसिद्ध। हालाँकि बनारस के हर मुहल्ले में मिठाई की दुकानों पर कचौड़ियाँ मिलेंगी पर सुबह सुबह ही और उनका स्वाद-लाजवाब। देश भर में ऐसी कचौड़ियाँ और कहीं नहीं मिलतीं। कचौड़ियों के साथ जो असली स्वाद होता है वह है सब्जी का। साधारण से साधारण आलू की सब्जी में भी वो गमक की मुँह में पानी आ जाए।

पर अब कचौड़ी गली में अधिक बिक्री स्थानीय लोगों के कारण नहीं होती। वह होती है पास में ही मणिकर्णिका घाट पर स्थित श्मशान के कारण। दूर दराज के गाँवों, कस्बों से लोग काशी में मुक्ति दिलाने के लिये शवों को लेकर आते हैं और शवदाह के बाद लौटते समय कचौड़ी गली में भरपेट कचौड़ी और मिठाई का रसपान करते हैं।

इसी कचौड़ी गली से आगे पड़ती है खोआ गली जिसका एक मुँह चित्रा सिनेमा के सामने आकर खुलता है। खोआ गली में सिर्फ खोआ यानी मावा मिलता है। पीतल के बड़े बड़े थालों में सजा हुआ मावा। तरह तरह का मावा या खोआ। खोए की ऐसी मंडी कहीं और ढूँढे न मिलेगी। तीस चालीस दुकानें और सिर्फ खोए की दुकानें।

खोआ गली में आधा किलो से लेकर सैकड़ों किलो तक खोआ आप खरीद सकते हैं। बनारस वैसे भी खोए की मिठाइयों के लिये प्रसिद्ध है। पर कुछ खास मिठाइयाँ तो केवल बनारस में ही मिलेंगी। राधाप्रिय, तिरंगी बर्फी, लालपेड़ा, राजभोग, लवंगलता, परवल की मिठाई, संतरे की मिठाई और न जाने कितने नाम। पर कुछ मिठाइयाँ तो ऐसी हैं जिनका पेटेंट बनारसियों को करा ही लेना चाहिये। इनमें बारह महीने मिलने वाली मलाई और मलाई पूड़ी भी हो और जाड़े के दिनों में मिलने वाला मलइयो भी। मलइयो ऐसी अद्भुत चीज है जिसे मिठाई  की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह मीठे की श्रेणी में आता है। इसे बनाने की कला भी अद्भुत है। रात में दूध को खुले में रख देते हैं केसर डालकर और आधी रात से उसे मथना शुरू करते हैं। उससे उठा हुआ गाढ़ा फेन ही मलइयो है जो सुबह आठ नौ बजे तक गलता नहीं है। किसने ईजाद किया होगा इसे, यह खोज का विषय है। एक और मिठाई है पलंग तोड़ जो विशेष रुप से नंदन साहू लेन में भैरो साव के यहाँ मिलती है।

खोआ गली का एक सिरा जाकर मिल जाता है ज्ञानवापी से। वही ज्ञानवापी जहाँ अब पुलिस का भयानक पहरा है, जहाँ संगीनों के साए में बाबा विश्वनाथ रोज हजारों भक्तों को दर्शन देते हैं, जिनके त्रिशूल पर निर्भय काशी टिकी है और जिसके आसपास के मकानों की खिड़कियाँ भी अब कड़ी सुरक्षा घेरे के नीचे हैं। वही ज्ञानवापी जहाँ स्थित कारमाइकल लाइब्रेरी को अब लोग लगभग भूलते जा रहे हैं और विश्वनाथ गली के दुकानदार इसलिये दुखी हैं कि मंदिर, मस्जिद के झगड़ों ने ज्ञानवापी को अभेद्य किला बना दिया है और उनकी दुकानदारी आधी रह गई है। काशी को निर्भय करने वाले भोलेनाथ, विश्वनाथ महादेव की नगरी खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है। ऐसे में गाहे बगाहे जब यहाँ के निवासी “अभी तो केवल झाँकी है, मथुरा काशी बाकी है“ जैसे प्रायोजित नारे सुनते हैं तो सिहर उठते हैं।

इसी ज्ञानवापी में पीछे की ओर है मुहल्ला नीलकंठ जहाँ पास में ही रहा करते थे शिवप्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय जिनका कथा खंडों में बँटा संग्रह ‘बहती गंगा’ बनारस की अद्भुत बानगी प्रस्तुत करता है। जिसके जीवंत पात्र इतिहास पुरुष थे, जिसकी एक एक कहानी ऐसी है कि हर कहानी पर एक फिल्म बनाई जा सकती है। भंगड़ भिक्षुक, दाताराम नागर, नन्हकू सिंह जैसे पात्र भूली हुई किवदंती बन चुके हैं। मजा देखिये कि बनारस की नई पीढ़ी से अगर आप पूछेंगे कि ये लोग कौन तो उन्हें कुछ नहीं पता। ‘बहती गंगा’ जो बनारस की पहचान बन सकती है कुछ साहित्य प्रेमियों के अलावा बाकियों के लिए अपरिचित है। शायद हिंदी में है इसलिये। शायद इसका अंग्रेजी में अनुवाद होता या अंग्रेजी में लिखी गई होती तो लोग ज्यादा जानते इसे। डॉमिनिक लॉ पियेर ने जब कलकत्ते पर अंग्रेजी में लिखा तो लोगों ने उसे खूब पढ़ा पर रुद्र जी की ‘बहती गंगा’ की शायद कुछ हजार प्रतियाँ ही बिक पाईं होंगी। खैर, किस किस से गिला कीजिये।

कचौड़ी गली से अंदर घुसकर पहुँच जाते हैं मनकनका घाट यानी मर्णिकर्णिक घाट। कहते हैं कि भगवान शिव, पार्वती के साथ भ्रमण पर निकले थे और काशी में पार्वती के कान की मणि जिस स्थान पर गिरी वह हो गया मणिकर्णिका। आज उसी मणिकर्णिक पर मुक्ति के लिये निरंतर लोग शवदाह करते हैं। यह सच है कि वहाँ चिताओं की आग ठंडी नहीं होती। दिनरात जलती चिताएँ मनुष्य को नश्वरता की याद भले दिलाएँ पर मणिकर्णिका पर बिना कुछ भोग चढ़ाए चिता को अग्नि नहीं मिल पाती। बाकी सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य। इस मुक्तिधाम में भी सांसारिक माया मोह से किसी को मुक्ति नहीं ।

अब घाटों की बात निकली है तो जान लीजिये कि अर्धचंद्रकार बहती गंगा के किनारे अस्सी से ज्यादा घाट हैं और हर घाट के बारे में जनश्रुतियाँ। ये सभी घाट स्थापत्य के बेजोड़ नमूने हैं। इनके किनारे बने भवन बार बार इटली के वेनिस और टर्की के इस्तांबुल की याद दिलाते हैं। फर्क बस ये कि इन दोनों जगहों पर दोनों ओर सुंदर इमारतें हैं और बनारस में केवल एक ओर। यहाँ गंगा दक्षिण से उत्तरवाहिनी हो गई है और बनारस पार करते ही फिर दक्षिण की ओर मुड़ गई है। इनमें से सबसे अधिक चर्चित या देखा जाने वाला घाट है दशाश्वमेघ घाट। इस घाट की खासियत यह है कि यहाँ एकदम घाट तक सड़क आई है। इसलिये पर्यटक सबसे अधिक यहीं आते हैं। कहते हैं कि इसी घाट पर दस अश्वमेध यज्ञ हुए इसलिये इसका नाम पड़ गया दशाश्वमेध घाट।

आजकल हर शाम दशाश्वमेध और उसके बगल में गंगा आरती का आयोजन होता है। लोगों की आस्था को बाजार ने किस तरह भुनाया और आकर्षित किया है इसका अद्वितीय उदाहरण है गंगा आरती। नीचे बदबू मारता गंगा का पानी और ऊपर श्रद्धालु जन, गंगा आरती की स्तुतियों और स्तोत्रों की गूँज से विनयावनत। सच ही है, श्रद्धा कभी स्थान या समय नहीं देखती।

इन घाटों पर पर्यटकों के पहुँचते ही नाववालों से लेकर पंडे तक उन्हें घेरने की कोशिश करते हैं। अब सौदा जितने में पट जाय। यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। भारतेंदु ने अपनी प्रेमजोगिनी में काशी का अद्भुत चित्रण किया है। वे लिखते हैं –

देखी तुम्हरी कासी लोगों देखी तुम्हरी कासी

जहाँ विराजें विश्वनाथ विश्वेश्वर जी अविनासी,

घाट जाएँ तो गंगा पुत्तर नोचे दे गलफाँसी

आधी कासी भाँड़ भंडेरिया लुच्चे और सन्यासी।

भारतेंदु ही थे जो यह कहने का साहस कर सकते थे वरना बनारस के पंडों से तो भगवान बचाए। ऐसे भारतेंदु हरिश्चंद्र का मकान भारतेंदु भवन आज भी चौक से ठठेरी बाजार की ओर होते हुए आगे जाएँ तो मिल जाएगा। जस का तस। कई आँगनों का घर, जो अब पारिवारिक विभाजन में बँट गया है। भारतेंदु के प्रपौत्ऱ अभी भी उसी निवास में रह रहे हैं। उनके घर के पिछवाड़े ही है अग्रसेन महाजनी पाठशाला जिसकी भूमिका महाजनी शिक्षा के विकास में बहुत महत्वपूर्ण रही है। अग्रसेन महाजनी पाठशाला से सटी हुई है बंगाली ड्योढ़ी जहाँ दशहरे पर सजने वाली दुर्गा पूजा का बड़ा महत्व था। कहा जाता है कि इसी बंगाली ड्योढ़ी में कभी जद्दन बाई का गायन हुआ था। इसी पाठशाला के सामने डॉ. भानुशंकर मेहता और डॉ. दिनेश मजूमदार बहुत पहले अपनी डिस्पेंसरी में बैठा करते थे। भानुशंकर मेहता और मेहता परिवार का बनारस के रंगमंच के विकास में बहुत योगदान रहा है। डॉ. निदेश मजूमदार के भाई नीनू मजूमदार द्वारा गुजराती में लिखा गया नाटक ‘चाड़िया नूँ सपनूँ’ अनेक बार खेला गया। यहीं ठठेरी बाजार के एक मुहाने पर कभी रहा करते थे रंगकर्म के विद्वान कुंवर जी अग्रवाल।

इन्हीं गलियों में आगे बढ़ते जाएँ तो मिलेगा फाटक रंगीलदास जहाँ आज भी गोपालदास नागर रहते हैं और जिन्होंने गुजराती भाषा से सबसे अधिक अनुवाद हिंदी में किये हैं। पुराने बनारस में रहने वाले व्यवसायियों में से अनेक की रुचि सांस्कृतिक रही और आज भी बनारस के नाट्यकर्मियों में से कई साड़ी या अन्य पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े हुए हैं। इनमें गुजराती, मराठी, खत्री, पंजाबी, मारवाड़ी आदि भी हैं जो हिंदी के रंगमंच को समृद्ध कर रहे हैं। मुरारीदास मेहता प्रेक्षागृह बनारस का प्राचीनतम और आज भी सक्रिय प्रेक्षागृह है जहाँ साल भर नाटकें के सर्वाधिक प्रदर्शन होते हैं। हालाँकि यह चौक से थोड़ी दूर कबीर चौरा मुहल्ले में है। वहाँ की बात बाद में कभी। अभी तो हम फँसे हुए हैं बनारस की गलियों में ही। फाटक रंगीलदास से थोड़ा आगे बढ़ते ही है गोपाल मंदिर। वैष्णवों का आराधना स्थल। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से सम्बद्ध। गोपाल मंदिर के आसपास का वातावरण आपको मथुरामय लगेगा। सुबह शाम ठठेरी बाजार से लेकर गोपाल मंदिर और चौखंबा के बीच आपको आते जाते लोग प्रश्न पूछते मिलेंगे, खुले हैं, जवाब मिलेगा- खुले हैं, यानी मंदिर अभी खुला है। वैष्णव जन अपने आपको दूसरों के स्पर्श से बचाने की असफल कोशिश करते मंदिर की ओर नंगे पैर लगभग भागते से नजर आएँगे। भगवान कहीं सो न जाएँ इसलिये शयन से पहले दर्शन कर लेने हैं। इसी गोपाल मंदिर के पिछवाड़े के एक कमरे में तुलसी बाबा ने बैठकर विनय पत्रिका की रचना की थी। दोनों वैष्णव। गोपाल मंदिर भी और तुलसीदास भी, पर एक कृष्णभक्ति का पीठ तो दूसरा राम का सबसे बड़ा भक्त। आज भी इस कमरे के पीछे दीवार पर चिपके संगमरमर के एक टुकड़े पर अंग्रेजी में इस बात का उल्लेख अंकित है। इसी के बगल में एक बड़ा सा मकान है जिसमें सत्यजीत राय की फिल्म ‘जय बाबा फेलूनाथ’ की शूटिंग हुई थी।

गोपाल मंदिर की कर्ताधर्ता विष्णुप्रिया बेटी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम किया, खासकर स्त्री शिक्षा के लिये। इस गली से बाहर निकलेंगे तो आगे बढ़ने पर आपने आपको गोलघर में पाएँगे। यहाँ दोनों किनारों पर बने मकान के कोने गोल और सड़क कुछ कुछ अर्धचंद्रकार है। बनारसी साड़ियों की यहाँ बड़ी मंडी है। इसी गोलघर में है बाबूराव विष्णु पराड़कर के नाम पर स्थित पराड़कर स्मृति भवन। साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का एक और आयोजन स्थल। पराड़कर जी बनारस की ही नहीं देश की हिंदी पत्रकारिता के विशिष्ट स्तंभ रहे। अन्य चर्चित पत्रकारों में आर +आर +खाडिलकर, माधवराव सप्रे, लक्ष्मीनारायण गर्दे आदि से भी बनारस की गलियाँ खूब परिचित रहीं।

गोलघर से सटी हुई है भाट की गली। भाट की गली में जगत सेठ के घर में सन् 1823 में जन्मे थे हिंदी गद्य के प्रारंभिक निर्माता राजा शिव प्रसाद सितारेहिंद। भाट की गली होते हुए बढ़ने पर आप पहुँच जाएँगे चौखंबा। काठ की हवेली के कारण भी जाना जाता है यह मोहल्ला। इस काठ की हवेली का ऐतिहासिक महत्व है। ग्वालियर स्टेट की संपत्ति इस हवेली का एक हिस्सा पूरी तरह लकड़ी का था जो अब नष्ट हो चुका है। पत्थर वाला हिस्सा अभी शेष है। कहा जाता है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने बचपन में कुछ दिन यहाँ भी रहीं। इसी काठ की हवेली में बाल साहित्यकार डॉ. श्रीप्रसाद लंबे समय तक रहे। काठ की हवेली के आगे जाने पर मिलेगा मुहल्ला कालभैरव। शिव के गण, नगर के तमाम भैरवों में मुख्य और नगर कोतवाल। यहीं से आगे जाने पर विशेश्वरंगज की सड़क मिलेगी और बाएँ घूमते ही कभी हिंदी की मुख्य पीठ रही नागरी प्रचारिणी सभा, जिसकी स्थापना बाबू श्यामसुंदर दास, ठाकुर शिवकुमार सिंह और पंडित रामनारायण मिश्र ने की थी। जिसने हिंदी को स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया था, जहाँ देश के तमाम साहित्यकार, राजनेता आकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे, जिसका भवन शहर की सुंदर इमारतों में गिना जाता था। है तो नागरी प्रचारिणी सभा आज भी किंतु जिस गति को आज यह प्राप्त हुई है वह विचारणीय है। पुराना भवन नए भद्दे भवन के पीछे छुप चुका है और नए भवन में साड़ी और कपड़ों से लेकर अन्य व्यवसाइयों की दुकानें हैं। बाजार संस्कृति पर कैसे हावी हुआ है इसका जीवंत उदाहरण है यह स्थान।

इसी सड़क से थोड़ा और आगे बढ़ते ही सामने है टाउन हाल और उसी टाउन हाल के सामने रक्षक के रूप में खड़े हैं लाठी लिये गांधी और उनके बगल में कस्तूरबा। इस लगभग उजाड़ हो चले बगीचे के तीन तरफ कपड़ों की दुकाने हैं। सन् 1947 में विभाजन के बाद आए सिंधियों, पंजाबियों को तमाम शहरों में घरों, दुकानों के लिये जगह दी गई। यह जगह भी उनमें से एक है जिसे नाम दिया गया मालवीय मार्केट। टाउन हाल के अंदर पहले अनेक सामाजिक सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे। चाँद से लौटने के बाद वहाँ से प्राप्त कुछ वस्तुओं (पत्थर आदि) की प्रदर्शनी जब बनारस में लगी तो टाउन हॉल में ही लगी थी। उससे जुड़े मैदान में आज भी मेले ठेले, सर्कस आदि लगा करते हैं और खाली दिनों में यह मैदान क्रिकेट से लेकर तमाम दैनिक क्रियाओं के काम में भी आता है। मालवीय मार्केट के सामने ही सन्मार्ग नामक सांध्यकालीन अखबार का कार्यालय था।

यहीं पास में है शिक्षा के एकाधिक केंद्र। एक ओर भारतेंदु के नाम पर हरिश्चंद्र महाविद्यालय तो दूसरी ओर अग्रसेन कन्या महाविद्यालय। इस महाविद्यालय से फिर घूमे बाइंZ ओर तो पहुँच जाएँगे बुलानाला। कभी यहाँ बड़ा नाला हुआ करता था जो वृहत नाला था। अब नाला गायब है और जगह बची है बुलानाला। इसी बुलानाला से चौक की ओर बढ़ें तो पहले मिलेगा मदन मशीनरी मार्ट जिसने अनेक लोकगीतों और बालगीतों के प्ले रिकार्ड बनाए थे। इसी के आगे है नीचीबाग जहाँ से प्रकाशित होता है बनारस का प्रमुख सांध्य कालीन अखबार गांडीव। गांडीव की स्थापना की थी भगवानदास अरोड़ा ने और आज गांडीव का संपादन संभाल रहे हैं राजीव अरोड़ा। दरअसल गांडीव में काशी का काशीपन है।

बनारस की गलियों में कितनी ही विभूतियाँ रही हैं। राजा शिव प्रसाद सितारेहिंद और भारतेंदु से लेकर आधुनिक काल तक के अनेक नामचीन कथा लेखकों, कवियों, आलोचकों और निबंधकारों ने बनारस की इन गलियों का मान बढ़ाया है। प्रेमचंद, प्रसाद, शांतिप्रिय द्विवेदी, हजारी प्रसाद व्दिवेदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र,  त्रिलोचन, विद्यानिवास मिश्र, रामदरश मिश्र, नामवर सिंह, बच्चन सिंह, चंद्रबली सिंह, केदारनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, द्विजेंद्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’, शिवप्रसाद सिंह, विष्णुचंद्र शर्मा जैसे रचनाकार हों या बाद की पीढ़ी के अजय मिश्र, अमिताभ शंकर रायचौधरी, ज्ञानेंद्रपति, या चंद्रकला त्रिपाठी बनारस ने सबको किसी न किसी रूप में मोहा और घेरा है। बेढब बनारसी, पंडित कांतानाथ पांडेय चोंच, भैया जी बनारसी और बेधड़क बनारसी जैसे हास्य रस के पुरोधाओं ने भी इन गलियों को सुशोभित किया। इनके साथ ही कलाकारों और संगीतकारों और साहित्य प्रेमियों की फेहरिस्त बनाई जाय तो यह संख्या अनगिनत होगी। इनके बिना बनारस और बनारस के बिना ये नाम अधूरे हैं। ये हैं उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, किशन महाराज, गिरिजा देवी, महादेव मिश्र, राजन साजन मिश्र, गोपीकृष्ण, मुरारीलाल केडिया, राजेश्वर आचार्य और ऐसे ही न जाने कितने नाम। अब भला महामना मालवीय और शिवप्रसाद गुप्त को भला कौन भूल सकता है। चलिये चौक के पश्चिमी की ओर चलें। यहीं है दालमंडी, तमाम वस्तुओं की थोक मंडी। इसी मुहल्ले में रहते थे उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ। पारसी थियेटर के पर्याय आगा हश्र कश्मीरी का संबंध भी इस मोहल्ले से रहा है। एक बड़ी खासियत इस इलाके की यह भी है कि यह मुस्लिम बहुल मुहल्ला है। चौक के पूर्वी तरफ एक भी घर मुसलमानों का नहीं है पर कभी भी चौक में दंगे हुए हों ऐसा याद नहीं पड़ता।

अब जब बात बनारस की हो और पान की बात न हो तो सब कुछ अधूरा। बनारस में हर दस बीस कदम पर पान की दुकान मिल ही जाएगी। पान का बीड़ा इतने करीने से लगाया जाता है कि आप इंच टेप लेकर नाप लें सारे एक बराबर। पान भी ऐसे ऐसे कि मत पूछिये। मगही, देसी, जगन्नाथी और न जाने क्या क्या। बनारस में पान खाते नहीं जमाते हैं और सारा खेल उसमें कत्थे और चूने का है। पान का बीड़ा बाँधा जाता है चौघड़े में जो महुए के पत्ते का होता है। अलग अलग वैरायटी और अलग-अलग खाने वाले। बनारसी पान की शान भी बनारसी लंगड़े आम और बनारसी साड़ी से कुछ कम नहीं। महुए के पत्ते पर एक वस्तु और बिका करती है यहाँ और वह है मक्खन। कभी यहाँ पर भोर के समय इन गलियों में थाली में मक्खन की डली बिका करती थी। जमा हुआ मक्खन भोर की किरणों के उगने के साथ पिघलने लगता था। अब मक्खन मिलता है ब्रांडेड, अमूल या किसी और ब्रांड का, देसी नहीं।

दालमंडी का दूसरा सिरा जाकर खुलता है नई सड़क की ओर और सड़क पार करते ही आगे आ जाता है पानदरीबा। पान की थोक मंडी। यहीं दाहिनी तरफ प्रसाद जी रहा करते  थे और यहीं पास में बेनिया बाग में प्रेमचंद टहलने आया करते थे।

हम शायद चौक से थोड़ी दूर आ गए। चलिये वापस वही चलें। बनारस की गलियों में उत्सवधर्मिता बहुत अधिक दिखती है। दीवाली हो या होली, दुर्गापूजा हो या गणगौर, जैनियों का त्यौहार हो या भरतमिलाप, नक्कटैय्या हो या नागनथैय्या, सब में बनारसी लोग भरपूर उत्साह के साथ भाग लेते हैं। यहाँ का प्रिय नारा है हर हर महादेव। महादेव बनारसियों के पालक हैं और मित्र भी तो भइय्या जिस बनारस में सांड़, सीढ़ी और सन्यासी आज भी बहुतायत में मिलते हैं वहीं आपको धाटों पर विश्वविख्यात संगीतकार संगीत प्रस्तुति देते मिल जाएँगे। वहीं किसी कोने में कोई विख्यात और कोई नौसिखुआ चित्रकार दृश्यों को कैनवास पर उकेरता मिलेगा और कोई बावरा अहेरी पागलों की तरह गंगा की लहरे गिनता नजर आएगा। तो इस एक फर्लांग में थोड़ी बहुत चीजें हमने नापीं। अभी और भी है बहुत कुछ पर भइय्या थोड़ा कहा, बहुत समझना और भूल चूक लेनी देनी माफ। हाँ सांड़ से दो बातें याद आ गईं सो चलते चलते सुन ही लीजिए। यों तो सांड़ महाराज शिव के वाहन हैं इसलिए बनारस में उनका विशेष महत्व है पर लोगों ने बताया कि चौक में एक सांड़ महाराज बाकायदा रंगदारी टैक्स वसूलते हैं। ये सांड़ महाराज प्रतिदिन उस इलाके में तमाम दुकानों के आगे खड़े होकर मुँह खोल देते हैं और दुकानदार उनके मुँह में खाद्य सामग्री डाल देता है। यदि किसी ने भूल से भी खराब सामग्री डाल दी तो उसकी ख्Sार नहीं। सांड़ महाराज उस दुकान की ऐसी तैसी कर देते हैं। एक अन्य सांड़ जी चौक के पास स्थित गोदौलिया की एक बड़ी सी कपड़े की दुकान के अंदर दुकान खुलते ही आकर बैठ जाते हैं और दुकान निर्बाध चलती रहती है।

तो भइय्या चौक से जब भी आप गुजरें बच बचा के गुजरियेगा। इस भीड़ में आपकी जेब कटने का डर तो है पर चौक नहीं गए तो क्या देखा बनारस। यहाँ हर आता-जाता गुरु है। दोस्त भी गुरु, अपरिचित भी गुरु, छोटा भी गुरु, बड़ा भी गुरु। इन गुरुओं के बीच आपको भी कोई आवाज लगाता मिल सकता है- का हाल बा गुरु!

-आनंद वर्द्धन 

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