कला शिल्प स्थापत्य और राष्ट्रप्रेम का अनुपम मन्दिर : भारत माता मन्दिर

सर्वविद्या की राजधानी तीनों लोकों से न्यारी काशी विश्व की सबसे प्राचीन जीवित महानगरी है। यह अपने स्थापना काल से ही कला-संस्कृति, भाषा, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, धर्म और आध्यात्म का केन्द्र रही है। देवाधिदेव, आदिदेव, महादेव के त्रिशूल पर स्थित इस पुरातन नगर को मन्दिरों का नगर होने का गौरव प्राप्त है। यहाँ देवी-देवताओं के अनेक मन्दिर हैं।

देवी-देवताओं के मन्दिरों के बीच इस प्राचीन महानगर में एक ऐसा भी अद्वितीय मन्दिर है जिसमें किसी देवी-देवता की प्रतिमा की जगह राष्ट्र के भौगोलिकीय लघु प्रतिरूप मूर्तिमान रूप में स्थापना की गई है। “भारतमाता के मन्दिर” के नाम से चर्चित “राष्ट्रदेवता” का यह मन्दिर आजादी के योद्धाओं के लिए चर्चित विश्वविद्यालय “महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ” के परिसर में चित्रकला विभाग के समीप स्थित है।

इस मन्दिर के संस्थापक काशी के चर्चित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं काशी विद्यापीठ के संस्थापक स्व0 बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी हैं।1 उनके निजी, एकल प्रयास से ही इस मन्दिर का निर्माण 1918 में शुरू हुआ राष्ट्रदेवता के इस मन्दिर की स्थापना के विषय में बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने एक विज्ञप्ति उस समय जारी की है, जो इस प्रकार है-

ओ।़म वन्दे मातरम्

भारतमाता के उभारदार मानचित्र की कल्पना संयोगवश हृदय में उत्पन्न हुई। संवत् 1970 (1913) ई0 बैक्रम के जाड़ों में कराँची कांग्रेस से लौटते हुए मुम्बई जाने का अवसर मिला। वहाँ से पूना जाना हुआ। वहाँ श्रीमान् घोड़ों करवे का विधवाश्रम देखने गया। आश्रम में जमीन पर भारतमाता का एक मानचित्र बना हुआ देखा। तो वह मिट्टी का ही पर उसमें पहाड़ और नदियाँ ऊँची-नीची बनी थीं, बड़ा सुन्दर लगा। इच्छा हुई थी ऐसा ही मानचित्र काशी में भी बनाया जाय। यह केवल एक संस्कार था, जो संभवतः कुछ ही दिन में मिट जाता, पर संयोगवश इसके बाद विदेश यात्रा करनी पड़ी लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में इस प्रकार के अनेक छोटे-बड़े मानचित्र देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह भी एक संयोग था पर उससे पूर्व का संस्कार और भी दृढ़ हो गया। इसे लेकर घर लौटा। भारत का इच्छा प्रबल हो रही थी। गुरुजनों और मित्रों से परामर्श और विचार के बाद यह बात चित्त में बैठ गयी की मानचित्र संगमरमर का हो तो उत्तम, क्योंकि वह अधिक टिकाऊ और अधिक उपयुक्त भी होगा। इस निश्चय के बाद कलाकार और शिल्पी की खोज होने लगी। बहुत यत्न के बाद काशी निवासी श्री दुर्गाप्रसाद जी ने यह भार उठाया और बड़े परिश्रम तथा बड़ी योग्यता से निभाया कार्यारम्भः सम्वत् 1975 तदनुसार वर्ष (1918 ई0) में हुआ और 5-6 वर्ष के परिश्रम में समाप्त हो भी गया। पर अनेक बाधाओं और विघ्नों के कारण, जिन पर मनुष्य का वश नहीं, कुछ समय तक सर्वसाधारण के लिए मातृभूमि का दर्शन सम्भव न हो सका।

    अन्त में केवल यह करना है कि जिस मन्दिर में भारतमाता की मूर्ति स्थापित है उसका शिलान्यास 24 लक्ष्य गायत्री पुरश्चरण के उपरान्त बासन्ती नवरात्रि के प्रथम दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 1984 वि0 चांद्र, सौर 20 चैत्र, संवत् 1993 वि0 2 अप्रैल 1923 को श्री भगवानदास जी के करकमलों द्वारा हुआ था। प्रथम दर्शन के उपलक्ष्य में चारों वेदों के चार-चार पाठ होकर पुर्णाहुति महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी के करपात्र से महानवमी (अश्विनशुक्ल 9) संवत् 1993 तदनुसार 25 अक्टूबर 1936 को हुई। सर्वसाधारण के दर्शनार्थ पाटोद्धाटन संवत् 1993 को विजयादशमी के शुभ दिन उन्हीं के पुनीत हाथों से हुआ।

 ¬तत् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु।

शिवप्रसाद गुप्त2

भारतमाता मन्दिर का संक्षिप्त विवरण

सतह या भूतल पर सफेद और काले संगमरमर पत्थरों से बनी सम्पूर्ण भारतवर्ष की भौगोलिक स्थिति को दर्शाती माँ भारती की यह मूर्ति, पवित्र भारतभूमि की सम्पूर्ण भौगोलिक स्थितियों को अनुपातिक रूप में प्रगट करती है, जिसका पूर्ण विवरण इस प्रकार है।

  1.  माँ भारती के इस भूगोलीय प्रतिमा में मैदान और सपाट भूमि और समुद्र के फैलाव को दिखाने के लिए 1 इंच 6.4 मील के पैमाने का निर्धारण किया गया    है।3
  2. पर्वत और पठार की ऊँचाई और समुद्र की गहराई को दर्शाने के लिए एक इंच 2000 फुट का पैमाना निर्धारित किया गया है।4
  3. संगमरमर के इस मानचित्र में समुद्र तट से ऊँचाई को दिखाने के लिए 500, 1000, 2000, 3000, 6000, 15000, 20000 और 25000 फुट की ऊँचाई को स्पष्ट     रेखाओं द्वारा काट कर दिखाते हुए अंकित किया गया। संगमरमर पत्थर के उभार     वाले इस नक्शे में ऊँचाई के अंकन की इस व्यवस्था से इस महादेश के प्रत्येक    चर्चित नगर की समुद्र तट से ऊँचाई का अन्दाजा लग जाता है।5
  4. पूरब पश्चिम 32 फुट 2 इंच तथा उत्तर से दक्षिण 30 फुट 2 इंच के पटल पर बनी माँ भारती की इस प्रतिमूर्ति के रूप के लिए 762 चौकोर ग्यारह इंच वर्ग के    मकराने के सफेद और काले संगमरमर के घनाकार टुकड़ों को जोड़कर भारत    महादेश के इस भूगोलीय आकार के मूर्तिरूप प्रदान किया गया है। माँ भारती की    इस पटलीय मूर्ति के माध्यम से भारत राष्ट्र को पूर्व से पश्चिम तक 2393 मील    तथा उत्तर से दक्षिण 2316 मील के चौकोर भूखण्ड दिखाया गया है। प्रस्तुत इस    पटलीय मूर्ति से वास्तविक भारतभूमि 405500 गुना अधिक लम्बाई और उतनी ही    चौड़ाई वाली है। गणितीय गणना में इस आंकड़े से वास्तविक भारतभूमि इस    पटलीय मूर्ति से एक अरब चालीस करोड़ तीस लाख पचास हजार गुनी बड़ी है।6
  5. माँ भारती के इस मूर्ति पटल में हिमालय सहित जिन 450 पर्वत चोटियों को दिखाया गया है उनकी ऊँचाई पैमाने के अनुसार 1 इंच से 2000 फिट की ऊँचाई    को दर्शाती है।7
  6. इस मूर्ति पटल में छोटी बड़ी आठ सौ नदियों को उनके उद्गम स्थल से लेकर अन्तिम छोर तक दिखाया गया है।8
  7.   माँ भारती के इस भूगोलीय मूर्ति पटल पर भारत के लगभग समस्त प्रमुख पर्वत, पहाड़ियों, झीलों, नहरों, और प्रान्तों के नामों को अंकित किया गया है।9
  8. माँ भारती को इस भूगोलीय पटल के निर्धारित चौकोर आकार में आने वाले भारत भूमि से हटकर उत्तर से पमीर के पठार, तिब्बत और तुर्किस्तान और पूरब के    ब्राह्म देश, मलप प्रायद्वीप और पश्चिम में अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, अरब समुद्र     को दिखाया गया है।10
  9. माँ भारती के इस भूपटलीय मूर्ति के निर्माण के लिए भूमापन विभाग के 1917 में उपलब्ध कराये गये नक्शे को पाँच गुना विस्तार देकर छः वर्षों के अनवरत प्रयास    के पश्चात् ठोस संगमरमर पत्थरों को जोड़कर यह रूप बन सका।11
  10. माँ भारती के इस विशाल पटलीय मूर्ति का शिलान्यास सन् 1926 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार के दिन काशी के महान विद्वान डॉ0 भगवान दास जी के कर कमलों से सम्पन्न हुआ था।12
  11. माँ भारती के “पटलीय मूर्ति मन्दिर” का शुभ उद्घाटन 25 अक्टूबर सन् 1936 में महात्मा गांधी के करकमलों से हुआ।13

यह ऐतिहासिक मन्दिर चौकोर भूखण्ड पर जमीन से लगभग 4 फिट ऊँचे चबूतरे पर एक विशाल महाकक्ष (हाल) में बना हुआ है। इस चबूतरे पर यह महाकक्ष 45×40 फुट क्षेत्र में बीचों-बीच बना है। जिसके चारों ओर में छायारहित खुला हुआ चबूतरा बना है। इस चबूतरे पर चढ़कर मन्दिर में प्रवेश के लिए चबूतरे के बगल से उत्तर दक्षिण दोनों तरफ से चार-चार डन्डों की पत्थर की सिढ़ियां बनी हुई हैं, जिससे इस विशाल चबूतरे पर चढ़कर मन्दिर में प्रवेश करने की व्यवस्था है। इस मन्दिर में प्रवेश के लिए पश्चिमी भाग से तीन ऊँचे दरवाजे बने हुए है। माँ भारती के मन्दिर में प्रवेश के लिए बने ये तीनों दरवाजें पश्चिमी भाग पर मन्दिर के महाकक्ष से सटे 20×15 आकार के बरामदे में खुलते हैं।

राष्ट्र देवता के इस मन्दिर के उद्घाटन के समय 25 अक्टूबर 1936 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने जो विचार व्यक्त किये वह इस प्रकार है-

दिनांक 25 अक्टूबर सन् 1936 ई0 भारत माता मन्दिर के उद्घाटन के समय महात्मा गाँधी का सन्देश।

इस मन्दिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। यहाँ संगमरमर पर उभारा हुआ एक मानचित्र-भर है। मुझे आशा है कि यह मन्दिर सभी धर्मों, हरिजनों-समेत, सभी जातियों और विश्वासों के लोगों के लिए एक सार्वदेशिक मंच का रूप ग्रहण कर लेना और इस देश में पारस्परिक धार्मिक एकता, शान्ति तथा प्रेम की भावनाओं को बढ़ाने में बड़ा योगदान देगा।

इस तीर्थ का उद्घाटन करते हुए मेरे मन में जो भावनाएं उमड़ रही है उनको मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। प्रेम की पुकार नहीं टाली जा सकती। मैं प्रेम की पुकार पर ही अपने दो प्यारे-प्यारे मरीजों को और गाँव के अपने काम को छोड़कर, गाँव से चलकर यहाँ काशी में आ गया हूँ। सन्त मीरा बाई के शब्दों में, प्रेम एक कच्चे धागे जैसा कोमल, जरा से झटके से टूटने वाला लेकिन स्वयं जीवन जितना ही मजबूत होता है। प्रेम लोगों को हजारों मील दूर से खींच लाता है मैं भी शिव प्रसाद के स्नेह के सामने टिक नहीं सकता था। मैं इस तीर्थ का उद्घाटन करने योग्य बिल्कुल ही नहीं हूँ, परन्तु शिवप्रसाद के स्नेह में मैं अपनी सीमाओं, अपनी अपात्रता को बिल्कुल भूल गया हूँ। इस शिवप्रसाद को जबसे मैं जानता हूँ, तब से मैं देखता हूँ कि गंगातट का उन्होंने अपना निवास स्थान बना रखा है, और गंगाजल से अपनी देह को पवित्र रखने के बावजूद उन्होंने अपने हृदय में एक दूसरी ही गंगा को स्थान दे रखा है। यह भावना और कल्पना की गंगा इनके हृदय में हमेशा बहती रहती है, और उसमें ये नित्य अवगाहन करते हैं। वे भावना के घोड़े भी गढ़ते हैं और पृथ्वी की प्रदक्षिणा करते हैं। भावना का बल ऐसा है कि यदि वह शुद्ध हो तो स्वर्ग में भी उड़ा ले जा सकता है, और अशुद्ध हो तो नरक में भी ले जा सकता है। इनकी भारत-भक्ति की भावना पूना-स्थित कर्वे के विधवाश्रम में उभरे हुए एक नक्शे को देखकर मूर्तिमन्त हुई, और इस पर अपनी समुचित धनराशि खर्च कर डालने का उन्होंने विचार किया। जैसी इनकी भावना थी वैसे ही इन्हें कलाकार भी मिल गये, शिल्पी और इंजीनियर भी वैसे ही मिल गये एक बार तो उन्हें अपने जीवन की भी आशा नहीं थी, किन्तु भगवान् ने इन्हें जीवित रखा और उनका स्वप्न, उनकी भावना की प्रतिमा आज हम अपने सामने देख रहे हैं।

आज सुबह जब मुझसे पूर्णाहुति सम्पन्न करने के लिए कहा गया था और वेदमन्त्रों का पाठ चल रहा था, तब उसे सुनते हुए मुझे अपनी प्रातःकालीन प्रार्थना का एक श्लोक याद आ गया, जिसका पिछले बीस वर्षों से हम पाठ करते आ रहे हैं।

         समुद्र वसनेदेवि पर्वत स्तनमण्डले।

         विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में।।

हम आज जिसकी सेवा के लिए अपने-आपको समर्पित कर रहे हैं वह यही धरित्री माता हैं। हमें जन्म देने वाली माँ मातृ होती हैं, परन्तु हमें पालने-पोसने और जीवित रखने वाली हमारी धरित्री-माता के साथ तो ऐसी बात नहीं है। धरित्री-माता का अन्त भी कभी आएगा, परन्तु तब उसके साथ उसकी सारी सन्तान भी काल के गाल में समा जाएगी इसलिए वह हमसे अपने प्रति जीवनपर्यन्त निष्ठा की अपेक्षा रखती है। शिवप्रसाद ने इस मन्दिर को बिना किसी भेदभाव के सभी धार्मिक विश्वासों के लोगों को समर्पित किया है, वे सभी इसमें आराधना कर सकते हैं उन्होंने इसके लिए किसी भी तरह की कोई शर्त नहीं रखी है। इस मन्दिर में भारतमाता से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत होगा और वह यहाँ अपनी सामर्थ्य तथा अपने विश्वास के अनुरूप आराधना कर सकेगा। इसलिए मैं शिवप्रसाद का स्नेहभरा आमंत्रण अनसुना नहीं कर पाया। आइए, हम सब अपने विभेदों और मतभेदों को भूला दें, भारतमाता के चरणों पर उनकी बलि चढ़ा दें और अपनी शुद्धतम भावना से उसकी सेवा में जुट जाएँ। ईश्वर की कृपा से शिवप्रसाद का स्वप्न साकार हो गया है। ईश्वर इतनी अनुकम्पन और करें कि शिवप्रसाद की हार्दिक अभिलाषा भी पूरा हो जाए कि परस्पर जूझते सभी धार्मिक विश्वासों, भिन्न-भिन्न मतों और हितों की आपाधापी बन्द हो जाए।14

    और ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि शिवप्रसाद इतने दीर्घजीवी हों कि अपनी आँखों से इस अभिलाषा को फलवती होते देख सकें।

माँ भारती के मन्दिर की बनावट

    लगभग 4500 वर्ग फुट क्षेत्र में तीन फीट ऊँचे एक विशाल चबूतरे पर बना है। इस ऊँचे चबूतरे के बीच में लगभग 45 फीट पूरब-पश्चिम 40 फीट उत्तर-दक्षिण क्षेत्र में मोटी दीवार से घिरा इस मन्दिर का दो मंजिला मूल भवन ही है।

    इस मूल मन्दिर में प्रवेश के लिए पश्चिमी दीवार में तीन द्वार बनाये हैं। इन प्रवेश द्वारों के खुलने वाले क्षेत्र में मूल मन्दिर से सटा एक 2015 फीट लम्बा दो मंजिला बरामदा है जो बलुआ पत्थरों से बने खम्भों पर टिका है।

इस बरामदे से होते हुए मन्दिर के भीतर के आन्तरिक लाभ में प्रवेश किया जाता है। इस आन्तरिक भाग में मन्दिर के चारों ओर लगभग पांच फुट चौड़ी गैलरी बनी हुई है। दीवार से सटी चारों तरफ बनी इस गैलरी के बीचो-बीच 32 फुट दो इंच गुणे 30 फीट दो इंच के क्षेत्र में गैलरी से लगभग ढाई फुट गहराई में माँ भारती का सफेद और काले संगमरमर से बनी भव्य ‘राष्ट्र प्रतिमा’ स्थापित है।

वास्तव में माँ भारती का यह मन्दिर एक विशाल महाकक्ष में बना है। इस महाकक्ष में चारों ओर बनी गैलरी के ठीक ऊपर वाले भाग में लगभग 15 फीट ऊपर दूसरे मंजिल पर भी इसी तरह की गैलरी बनी है लेकिन बीच का भाग खुला हुआ है जिससे दर्शक इस मन्दिर के ऊपरी मंजिल से नीचे की ओर बने भारतमाता के दर्शन का लाभ प्राप्त करते हैं। यह ऊपरी गैलरी बलुआ पत्थरों के खम्भों पर टिकी है। ऊपरी मंजिल पर भी ऐसे ही खम्भे बने हुए हैं। जिस पर मन्दिर के महाकक्ष की छत टिकी हुई है। इस मन्दिर के ऊपरी मंजिल पर पहुँचने के लिए निचली मंजिल में गैलरी के पूर्वी दक्षिणी कोने पर पत्थर की सीढ़ी बनी है जिससे ऊपरी मंजिल पर पहुँचा जाता है।

यह मन्दिर पूरी तरह पत्थर और बरी चूने के मसाले से बना है। इसकी छत पत्थर की पटिया से ढंक बरी के मसाले से बनी है। मन्दिर की छत के निर्माण में लगी सहतीर (धरन) प्राचीन भारत में प्रयुक्त होने वाली भवन निर्माण की तकनीक से बनने वाले बरी, चूने के साथ अन्य मसालों के मिश्रण से बनायी गयी है।

मन्दिर के महाकाक्ष के दोनों मंजिलों की चारों तरफ की दीवारों में रोशनी और स्वच्छ वायु के अनवरत आवागमन के लिए पांच-पांच बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ बनी है। सभी खिड़कियों के ऊपर बने रोशनदान पर पत्थर को काट कर बनी आकर्षक जालियां लगी है। खिड़कियों के ऊपर रोशनदान के रूप में लगी पत्थर की ये जालियां पत्थर में कारीगरी (पच्चीकारी) का उत्तम नमूना है। इस मन्दिर के भीतर-बाहर लगे बलुआ पत्थर के चिकने आकर्षण स्तम्भ भी श्रेष्ठतम् भारतीय वास्तुकला का बोध कराते हैं।

माँ भारती के इस अनुपम मन्दिर के पश्चिमी दीवार में बने तीन द्वारों पर पत्थर की कटी हुई जालियों की जगह बलुआ पत्थर पर बने कलात्मक तोरण बने हैं जो पत्थर पर खोदकर बनायी गयी है। ये पत्थर पर बारीक कलात्मक काम का बेजोड़ भारतीय नमूना है, तोरणीय कलाकृतियाँ मूर्तिकला के साथ ही तन्त्र और आध्यात्म्य का भी सन्देश प्रसारित करती हैं। इसी तरह के कलात्मक तोरण माँ भारती के इस मन्दिर के ऊपरी बरामदे के तीन दरवाजों के ऊपर भी बनाये गये हैं।

भारतमाता के इस मन्दिर के मध्य भाग में स्थापित भारत के विभिन्न भौगोलिक उपादानों के रूप में पर्वत, पठार, नदी और समुद्र के सजीव निर्माण के लिए संगमरमर के पत्थरों को जिस कलात्मक ढंग से तराशकर भारत के भौगोलिक भू-परिवेश का प्रतिरूपांकन किया गया है, वह भारत में पत्थर पर कलाकृति निर्माण कार्य में प्राचीन काल से चली आ रही कला और तकनीकी पक्ष को उजागर करती है।

वास्तव में राष्ट्र भाव के अनुप्रेरक माँ भारती के इस मन्दिर के निर्माण में कला, शिल्प और तकनीकी ज्ञान का उत्कृष्ट समन्वय हुआ है। संगमरमर पत्थर के टुकड़ों को जोड़कर बने इस धरातलीय राष्ट्र मन्दिर के निर्माण में जहाँ कलाकारों ने संगमरमर पत्थर के टुकड़ों को तकनीकी विशेषज्ञों के दिशा निर्देश और देख-रेख में पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र की गहराइयों को दिखाने के लिए छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़ों को जोड़कर निर्धारित पैमाने के अनुसार ऊँचाई और गहराई को ठीक-ठीक दिखाने के लिए पैमाने के अनुसार लम्बाई-चौड़ाई और ऊँचाई में टुकड़ों को काटने, छांटने और तराशने के बाद उन्हें आपस में जोड़कर एकीकृत भारत महादेश के रूप में जिस प्रकार मूर्तिमान किया है, उसे सामान्य के दर्शक के नजरिये से नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत, कलाकार, अभियन्ता, योजनाकार, व्यवस्थाकार के मिले-जुले नजरिये से देखना होगा, तभी जाकर राष्ट्रदेव के इस महान मन्दिर के निर्माण के उद्देश्य और विशेषता को समझा जा सकता है। अन्यथा यह मन्दिर संगमरमर के पत्थर से बना भारत के नक्शे के अलावा कुछ और नहीं लगेगा।

यहाँ एक बात और भी महत्त्वपूर्ण है कि तकनीकी साधनों से सम्पन्न जिस वर्तमान समय में हम आज रह रहे हैं मन्दिर निर्माण का समय तकनीकी साधनों से इतना सम्पन्न नहीं था। आज हमारे पास बिजली से चलने वाली पत्थर कटाई-छंटाई और पालिश करने की मशीने आ गयी हैं, लेकिन आठ-नौ दशक पूर्व जब मन्दिर निर्माण के समय इस तरह के कोई भी साधन नहीं थे, उस समय कलाकारों और कारीगरों के पास छेनी-हथौड़ी और अन्य परम्परागत औजारों के साथ ही परम्पराओं से प्राप्त कला-कौशल और दक्षता ही उनके साधन थे, जिसके बल पर इस मन्दिर के निर्माण में लगे लोगों ने इसे भव्य मूर्त रूप दिया। इसके अलावा एक और बात महत्त्वपूर्ण है कि पत्थर के इन टुकड़ों को आपस में जोड़कर मन्दिर का जो यह साकार रूप उपलब्ध है जुड़ाई के लिए विज्ञान और अभियान्त्रिकी द्वारा उपलब्ध कराये गये आज जैसे अधुनातन साधन उपलब्ध नहीं थे, यहाँ भी इस मन्दिर में प्रयुक्त हुए जोड़ने वाला मसाला कई दशकों के बाद भी मौसम की मार सहता हुआ अपनी जगह यथावत् कायम रहकर इस मन्दिर के भव्यता को बनाये हुए है। निश्चय ही यह परम्परागत प्राचीन भारतीय भवन निर्माण (स्थापत्य) तकनीक का उत्कृष्ट प्रमाण है। इस मन्दिर के निर्माण उद्देश्य से प्रभावित होकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने विचारों को काव्यरूप में इस प्रकार प्रगट किया है-

सभास्थल में मातृ-मन्दिर

(रचयिता श्री मैथलीशरण गुप्त)

         भारतमाता का यह मन्दिर, समता का संवाद यहाँ।

         सबका शिव-कल्याण यहाँ है, पावै सभी प्रसाद यहाँ।

         नहीं चाहिए बुद्धि बैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहाँ।

         कोटि-कोटि कण्ठों से मिलकर, उठे एक जयनाद यहाँ।

         जाति, धर्म या सम्प्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ।

         सबका स्वागत, सबका आदर, सबका सभा-सम्मान यहाँ

         भिन्न-भिन्न भव-संस्कृतियों के, गुण-गौरव का ज्ञान यहाँ।

         सब तीर्थों का तीर्थ यह, हृदय पवित्र बना ले हम

         आओ यहाँ अजातशत्रु बन, सबको मित्र बना लें हम।

         रेखाऐ प्रस्तुत हैं अपने, मन के चित्र बना लें हम,

         सौ, सौ आदर्शों को लेकर, एक चरित्र बना लें हम।

         मिला सत्य का हमें पुजारी, सफल काम उस चाभी का

         मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है, एक-एक अनुयायी का

         बैठों माता के आँगन में नाता भाई-भाई का

        समझे उसकी प्रसव वेदना, वही लाल भाई का15

ओ।म्

कुल मिलाकर राष्ट्र देवता का यह भव्य मन्दिर परम्परागत भारतीय कला, तकनीकी और शिल्प का अद्वितीय नमूना है। जो काशी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के परिसर में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न दुनियाभर से आने वाले पर्यटकों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान और कला का नियमित दर्शन कराता है।

                                                                                                                                                                                                           जगनारायण

 

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