अखाड़ा गया सेठ- वाराणसी

कोयला बाजार की घुमावदार गलियों के बीच अखाड़ा गया सेठ मौजूद है। कोई 75 वर्ष पहले यह स्थापित हुआ। गया सेठ के भाई गजाधार सेठ ने बताया- “भइया उ जमाना ही लड़ै भिड़ै वाला रहा, चारो तरफ सस्ती थी, कोई चिन्ता नाहीं रहत रहा, खूब खाओ, खूब लड़ो, हमें याद है हम अउर भइया अखाड़े पर संगे उतरत रहे, लड़े वाला पहिले हमसे लड़ता रहा फिर भइया से। शिवपुर के एक ठाकुर साहब थे। उन दिनों सामने खटिया पर बैठना इज्जत के खिलाफ रहा। भूल से तहिया हम लोग ऊहाँ बैठ गये- ‘ठाकुर के ललकारने पर दुनो जने से कई पक्कड़ भवा।’ ऊहाँ से लौटकर भइया ने ई अखाड़ा खोदवाया।” 90 वर्ष के इस बूढ़े शेर ने बताया कि यहाँ सिर्फ कुश्तियाँ होती हैं। चमकी से लेकर ढाँक मारने तक का दाँव सिखाया जाता है। उन्होंने 370 दाँवों की चर्चा की। उन्होंने कहा- “रूपया सेर घी, दू आना दूध, चपक के खाना खात जात रहा और सिकड़ौल तक बिना रूके दौड़ल जात रहा। कोई शरम-वरम नाय रहा आजक।़ लड़िकन तौ इहौ करै में लजात हैं अरे! जब नाचे के तब घूँघट का…।” मन्नू, मनोहर, बनारसी, मुन्ना इस अखाड़े के प्रसिद्ध पहलवान थे, जिन्होंने बिजनौर, कलकत्ता, केरल, बम्बई तक जाकर ‘चाँदी जैसा गदा’ प्राप्त किया। शिल्डों और पुरस्कारों की ढेर लगी है इस अखाड़े की।

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