ब्रिटिश हुकूमत इतना क्यों डर गयी थी आदि केशव मंदिर से..

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मुस्लिम शासनकाल से लेकर अंग्रेजी हुकूमत तक का बनारस के जनजीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा है। खासकर इस शहर की आस्था पर इन शासनकालों में गहरा आघात किया गया। मुस्लिम शासन के दौरान कट्टर शासक औरंगजेब ने जहां काशी के अनेकों मंदिरों को ध्वस्त कराकर मस्जिदों का निर्माण कराया वहीं अंग्रेजी शासन में भगवान को ही कैद कर दिया गया। भक्त और भगवान के बीच अंग्रेजी शासन की सामंतवादी नीति दीवार बन कर खड़ी हो गयी। इतने अत्याचारों के बाद भी न तो भक्त का भगवान से नाता टूटा और न ही आस्था डोली।

धर्म की नगरी काशी अपने आंचल में ऐसी घटनाओं को भी समेटे हुए है जिसका जिक्र आने पर आज के दौर में कलेजा कांप उठता है। क्रूरता की ऐसी कहानी जिसकी दास्तान सिहरा देने वाली होती है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह शहर भी अंग्रेजी शासन के क्रूर हनक का भुक्तभोगी रहा। अंग्रेजों ने इस शहर को न केवल शारीरिक रूप से उत्पीड़ित किया बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आधारों पर भी शोषित किया। अंग्रेजों की बर्बरता ऐसी की आम से लेकर खास तक चिंतित और अस्थिर रहते थे।

हिन्दुओं की सबसे पवित्र तीर्थ स्थली और आध्यात्मिकता और पौराणिकता का केन्द्र रहा बनारस मुस्लिम शासन के कट्टरता को झेलने के बाद सम्भल भी नहीं पाया कि अंग्रेजों ने कई जख्म दिए। अंग्रेजों के दिये ऐसे ही एक घाव का गवाह है – गंगा वरूणा संगम पर स्थित आदि केशव मंदिर। अंग्रेजों ने इस मंदिर में न केवल हिन्दुओं की आस्था पर कुठाराघात किया बल्कि भगवान को भी कैद करने जैसा दुस्साहसिक कार्य किया। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल बजने के साथ ही जैसे पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ लहर दौड़ गयी।

आंदोलन कि यह चिंगारी नगरों कस्बों से होते हुए गांवों तक पहुंचने लगी थी। भारतीय अंगेजी शासन के खिलाफ मुखर हो रहे थे। जगह-जगह सरकारी कार्यालयों रेल की पटरियों को उखाड़ने के साथ नियमों को मानने से इनकार किया जा रहा था। आंदोलन की यह आग अंग्रेजी शासन की नींव हिलाने लगी थी। अंग्रेजी शासन में पूरी तरह से खलबली मच गयी। वह किसी भी कीमत पर इस आंदोलन को दबाने की अत्याचारी कवायदें करने लगा। लोगों को हिरासत में लेकर तमाम तरह की यातनाएं दी जाने लगीं। बहुतों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। आंदोलन के इस हालात में काशी भी अंग्रेजों के अत्याचार से अछूती नहीं रही। हालांकि 1857 क्रांति का असर काशी पर नहीं पड़ा था बावजूद इसके अंग्रेजी शासन कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती थी। उसकी रणनीति थी कि जहां माहौल शांत है और आंदोलन का असर नहीं है वहां भी पूरी सावधानी बरती जाय और किसी भी प्रकार से आंदोलन को और न बढ़ने दिया जाये। अपनी इस कुटिल रणनीति के तहत अंग्रेजी शासन का फरमान काशी के लिए भी आया। बात 1857 की ही है।

दरअसल उस दौर में वर्तमान की तरह शहर में आने के लिए तमाम रास्ते नहीं थे। उस पार से शहर में आने के दो ही रास्ते हुआ करते थे। संसाधनों की कमी की वजह से प्रायः परिवहन लोग जलमार्गों से ही करते थे।

बनारस में गंगा जी के रास्ते ही लोग यात्राएं किया करते थे। वह भी चुनिंदा स्थानों शहर में घुसने की व्यवस्था थी। एक था रामनगर और दूसरा राजघाट। प्रायः लोग राजघाट के रास्ते से ही शहर में प्रवेश करते थे। राजघाट पर ही गंगा वरूणा संगम के पास स्थित है आदि केशव का पौराणिक महत्व का मंदिर। काशी के 84 घाटों में से उत्तर दिशा का यह पहला घाट है। हिन्दुओं के लिए इस स्थान का धार्मिक रूप से खास महत्व रहा है। तमाम तीर्थ यात्राओं के दौरान हिन्दू तीर्थ यात्री इस स्थान पर स्नान के बाद आदि केशव का दर्शन-पूजन करते रहे हैं। मंदिर में भगवान विष्णु की दिव्य मूर्ति के अलावा भी कई देवताओं की मूर्तियां हैं। चूंकि राजघाट गंगा उस पार से शहर में आने का मुख्य मार्ग था इसलिए इस स्थान को लेकर अंग्रेजी शासन कुछ ज्यादा ही सतर्क रहा।

आज की तरह उस दौर में संचार के भी इतने माध्यम नहीं थे कि लोग दूर की खबरों को आसनी से जान लेते। उस समय एक दूसरे के जरिये ही लोग सूचनाएं प्राप्त करते थे। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी शासन ने राजघाट मार्ग को रोक दिया। देखते ही देखते पूरे राजघाट क्षेत्र छावनी में तब्दील हो चुका था। हर ओर अंग्रेजी सैनिकों के भयानक बूटों की आवाजें ठक-ठक सुनाई देती थी। आस्था और श्रद्धालुओं के धार्मिक वाणी के बजाय सैनिकों की आवाजाही आम लोगों के लिए किसी भयानक सपने से कम न थी। लोग डरे सहमे सैनिकों की डरावनी निगाहों के बीच आदि केशव मंदिर दर्शन-पूजन करने जाते थे। यह क्रम कुछ दिनों तक चला लेकिन हद तो तब हो गयी जब सैनिकों की पहुंच आदि केशव मंदिर परिसर में हो गयी। इसी बीच अंग्रेजी हुकूमत का शाही फरमान आया कि आदि केशव मंदिर में पूजा पाठ बंद करा दी जाये। जिसका स्थानीय अंग्रेजी अधिकारियों ने कड़ाई से पालन कराना शुरू कर दिया।

यह घटना 1857 की है। मंदिर परिसर में अब श्रद्धालुओं की बजाय बूट धारी अग्रेजी सैनिकों की पहुंच हो गयी। श्रद्धालुओं के लिए मंदिर पूरी तरह से बंद कर दिया गया। इस घटना का शहर में कुछ लोगों ने विरोध भी किया लेकिन उनकी आवाजों को दबा दिया गया। मंदिर में पूजा पाठ बंद करने के पीछे अंग्रेजी शासन का उदेश्य था लोगों के बीच के सम्पर्क को खत्म करना। अंगेजों की बर्बरता अब जनता से होते हुए भगवान तक जा पहुंची थी। अब भगवान भी अपने ही घर में अंग्रेजों द्वारा कैद कर दिये गये थे। हिन्दुओं की आस्था पर की गयी यह चोट लोगों को नागवार गुजरी लेकिन अंग्रेजी सरकार की ताकत के आगे लोग चुपचाप रहे। करीब छः सालों तक यह मंदिर पुजारी, आरती और श्रद्धालुओं से बेजार रहा।

स्वतंत्रता के पहले आंदोलन की आग थमने के बाद अंततः 1863 में मंदिर को पुनः श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। अंग्रेजी शासन ने निर्णय लिया कि आदि केशव मंदिर में फिर से पूजा पाठ किया जायेगा। छः वर्ष के लम्बे वनवास को झेलने के बाद भक्त और भगवान फिर मिले। आज भी मंदिर परिसर के पास अंग्रेजों द्वारा लगाया गया शिलापट्ट विद्यमान है। भले ही आज मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से गुलजार हो घण्टे घड़ियाल से परिसर गूंज रहा हो। सुबह दोपहर शाम आरती से पूरा परिसर भक्ति पूर्ण माहौल से रच-बस जाता हो लेकिन मंदिर की दीवारें आज भी अपने उस इतिहास को नहीं भूली हुई हैं। जिसने उसे अपने भक्तों से जुदा करके कैद कर दिया ।