कहानी क्वींस कालेज की

-डॉ०भानुशंकर मेहता

वाराणसी को “सर्वविद्या की राजधानी” कहा गया है। अनादिकाल से देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ विद्या अर्जन करने आते रहे हैं। राजा दिवोदास का आयुर्विज्ञान विद्यापीठ यही पर था। तक्षशिला और काशी के विद्यालयों के बीच शिक्षकों-विद्यार्थियों का आदान-प्रदान होता था। गौतमबुद्ध से लेकर स्वामी दयानन्द तक भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के प्रर्वतक और विभिन्न दर्शनों के आचार्य अपने मत पर प्रामाणिकता की मुहर लगवाने काशी आते रहे हैं। ‘उच्च विद्याध्ययन’ का अर्थ ही हो गया था काशी जाना। एक विदेशी विद्वान ने लिखा है कि यहाँ हर घर में पंडित और उसकी पाठशाला है और इस प्रकार पूरा नगर ही विश्वविद्यालय है। ऐसी विद्या की नगरी में बादशाह औरंगजेब ने फरमान जारी किया कि तमाम मंदिर और पाठशालाएँ गिरा दिये जाएँ। “शास्त्रों का पठन-पाठन और मूर्तिपूजा बंद कर दें।” सितम्बर 1669 में विश्वनाथ मंदिर और बिंदुमाधव मंदिर गिरा दिये गये। पंचगंगा घाट पर बिंदुमाधव मंदिर के पास जयपुर नरेश ने राम मंदिर, कंगनवाली हवेली और एक पाठशाला स्थापित की थी। तावेर्निये नामक यात्री ने इस पाठशाला का विशद वर्णन किया है (1965)। दूसरे यात्री बर्नियर ने 1660 के बनारस की शिक्षा संस्थाओं पर प्रकाश डाला है। किंतु बादशाही फरमान के बाद पाठशालाएँ बंद हो गयीं। गुपचुप कुछ पंडित अपने शिष्यों को पढ़ाते लिखाते रहे। सौ वर्ष के अविद्या के अंधकार के बाद पुनः ज्ञान का सूर्योदय हुआ। उस समय काशी पर इंग्लैण्ड की ईस्ट इंण्डिया कम्पनी का अधिकार हो चुका था। कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने काशी के राजा चेतसिंह को अपदस्थ करके नगर पर कंम्पनी का शासन स्थापित किया था। (1781)। सन् 1787 में डंकन बनारस के रेजिडेन्ट बनकर काशी आये। डंकन ने बनारस की शासन व्यवस्था में अनेक सुधार किये। सहज ही था वह शिक्षा की बात भी सोचता

अट्ठारहवीं सदी के अंत में मुगल साम्राज्य का अवसान हो गया और ब्रिटिश सत्ता धीरे-धीरे काबिज हो रही थी। अंग्रेज व्यापारी थे, अस्तु उनमें इस्लामी शासकों की धार्मिक रूढ़िवादिता नहीं थी, वे ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार तो करना चाहते थे पर तलवार के दम पर नहीं। दो बातें कंपनी के शासकों के सामने आयीं। एक तो यह कि दीवानी कचहरी में प्रस्तुत वादों में शास्त्रों की व्याख्या करके अंग्रेज न्यायाधीश को सहायता करने के लिए संस्कृत पंडितों की आवश्यकता; दूसरे संस्कृत की पाठशाला या उर्दू-फारसी पढ़ाने के मदरसे खोलने से लोगों में कंपनी-सरकार की लोकप्रियता बढ़ाना। साथ ही बनारस में संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था करना विशेष महत्त्व रखता था क्योंकि यह विद्या का केन्द्र तो था ही साथ ही अंग्रजों ने सोचा कि इस राष्ट्र के संस्कृत, साहित्य धर्म, आस्था और विश्वास के इस केन्द्र में जहाँ श्रद्वालु भारतीय आते हैं; संरक्षण और संवर्धन करना चाहिए, जिससे लोग कंपनी सरकार के प्रति अनुगृहीत हों।

अब प्रश्न यह है कि बनारस में संस्कृत पाठशालाओं की पुनः स्थापना का विचार पहले किसके मन में आया! “काशी के इतिहास” में डा0 मोतीचंद्र-जर्नल आफ रिसर्च इंस्टिट्यूट-मई 1944 में एस0 एन0 सेन के लेख “संस्कृत कालेज एण्ड बनारस” का हवाला देते हुए कहते है कि 1799 में लार्ड मानिंगटन के नाम लिखे पत्र में संस्कृत कालेज के प्रथम आचार्य काशीनाथ लिखते हैं कि बनारस संस्कृत कालेज चलाने की बात उन्होंने ही चलायी थी। दूसरी ओर चार्ल्स बिकलिस को संस्कृत पढ़ाना था और उसे पंडित ढूंढ़ने में बड़ी तकलीफ हुई अतः उसने वारेन हेस्टिंग्स के समक्ष संस्कृत पाठशाला खोलने का सुझाव रखा। काशीनाथ कलकत्ता जाकर यह प्रस्ताव हेस्टिंग के सामने रखना चाहते थे। पर जा न सके अतः उन्होंने प्रस्ताव बनारस के रीजेण्ट जोनेथन डंकन के समक्ष रक्खा। अब वास्तविकता क्या है, किसे श्रेय दें, यह निर्णय करना कठिन है।

पहली जनवरी 1771 को डंकन ने यह प्रस्ताव गर्वनर जनरल लार्ड कार्नवालिस के सामने रखा। वे यहाँ “भारत का आक्सफोर्ड” बनाना चाहते थे। साथ ही डंकन मूल उद्देश्य नहीं भूला था। उसने कहा कि इस विद्यालय द्वारा भारतवासियों को योरोपीय साहित्य और दर्शन का ज्ञान दिया जा सकेगा क्योंकि उनकी राय में भारतीय साहित्य और दर्शन आदिम अवस्था में है और यहाँ के लोग योरोप का उच्च ज्ञान प्राप्त कर सहज ही अंग्रेज भक्त हो जायेंगे। उनकी कूटनीति एक हद तक सफल भी रही। उन्होंने अच्छी खासी आंग्लभक्तों की फौज तैयार भी की। साथ ही डंकन ने लिखा कि हिन्दू लॉ की मीमांसा के लिये पंडितों की जरूरत है। डंकन ने प्रस्ताव में कहा कि कालेज की स्थापना करके पंडितो और विद्यार्थियों की सहायता से संस्कृत की हस्तलिखित पुस्तकें इकट्ठा की जाँय, इससे भी हिंदुओं में अंग्रजों की ख्याति बढ़ेगी और अंग्रेज भारत के विद्या-भण्डार में घुसकर उसकी सम्पदा देख सकेगा और समझ सकेगा कि उसमें कुछ दम भी है या नहीं। आगे की कूटनीति के लिये यह आवश्यक कदम था। गवर्नर जनरल ने तुरंत स्वीकार कर लिया और यद्यपि डंकन ने चौदह हजार रूपये सालाना की ही माँग की थी पर कार्नवालिस ने बीस हजार रूपये वार्षिक अनुदान की मंजूरी दे दी।

28 अक्टूबर 1791 को संस्कृत पाठशाला या गवर्मेण्ट संस्कृत स्कूल की स्थापना हो गयी। इसके लिये महाराजा महीप नारायण सिंह (काशी नरेश) ने प्रचुर धन और भूमि प्रदान की। मिर्जापुर में काशीनरेश की जमींदारी की सत्तासी परगना की आमदनी कालेज चलाने को दी गयी। महाराज ने चौकाघाट में स्थित वह भूमि भी दान में दे दी, जहाँ वर्तमान में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय स्थित है। आरम्भ में मैदागिन तालाब के निकट के किराये के घर में विद्यालय स्थापित हुआ। सौ रूपये प्रतिमाह वेतन पर छः पंडित और अस्सी रूपये प्रति माह पर दो पंडित नियुक्त हुऐ। नौ विद्यार्थी निःशुल्क पढ़ते थे। पं0 काशीनाथ शास्त्री प्रधानाचार्य नियुक्त हुए और इनका वेतन दो सौ रूपये था। विद्यालय में वेद, वेदान्त, न्याय, मीमांस, पुराण, काव्य, ज्योतिष, आयुर्वेद तथा धर्मशात्र पढ़ाने की व्यवस्था की गयी। विद्यालय की व्यवस्था रीजेंट स्वयं देखते थे। वस्तुतः काशी के विद्वान् पंडित अंग्रजों द्वारा संचालित इस संस्था में पढ़ाने के लिये तैयार नहीं थे।

सन् 1794 में डंकन बंबई में चले गये और कालेज की देखरेख का काम एक समिति के जिम्मे दिया गया जिसमें जी0 एफ0 चेरी, कैप्टेन सैमुअल डेविस और कैप्टन विलफोर्ड नियुक्त हुए। समिति के अध्यक्ष गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि रीजेंट बनाये गये। इस समिति ने पंडितों का वेतन घटाकर साठ और चालीस रूपये प्रतिमास कर दिया। साठ विद्यार्थियों को एक से दस रूपये तक छात्रवृत्ति के मिलते थे। (इस समिति के चेरी फारसी के विद्वान थे, डेविस भारतीय ज्योतिष में दखल रखते थे और विलफोर्ड की संस्कृत अध्ययन में रूचि थी।) सन् 1801 में चेरी और डेविस के स्थान पर ‘नीव’ और ‘डीन’ आ गये। इन लोगों ने काशीनाथ के विरूद्ध रिपोर्ट भेजी और गड़बड़ी के आरोप लगाये। इस कारण काशीनाथ ने लार्ड मार्निगटन को अर्जी भेजकर दुखड़ा रोया पर असफल रहे। सन् 1804 में समिति के सभापति ब्रुकर ने लिखा कि विद्यालय के  एक अध्यापक जटाशंकर पाठशाला के आचार्य होने के योग्य नहीं है। सन् 1813 में बीरेश्वर पंडित, शिवराम पंडित और जयराम भट्ट के विरूद्ध भी शिकायतें भेजी गयीं। संक्षेप में ऐसा प्रतीत होता है कि काशीनाथ और उनके साथी गड़बड़ी करते थे और कालेज की व्यवस्था ठीक नहीं थी। स्थिति इतनी खराब थी कि रामप्रसाद तर्कालंकार अस्सी वर्ष की अवस्था में नियुक्त हुए थे। विरेश्वर सुब्बाशास्त्री और जटाशंकर ने समिति से कहा कि छात्रों की छात्रवृत्तियाँ उन्हीं को दे दी जाय।; जिसे समिति ने अस्वीकार कर दिया। पं0 बाल शास्त्री भी विद्यालय में पढ़ाते थे। बाल शास्त्री जी के चार शिष्य थे म0म0पं0 शिव कुमार शास्त्री, म0म0पं0 गंगाधर शास्त्री, म0म0 तात्या शास्त्री और म0म0 दामोदर शास्त्री। इन विद्वानों ने कालेज की श्रीवृद्धि की।

अन्ततः सन् 1812 में कालेज की पुनर्योजना हुई जिससे स्थिति कुछ संभली। छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों की संख्या 60 निर्धारित कर दी गयी। सुधार का परिणाम यह हुआ कि 1823 में विद्यार्थिओं की संख्या 200 हो गयी। सन् 1820 में कैप्टेन एडवर्ड फेल ‘समिति’ के सेक्रेटरी और कालेज के सुपरिटेंडेंट चुने गये पर 1824 में उनकी मृत्यु हो गयी। पुनर्योजना में कालेज का नाम “बनारस कालेज” हो गया।

बिशप हेब्बर ने सन् 1824 मे कालेज का आँखों देखा हाल लिखा है- “विद्यालय दो चौक की इमारत में है। यह सर्वदा शिक्षकों और विद्याथियों से भरा रहता है। विद्यालय में बहुत सी कक्षाएं हैं जिनमें विद्यार्थी पढ़ना लिखना, भारतीय गणित, फारसी, हिन्दू कानून, वेद, संस्कृत और ज्योतिष सीखते हैं। विद्यालय में दो सौ विद्यार्थी हैं और उनमें बहुत से मुझे पाठ सुनाने आये। दुर्भाग्यवश थोड़ा ज्योतिष और फारसी के सिवा मैं कुछ समझ न सका। ज्योतिष पंडितों ने हिंदू ज्योतिष के सिद्वांतनुसार बने गोले दिखलाये जिसमे उतरी ध्रुव पर सुमेरु पर्वत और दक्षिणी ध्रुव पर एक कछुवा पर पृथ्वी आश्रित है, थे। पंडित जी ने बतलाया कि दक्षिणी गोलार्ध बसने योग्य नहीं है। इस पाठशाला मे अंग्रजी और यूरोपीय ज्योतिष पढ़ाने की कई बार कोशिश की गयी पर इस विद्यालय के विगत प्रधान शिक्षक इसके इसलिए विरोधी थे कि ऐसा करने से संस्कृत शिक्षा पर व्याघात पहुँचने और पंडितों की धार्मिक भावनाओं पर धक्का लगने का डर था। दूसरे दिन विद्यालय का एक छोटा विद्यार्थी मेरे पीछे दौड़ा और हाथ जोड़कर अपना पाठ सुनाने की अनुमति चाही, श्लोक मेरे संबंध मे थे – शायद यह अभिनंदन पत्र था। (नैरेटिव ऑफ ए जर्नी थ्रू दि अपर प्रविंसेज आँफ इडिया – लंदन 1861 – विशप हैब्बर)

सन् 1829 में कैप्टेन थोसवाई सेक्रेटरी बने और उन्होंने सिफारिश की कि संस्कृत के साथ एक अंग्रेजी स्कूल भी चलना चाहिए। सो जून सन् 1830 मे एंग्लो इंडियन सेमिनारी स्कूल की स्थापना हुई जो सन् 1836 में बनारस गवर्मेण्ट स्कूल बन गया। एंग्लो इंडियन सेमिनारी मे गुरुचरण मित्रा और ईश्वरचंद्र डे प्रभृति विद्वान अध्यापक थे। सन् 1837 में बनारस गवर्मेण्ट स्कूल के हेड मास्टर ही संस्कृत कालेज के सुपरिटेंडेंट और स्थानीय शिक्षा समिति के सेक्रेटरी भी होते थे।

अब यह अनुभव किया गया कि कालेज को पूर्ण कालिक प्रिंसिपल की आवश्यकता है जो संस्कृत और अंग्रेजी दोनो कालेजों का प्रबंध देख सके। यह भी सोचा गया कि प्रिंसिपल संस्कृत जानने वाले अंग्रेज हों। अतः सन् 1844 में जेो म्योर प्रिंसिपल हुए। वे दो वर्ष तक प्रिंसिपल रहे। स्कूल और संस्कृत कालेज मिलाकर एक कर दिये गये।

सन् 1846 में डाो जेो आरो वैलेण्टाइन, एलो एलो डीो प्रिंसिपल बने। वैलेण्टाइन संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। अपने 14 वर्ष के कार्यकाल में इन्होंने कालेज की बड़ी उन्नति की। उनके समय छात्रों को संस्कृत भाषा मे इंग्लैण्ड और भारत का इतिहास, यूरोपीय दर्शन, पढ़ाया जाता था। बैलेण्टाइन ने अंग्रेजे विद्वानों के लिए अंग्रेजी भाषा में संस्कृत का व्याकरण, लद्यु सिद्धांत कौमुदी का अंग्रेजी अनुवाद ,सांख्य एवं कपिल वेदांत सार का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया।

सन् 1835 में विद्यालय के भवन का निर्माण हुआ। मेजर किटो इस भवन के आर्किटेक्ट थे। गाथिक शैली में चुनार के पत्थरों से बना यह अंग्रेजी युग का भव्यतम भवन था। गाथिकशैली ,पर्पेडिकुर स्टाइल , आमुख चुनार के फ्री स्टोन का अंग्रेजी-युग के भारत की सबसे भव्य इमारत का निर्माण हुआ। इसका केन्द्रीय शिखर 75 फुट ऊँचा, नेव 60 फुट लंबा, 30 फुट चौड़ा, 32 फुट ऊँचा तथा ट्रांसेप्ट 40 फुट लंबा, 20 फुट चौड़ा, 32 फुट ऊँचा था। चारों ओर छोटे शिखर थे। दीवार पर दाताओं के नाम और श्लोक अंकित किये गए।

इसी जमाने में नार्थवेस्ट प्रांविस के लेफ्टिनेण्ट गवर्नर थाम्सन गाजीपुर से पत्थर की लाट उठा लाये जिस पर प्राचीन लिपि में आलेख खुदा था। यह साढ़े इकत्तीस फुट ऊँची लाट कालेज के मैदान में स्थापित कर दी गयी। कहते हैं कि जब भवन बनकर तैयार हो गया तो मेजर कीटो को पता चला कि भवन मे पानी घुस आया था। इस चूक पर कीटो को इतनी ग्लानि हुई कि उन्होंने  आत्महात्या कर ली ।

यहीं पर एक नार्मल स्कूल भी स्थापित किया गया जहाँ ग्रामीण स्कूल-अध्यापकों का प्रशिक्षण होता था। इसी युग में प्रथम स्वातंत्रता संग्राम छिड़ गया और फलतः कंपनी का राज्य समाप्त हो गया। सन् 1875 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया भारत की महारानी बन गयी। इसके साथ की गवर्मेण्ट स्कूल का नया नामकरण “क्वींस कालेज“ हो गया। आरंभ में यह कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबंध था और यहाँ पोस्ट ग्रेजुएट (एम0 ए0) तक की शिक्षा होती थी। फिर जब इलाहाबाद से विश्वविद्यालय बना (1887) तो इसे इलाहाबाद सम्बद्ध कर दिया गया। लार्ड मैकाले की शिक्षा योजना लागू होने के बाद पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में अवरोध आया और इंगलिश स्कूल की स्थापना का क्रम आरंभ हुआ।

सन् 1861 में आर0 टी0 एच0 ग्रिफिथ, एम0 ए0 (आक्सफोर्ड के बोडेन संस्कृत – स्कालर) प्रिंसिपल नियुक्त हुए। ये क्वींस कालेज के दूसरे यशस्वी प्रिंसिपल बने। ग्रिफिथ संस्कृतज्ञ तो थे ही, कवि भी थे। इन्होंने वेदों का अंग्रेजी अनुवाद किया। इनका वाल्मीकि रामायण का अंग्रजी अनुवाद प्रसिद्ध है। विद्यालय में जिस स्थल पर बैठकर ग्रिफिथ ने रामायण का अनुवाद किया वहाँ संगमरमर का एक शिलालेख लगा है।

जिस पर लिखा है –

        “तमसातट कोकिलेन यच्चरितं

        कूजितभूर्जित हरे ।

        तदिहैव निवीदता सुखं

        ग्रिफिथे नात्मगिरा।़प्याजीयत ।”

ग्रिफिथ आजीवन अविवाहित रहे और संस्कृत की सेवा करते रहे । उनका बंगला सुंदर था और वे अभ्यागतों को बड़े शौक से अपना घर दिखाते थे। ग्रिफिथ ने “द पंडित“ नामक पत्रिका भी प्रकाशित की जो 1866 से 1917 तक संस्कृत वांङमय की सेवा करती रही।

ग्रिफिथ के बाद डा0 जी0 थीबो पधारे और ये 1879 से 1888 तक क्वींस – संस्कृत कालेज के प्रिंसिपल रहे। थीबो जर्मन थे, गणितज्ञ और वेदान्त दर्शन के आचार्य थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इनका उल्लेख किया है। थीबो महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर दिवेदी के अनन्य मित्र थे और दोनों मिलकर ज्योतिष गंथो का संपादन करते थे। इस लोगों ने ब्रह्मसूत्र और श्रीसूत्र का अंग्रजी अनुवाद किया जो मैक्समूलर के “दि सेक्रेड वर्क्स आफ ईस्ट“ में प्रकाशित हुआ है। थीबो ने तात्याशास्त्री और गंगाधर शास्त्री को नियुक्त किया। इसी प्रकार पंचांग के लिए विख्यात म0 म0 बापूदेव शास्त्री  गणित के प्रार्चाय नियुक्त हुए। थीबो के समय में ही प्रथमा आदि परीक्षाएं आरम्भ हुईं। थीबो के यशस्वी उतराधिकारी थे डा0 आर्थर वेनिस, जिन्होंने 1888 से 1918 तक क्वींस कालेज की प्रिंसिपली की। अंग्रेजी होते हुए भी वेनिस काशी के वरदपुत्र थे। इनके पिता डॉ0 ई0 जे0 लाजरस काशी में ही रहते थे। (नदेसर मे अभीतक लाजरस कोठी थी)। वेनिस जीवनभर काशी में ही रहे। केवल अध्ययन के लिये कुछ वर्ष आक्सफोर्ड गये थे ।

वेनिस साहब के गुरुओं में महामहोपाध्याय कैलाशचंद्र शिरोमणि और महामहोपाध्याय गंगाधर शास्त्री प्रभृति विद्वान थे। डा0 वेनिस वेदान्त और न्यायशास्त्र के विद्वान थे। महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज जी को ये अपना मानसपुत्र मानते थे।

वेनिस साहब के प्रयास से ही विश्वविद्यालय का पुस्तकालय “सरस्वती भवन“ बना। वेनिस साहब के प्रयास से ही सन् 1893 में ‘बनारस संस्कृत सिरीज’ और ‘चौखंबा संस्कृत सीरीज’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। काशी के संपन्न रईसों से वेनिस साहब की मैत्री थी और उनके प्रयास से मुंशी साधोलाल ने रिसर्च स्कालरशिप की स्थापना की। ‘सरस्वती-भवन टेक्स्ट्स’ तथा ‘सरस्वती – भवन स्टडीज’ के प्रकाशन का शुभारंभ हुआ और 1890 में विजयानगरम् संस्कृत सीरीज का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। डा0 वेनिस स्वयं एपीग्राफी, इतिहास और वेदान्त पढ़ाते थे। डा0 वेनिस के मानसप़ुत्र स्वनाम धन्य जीवन्त विश्वनाथ म0 म0 डा0 गोपीनाथ कविराज जी थे । जिन्हे वेनिस जयपुर से काशी लाये, क्वींस कालेज से एम0 ए0 कराया और यहीं पुस्तकालयध्यक्ष और प्रिंसिपल बनाया।

वेनिस के बाद पी0 एस0 बरेल और जेनिंग्स आये। इसी बीच 1918 मे हार्टोग्ग कमीशन आया जिसमें फतवा दिया कि क्वींस कालेज इस योग्य नहीं है कि इसमे एम0 ए0, बी0 ए0 शिक्षा हो अतः उनकी सिफारिश पर डिग्री और पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाएं बंद कर दी गयी और संस्कृत तथा अंगेजी कालेज अलविदा कर दिये गये। यद्यपि सम्बन्ध बना रहा मुख्य गाथिक भवन संस्कृत कालेज के अलावा विश्वविद्यालय की स्थापना होने तक इंटर की कक्षाएं चलती रहीं। इंटर कालेज के प्रिंसिपल का कार्यालय भी वहीं था। स्कूल की कक्षाएं सड़क पार भवन में जहाँ इस समय पुरातत्व विभाग है- चलती थी।

अंततः कालेज अब क्वींस इंटरमीडिएट कालेज हो गया जिसके प्रिंसिपल बने डा0 बी0 संजीव राव । संस्कृत विद्यालय – गवर्मेण्ट संस्कृत कालेज बन गया। इसके प्रधानाचार्या बने डा0 सर गंगानाथ झा। इस कालेज की बड़ी प्रसिद्धि थी, स्वतंत्रता के पूर्व में अपरोक्ष रुप में यह एक विश्वविद्यालय ही था। भारत और नेपाल के सैकडों संस्कृत विद्यालय इससे सम्बद्ध थे और यहाँ अखिल भारतीय परीक्षा होती थी और उपाधियाँ प्रदान की जाती थीं ।

डा0 गंगानाथ झा ने 1886 मे क्वींस कालेज से ही डा0 थीबो के जमाने मे शिक्षाप्राप्त की थी और 1890 यही से एम0 ए0 हुए थे। ज्ञातव्य है कि भारतरत्न डा0 भगवान दास के बड़े भाई श्री गोविंद दास जी इनके सहपाठी थे।

डा0 झा के बाद यह पद गौरवान्वित किया डा0 गोपीनाथ कविराज ने (1923 से 1937)। उनके बाद डा0 मंगलदेव शास्त्री सन् 1956 तक प्रिंसिपल रहे जब कि डाक्टर सम्पूर्णानन्द ने इसे वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय बना दिया। उन्होने डा0 गोपीनाथ कविराज जी से प्रथम कुलपति होने का आग्रह किया जिसे वीतराग विद्वान ने अस्वीकार कर दिया। तब डा0 आदित्यनाथ झा कुलपति बने और तब से विश्वविद्यालय प्रगति कर रहा है। इधर क्वींस कालेज में संजीव राव के बाद क्रमशः प्रो0 अली अमी, आर 0 एन0 कौल0, एस0 बी0 परमानन्द  चंद्रमोहन चक आदि प्रिंसिपल रहे।

 और पढ़ें: बनारसीपन को बचाना होगा – डॉ0 भानुशंकर मेहता

अब क्वींस कालेज जगतगंज चौराहे पर स्थित विज्ञान कालेज में स्थानांतरित हो गया है। उसके नये भवन बन गये और आज वह काशी का प्रसिद्व सरकारी इंटर कालेज है और आज भी उसे अपने गाथिक भवन की ‘बुक बेल एण्ड द केंडिल’ समाधि की याद सताती है पर  रसायन प्रयोगशाला के “गैस “ की मीठी गंध उसे अतीत भुलाकर वर्तमान मे कर्तव्य करते रहने का निर्देश करती है।

(बनारस व बनारसीपन के जीवंत हस्ताक्षर डॉ०भानुशंकर मेहता क्वींस कालेज के पुराछात्र रहे हैं। उनके द्वारा लेख कॉलेज के पुराछात्र समागम -“धरोहर” के अवसर पर प्रदान किया गया था। काशीकथा समूह की मासिक पत्रिका- “आग्रह” में इसे सर्वप्रथम जुलाई 2014 के अंक में प्रकाशित किया गया था।)

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