बनारस का सत्य

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कहते हैं बाकी दुनिया शेषनाग के फन पर टिकी है पर बनारस शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है। यानी बनारस बाकी दुनिया से निराला है। अपने होने के साथ ही बनारस बाबा भोलेनाथ की नगरी है। कभी-कभी मुझे लगता है शिव के व्यक्तित्व में दिखने वाली अंतर्विरोधी धाराएँ बनारस में भी मौजूद हैं। चन्द्रमा की अमृत जैसी शीतलता और अमरत्व के साथ हलाहल विष का दाह लिए अपने में मगन रहता है बनारस विरुद्धों को स्वीकारने और धारण करने की क्षमता ही बनारस को शिव की नगरी बनाती है। शिव की बूटी भांग की मस्ती यहाँ की हवा में है। जो इसे छानते हैं वे भी और जो नहीं छानते वे भी मस्ती के आलम में रहते हैं। मजे की बात यह है कि इस आलम में भी चेतना का तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहता है। बिल्कुल शिव की तरह भारत की धार्मिक सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता की ऐसी उपस्थिति शायद ही किसी दूसरे नगर में मिले। भगवान बुद्ध अपना पहला उपदेश देने यहीं आये। बुद्ध को पहले शिष्य भी यहीं मिले। जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरो में से चार यहीं हुए। बुद्ध की तरह महावीर को भी पहले शिष्य यहीं मिले। शैव और शाक्त साधनाओं का केन्द्र रहे इस शहर में वैष्णव भक्ति की धारा को विकसित होने का अवसर मिला। कबीर और रैदास जैसे संतों की वाणी बनारस के कण-कण में गूज रही है और मनुष्य की मूलभूत एकता और श्रेष्ठता का संदेश दे रही है। तुलसीदास ने राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप की लोक स्थापना यहीं रहते हुए की राम का जन्म भले ही अयोध्या में हुआ हो रामलीला बनारस से ही शुरू हुई और जन-जन में व्याप्त गयी। अघोरपंथी कीनाराम यहीं हुए। बनारस में आस्तिक और नास्तिक, निर्गुण और सगुन साथ-साथ रहते हैं।

बनारस के संगीत घराने दुनिया में प्रसिद्द हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से उठती मधुर तान बनारस के मन्दिरों में गूंजती रही है। काशी विश्वनाथ के नौबतखाने से उठी शहनाई की तान पूरी दुनिया ने सुनी। कभी बिस्मिल्लाह खान से अमेरिका चलने के लिए कहा गया। उन्होंने पूछा- वहां गंगा हैं? नहीं हैं तो मैं वहां क्यों जाएँ? सौन्दर्य और मंगल की विधायक बनारसी साड़ियाँ जिस ताने और बाने से रची जाती हैं उसमें हिन्दू और मुसलमान एकरस होकर शामिल हैं। बनारसी पान का रंग इसी ताने-बाने से जमता है. ताना-बाना बनारसी जीवन का केंद्रीय शब्द है। यह शब्द बुनकरों की दिनचर्या से निकल कर कबीर की कविता के रास्ते बनारस के जीवन में उतर आया है। ताने और बाने की तरह यहाँ के रहवासी जुड़े हुए हैं। हिन्दू मुसलमान जनता की अनगिन साझी विरासतें बनारस के जर्रे-जर्रे में समाई हुयी है।

देश के हर हिस्से से लोग बनारस आये और बनारस को अपना घर बनाया। बंगाली, मराठी, गुजराती ही नहीं तमिल कन्नड़ और मलयाली मुहल्ले बनारस में मौजूद हैं। बनारस विविध कला साहित्य संगीत के साथ परस्पर विरोधी विचारों और साधना पद्धतियों से जगमगाता रहता है। शायद इसीलिए बनारस को प्रकाश का शहर (काशी) भी कहते हैं। गंगा के अर्ध चंद्राकार किनारे पर बसे इस नगर की प्राकृतिक शोभा दुनिया को अपनी ओर आकृष्ट करती है। गंगा में पड़ती सुबह के सूरज की किरणें आज भी सुबहे बनारस का जादू रचती हैं। कहते हैं बनारस के सौन्दर्य से अभिभूत होकर कोलकाता (तब कलकत्ता) जाते समय मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ महीनों रुक गए और चिरागे दैर जैसी शानदार नज़्म बनारस को अर्ज की। इस चिरागे दैर में भी काशी के प्रकाश की अनुगूँज सुनाई देती है।

विद्या के केंद्र के रूप में बनारस युगों-युगों से जाना जाता है। महान वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगीत में बनारस को सर्व विद्या की राजधानी कहां है। स्वाधीनता आन्दोलन की सभी धाराएँ बनारस में सक्रिय रही हैं। क्रांतिकारी, समाजवादी और गांधीवादी विचारों की प्रयोगभूमि रहा है बनारस। जिस समय महामना मदन मोहन मालवीय विद्या और ज्ञान के क्षेत्र में प्रतीचि और प्राची के सुन्दर मेल की प्रस्तावना कर रहे थे लगभग उसी समय में यहाँ पर भारत माता मंदिर के रूप में राष्ट्र की अवधारणा रची जा रही थी। पुरातन और नवीन में चयन का विलक्षण विवेक बनारस को जड़ होने से बचाता है और जीवंत बनाता है। इसीलिए बनारस का इतिहास सदैव अग्रगामी रहा है। भारत विविध भाषाओं, विविध संस्कृतिओं, विविध धर्ममतों और विविध भौगोलिक विशेषताओं का देश है। यह इस देश की सबसे बड़ी पूंजी है। बनारस विविधता की इस पूंजी का प्रतिनिधित्व करता है।

बनारस का एक और पहलू है। हिंदी के महान लेखक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ‘देखी तुमरी कासी’ में बनारस को झूठे, निकम्मे, बेशर्म और डींग हांकने वाले लोगों की नगरी बताया है। प्रेम योगिनी नाटक के ‘देखी तुम्हरी कासी’ में उन्होंने बनारस के इस रूप का चित्र खींचा है। तुलसीदास भी बनारस के इस रूप से परिचित थे। तुलसीदास ने कलियुग का जो चित्र खींचा है उसका आधार बनारस का यही रूप है। कबीरदास जब साधो ये मुर्द़ों का गाँव कह रहे थे तो उनके सामने बनारस का यही रूप था। लेकिन यह भी सच है की कबीर हो, तुलसीदास हों या भारतेन्दु सब बनारस में रहते हुए बनारस की जड़ता से संघर्ष कर रहे हैं। जो कुछ मुर्दा हो चला है, जो कुछ पाखण्ड में तब्दील हो चुका है, जो बेशर्मी और नंगई है उसे चुनौती देने वाली प्रतिभाएं भी इसी बनारस में होती आई हैं। दो सर्वथा विरोधी प्रवृत्तियां हैं जो मिलकर बनारस को रचती हैं। बनारस को बनारस बनाती हैं .बनारस इन दोनों प्रवृत्तियों की संघर्ष भूमि है। बनारस में पाखंड को रचने वाली बुद्धि है तो किसी भी तरह के पाखंड को भेद कर सत्य का मर्म जान लेने वाली मेधा भी है। बनारस में लोभ और स्वार्थ की पराकाष्ठा है तो प्रसाद की गुंडा कहानी के नन्हकू सिंह की तरह प्रेम और स्वाभिमान के लिए जान कुर्बान करने का हौसला भी दिखाई पड़ता है।

बनारस में प्राचीन और नवीन के, जड़ और चेतन के बीच संघर्ष और अंतःक्रिया चलती रहती है। यह शहर जो हजारों वर्ष़ों से बना और बचा हुआ है वह केवल प्राचीन के वैभव से नहीं। यहाँ समय-समय पर नवल बसंत आता रहता है। यह नवल वसंत प्राचीन को बदलता है, उसे संवारता है, नित नूतन बनाता है। केदारनाथ सिंह अपनी बनारस कविता में कहते हैं-इस शहर में बसंत/अचानक आता है/जब आता है तो मैंने देखा है/लहरतारा या मंडुआ डीह की तरफ से/उठता है धूल का एक बवंडर/और इस महान पुराने शहर की जीभ/किरकिराने लगती है/जो है वह सुगबुगाता है/जो नहीं है वह फेकने लगता है खपचियाँ। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि केदार जी वसंतागम को लहरतारा या मडुआ डीह की तरफ से ही आता हुआ क्यों देखते हैं? कहीं उनका इशारा कबीर और रैदास की ओर तो नहीं है। कबीर और रैदास ने बनारस में एक नवता का संचार किया था। नवता जो पहले नहीं थी। कर्मकाडों के गढ़ में भक्ति आन्दोलन का होना यानी-जो नहीं है वह फेंकने लगता है खपचियाँ। कुछ लोग कहते हैं बनारस पांच हजार साल पुराना है तो कुछ लोग इसे नित्य या सनातन भी मानते हैं। बनारस की यह निरंतरता अपने को नित नूतन करने की इसी शक्ति से आती है। शिव का तीसरा नेत्र और उनका सर्व मंगला शिवत्व ही इस महान पुराने शहर का सत्य और सुन्दर है।