इस तरह धीरे-धीरे बनारस के घाटों का काल बन गया कछुआ सेंक्चुरी

बनारस के घाटों का सौंदर्य और मां गंगा का आकर्षण किसी को भी बरबस अपनी ओर खींच ही लेता है। लेकिन जब मां गंगा स्वयं अपने मूल अस्तित्व के लिए  जूझ रही हों और मनोहारी घाट और उनकी सीढ़ियां अंदर से पोले होकर टूटने लगें तो फिर ये चित्र न केवल चिंताजनक बल्कि भविष्य के डरावने सांस्कृतिक खंडहरों के भी संकेत हैं ।

बनारस में गंगा नदी कि किनारे उस पार रामनगर किले से राजघाट पुल के मध्य फैला सात किलोमीटर का क्षेत्र लगातार विवादों के घेरे में बना रहा है। अपनी अजीबो-गरीब नीतियों व शासनादेशों के माध्यम से क्षेत्रीय जनता तथा विकास के अनेक कार्यों में लगातार अड़ंगेबाजी करता यह क्षेत्र कछुआ सेंक्चुरी के नाम से जाना जाता है । जनता के हित में तमाम विकास कार्य में समय-समय पर अड़ंगेबाजी का काम इसी कछुआ सेंक्चुरी के बहाने वन विभाग करता रहा है। वह चाहे गंगा नदी में नये पुल का निर्माण हो, पक्के घाट की योजना अथवा नौका चालन या फिर शहर की कोई योजना अथवा विद्युतीकरण क्षमता बढ़ाने के लिए गंगा पार से आ रहे हाइवोल्टेज का विषय हो। जबकि  वैज्ञानिकों व नदी विज्ञान के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि कछुआ सेंक्चुरी की वजह से प्रतिबंधित हुए क्षेत्र में किसी प्रकार की गतिविधियां बन्द होने की वजह से उस पार रेती का अंबार अब पहाड़ की ऊंचाइयां छूने को बेताब होता जा रहा है। इस बदलाव की वजह से गंगा की चौड़ाई अत्यल्प बची है, इसके वजह से काशी के पक्के घाटों की दुर्दशा शुरू हो चुकी है, क्योंकि पानी सीधे घाट की सीढ़ियों के भीतर टकरा कर उन्हें पोला बनाता – ढहाता चला जा रहा है।

सूचना अधिकार अधिनियम के जरिए आर टी आई कार्यकर्ता डॉ अवधेश दीक्षित के मात्र एक आवेदन के माध्यम से कछुआ सेंक्चुरी की पूरी कहानी सामने आ गयी। मार्च 2011 में एक आर0टी0आई0 आवेदन का जवाब देते हुए अपने पत्रांक 4895/26 के माध्यम से प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा यह स्वीकार किया गया कि दोनों तटों से गंगा नदी के मध्य धारा के किनारे का सात किलोमीटर क्षेत्र कछुआ सेंचुरी के रूप में स्थित है। उर्द्ध प्रवाह सीमा में रामनगर किला से दूसरे छोर में मालवीय रेल एवं सड़क पुल तक 7 किलोमीटर में यह सीमा अवस्थित है। वहीं गंगा नदी के पूर्वी तट (रामनगर) तथा पश्चिमी तट (वाराणसी) कछुआ सेंक्चुरी की निर्धारित सीमा हं। आवेदन में वन विभाग ने यह भी जवाब दिया कि वन्य जन्तु संरक्षण अधिनियम-1972 के विविध धाराओं से कछुआ सेंक्चुरी आच्छादित है। साथ ही कछुआ वन्यजीव विहार से सम्बंधित विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन तथा नियंत्रण वन एवं पर्यावरण विभाग भारत सरकार द्वारा निर्धारित नीतियों तथा परामर्श के क्रम में वन विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित किया जाता है।
आवेदन में यह पूछा गया था कि कछुआ वन्य जीव विहार कब से घोषित है तथा अभी तक किन-किन वर्षों में कुल कितने कछुए छोड़े गये व उनकी कीमत क्या थी? इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि अधिसूचना संख्या : 4170/14-3-62/89 लखनऊ दिनांक 21-12-1989 के अनुसार वाराणसी स्थित गंगा नदी के उक्त क्षेत्र में कछुआ सेंक्चुरी की स्थापना की गयी है। कछुओं की संख्या तथा कीमत के बारे में जवाब देते हुए उन्होंने छोड़े गये कछुओं की संख्या वर्षवार तो बतायी लेकिन उसका मूल्य नहीं बताया; जबकि आवेदक की तरफ से स्वयं एक तालिका बनाकर के सम्बन्धित जानकारियां-वर्ष, छोड़े गये कछुओं की संख्या, छोड़े गये कछुओं का मूल्य के क्रम में मांगी गयी थी। जवाब देते हुए बड़े सावधानी से इन्होंने कछुओं का मूल्य नहीं बताया। छोड़े गये कछुओं का मूल्य बताने में प्रभागीय वनाधिकारी डॉ0 पी0पी0 वर्मा को क्या परेशानी थी? यह तो वही जानें लेकिन मूल्य न बताना साफ तौर पर आर्थिक भ्रष्टाचार की तरफ इंगित कर रहा है। उनके जवाब के तरीके से तो यह साफ जाहिर होता है।
कछुआ वन्य जीव विहार को स्थापित करने के पीछे महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में वन्य जीव विहार के लघु एवं सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र में स्थानीय स्तर पर कछुआ प्रजाति की भूमिका को सक्रियता प्रदान करना तथा कछुआ वन्य जीव विहार के माध्यम से सम्पूर्ण गंगा नदी के वृहद पारिस्थितिकी तंत्र को पुर्नजीवित कर चिरन्तर गतिशीलता प्रदान करना रहा है।

किसी भी जागरूक नागरिक को यह बातें निश्चित रूप से प्रसन्नता प्रदान करेंगी कि सरकार की तरफ से कछुआ वन्य जीव विहार तथा ऐसे ही अन्य प्रदूषण निवारण के लिए तमाम कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं; लेकिन इनके परिणामों के बारे में अगर आप खबर लेना चाहते हैं तो आपको धैर्य की परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि इसी आवेदन का जवाब काफी दिनों के मशक्कत के बाद वन विभाग की तरफ से प्राप्त हुआ। प्रथम अपील के बाद जागे वन विभाग के संबंधित अधिकारी ने सूचनाएँ तो भेजी लेकिन अपनी तरफ से बीमानीपूर्ण सावधानी भी बरतने का प्रयास किया। यह सावधानी अगले पृष्ठ की विवरण तालिका से स्वतः स्पष्ट है।
कछुुुआ सेेंक्चुरी के पश्चात् अभी तक जिस मात्रा में कछुओं की उपस्थिति गंगा नदी में होनी चाहिए वह नहीं है। इस बात का दावा न केवल स्थानीय लोग बल्कि दिन-रात नदी के किनारे रहने वाले मल्लाहों की तरफ से आये दिन किया जाता है। इन आरोपों की प्रमाणिकता की जड़ में जाने के लिए प्रश्न संख्या-7 के माध्यम से पूछा गया कि यदि समय-समय पर उक्त कछुआ सेंक्चुरी में विद्यमान कछुओं की गणना/आकलन का कार्य भी किया जाता है तो यह कब-कब किया गया तथा सम्बन्धित रिपोर्ट की छायाप्रति उपलब्ध करायें। इस प्रश्न का जवाब अत्यन्त ही आश्चर्यजनक और निराशा से भरा हुआ सामने आया। सरकारी उदासीनता और पर्यावरण चिंता की अवास्तविक चिंताओं को उजागर करता उसका उत्तर यथारूप प्रस्तुत किया जा रहा है- “कछुआ वन्य जीव बिहार में विभिन्न जीवों की उपस्थिति, घनत्व तथा पारिस्थितिकी तंत्र की सक्रियता एवं गतिशीलता के आकलन हेतु प्रस्तावित शोध अध्ययन कार्य किये जा रहे हैं। आँकड़े प्राप्त होने पर उपलब्ध कराया जाना सम्भव होगा।” इस प्रश्न का जवाब सरकारी उदासीनता की पोल खोलने के लिए काफी हैं।
जहाँ पर योजना शुरू होने के 28 वर्षों के बाद भी आज तक यह तय नहीं हो पाया कि कुल 50000 से ज्यादा छोड़े गये कछुओं में अभी तक ये कितनी संख्या में उपस्थित हैं? उपस्थिति की ठीक-ठीक संख्या तो छोड़िए उक्त प्रस्तावित क्षेत्र में कभी भी कछुओं का दिखायी नहीं देना पूरी योजना की उपादेयता पर बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। वहीं दूसरी तरफ अन्तिम सवाल के रूप में यह भी पूछा गया कि यदि कछुआ सेंचुरी के उद्देश्यों में प्रदूषण नियंत्रण भी है तो अभी तक गंगा नदी में इसका प्रभाव कितना पड़ा है। (इस सम्बन्ध में समय-समय पर हुए आँकलन एवं रिर्पोट की छायाप्रति उपलब्ध करायें।) पुनः इस सवाल के जवाब में उसी उत्तर को दोहराया गया जिसमें यह कहा गया था कि- ‘प्रस्ताविक शोध तथा अध्ययन का किये जा रहे हैं। आंकड़े प्राप्त होने पर ही उपलब्ध कराया जाना सम्भव होगा।’ मांगे गये एक आर0टी0आई0 आवेदन के जवाब में उस पूरी योजना के सभी पहलूओं की विफलता के फलक को खोल कर रख दिया जिसमें प्रदूषण नियंत्रण तथा पारिस्थितिकी तंत्र के उन्नयन के हजारों दावे समय-समय पर बड़े बेशर्मी के साथ किये जा रहे हैं।
कछुआ सेंक्चुरी को शुरू हुए 25 वर्ष होने के बाद भी आज तक इसका सकारात्मक नकारात्मक आकलन नहीं किया जाना केवल उदासीनता की तरफ ही नहीं बल्कि अधिकारियों की मिलीभगत से समय-समय पर सेंक्चुरी का बहाना लेकर नगर के तमाम विकास कार्यों व जनहित के कई बड़े सवालों पर अड़ंगेबाजी का एक घटिया माध्यम ही सिद्ध हो रहा है।
28 वर्षों के बाद भी जिस योजना का लाभ  ही नहीं  फिर व्यूह क्यों रचा जा रहा है?  ऐसी सूचनाओं के प्रकाश में आने के बाद पर्याप्त साक्ष्यों के साथ तमाम सक्षम अधिकारियों के समक्ष शिकायत के उपरांत भी कछुआ सेंक्चुरी का पेंडुलम अभी तक व्यवस्था के चेहरे पर बारह बजा रहा है। सुनने में आया है कि आर0टी0आई0 के सवालों के जाल में फंस चुके कछुआ सेंक्चुरी के पैरोकार अब इसे अन्यत्र स्थानान्तरित करने पर विचार कर रहे हैं। आमीन!

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