विशुद्धानंद कानन आश्रम, मलदहिया वाराणसी

वाराणसी यानी संत, महात्माओं, मनिषियों महापुरूषों की तपस्थली का केन्द्र बिन्दु। यहां ऐसे-ऐसे मनीषी हुए जो ज्ञान के अधिष्ठाता रहे हैं। काशी के इन्हीं योगियों में चमत्कारी योगी विशुद्धानंद महराज भी रहे हैं। जिन्होंने मलदहिया में विशुद्धानंद कानन आश्रम की स्थापना की। योग के विभिन्न आयामों पर सिद्धहस्त परमहंस स्वामी विशुद्धानंद महराज ने सूर्य विज्ञान को ही सृष्टि का मूल तत्व बताया है। इस परम तपस्वी संत ने न केवल सूर्य विज्ञान के रहस्य को बताया बल्कि चन्द्र विज्ञान, वायु-विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, शब्द विज्ञान, क्षण विज्ञान आदि विज्ञानों के रहस्य को खोला। विशुद्धानंद जी महराज कहा करते थे कि सहसा किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। विश्वास करने पर ठगे जाने की सम्भावना रहती है। कहते थे कि इस जगत में तुम्हारा मित्र एकमात्र तुम हो। अपने शिष्यों को शाश्वत सत्य यानी कर्म को ही ज्ञान का आधार बताते थे। विशुद्धानंद जी को कई सिद्धियां प्राप्त थी। पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के बण्डुल गांव में अखिलचंद्र चट्टोपाध्याय और उनकी पत्नी राजराजेश्वरी भगवती को 21 मार्च 1856 में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माता पिता ने अपने पुत्र का नाम भोलानाथ रखा।

बचपन से ही भोलानाथ का मन धार्मिकता की ओर रमता था। भोलानाथ अपनी माता से अति प्रेम करते थे। बचपन में एक बार भोलानाथ को पागल कुत्ते ने काट लिया। जिससे इन्हें भयानक कष्ट झेलना पड़ा। इसी दौरान गंगा तट के हुगली घाट पर एक दिन भोलानाथ को एक संत मिले। उस संत ने भोलानाथ को एक दवा पिलाई जिससे उनका शरीर फिर से स्वस्थ हो गया। भोलानाथ ने दवा देने वाले संत से दीक्षा देने को कहा तब संत ने भोलानाथ को बीज मंत्र सिखाया और उसका जाप करने का सुझाव दिया। कुछ दिनों बाद भोलनाथ अपने एक परिचित के साथ ढाका पहुंचे जहां पुनः प्राणदान देने वाले उस महापुरूष से भेंट हो गयी। महात्मा ने दोनों को अपना शिष्य बनाते हुए साथ ले लिया। उस महापुरूष के साथ दोनों लोग विन्ध्याचल पर्वत पहुंचकर मां अष्टभुजा देवी का दर्शन किया। इसके बाद करीब 12 वर्ष तक घोर साधना के जरिए भोलानाथ ने कई सिद्धियों को प्राप्त किया और तभी से विशुद्धानंद हो गये। विशुद्धानंद जी को काशी से बहुत लगाव था। उन्हें अनुलोम-विलोम सहित अन्य प्रकार के योग में निपुणता हासिल कर थी। इसके बाद विशुद्धानंद अपने शिष्यों को ज्ञान मार्ग की दीक्षा देने लगे।

विशुद्धानंद जी ने मलदहिया में अपनी कर्मस्थली बनायी। यहां पर उन्होंने विशुद्धानंद कानन आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में विशुद्धानंद जी अपने शिष्यों को योग, सूर्य विज्ञान, सहित विभिन्न विषयों की दीक्षा देते थे। साथ ही कई चमत्कार भी दिखाते थे। विशुद्धानंद जी द्वारा स्थापित यह आश्रम काफी विशाल है। आश्रम में एक ओर वह कोठरी भी है जहां विशुद्धानंद जी अपनी साधना किया करते थे। मलदहिया जैसे क्षेत्र में जहां वर्तमान में हर समय भीड़ और शोरगुल रहता है वहां इस आश्रम में असीम शांति और शीतलता रहती है। आश्रम के हरे-भरे उद्यान में हर समय चिड़ियों का कलरव मन को ताजा कर देता है। इसके मध्य में विशुद्धानंद जी का मंदिर बनाया गया है। साथ इस आश्रम में विज्ञान मंदिर जिसे सूर्य मंदिर भी कहा जाता है स्थित है। 1931 में इस आश्रम में मां नवमुंडी की भी स्थापना हुई थी। वर्तमान में यह आश्रम विशुद्धानंद जी के शिष्यों की देख-रेख में है। हर वर्ष विशुद्धानंद जी के जन्म दिवस के अवसर पर आश्रम में भण्डारे का आयोजन होता है। इस आश्रम में काफी कम लोग ही पहुंच पाते हैं। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से यहां पर कई प्रकार के नियम बनाये गये हैं। हालांकि आश्रम में जाने के लिए किसी तरह की रोक-टोक नहीं है। यह आश्रम मलदहिया चौराहे से लहुराबीर की ओर बढ़ने पर दाहिनी ओर है।

2 COMMENTS

  1. I am Virendra Nath Banerjee, living in Jabalpur-Madhyapradesh.
    I want to come at Shree Paramhans Vishudhanand Ji Ashram at Varanashi.
    IT is only for my internal religious intuition and to prey for my betterment.

    Plz give any telephonic contact details if any.

    Thanks & Regardsm

    V.N.BANERJEE
    9893036974
    JABALPUR(M.P)

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