रामनगर में मृण्मय पात्र कला

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रामनगर वाराणसी के पूर्व दिशा में गंगा नदी के उस पार बसा एक छोटा-सा कस्बा है। यह कस्बा काशीनरेश राजा बलवन्त सिंह के द्वारा बसाया गया था जो काशी की राजधानी कही जाती थी। राजा बलवन्त सिंह के समय से लेकर अब तक ये राज घराने धार्मिक विचार एवं परम्पराओं से जुड़े रहे हैं। साथ ही साथ कला-प्रेमी भी रहे हैं। राजा के कला-प्रेमी एवं धार्मिक प्रवृत्ति के कारण यहाँ की प्रजा अर्थात् समाज भी कला प्रेमी एवं धार्मिक प्रवृत्ति का ही है।

राजा बलवन्त सिंह ने अपने राज्य में अनेक कारीगरों को बसाया जिससे उनके आवश्यकता संबंधी वस्तुओं की पूर्ति उनके राज्य से हो सके। अन्य जातियों की तरह कुम्भकारों को भी यहाँ बसाया गया, जो राजा एवं समाज की आवश्यकता संबंधी वस्तुओं का निर्माण करते रहे। उदाहरण के तौर पर आज भी रामनगर के किले में लगी घड़ी और ताले प्रसिद्ध हैं। रामनगर की मृण्मय पात्र- कला भी काफी उन्नत तरह की रही। पात्रकला के अलावा अन्य कलायें जैसे- म्यूरल, पेंटिंग, पोटेट, हाथी दांत का काम, स्फटिक के काम काफी सराहनीय रहे हैं। राज्य बिखर गया, जमींदारी खत्म हो गयी लेकिन धार्मिक परम्परायें आज भी जीवित हैं। जो राज घराने से लेकर समाज तक फैली हुई हैं। आज रामनगर में कुम्भकारों की बस्तियाँ छिटपुट, इधर-उधर बिखरी पड़ी है। रामनगर थाने के पीछे लगभग दस घरों की कुम्भकारों की बस्ती है, जो एक ही परिवार से सम्बंधित है। ये लोग लगभग पाँच पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं। सम्भवतः इनके पूर्वज किसी दूसरे स्थान से आये थे। ये जाति के कन्नौजिया कुम्भकार हैं। इसके अलावा इनकी बस्ती रामपुर लोहरा की पोखरी के पास एवं सगरा नामक स्थान में है। ये लोग भी जाति के कन्नौजिया कुम्भकार हैं। इनका एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध एवं रिस्तेदारी भी है। इससे यह ज्ञात होता है कि इन कुम्भकारों का मुख्य स्रोत एक ही जगह से रहा है। ये लोग भी पाँच-छः पीढ़ियों से पहले यहीं पर रह रहे है। इनके पूर्वज मुगलसराय, अलीनगर से आये ।

रामनगर की अन्य कलाओं के साथ-साथ पात्र निर्माण कला भी विकसित रही क्योंकि यहाँ के कुम्भकारों को अच्छी मिट्टी गंगा के कछार से आसानी से मिल जाती थी। कछार होने के कारण मिट्टी लचीली एवं साफ होती है। लेकिन आज-कल यहाँ के कुम्भकार लोग गंगा की मिट्टी के अलावा सगरा नामक स्थान की एक पोखरी से भी मिट्टी खोदकर लाते हैं जो कार्योपयोगी है। यहाँ के कुम्भकार परम्परागत पत्थर की चाक, गाँधी आश्रम की चाक एवं विद्युत की चाक पर कार्यरत हैं। ये लोग पात्रों के अलावा मिट्टी के खिलौने, मुखौटे, गणेश-लक्ष्मी, पोटेट, छोटी-मोटी प्रतिमायें भी बनाते हैं। यहाँ के कुछ कुम्भकार पात्र जैसे पुरवा एवं अन्य दैनिक जीवन से संबंधित पात्रों का निर्माण ज्यादातर करते हैं जिससे रोजाना खर्च की पूर्ति करते हैं। इसके अलावा ये लोग गगरी, कसोरा, सुराही, गमला, कोहा, गुल्लक, बट्टा, कछरा, चीलम, गौरैया, हाड़ी, दीया, लभनी, नाट, कोही, दुधहड़ी, मेटी आदि दैनिक जीवन की उपयोगी पात्रों का निर्माण करते हैं अर्थात् तीज-त्योहारों के मुताबिक काम करते हैं जैसे-गर्मी के दिनो में सुराही, घड़ा, लभनी इत्यादि और जाड़े के दिनो में पुरवा, दीया, परयी, हाड़ी आदि बनाते है तथा मेले जैसे- दशहरा, दीपावली, कृष्ण जन्माष्टमी के समय खिलौने मुखौटे, गणेश लक्ष्मी भी बनाते हैं।

यहाँ के कुम्भकार दैनिक जीवन के उपयोगी पात्रों के साथ ही साथ तीज-त्योहारों, पूजा, धार्मिक अनुष्ठानों पर उपयोग में आने वाले पात्रों का भी निर्माण करते हैं।

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