टी0 आर0 वी0 मूर्ति

तिरुपत्तूर रामशेषय्यर वेंकटाचलमूर्ति का जन्म 15 जून 1902 को एक संस्कारयुक्त कुलीन मध्यम वर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। बालक मूर्ति का पारिवारिक परिवेश जीवन में सत्य, निष्ठा देशभक्ति एवं विद्या के प्रति सचेष्ट अन्तःज्योति को दीप्त करने में सहायक रहा। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पहले तिरुपत्तूर में तथा बाद में तिरुचिरापल्ली में हुई जहां उन्हेंने बिशप हीबर कालेज में प्रारम्भिक स्नातकीय अध्ययन किया। महात्मा गांधी द्वारा संचालित होम रूल आन्दोलन में युवावस्था (17-18 वर्ष की अवस्था) में ही शामिल हो जाने के कारण उनकी कालेज की शिक्षा बाधित हुई इस आन्दोलन का एक अंश ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित कालेजों, कचहरियों एवं अन्य सरकारी सेवाओं का बहिष्कार था। कालेज छोड़कर युवक मूर्ति तथा उनके अग्रज गोविन्दराज शर्मा लगभग 2000 मील की पदयात्रा कर उत्तर भारत आये, जहां श्री वेंकटाचलमूर्ति ने शिक्षा के दूसरे चरण में प्रवेश किया। गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार के राष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में उनके एक वर्ष के निवासकों, उनके परवर्ती संस्कृत अध्ययन का प्रशिक्षु काल कहा जा सकता है।

    1925 में श्री मूर्ति ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। तत्कालीन स्वातंत्र्य आन्दोलन के अग्रणी नेता पण्डित मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्वयं भारतीय राष्ट्रीयता आन्दोलन की उपज थी और काशी तो हिन्दू शास्त्रों के अध्ययन का प्रसिद्ध पीठ था ही जो संस्कृत विद्या एवं व्याकरण से जुड़े देश के शीर्षस्थ विद्वानों को मंच प्रदान करता था। गवर्नमेंट संस्कृत कालेज, बनारस इस कथन की सत्यता का जीवन्त प्रमाण था।

    1927 में प्रोफेसर मूर्ति ने हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं दर्शन के साथ बी0ए0 तथा 1929 में दर्शन में एम0ए0 की उपाधि प्राप्त की। 1929 में ही प्रोफेसर मूर्ति ने संस्कृत कालेज से वेदान्त में शास्त्रों की परीक्षा, 1941 में व्याकरण में आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। संस्कृत कालेज में उन्हें पण्डित बालकृष्ण मिश्र, पण्डित कालीप्रसाद मिश्र तथा पण्डित देवनारायण तिवारी जैसे उद्भट विद्वानों से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। 1948 में प्रोफेसर मूर्ति को उनके शोध प्रबन्ध ‘माध्यमिक डायलेक्टिक’ के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की शीर्षस्थ उपाधि डी0लिट से अलंकृत किया गया।

    भारतीय दर्शन के ‘विचारक’ के रूप में प्रोफेसर मूर्ति के निर्माण में मुम्बई के समीप अमलनेर के इन्स्टिट्यूट ऑफ फिलास्फी’ में 1926-36 तक प्रारम्भ में फेलो तथा बाद में संकाय के सदस्य के रूप में व्यतीत किये गये सात वर्ष विशेष महत्व के थे। यह संस्थान अपने ढंग का अकेला था जिसका स्पष्ट उद्देश्य वेदान्त के रुझान के साथ सर्जनात्मक दार्शनिक चिन्तन को विकसित एवं प्रोत्साहित करना था। फिलासोफिकल ‘क्वार्टरली’ इस संस्थापक एक अंग था। यह पत्रिका बीसवीं शती के तीसरे चौथे एवं पांचवें दशकों में मौलिक भारतीय दार्शनिक निबन्धों को प्रकाशित करने वाली एकमात्र पत्रिका थी।

    17 मार्च 1986 को 84 वर्ष की अवस्था में इस युगपुरुष का देहावसान उनके वाराणसी स्थित गृह में हुआ।

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