ऐसे लगा सत्यजीत राय को बनारसीपन का चस्का …

सदियों से बनारस में अलग-अलग क्षेत्र के महान व्यक्तियों का निवास और उनके ऊपर बनारस का प्रभाव रहा है। उनके संस्मरणों, रचित गद्य एवं काव्य के द्वारा हमें बनारस के प्रति उनका लगाव और उनके ऊपर बनारस का प्रभाव समझ में आता है। यह क्षेत्र बहुत विस्तृत है। इसमें धार्मिक, राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र के अनेक मनीषियों का वर्णन हमें मिलता है। इसी कड़ी में सत्यजीत राय एक महत्वपूर्ण हस्ती हैं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर एक गरिमामय स्थान पर प्रतिष्ठित किया है।

उनके द्वारा रचित कहानियों तथा सिनेमा निर्माण के संस्मरणों पर जब गहनता से विचार करते हैं तो देखते हैं कि बनारस शहर ने उनको किस प्रकार से प्रभावित किया था।

उनका सर्वप्रथम बनारस आगमन ‘पाथेर पांचाली’ सीरीज की फिल्म ‘ओपुर संसार’ की शूटिंग के दौरान हुआ था। उस समय वे कितने दिन बनारस आकर रहे इसकी सही जानकारी तो उपलब्ध नहीं है परन्तु उसी पल उनके मन में बनारस की अमिट छाप पड़ी थी। क्योंकि इसके करीब 22 साल बाद वे ‘जय बाबा फेलूनाथ’ की शूटिंग के दौरान करीब 16 दिन यहीं रहे।

सत्यजीत राय ने अपनी दो फिल्मों में बनारस की पृष्ठभूमि का उपयोग किया था। ‘ओपुर संसार’ फिल्म में बनारस की गलियों एवं घाटों का चित्रण किया गया था। उस समय उनके मन में बनारस की अलग-अलग विशेषताओं का जो प्रभाव पड़ा उसका उपयोग उन्होंने बनारस पर अपनी दूसरी फिल्म ‘जय बाबा फेलूनाथ’ में किया।

सत्यजीत राय की फिल्मों को देखें तो हम पाएंगे कि उन्होंने शुरूआत में बनारस के रिक्शों और बनारस की गलियों का बहुत ही खूबसूरत चित्रण किया है। वे बनारस स्थानीय भित्ति चित्र से बहुत प्रभावित थे। उन्हेंने अपनी किताब ‘एकेई बोले’ शूटिंग के ‘फेलूदार शंगे काशी ते’ में उल्लेख किया है कि पिछली बार जब वे बनारस आए थे, उस समय यहां के स्थानीय कलाकारों के भित्ति चित्रों में जो पैनापन था वह अब कम दिखाई पड़ता था। यहां के अलग-अलग दरवाजों के बगल में बने हुए भित्ति चित्रों के अलग-अलग विषय-वस्तु, जैसे कि गणेश जी, दोनों तरफ बने हुए सिपाही, तोता, खरगोश, मछली आदि का वर्णन उन्होंने बनारस की लोककला के एक प्रमुख आकर्षण के रूप में किया है और इसका उपयोग उन्होंने अपनी फिल्म ‘जयबाबा फेलूनाथ’ में किया है। इसका उदाहरण है कि फिल्म में खलनायक के घर के दरवाजे के दोनों तरफ सिपाही और उसके बजड़े पर अलग-अलग फूल-पत्तियों के नक्शे बनाए गए हैं।

सत्यजीत राय ने अपनी फिल्म ‘जयबाबा फेलूनाथ’ में बनारस का एक प्रमुख आकर्षण, यहां की मिठाई दिखाई है। जलेबी और पेड़े का जिक्र उन्होंने फिल्म में श्रीराम भंडार से मिठाई खरीदते हुए दिखाकर किया है। इसके अलावा बनारस के सांड़ों को भी उन्होंने अपनी फिल्म में जगह दी। दुर्भाग्यवश रील खराब हो जाने से शूटिंग का यह अंश फिल्म में दिखाया नहीं जा सका। इसका उल्लेख उन्होंने अपनी किताब ‘एकेई बोले शूटिंग’ में किया है।

‘ओपुर संसार’ फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्होंने ख्याल किया कि दरभंगा घाट पर जो बुर्ज है उस पर सैकड़ों कबूतर रहते हैं और उनको अक्सर लोग वहां पर दाना खिलाते हैं और कभी एकाएक तेज आवाज होने पर वे कबूतर एक साथ उड़ जाते हैं। 22 साल बाद वह बनारस में ‘जयबाबा फेलूनाथ’ की शूटिंग कर रहे थे तो इस दृश्य का भी उन्होंने अपनी फिल्म में उपयोग किया था। इसके अलावा बनारस के घाटों की अपनी एक मौलिक विशेषता, जो यहां के छतों के रूप में इनका उपयोग उन्होंने अपनी फिल्मों में किया है। सत्यजीत राय ने बनारस की पृष्ठ भूमि पर एक पुस्तक जय बाबा फेलूनाथ तथा दो कहानियां (गोपाली मुक्तोर रहस्य और मृगांक बाबूर घटना) लिखी। ‘मृगांक बाबूर घटना’ कहानी उनके कहानी संग्रह ‘आबार बारो’ में प्रकाशित हुई। इसके अलावा उनकी पुस्तक एकेई बोले शूटिंग में बनारस पर एक प्रबन्ध है।

बनारस पर इनकी पहली पुस्तक जयबाबा फेलूनाथ है। ‘जयबाबा फेलूनाथ’ बनारस की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर रचा गया किशोर उपन्यास है। इसके बाद की दोनों कहानियां- ‘गोलापी मुक्तोर रहस्यो’ एक ‘मृगांक बाबू की घटना’ में बनारस की कहानी के प्रमुख घटनास्थल के रूप में दर्शाया गया है। ‘जयबाबा फेलूनाथ’ पुस्तक में लेखक के अनुसार बनारस शहर का अपना एक अलग मिजाज है। यही वह शहर है जो इतिहास में सबसे प्राचीनतम शहर के रूप में अभी भी जीवित है। इस शहर पर अलग-अलग सभ्यताओं का अलग-अलग प्रभाव पड़ा है। इसकी जीवन यात्रा में हमें उन सभी प्रभावों का अंश देखने को मिलता है। इसलिए इस शहर का अपना एक प्रभाव और स्वभाव है।

लेखक किसी भी किताब में अपनी सोच को अपने पात्रों के द्वारा व्यक्त करता है। इससे मालूम पड़ता है कि सज्यजीत राय की बनारस के प्रति सोच क्या थी। एक फिल्म निर्देशक के रूप में सत्यजीत राय बनारस में दो बार घूमे थे। कोई भी निर्देशक किसी भी शहर को अपने निर्देशन की दृष्टि से और अपने पात्रों के जीवन के रोमांचकारी एवं साधारण घटनावली की पृष्ठभूमि के रूप में देखते हैं। परंतु बनारस ही एक ऐसा शहर है जहां आंख, कान और नाक तीनों का प्रयोग होता है तथा तीनों के अलग-अलग दृश्य, गंध एवं श्रव्य उपादान मिलते हैं। इसका बहुत अच्छा उदाहरण ‘जयबाबा फेलूनाथ’ में फेलूदा के द्वारा गोदौलिया से घाट तक बनारस के बारे में दी गयी टिप्पणी में मिलता है। गोदौलिया चौराहे के बारे में वे कहते हैं कि ऐसा विविधतापूर्ण चौराहा बहुत ही कम मिलता है। यहां पर रिक्शा, गाय, साइकिल, एक्का और तांगे की गुत्थमगुत्थी जैसा नजारा कम ही कहीं नजर में आता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इतना कुछ होते हुए भी और आपस में धक्का-मुक्की लगने के बाद भी लोग निर्विकार चित्त से आगे बढ़ते चले आते हैं जैसे इस धक्का-मुक्की और शोर-शराबे का कोई असर ही न हुआ हो।

श्रव्य माध्यम का यहां पर यह मजा है कि लोगों की हल्की-फुल्की बातें भी कोलाहल का रूप ले लेती हैं। साथ ही साथ अलग-अलग गाड़ी, रिक्शा, साइकिल आदि की घंटियों के साथ अलग-अलग दुकानों से बजने वाले ट्रांजिस्टर से फिल्मी गीत सभी मिलकर एक अलग ही समां बांधते हैं। इसके बाद जब हम विश्वनाथ गली में प्रवेश करते हैं; तो दृश्य एवं श्रव्य के साथ-साथ अब गंध भी जुड़ जाती है, जैसे फूल-माला, सेंट, इत्र चंदन, अगरबत्ती की खुशबू साथ में पीसने, सड़ी हुई फूल-माला  एवं साथ-साथ चलती हुई गायों के शरीर की गंध मिलकर एक अलग ही बनारसी खुशबू का निर्माण करती है जो सिर्फ इसी जगह उपलब्ध है। इसका वर्णन उन्होंने पुनः अपनी किताब ‘गोलापी मुक्तोर रहस्यों में किया है। विश्वनाथ गली से जब हम निकलते हैं तो घाट तक हमें दृश्य-श्रव्य तो मिलता है परंतु किसी विशेष प्रकार की महक नहीं मिलती। यहां हमें मिलती है घाट पर पहुंचने पर जहां फूल-माला, अगरबत्ती, धूप, गली मिट्टी और पानी की खूशबू के साथ-साथ वहां विचरण करने वाले सांड़ों के शरीर की सुगंध एक अलग ही गंध का निर्माण करती है। यह सिर्फ बनारस के घाट पर ही उपलब्ध है। इससे समझ में आता है कि सत्यजीत राय ने बनारस के इन क्षेत्रों का कितनी बारीकी से अध्ययन किया था।

इसी पुस्तक में एक वर्णन और है जो कि बनारस की गलियों के बारे में है। इसमें जगमोहन बाबू कहते हैं “अरे फेलू बाबू आपने तो गंध, दृश्य, श्रव्य की बात कही, परंतु तापमान के बारे में कुछ नहीं कहा क्योंकि यहां लग रहा है कि बाहर सड़क की अपेक्षा गलियों का तापमान चार डिग्री कम है।” इसके साथ ही साथ बनारस की प्रमुख गलियों से होते हुए जब संकरी गलियों में जाते हैं तो वहां सिर्फ मंदिरों के घंटों की आवाज के अलावा या अलग-बगल के मकानों से आती हुई हल्की आवाजों के अलावा और कोई आवाज नहीं मिलती।

उन्होंने यह जो सड़कों और गलियों के गुणों के अंतर का वर्णन किया है इसी से समझ में आता है कि अलग-अलग विषयों पर वे कितना सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। इसका प्रयोग उन्होंने सिनेमा के निर्देशन के क्षेत्र में हो, या लेखन के क्षेत्र में-बहुत ही बारीकी से किया है। इसके अलावा जयबाबा फेलूनाथ पुस्तक में ही बनारस के भित्ति चित्रों के बारे में सत्यजीत राय ने पुस्तक के हीरो से यह कहलवाया है कि यह बनारस की अपनी एक लोककला है जो शादी-विवाह के अवसर पर दिखती है।

‘फेलूदार संगे काशी तो’ (फेलू दा के साथ बनारस में) में उन्हेंने बनारस के अलग-अलग घाटों के बारे में संक्षिप्त विवरण दिया है। इसके पहले उन्होंने लिखा है कि बनारस जैसे घाट और गली विश्व में कहीं नहीं हैं। बनारस के अलग-अलग घाटों के बारे में वर्णन करते हुए उन्होंने कहा है कि हरिश्चंद्र घाट, महाराजा हरिश्चंद्र के लिए विश्व विख्यात है और यह बनारस के दो महाश्मशानों में एक है। तुलसी घाट पर बैठकर तुलसीदास जी ने रामायण की रचना की थी। चेत सिंह घाट से बनारस का इतिहास जुड़ा हुआ है। यहां पर वारेन हेस्टिंग्स के साथ महाराज चेत सिंह की लड़ाई हुई थी। दशाश्वमेध घाट के साथ यह धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है कि यहां पर ब्रह्मा जी ने दस बार अश्वमेध यज्ञ किया था। इसके बगल में मान मंदिर घाट है जहां पर जयपुर के प्रतिष्ठाता महाराज जय सिंह ने दिल्ली के जंतर-मंतर की तरह यहां भी खगोलशास्त्रीय का निर्माण करवाया था।

दशाश्वमेध घाट पर दुर्गाजी के विसर्जन का उन्होंने बड़ा ही अच्छा वर्णन अपनी किताब जयबाबा फेलूनाथ में किया है। इसके अलावा घाटों के बारे में उनका एक जोरदार वक्तव्य यह है कि उन्हेंने लोगों को वहां करीब एक सौ पैंतीस तरह के कार्य करते हुए देखा। उसमें पंडों द्वारा टीका लगाने से लेकर साधुओं के गांजा में दम लगाने और विदेशियों द्वारा बैठकर पीड़िंग-पीड़िंग कर सितार बजाने तक हैं।

 अपनी छोटी कहानी ‘मृगांको बाबूर घटना’ (मृगांक बाबू की घटना) में और जयबाबा फेलूनाथ में उन्होंने बनारस के घाटों एवं दुर्गामंदिर में बंदरों के उत्पात का भी चित्रण किया। जयबाबा फेलूनाथ में एवं फेलूदार संगे काशी ते (फेलू दा के साथ बनारस में) उन्होंने बनारस के पान के बारे में और यहां की कचौड़ी गली में कचौड़ी के बारे में भी जानकारी दी है।

बनारस ने अपने अलग-अलग कालखंडों में विश्व के, एवं अपने देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, धर्माचार्यो, कलाकारों आदि को प्रभावित किया था, जिसका प्रमाण हमें इस रूप में मिलता है कि या तो वे बनारस के होकर रह गए या उनके दिल-दिमाग में बनारस की अपनी एक अलग पहचान का सृजन हो गया। सत्यजीत राय के ऊपर भी बनारस ने अपनी एक अमिट छाप छोड़ी थी। इसका प्रमाण हम उनके द्वारा लिखित पुस्तकों, एवं उन्हीं पुस्तकों पर आधारित फिल्मों के निर्देशन के रूप में देखते हैं।

अजय रतन बनर्जी

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