इसलिए कहते हैं- काशी को प्राचीनतम नगरी

वाराणसी भारतीय इतिहास एंव संस्कृति का एक प्रतिनिधि शहर है। यह काशी महाजनपद की राजधानी के रूप में ख्यात् था। काशी का उल्लेख विविध संदर्भ में वैदिक काल से ही मिलने लगता है, परन्तु इसके पुरातात्विक अध्ययन का प्रारम्भ 18 वीं शताब्दी के अन्त से प्रारम्भ होता है। जिसके परिणामस्वरूप अब तक वाराणसी क्षेत्र में अनेक पुरास्थलों की खोज कर उत्खनन किया जा चुका है। इनमें सारनाथ, राजघाट, सरायमोहाना, अकथा, आशापुर, तिलमापुर, कोटवॉ, रामनगर, अनेई व शूलटंकेश्वर प्रमुख हैं। इन स्थलों के उत्खनन से प्राप्त पुरासामग्रियों से काशी के सांस्कृतिक स्वरूप पर व्यापक प्रकाश पड़ता है। इनमें से वाराणसी के दो प्रमुख स्थलों का सम्यक् विवरण प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

सारनाथ-

सारनाथ बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ-स्थलों में से एक है। यहाँ गौतम बुद्ध ने सम्बोधि प्राप्ति के पश्चात् प्रथम धर्मोपदेश देकर धर्मचक्र का प्रवर्त्तन किया था । दीघनिकाय के महापरिनिब्बानसुत्त में बुद्ध ने बौद्ध धर्मानुयायियों हेतु चार दर्शनीय और संवेजनीय (वैराज्ञप्रद) स्थान बताया है – जहाँ तथागत उत्पन्न हुए (लुम्बिनी), जहाँ तथागत ने अनुत्तर सम्यक्-सम्बोधि को प्राप्त किया (बोधगया); जहाँ तथागत ने अनुत्तर (श्रेष्ठ) धर्मचक्र का प्रवर्तन किया (सारनाथ) और जहाँ तथागत अनुपादिशेष निर्वाण-धातु को प्राप्त हुए (कुशीनारा)।

पालि साहित्य में सारनाथ को ‘इसिपतनमिगदाय’ नाम से अभिहित किया गया है और इसे वाराणसी का एक अंग माना गया है। वाराणसी तथा इसिपतन मिगदाय का उल्लेख साथ-साथ प्राप्त होता है, यथा- ‘एकंसमय भगवा बाराणासियं विहरति इसिपतनेमिगदाये’; ‘स वाराणसीनगरीमुपनिश्रित्य विहरति ऋषिवदने (पतने) मृगदावे’ । संस्कृत ग्रन्थों में इसका नाम ‘ऋषिपत्तन’, ‘मृगदाय’, ‘ऋषिपतन मृगदाव’, ‘ऋषिवदनमृगदाव’, ऋषिपत्तनमृगदाय’ आदि प्राप्त होता है । ‘इसिपतन मिगदाय’ नामकरण के विषय में बुद्धघोष का मत है कि इस स्थान पर ऋषि (इसि) लोग हिमालय से वायु मार्ग से आते हुए उतरते थे (पतन), इसलिए यह ‘इसिपतन’ कहलाता था और मिगदाय (मृगदाव) यह इसलिए कहलाता था, क्योंकि यहाँ एक सुरम्य उद्यान (दाव) था, जहाँ मृगों को अभयदान दिया गया था, यहाँ वे स्वच्छन्द होकर विचरते थे ।

गौतम बुद्ध ने धर्मचक्रप्रवर्तन के पश्चात् प्रथम वर्षावास सारनाथ में ही किया था और वाराणसी के श्रेष्ठी पुत्र यश तथा उसके चार मित्रों विमल, सुबाहु, पूर्णजित व गवांपति की प्रव्रज्या यहीं हुई । बुद्ध अपने जीवनकाल में अनेक बार यहाँ आये थे और धर्मोपदेश दिया था। अनेक सुत्तों, यथा – धम्मचक्कपवत्तन सुत्त, अनन्तलक्खणसुत्त, घटिकारसुत्तन्त, सच्चविभंगसुत्तन्त, पाससुत्त, पंचवग्गियसुत्त और धम्मदिन्नसुत्त आदि का उपदेश यहीं दिया था ।

पॉचवीं सदी ई. में फाह्यान ने सारनाथ की यात्रा की थी। वाराणसी नगर से 10 ‘ली’ उत्तर-पूर्व दिशा में चलकर चीनी यात्री ऋषिपत्तन मृगदाव में आया था और उसने यहाँ पर कुल दो संघाराम तथा चार स्तूप का उल्लेख किया है ।

एक स्तूप उस स्थान पर निर्मित था, जहाँ बुद्ध के पाँच पूर्व साथियों ने उनके सारनाथ आगमन पर उठकर अभिवादन किया था। ये पाँच साथी धर्मचक्र-प्रवर्तन के बाद पंचवर्गीय भिक्षु कहलाये। इस स्तूप से उत्तर दिशा में लगभग 60 पग की दूरी पर एक अन्य स्तूप का उल्लेख फाह्यान ने किया है। यह उस स्थान पर स्थित था, जहाँ बुद्ध ने कौण्डिन्य और उनके चार अन्य साथियों को प्रथम धर्मोपदेश देकर ‘धर्मचक्र’ का प्रवर्त्तन किया था । इस स्तूप से उत्तर दिशा में 20 पग की दूरी पर एक अन्य स्तूप का भी उल्लेख प्राप्त होता है। यह उस स्थान पर निर्मित था, जहाँ बुद्ध ने मैत्रेय के भावी बुद्ध होने की भविष्यवाणी की थी। पुनः इस स्तूप से दक्षिण दिशा में लगभग 50 पग की दूरी पर एक और स्तूप था, जहाँ ‘एलापत्र’ नामक नागराज ने बुद्ध से अपने निर्वाण का समय पूछा था। फाह्यान के आगमन के समय मृगदाव में दो संघाराम थे, जिसमें भिक्षु निवास करते थे ।

सातवीं सदी ई. में ह्वेनसांग सारनाथ आया था। उसने अपने यात्रा वृत्तान्त में यहाँ का विस्तृत विवरण दिया है । ह्वेनसांग ने वाराणसी नगर से उत्तर-पूर्व दिशा में 10 ‘ली’ की दूरी पर, वरुण नदी के पश्चिमी तट पर मृगदाव वनविहार का उल्लेख किया है।

मृगदाव वनविहार आठ खण्डों में विभक्त था, जो एक ही प्राचीर से घिरा था। प्राकार के मध्य में लगभग 200 फीट ऊँचा एक विहार था, जिसकी नींव तथा सीढ़ियाँ पत्थर की बनी थीं, जबकि ऊपरी भाग इंZटों से निर्मित था। इसमें सैकड़ों ताखे बने थे, जिनमें बुद्ध की सुवर्णमण्डित प्रतिमाएँ स्थापित थीं। विहार के मध्य में धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध की ताम्र प्रतिमा स्थापित थी, जो तथागत के काय-प्रमाण की थी

इस विहार के दक्षिण-पश्चिम दिशा में अशोक निर्मित एक भग्न स्तूप था, जिसकी ऊँचाई 100 फीट से अधिक थी। स्तूप के सामने एक प्रस्तर स्तम्भ था। इसकी ऊँचाई 70 फीट थी तथा यह स्फटिक की तरह स्निग्ध और चमकीला था। यह स्तम्भ धर्मचक्रप्रवर्तन स्थल पर स्थापित किया गया था ।

प्रस्तर स्तम्भ के समीप एक स्तूप था, जहाँ अज्ञात कौण्डिन्य आदि ने ध्यान किया था। इसके समीप एक अन्य स्तूप उस स्थान पर बना था, जहाँ 500 प्रत्येक बुद्धों ने एक साथ निर्वाण प्राप्त किया था। यहाँ तीन और स्तूप उन स्थानों पर बने थे, जहाँ पूर्व के तीन बुद्ध बैठते व चङ़्क्रमण करते थे। इस स्थान के निकट ही एक और स्तूप उस स्थान पर बना था, जहाँ मैत्रेय बोधिसत्व को बुद्ध ने भावी बुद्ध बनने की भविष्यवाणी की थी। इसके अतिरिक्त प्राचीर के भीतर अनेक पूजनीय स्थल थे ।

ह्वेनसांग ने संघाराम की प्राचीर के बाहर, पश्चिम दिशा में एक सरोवर का उल्लेख किया है। 200 पग की परिधि वाली इस पुष्करिणी में बुद्ध स्नान करते थे। इसके पश्चिम दिशा में 180 पग घेरे वाला एक सरोवर था। इस सरोवर से उत्तर दिशा में एक और तालाब था, जिसकी परिधि 150 पग थी। इसमें बुद्ध अपना वस्त्र धोते थे। इस प्रकार तीन सरोवरों का विवरण ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तान्त में प्राप्त होता है इसके अतिरिक्त कई अन्य स्तूपों का उल्लेख भी प्राप्त होता है, जो सारनाथ की विभिन्न घटनाओं से सम्बन्धित थे।

मृगदाय संघाराम से 2-3 ‘ली’ दक्षिण-पश्चिम दिशा में 300 फीट से अधिक ऊँचा एक स्तूप था। स्तूप का अधिष्ठान चौड़ा और ऊँचा था, जिसे विभिन्न प्रकार के रत्न अभिप्राय उकेर कर अलंकृत किया गया था । मृगदाय विहार से पूर्व दिशा में 2-3 ‘ली’ की दूरी पर अन्य स्तूप का उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। इसके समीप एक सूखा कुण्ड भी था, जिसकी परिधि 80 पग थी। इस कुण्ड को ‘प्राणपरित्राणकुण्ड’ तथा ‘शूरवीरकुण्ड’ के नाम से जाना जाता था ।

इस प्रकार ह्वेनसांग ने सारनाथ में प्राचीर के अन्दर आठ स्तूप, एक अशोक स्तम्भ तथा एक चङ़्क्रमण स्थल का विवरण दिया है। प्राचीर के बाहर तीन सरोवर तथा तीन स्तूपों का उल्लेख किया है। संघाराम की परिधि से लगभग 3 ‘ली’ के परिक्षेत्र में स्थित चार स्तूप तथा दो कुण्डों का भी उल्लेख किया है ।

पुरातात्विक अन्वेषण

सारनाथ (उ.अ. 25022श्; पू.दे. 83001श्) उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित है। सारनाथ के बौद्ध अवशेष नगर के उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग 3) मील की दूरी पर स्थित है ।

सारनाथ के ऐतिहासिक महत्व को प्रकाश में लाने का श्रेय सर्वप्रथम जोनाथन डंकन को जाता है, उन्होंने अपने विवरण में जगत सिंह द्वारा 1794 ई. में प्राप्त संगमरमर की मंजूषा व अस्थि अवशेष आदि का उल्लेख किया। 1815 ई. में कर्नल सी. मैकेन्जी ने सारनाथ का सर्वेक्षण किया।

सारनाथ का पुरातात्विक उत्खनन सर्वप्रथम 1834-35 ई. में जनरल कनिंघम द्वारा किया गया। इन्होंने धर्मराजिका स्तूप, चौखण्डी स्तूप, धमेक स्तूप तथा मंदिर का उत्खनन करवाया और काफी संख्या में प्रस्तर मूर्तियाँ तथा उत्कीर्ण प्रस्तर खण्ड प्राप्त किया । 1851-52 ई. में मेजर किट्टो के अन्वेषण के फलस्वरूप धमेक स्तूप के पास अपेक्षाकृत छोटे स्तूप व विहार के अवशेष प्रकाश में आये। तत्पश्चात् ई. थामस, एफ.ई. हॉल तथा 1865 ई. में सी.हॉर्न ने अन्वेषण कार्य को आगे बढ़ाया।

बीसवीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा करवाये गये उत्खनन से मौर्यकाल से प्रारम्भ कर पूर्व-मध्यकाल तक के पुरावशेष प्रकाश में आये। 1904-05 ई. में सारनाथ का विस्तृत उत्खनन एफ.ओ.ओर्टल ने करवाया। इस उत्खनन से मुख्य मंदिर के अवशेष, अशोक स्तम्भ, सिंह शीर्षक और बड़ी संख्या में मूर्तियाँ तथा अभिलेख प्राप्त हुए । तत्पश्चात् 1906-08 ई. में जॉन मार्शल के निर्देशन में सारनाथ का उत्खनन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप इस पुरास्थल की भौगोलिक सीमा पर प्रकाश पड़ा तथा अनेक छोटे स्तूप, मंदिर, मूर्तियाँ व उत्कीर्ण शिल्पों के साक्ष्य प्राप्त हुए । 1914-15 ई. में एच. हारग्रीब्स ने मुख्य मंदिर के आस-पास के उत्खनन से मौर्यकाल से पूर्व-मध्यकाल तक के अवशेष प्राप्त किए। इसमें कुमारगुप्त व बुधगुप्त के समय की अभिलेख युक्त मूर्तियाँ तिथि की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हैं । यद्यपि 1919-20 ई. में भी उत्खनन कार्य हुआ; परन्तु दयाराम साहनी द्वारा 1921-22 ई. में करवाये गये उत्खनन से मुख्य मंदिर के पूर्वी प्रांगण, संकल्पित स्तूपों के अतिरिक्त गुप्तकालीन स्तूप का अधिष्ठान, हारिति का मंदिर व पूर्वी द्वार के बाहर जलकुण्ड आदि विशेष उल्लेखनीय है । 1927-28 ई. में रामप्रसाद चन्द ने अशोक स्तम्भ के पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम से मौर्यकालीन अवशेष प्राप्त किये ।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा सारनाथ में सीमित स्तर पर उत्खनन तथा संरक्षण का कार्य हुआ। सन् 1963-64 ई. के उत्खनन से संकल्पित स्तूपों में स्थापित बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई, जो शैलीगत विशेषता के आधार पर गुप्त व गुप्तोत्तर कालीन स्वीकार की जाती है । पुनः सारनाथ में 1992-93 ई. में ए.के. सिन्हा द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया, जिससे सारनाथ की प्राचीनता तृतीय-चतुर्थ शताब्दी ई.पू. निर्धारित हुई ।

सारनाथ के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर यहाँ की प्राचीनता चतुर्थ शताब्दी ई.पू. तक प्रमाणित हुई है, परन्तु सारनाथ के समीप स्थित अकथा के उत्खनन से सारनाथ व वाराणसी की प्राचीनता ई.पू. 1200 तक प्रमाणित । अकथा पुरास्थल वाराणसी जिला मुख्यालय से लगभग 3 किमी. उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। पुरास्थल के पूर्व दिशा में नरोखर नाला है, जो वरूणा नदी में जाकर मिलता है। विदुला जायसवाल के निर्देशन में अकथा का उत्खनन करवाया गया, जिससे पाँच सांस्कृतिक चरणों के अवशेष प्राप्त हुए ।

सांस्कृतिक कालानुक्रम-

प्रथम काल -ई.पू. 1200 – ई. पू. 700/600 -पूर्व उ.कृ.मा.मृ. कालद्वितीय काल -ई.पू. 600 – ई.पू. 200 -उ.कृ.मा.मृ. कालतृतीय काल -ई.पू. 200 – प्रथम शताब्दी ई.पू.-शुंगकालचतुर्थ काल -ई. सन् के प्रारम्भ से तृतीय/चतुर्थ शताब्दी ई. -कुषाणकाल पंचम काल -तृतीय शताब्दी ई. – छठी शताब्दी ई. – गुप्तकाल

राजघाट (वाराणसी)-

वाराणसी, प्राचीन काशी महाजनपद की राजधानी थी। दीघनिकाय के महापरिनिब्बाण सुत्त तथा महासुदस्सन सुत्त में वाराणसी की गणना बुद्धकालीन भारत के छः प्रसिद्ध महानगरों में की गई है । दिव्यावदान में वाराणसी को एक समृद्धशाली, विस्तृत और जनाकीर्ण नगर के रूप में वर्णित किया गया है बुद्ध पूर्व काल में काशी एक स्वतंत्र एवं समृद्ध राज्य था, इसकी प्रशंसा स्वयं गौतम बुद्ध ने की है । बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से वाराणसी का विशेष महत्व है। बुद्ध ने धर्मचक्र का प्रवर्त्तन वाराणसी के ही इसिपतन मिगदाय (सारनाथ) में किया था। प्रथम वर्षावास के पश्चात् वाराणसी के श्रेष्ठि पुत्र यश और उसके साथियों की प्रव्रज्या यहीं हुई थी। भिक्षुओं की संख्या साठ हो जाने पर उन्हें चारों दिशाओं में धर्म प्रचार हेतु भेजकर स्वयं गौतम बुद्ध उरूवेला होते हुए राजगृह गये थे । जातक कथाओं में वाराणसी नगर को सुदस्सन, सुरूद्धन, ब्रह्मवड्ढन, पुफ्वती, रम्मनगर तथा मोलिनी आदि उपनामों से सम्बोधित किया गया है ।

गौतम बुद्ध के जीवन काल में वाराणसी के एक समृद्ध व्यापारिक नगर होने का उल्लेख मिलता है। कई प्रसिद्ध व्यापारिक पथ वाराणसी से होकर जाते थे। गौतम बुद्ध ने वाराणसी आगमन के समय इन्हीं मार्गों का प्रयोग किया था। राजगृह से तक्षशिला जाने वाला व्यापारिक मार्ग वाराणसी से गुजरता था। वाराणसी से राजगृह और श्रावस्ती जाने वाले पथ पर बुद्ध के विचरण करने का उल्लेख बौद्ध साहित्य में प्राप्त होता है । वैशाली से नदी मार्ग से पाटलिपुत्र होते हुए वाराणसी तक के आवागमन का भी विवरण प्राप्त होता है ।

प्राचीन काल में वाराणसी नगरी अपने सुन्दर, बहुमूल्य वस्त्रों के लिए भी प्रसिद्ध थी। संयुक्त निकाय के अनुसार काशी का बना हुआ वस्त्र श्रेष्ठ होता है । काशी के विभिन्न रंग के वस्त्रों का उल्लेख महापरिनिब्बाण सुत्त में भी प्राप्त होता है । काशी की ख्याति एक व्यापारिक स्थल के रूप में थी। उत्तरापथ के घोड़ों का एक बड़ा बाजार वाराणसी में लगता था, सैन्धव घोड़े भी वाराणसी के बाजार में बिकने हेतु लाये जाते थे। वाराणसी नगर के समीपवर्ती क्षेत्र में शिल्पग्रामों का उल्लेख प्राप्त होता है, यथा – दन्तकार विथि, बड्ढकिग्राम, नेसाद ग्राम आदि ।

बुद्धकाल में वाराणसी उत्तर भारत के एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में विख्यात थी । वाराणसी की कुछ शिक्षण संस्थाएँ तक्षशिला से भी प्राचीन थी। तक्षशिला जैसे प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र के एक ब्राह्मण ने अपने पुत्र सुसीम को वाराणसी में अध्ययनार्थ भेजा था । यह उद्धरण शिक्षा केन्द्र के रूप में वाराणसी  के महत्व का प्रमाण माना जा सकता है।

पाँचवीं सदी ई. में फाह्यान वाराणसी आया था। कुक्कुट पादगिरि से पश्चिम दिशा में पाटलिपुत्र की ओर गंगा के किनारे चलते हुए 10 योजन की दूरी पर आटवी विहार आया था। यहाँ से पुनः गंगा के किनारे 12 योजन की दूरी तय कर फाह्यान वाराणसी आया था । इस प्रकार कुक्कुट पादगिरि से वाराणसी की दूरी 22 योजन थी ।

सातवीं शताब्दी ई. में ह्वेनसांग कुशीनगर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग 500 ‘ली’ की दूरी तय कर वाराणसी आया था। उसने वाराणसी  ;च्व.सव.दं.sमद्ध राज्य को 4000 ‘ली’ की परिधि में विस्तृत बताया है। राजधानी गंगा नदी के पश्चिम तट पर थी, जिसका विस्तार लम्बाई में 18 ‘ली’ तथा चौड़ाई में 5-6 ‘ली’ था । ह्वेनसांग के अनुसार उस समय वाराणसी में 30 संघाराम थे, जिसमें हीनयान के सम्मितीय निकाय के 3000 भिक्षु निवास करते थे। वाराणसी राज्य में 100 देव मंदिर थे, जिसमें 20 राजधानी में स्थित थे। इनमें 10,000 अन्य मतावलम्बी रहते थे। ह्वेनसांग ने यहाँ एक 100 फीट ऊँची देव प्रतिमा का भी उल्लेख किया है ।

पुरातात्त्विक अन्वेषण-

प्राचीन वाराणसी (उ.अ. 2504’30″; पू.दे. 8301’30″) को वर्तमान राजघाट से समीकृत किया गया है। यह नगर गंगा के बाँये तट पर अर्द्ध चन्द्राकार रूप में बसा है । शेरिंग, मरडाक, ग्रीब्ज आदि विद्वानों के मतानुसार प्राचीन वाराणसी वर्तमान नगर के उत्तर में सारनाथ के समीप स्थित थी और इसका विस्थापन मुख्यतया दक्षिण की ओर हुआ है। सारनाथ के समीप अकथा  के उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर, उपर्युक्त विद्वानों के सुझाव पर पुनर्विचार किया जा सकता है। रामलोचन सिंह के अनुसार वाराणसी नगर की मूल स्थिति प्रायः उत्तरी भाग में स्वीकार करनी चाहिए । वाराणसी नगर गंगा के उत्तरी किनारे पर है, जिसका विस्तार लगभग तीन मील क्षेत्र में है। वाराणसी के धरातल की संरचना ठोस कंकड़ों से हुई है। आधुनिक राजघाट का समतल मैदान, जहाँ नदी-नालों के कटाव नहीं मिलते, नगर बसाने हेतु उपर्युक्त था। ऊँचाई पर बसे होने के कारण नगर को बाढ़ से भी कोई खतरा नहीं था ।

प्राचीन वाराणसी (राजघाट) की खोज 1939 ई. में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के समय हुई। तत्पश्चात् 1940 ई. में कृष्णदेव ने यहाँ पर उत्खनन करवाया और उ.कृ.मा. मृदभाण्ड तथा अनेक मुद्राएं प्राप्त किया। इनके अध्ययन के आधार पर कृष्णदेव ने यह मत प्रतिपादित किया कि वाराणसी और पश्चिम राष्ट्रों (यूनान एवं रोम) के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध था ।

राजघाट पुरास्थल का व्यापक स्तर पर उत्खनन 1957 व 1960-69 ई. के मध्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा अवध किशोर नारायण के नेतृत्व में करवाया गया। इस उत्खनन से वाराणसी की प्राचीनता ई.पू. 800 तक ज्ञात हुई।

राजघाट के उत्खनन से छः सांस्कृतिक चरणों के अवशेष प्राप्त हुए, जिन्हें ई.पू. 800 से आधुनिक काल के मध्य रखा गया है –

प्रथम ‘अ’ काल – ई.पू. 800 – ई.पू. 600

प्रथम ‘ब’ काल – ई.पू. 600 – ई.पू. 400

प्रथम ‘स’ काल – ई.पू. 400 – ई.पू. 200

द्वितीय काल – ई.पू. 200 – ई. सन् के प्रारम्भ तक

तृतीय काल – ई. सन् के प्रारम्भ  – 300 ई. तक

चतुर्थ काल – 300 ई. – 700 ई.

पंचम काल – 700 ई. – 1200 ई.

षष्ठ काल – 1200 ई. – आधुनिक काल तक वाराणसी के उपर्युक्त दोनों प्रमुख पुरास्थलों के सिंहावलोकन से स्पष्ट होता है कि वाराणसी में आवासीय गतिविधियॉ आज से लगभग 4000 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई और निरतंर विकसित होते हुये महाजनपद की राजधानी बनी। राजघाट से प्राप्त प्रमाणो के बाद के साक्ष्य स्मारकों के रूप में वाराणसी नगर में बहुतायत संख्या में प्राप्त है, जो हमारी धरोहर है। इनका संरक्षण हम सभी का सम्यक् दायित्व है।

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  34. सिंह, बीरेन्द्र प्रताप. 1985. लाइफ इन एंशिएण्ट वाराणसी (ऐन एकाउण्ट बेस्ड ऑन आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स). संदीप प्रकाशन, दिल्ली.

डॉ0 सुभाष चन्द्र यादव
(क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी)
वाराणसी।