लाल खाँ का रौजा (मकबरा)

लाल खाँ का मकबरा काशी में मुगल काल के दौरान बनाई गयी मकबरों में से एक है। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) के अनुसार लाल खाँ मुगलकाल में फर्रूखसियर के शासन काल में काशी के स्थानीय शासक थे। संभवतः जिनका महल राजघाट के समीप गंगा के तट पर था, जो अब लाल घाट के नाम से प्रचलित है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि लाल खाँ, काशी नरेश बलंवत सिंह के सिपहसालार थे, और उन्होंने काशी राज के सामने यह इच्छा जाहिर की थी कि मरने के बाद भी वह रामनगर स्थित किले का दीदार कर सकें, अतः राजा बलवंत सिंह ने उन्हें यह जगह प्रदान कर दी। सन् 1770 में बलवंत सिंह का स्वर्गवास हो गया। तत्कालीन काशी नरेश ने 1773 में पूर्वजों के सम्मान के लिये इस मकबरें का निर्माण कराया। इनका मकबरा राजघाट पुल (मालवीय ब्रिज) के पास आज भी है। मुगलकालीन स्थापत्य एवं वस्तु कला का सुन्दर स्वरूप इस मकबरे पर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। एक आयताकार भूभाग पर स्थित इस गुम्बदाकार रौजे (मकबरा) के चारों ओर समान दूरी पर चार बुर्ज बने हुए हैं, जिसमें से एक बुर्ज शेरशाह सूरी राजमार्ग बन जाने के कारण सड़क के दूसरी ओर चला गया। रौजा परिसर की बुर्ज तो ठीक-ठाक है पर सड़क के दूसरी ओर स्थित बुर्ज को मरम्मत की आवश्यकता है। गुम्बदाकार विशाल मकबरे को रंगीन ग्लेज्ड टाइल्सों से सजाया गया है तथा रौजे के प्रवेश द्वार पर उर्दू में कुछ लेखांकन भी है। वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। कुछ समय पूर्व खुदाई के दौरान यहां काशी के प्राचीन समय  के कुछ अवशेष प्राप्त हुए थे। कैण्ट स्टेशन से लगभग 6 किलो मीटर की दूरी पर यह मकबरा स्थित है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक यह आम लोगों के लिए खुला रहता है तथा रविवार को बन्द रहता है।

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